#ठेठ_पलामू:कलश स्थापना
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“#नन्हका_बाबू! इस बार भी दशहरा में गाँव नहीं आओगे क्या? अच्छा वहां तो पंडाल वगैरह कुछ तो बनता होगा ना? अमेरिका में भारतवासी लोग मूर्ति नहीं रखते क्या? कलश स्थापना के कुछ दिन रह गए हैं, घर में एक कलश रख लेना मंगल धागे से लपेट कर, थोड़ी सी रेत बिछा लेना कमरे के पूरब वाली दिवार के नीचे और हो सके तो जौ ....”
सिग्नल नहीं आने के बहाने से उसने विडियो कॉल डिसकनेक्ट किया , भीगी पलकों से टपकती बूंदों के साथ खुद भी बह चला बचपन की यादों में.
तब मुश्किल से चौथी जमात में था वह जब #मनोहर_पोथी और बाल भारती के अलावा सफ़ेद जिस्ते की कॉपी बनाने और उसके ऊपर डिजाईनदार आयत बनाकर उसमे नाम, कक्षा, गाँव, पोस्ट, थाना, जिला, राज्य, देश सब के नाम लिखता था. क्या पता था कि आसपास के ये नाम भी इतने दूर हो जायेंगे. छोटी बहन ने मोबाइल से उसके बचपन की गणित कॉपी की तस्वीर भेजी थी . #पटवट वाला घर इस बारिश में ढह गया था, उसी में से बरामद हुए थे ये सब रद्दी के कागज और #चम्पक_नंदन के कुछ पन्ने जिनकी कहानियों को वो अक्सर सच मान लेता था तब. उसे लगता था सच में जंगल में नदी का सुन्दर किनारा होता है जिसके किनारे मीकु बन्दर ,चीकू खरगोश और वह मिलकर दुनिया भर की बातें करेंगे. वह उन्हें कंप्यूटर और टीवी के बारे में बताएगा तो कितने खुश हो जायेंगे वे सब. फिर तो पुरे जंगल में उसकी खूब प्रसिद्धि होगी. क्योंकि वो शाकाहारी है इसीलिए जंगल के सारे जानवर उसके दोस्त ही होंगे. सच वो कहानी ही बहुत सुन्दर थी या बचपन की मासूम कल्पना या फिर वो समय?
फिर लाल पीले #कोह्चन_पेपर...ओह जैसे परीक्षा न हो कोई पर्व हो. नहा-धोकर नए कपडे पहनकर सब को प्रणाम कर स्कूल जाना और लौटते वक़्त देखते आना कि मूर्ति निर्माण शुरू हुआ कि नहीं? गज़ब का कौतुहल पुरे ग्रुप में! तुक्के लगते कि ये वाली जो सबसे बड़ी है ये तो दुर्गा की ही होगी लेकिन ये जो चार मूर्तियाँ एक बराबर की हैं, ये कौन कौन हैं?
कलशयात्रा, रामायण पाठ, लाउडस्पीकर की आवाज़, हर चौक पे चल रहे प्रवचन वाले महाराज जी के ज्ञान के चर्चे. घर में चाची-दादी की तैयारियों की सुगबुगाहट, जल्दी जल्दी सब को खाना खिला के प्रवचन सुनने जाने की प्लानिंग, दीदी टाइप की गाँव की बेटियों का नया नया सलवार सूट सिलवाना और फिर #लहसते हुए पुरे गाँव में घूम के दिखाना. लड़के भी कहाँ पीछे थे, चार भाइयों के एक ही थान के कपडे से बुशर्ट सिलवाना मगर पैन्ट बड़े भाई का मंझले को और फिर छोटे को ट्रान्सफर हो जाना बिना किसी मैचिंग की फरमाइश के.
शाम होते ही बैलून, सिटी, #फोंफी, बन्दूक, प्लास्टिक की कार, तोता, लूडो, डमरू और #चिनिया_बादाम. उन खिलौनों से खेला कभी नहीं उसने, सब सहेजकर रखता जाता था किसी दिन के लिए. पता नहीं ढहते हुए मिटटी के घर के किसी #दिरखे या कोठी में अभी भी छुपे हों.
सालों बीत गए. नकली हवाई जहाज से असली हवाई जहाज के बीच के सफ़र में कितना कुछ छुट गया. कितने रिश्ते टूट गए. वह खुद कितनी बार टुटा रेस में भागते भागते, और अब अकेला परदेस में नदी के किनारे से रेत उठाता हुआ सोच रहा था, इस बार ये आखिरी कलश स्थापना है अमेरिका में. रिसर्च पूरा होते ही भाग जायेगा अपने गाँव में जहाँ कोई डाटा उसे परेशां नहीं करेगा अलार्म क्लॉक के साथ, जहाँ कैलंडर उत्सवों के लिए उत्साह से देखे जाते हैं, न की असाइनमेंट की डेड लाइन्स की फटकार के लिए.
काश कि सफलता की उड़ान उसे इतनी ऊँची नहीं ले जाती, काश कि वो भी बचपन में ज्यादा पढने वाला बच्चा नहीं बनता...
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