Saturday, October 29, 2022

"उग हे सुरुज देव... भेल भिनसरवा... अरग के बेरवा..."

छठ के गीत सुनते ही चेहरे पर मुस्कान और ह्रदय में भक्ति आ जाती है। व्रत पास आते ही, अपने साथ लाती है, उत्साह भरी तैयारियां; सूखते हुए गेंहू, मिटटी के चूल्हे, आम की सूखी लकड़ियां, रेत, ईख, सूप, ढेरों फल और फिर बनता है हमारा प्रिय प्रसाद- 'ठेकुआ'....!
बचपन मे छठ के ठेकुए का इंतज़ार तो सारे लोगों को होता था। लगता था कब भोर वाली दूसरी अर्घ्य आ जाये और हम जमकर ठेकुआ, ईख और बाकि प्रसाद खाएं, लेकिन असली टारगेट तो सूप वाला काजू-किसमिस-छुहाड़ा-गड़ी रहता था। दिन भर चलता था ईख चबाने और ठेकुआ खाने का सिलसिला। इस ठेकुवे के सिलसिले के बाद में, माँ ठेकुआ पसंद लोगो को दोबारा खिलाने के लिए ढेरों और ठेकुआ बनाती थीं। पर छठ के लिए बने ठेकुवे की बात ही कुछ और होती है, एक अलग सा छठ वाला स्वाद होता है उसमें।
आज भी ठेकुआ से मेरा प्यार वैसा ही है।
खैर, व्रत की शुरुआत होते ही कठिन नियम के अनुसार सारी चीज़ों को शुद्ध स्थान पर रखने से लेकर व्रतियों के एक स्थान पर रहकर, तन-मन से शुद्धता व एकाग्रता का पालन करना, हमें ऐसे कई यादों से भर देता है, जब हम बच्चों को व्रत संपन्न होने तक पूजा घर में जाने की अनुमति नहीं होती थी। दादी और फुआ, छठ के पूरे समय पूजा घर में ईश्वर में ध्यान और एकाग्रता के साथ तैयारी करती थीं। पता नहीं 36 घंटे का उपवास दादी और उनकी तरह लाखों अन्य व्रती, इतनी प्रसन्नता से कैसे कर लेती थीं। ऐसे ही इन व्रतियों को पूज्य नहीं माना जाता। कोई दिव्य शक्ति ही है, जो इनकी रक्षा करती हैं।
नहाय खाये के स्वादिष्ट खाने के बाद हमें इंतज़ार होता था खरना(खड़ना) का, जब दादी द्वारा मिटटी के चूल्हे पे बनाये गुड़ के खीर वाली प्रसाद से तृप्त होते थे, हमारे साथ-साथ हमारे आस-पास के कई सारे लोग..और सबके साथ खुशियां दुगनी हो जाती थी।
अगले दिन संध्या अर्घ्य के लिए घर के लोग दौउरा सूप लेकर घाट पर जाते..जहाँ का नज़ारा ही देखने लायक होता था..आज भी होता है, लेकिन परदेश में रहने के कारण अब तो सिर्फ वीडियो में ही देख पाती हूँ। बाद में छठ घर के कुआँ पर होने लगा, पर वातवरण बिलकुल वैसा ही रहा, पवित्र और अलौकिक।
सजे हुए घाट पे ईख, जोड़े सिन्दूर में गीत गाती महिलाएं और भीनी शीतलहर वाले वातावरण में अद्भुत आध्यात्मिक एहसास कराती थी। हर तरफ से दिए में जल रहे घी और अगरबत्ती की सुगंध और शारदा सिन्हा की आवाज़। लगता था दोनों दिन प्रकृति के सबसे बाल रूप की ताज़गी को महसूस कर रहे हों। आज भी हर तरफ छठ बिलकुल वैसा ही है, आज भी नदियों के घाट का सुन्दर दृश्य मन को अपनी ओर खींच लेता है। संध्या अर्घ्य के बाद कुछ देर शान्ति से बैठना, सूर्य देव की आराधना, आदित्य हृदयँ जैसे पाठ..असीम शांति दे जाती है।
थोड़े बचे श्रद्धालुओं के बीच बिलकुल शांत वातावरण में बहती नदी के समक्ष ढलते सूर्य को देखना, जीवन में बहुत कुछ सीखा जाती है। जीवन उगता ढलता है, पर सृष्टि का चक्र यूंही चलता रहता है। समय बहती नदी सा बीतता रहता है।
अब उत्साह होता, अगली सुबह भोर में उठकर तैयार होकर घाट पर जाने का। भोरे-भोर छठ के गीत से वातावरण आनंदमयी और हृदय भक्तिपूर्ण हो जाता था। मैं भी साथ-साथ गीत गाती थी और तब से ही छठ गीत मेरा सबसे प्रिय गीत रहा है। मुझे छठ व्रत में कभी ठण्ड महसूस नहीं हुई। दिवाली में हलकी लगती थी और दूसरे अर्घ्य के होते ही अगले दिन से बहुत ठण्ड लगने लगती थी।
भोर के हलके अँधेरे और भीनी ठण्ड में व्रतियों का उत्साह ऊर्जा और निष्ठा हमसब में आस्था की अपनी जगह बना देती थी। भोर का अर्घ्य सूर्य देव के उगते ही सही समय पर दिया जाता है। उस दिन हम सबको सूप पे अर्घ्य देने मिलता था।
छठी मईया और सूर्य देव की ध्यान उपासना, दीये, के बाद हवन करके व्रत का समापन। हमलोग छठी मईया से सभी के स्वास्थ्य, सुख, शांति की प्रार्थना: करते थे और व्रतियों के चरण स्पर्श कर आशीर्वाद और प्रसाद लेते थे, जिसका हमें बेसब्री से इंतज़ार होता था। उस दिन घर पर रिश्तेदार, परिवार और आस-पड़ोस के लोगों की बहुत भीड़ होती थी। सबके लिए आशीर्वाद और प्रसाद कीमती होते थे, छठ जो है। कई लोग अर्घ्य देने भोर में भी आकर हमारा साथ देते थे।
उगता हुआ..आसमान चढ़ता हुआ सूर्य धीरे-धीरे सब कुछ अपनी रोशनी के अगोश में भर देता और हम देखते रह जाते। ऐसे ही अपने जीवन में आगे बढ़ने और उन्नती करने की प्रेरणा लेते हुये..!
छठ हमें बहुत कुछ सीखा जाती है। हमारी झोली में स्नेह आशीष भरने के अलावा जीवन के उतार-चढ़ाव, उनके महत्व और समय के कभी न रुकने का सन्देश दे जाती है। ढलते सूर्य की उपासना हमें अपने या दूसरों के गिरते, ढलते वक़्त को भी सम्मान देना सिखलाती है। छठ व्रत आज भी वैसा है, पर समय के साथ लोग बदल गए। आज भी छठ की आनंदमयी छवि मन में समायी है। छठ अलौकिक शक्ति और सुख प्रदान करने वाला महापर्व है.. और सदा रहेगा..!
छठी माई के किरपा सबे लोगन पर बानल रहे। छठी माई बुलइहें घाट पर, त अबरी छठ हमहूँ नदी घाट पर देखे पारब।
जय छठी मईया।
© आभा रश्मि
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Friday, October 28, 2022

कूटे ला सबे भईया के दुश्मन दिनों रात चारो पहिर!

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जरा कल्पना कीजिए दिवाली के कुछ दिन बाद ही उत्तरी भारत की एक सांस्कृतिक जनसंख्या..मान लीजिए कि अपना पलामू ही आपके आंखों के सामने है... लोग एक बार फिर नया नया कपड़ा पहिन के चवनिया स्माइल बिखेरते दिख जाते हैं. औरतें बूट, बजरी, रेंगनी का कांटा इक्कठा करते, लालाजी लोग में पुरुष औऱ बच्चे अपनी विद्वता प्रदर्शित करने कलम दवात का इंतजाम करते हैं.
भाईदूज यानी गोधन /यमद्वितीया में बजरी कूटना मतलब अपने भाई को वज्र सा ताकतवर बनाने की कामना करना, जिससे वो अपने कष्ट क्लेश का मुक़ाबला आसानी से कर सकें. लकड़ी, डंडा जो मिले उससे दिवाली के बचे-जले मिट्टी के खप्पर, दीयों, नारियल औऱ बजरी को कूट काट के बराबर कर देना, लड़ भीड़ जाना, यमराज माने मृत्यु से भी टकरा जाना- क्यूंकि यमराज, यमीन की ही छवि तो बनती है गोबर मिट्टी से लीप के. यद्यपि मृत्यु के देवता का इतना वीभत्स चित्रण क्यूँ होता समझ से परे है. जैसे जन्म शाश्वत सत्य है वैसे ही मृत्यु भी...
जन्म मृत्यु, पाप पुण्य, कर्मों का लेखा जोखा रखने वाले श्री चित्रगुप्त महाराज की पूजा भी उसी दिन होती है उनके वंशजों द्वारा - लालाजी लोग करते हैं. लिखाई पढ़ाई से छुट्टी एक दिन के लिए.
ये कैसी विडम्बना है कि मृत्यु देवता से भयभीत हो लोग उनकी भ्रतसना कर रहें है, वहीँ उनके लेखाकार चित्रगुप्त महाराज को खुश करने कि कवायद. अजीब दोमुँहा ऐटिटूड है भाई.
अब आपको लिए चलते हैं दक्षिणी दिल्ली के एक कॉलेज में जहाँ पढ़ती है छोटे शहर क़ी स्वाति. स्वाति को उस समय घनघोर कल्चर शॉक मिला ज़ब पता चला कि उसकी कक्षा के 60% सहपाठी किसी ना किसी तरह का नशा करते हैं, क्या लड़का क्या लड़की, हेप दिखना है तो शराब औऱ नशा फैशन ट्रेंड हैं. वो बात अलग है कि स्वाति को ऐसी कोई तमन्ना नहीं थी हेप लगने क़ी... इसलिए बात बिगड़ी नहीं.
वहीं दिल्ली की तस्वीर के ठीक विपरीत एक और तस्वीर पेश है जालंधर आए प्रहलाद की. प्रह्लाद पलामू के सिमरिया का पहला नवयुवक था जो पढ़ लिख कर जूता बनाने क़ी फैक्ट्री में काम करने हेतु मैनेजर बन के दूर शहर जालंधर गया था. उसके गांव के बाकी साथी या तो क़ृषि योग्य भूमि क़ी गांव में अनुपलब्धता के कारण बेकार बैठे थे या फिर पूरी तरह से नशे में गिरफ्त, शराब में धुत्त गृहस्थी को ढोने के लिए मजूरी वाला छिटपुट काम कर लेते थे. प्रह्लाद को क्षोभ होता था उन्हें अपना दोस्त कहने में. किन्तु पंजाब के हालात भी काफी अच्छे नहीं थे. उड़ता पंजाब के किस्से लोकप्रिय तो हैं ही.
अब आइए लौटते हैं अपने डाल्टनगंज के साहित्य समाज चौक पर. मधु माई उम्र के चालीसवे दशक में हैं. घरों में झाडू,पोंछा, बर्तन धोने का काम करती हैं. उनके पति औऱ सुपुत्र दोनों को जबरदस्त चरस, गांजा क़ी लत्त लग गयी है. घर क़ी माली हालत सब बिकने के कगार पर पहुँच चुकी है. बस उनको खुद के हाथों का ही आसरा, ऐसे में क्या गोधन औऱ क्या कोई त्यौहार, वो बिना नागा किये हर दिन बोझिल क़दमों से ही सही सुबह निकल पड़ती हैं. भले ही आँसू से आँखों के काले घेरे औऱ सुर्ख हुए जा रहे हों. साहित्य समाज चौक से ढलकते ही छोटी दुकानों में कई सारी रंगीन खैनी के डब्बों को देख उनको अपनी भतीजी क़ी याद आ जाती है जो उन्हें खिलौने समझ खरीदने क़ी ज़िद्द करती थी. काश मधु माँ समय से अपने बेटा औऱ आदमी दोनों को उसी समय रोक पाती जब उनकी शुरुआत खैनी खाने से हुयी थी.
इतने सारे दृश्यों की झलकी के बाद अब दृष्टांत क्या?
एक सवाल आप सब से - सिर्फ त्यौहार के हरेक रीती रिवाज़ को बारीकी से मानना जरुरी है, या फिर जब इन त्योहारों को बनाया गया होगा तो उसके पीछे छिपी भावना क्या थी इस बात को समझना?
मंगलकामना करो बहिनों लेकिन अपने बांधवों, खुद के अंतर में व्याप्त बुराईयों डर को सबसे पहले शमन करो. यमराज/मृत्यु से डरने औऱ चित्रगुप्त महाराज को घटा के अपने मुनाफा का लेखा जोखा लिख के देने क़ी बजाय त्यौहार उल्लास के साथ मनाइये. फिर हर त्यौहार रोशन होगा औऱ हर व्यक्ति खुशहाल.
©शिवांगी
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Tuesday, October 25, 2022

ठेठ पलामू की तरफ से छोटी सी सौगात

ठेठ पलामू की लघु फिल्म "मोह माटी के" में सहृदय भागीदारी लेने के लिए पिढ़िया बाजार, सरजा, पोलपोल के प्रजापति परिवार का हम रहे दिल से शुक्रिया अदा करते हैं. आप माटी के जादूगर हैं. अपने व्यस्त सरल जीवन के कुछ लम्हों को हमे कैमरा में कैद करने की इजाजत देने के लिए हम आपके आभारी हैं.
ये हमारी एक छोटी सी कोशिश थी अपनी माटी अपनी बोली को सहेजने संवारने के लिए. कृपया इसे स्वीकार कर हमें आह्लादित होने का अवसर दें. 🙏🙏

Sunday, October 16, 2022

वो कॉमिक्स की दुनिया थी दोस्त

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कहा जाता है ना कि
"जो ना मिला हड़प्पा की खुदाई में,
वो भी मिला घर की सफाई में।"
मां के बहुत चिल्लाने पर, मैने भी इस बार अपने रूम की सफाई की, तो छज्जा पर एक पेटी में मुझे जैसे खजाना मिल गया। सोचा की आप लोगों से भी अपने दिल की बात शेयर कर ली जाए। पेटी खोलते ही जैसे किसी दूसरी दुनियां में पहुंच गया, पूरा का पूरा पेटी ही पुरानी-पुरानी कॉमिक्सों से भरा पड़ा था।
अब क्या कहें, इस कॉमिक्स के चक्कर में हम पापाजी से कितनी बार 'बाटा और चाटा' खाये हैं। मैं था भी तो एक नंबर का शैतान, कॉमिक्स की लत ऐसी कि पढ़ते समय भी किताब में कॉमिक्स छुपा कर पढ़ने लगता था। पकड़े जाने पर मार खाने से उतना डर नहीं लगता था, जितना पापाजी के कॉमिक्स फाड़ देने से लगता था। फिर तो दंड भी बड़ा भारी भरना पड़ता था। आज के बैंक के लोन से भी ज्यादा डरावना लगता था, वो कॉमिक्स को चुकाने का दंड।
अब कमाई-धमाइ तो उस वक़्त एक रुपया थी नहीं, तो रोज-रोज नया-नया कॉमिक्स कहाँ से आये? कॉमिक्स की दुनिया की एक अलग ही अर्थव्यवस्था थी, जो बार्टर सिस्टम से चलती थी। बोले तो अदल-बदल कर पढ़ने की जुगाड़ की टेक्नोलॉजी। एक बढ़िया कॉमिक्स खरीद लेने पर, उससे बदल-बदल कर ढेरों कॉमिक्स पढ़ लेते थे। फिर भी कोई जुगाड़ नहीं लगा, तो भाड़ा पर कॉमिक्स तो मिलता ही था। उस वक़्त बाजार में अधिकतर श्रृंगार स्टोर और किराना दुकान में भाड़ा पर कॉमिक्स चलाया जाता था, लेकिन पहले कॉमिक्स का पूरा दाम सिक्युरिटी मनी के रूप में जमा करा लिया जाता था।
उस वक़्त हम बच्चों में कॉमिक्स ढांपना एक कला के रूप में प्रसिद्धि पा चुकी थी। बोले तो किसी का कॉमिक्स लेकर अगले दिन सफेद झूठ बोल देना कि पापा ने कॉमिक्स फाड़ दी या फिर माँ ने कॉमिक्स जला डाली। अब अगर सामने वाला आपसे ज्यादा बाहुबली है, तो गए आपके पैसे पानी में। कुछ लड़कों का तो काम ही था मांग कर पढ़ना और कभी नहीं लौटाना।
जो लड़का कॉमिक्स नहीं पढ़ता था, उसको हमलोग मंदबुद्धि मानते थे, बोले तो इसको कुछ समझ नहीं आता दिन दुनिया के बारे में। दोस्तों के बीच ज्यादातर बातें कॉमिक्स के प्लाट, उसके हीरो, एक्शन और सस्पेंस पर ही होती थी। 'नागराज' और 'सुपर कमांडो' ध्रुव सबसे ज्यादा पसंदीदा हीरो थे। फैंटेसी पसंद करने वालों को नागराज पसंद था, तो खुद को बुद्धिमान मानने वाले ध्रुव के फैन थे। दोनों की लड़ाई में कौन जीतेगा ये एक भारी विवाद का विषय था। कॉमिक्स में हरेक पाठक वर्ग को ध्यान में रखा जाता था। हिंसा पसंद करने वालों के लिए 'डोगा' और 'भेड़िया' थे, तो कॉमेडी ऑडियंस के लिए 'बांकेलाल' और 'हवलदार बहादुर'। आज जो एपिक कहानी जैसे 'गेम ऑफ थ्रोन्स' और 'लार्ड ऑफ द रिंग्स' देखते हैं, उस वक़्त भोकाल, योध्दा और अश्वराज पढ़ते थे। जो आज 'शरलॉक होम्स' और 'जेम्स बांड' पसंद करते हैं, उनके लिए हमारा देशी ब्रांड चाचा चौधरी था।
जिस बच्चे के पास जितनी ज्यादा कॉमिक्स होती थी, वो उतना ही पॉपुलर था। ज्यादा कॉमिक्स का कलेक्शन रखने वाला खुद को ग्रुप का लीडर समझता था और बाकी बच्चे भी उसकी बातों को काफी तवज्जो देते थे। कहने का आशय ये है कि बच्चों में अमीरी नापने का पैमाना कॉमिक्स ही था। अगर आप कोई नया कॉमिक्स नहीं पढ़े हैं, तो आपको बाल समाज में आउटडेटेड माना जाता।
कॉमिक्स के साथ मिलने वाला मैग्नेट स्टीकर और पोस्टर में तो हम बच्चों की जैसे जान बसती थी। उस वक़्त दोस्ती भी अधिकतर कॉमिक्स के लेन-देन के कारण ही होती थी। आज भी मेरे आधे से ज्यादा दोस्त बचपन में कॉमिक्स ग्रुप वाले ही हैं। नंदन-चम्पक को हमलोग बच्चों को ठगने वाला साहित्य मानते थे, वो बड़ा ही नीरस लगता था पढ़ने में। कभी-कभी आने वाला मल्टी स्टारर विशेषांक, जो थोड़ा महंगा भी आता था, बहुत डिमांड में रहता था। कोई भी कॉमिक्स खरीदने के पहले लास्ट में 'क्रमशः' जरूर देखते थे, वरना आधी कहानी पर पैसे क्यूँ बर्बाद करना।
कुछ कलाकार बच्चे कॉमिक्स के हीरो-हीरोइन का स्केचिंग और ड्राइंग बनाते थे। अब स्कूल की मैडम को ये बात तो पता थी नहीं कि डोगा का चेहरा कुत्ते जैसा दिखता है, तो बेचारे डांट भी खूब खाते थे।
जैसे शराब और सिगरेट का नशा पहले मुफ्त में चखा कर लगाया जाता है, वैसे ही कॉमिक्स की लत भी यार दोस्तों को पहले मुफ्त में पढ़ा कर ही लगाई जाती थी। एक बार बच्चे को कॉमिक्स की लत लग गयी, तो फिर वो अपने ग्रुप का रेगुलर सदस्य बन जाता था।
ओह रे बचपन!!! एक अलग ही मायावी दुनियां थी इसकी। अब तो मल्टीप्लेक्स में सिनेमा देखने में भी वो रोमांच और सुकून नहीं आता है।
अगर आप भी इस दौर से वाकिफ हैं, तो अपने अनुभव कॉमेंट बॉक्स में जरूर शेयर करें। साथ ही अपने पसंदीदा हीरो और कॉमिक्स का नाम लिखना ना भूलें।
© सन्नी शुक्ला
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Wednesday, October 12, 2022

हम केकरो से कम हैं क्या ???

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"अपने हुनर को कम ना आंक तू,
किसी से ना डर, ना घबरा तू,
अभावों का क्या है?
ये तो वक़्त का पहिया है,
कभी घना-घना,
तो कभी मुट्ठी भर चना है।"
अभावों में ही तो प्रतिभा निखर कर हुनर का रूप लेती है। सारी सुख सुविधाओं में तो खुद भी अपनी प्रतिभा की कद्र नहीं रहती।
एक पूरा मोची मोहल्ला है, जिन्होंने 10 वर्ष पूर्व कोलकाता जा कर, एकदम सही तरीके से मशीन की ट्रेनिंग ली थी; जूते, चप्पल, बैग, वॉलेट इत्यादी बनाने की। पर सरकारी वित्तीय सहायता बंद होते ही, उन सब को बस स्टैंड, रेलवे स्टेशन के पास बूट पोलिश/ठेले की दूकान खोलना ज्यादा श्रेयस्कर लगा। यही हाल ज़रदोज़ी कढ़ाई, कांथा में ट्रेनिंग पाए पोलपोल, चियांकी, सतबरवा और रेड़मा के 300 कुशल गृहणियों के साथ भी हुआ। बढ़ावा और सरकारी सहायता लगातार ना मिल पाने के कारण शायद उनके दक्ष हाथ सहायता की आस में कहीं खो गए, स्वरोज़गार के सपने तो चूल्हे चौकों में छिप कर सो गए।
वैसे तो छोटे और मंझौले उद्योगों को बढ़ावा देने के लिए उद्योग विभाग भी है, पर पूरी सरकारीपने से ग्रस्त। हर साल कला, गृह उद्योग, हस्तकरघा, हस्तकला में उत्कृष्ट योगदान के लिए पुरस्कारों का प्रावधान है, लेकिन प्रयास तभी सफल हो पाएंगे ना, जब उसकी उचित पहचान करने वाला कोई हो? लालफीताशाही और कभी ना भरने वाला पेट, किसी का भला होने दिया है आज तक भला!
किनत्सुकि एक जापानी कला है; टूटी हुयी सिरेमिक के बर्तनो में दरार को सोने से भर देने की, जिससे की वो ना सिर्फ फिर से काम में आने लायक हो जाएं, बल्कि अपने मौलिक स्वरुप से भी बेहतर बन जाएं। हरेक अवसर का, प्रत्येक संसाधन का भरपूर लाभ उठाया जा सकता है। जरूरत है तो सिर्फ एक पॉजिटिव माइंडसेट की, आज तक संसाधनों के अभाव में किसी की उन्नति रुकी है क्या?
दिल्ली के युसूफ-सराय, गोविंदपुरी, गढ़ी गांव, शाहपुर जाट इत्यादि इलाकों में मैंने देखा है कि हमारे बिहार-झारखण्ड के ही लोग - एक 10ft.x10ft. वाले कमरे में एक साथ 15 लोग, कोई ज़रुदोज़ी वाली खाट फ्रेम पर, तो कोई बैग के हिस्से सिल रहे होते हैं। हरेक कमरे में एक अलग उद्योग विकसित हो रहा होता है। वही लोग अपने घर, अपने गांव वापस आ कर कुछ काम नहीं कर सकते क्या?
पलामू संसाधनों, कलाकारो, बुनकरों, सिनेमाकारों, संगीतकारों, रचनाकारों, साहित्यकारों औऱ बुद्धिजीवीयों का हमेशा से गढ़ रहा है। जाने क्यूँ हमारी नम्रता कह लीजिये या फिर झिझक अपनी उत्कृष्टता जग जाहीर करना हमलोग को अच्छा नहीं लगता। बिश्रामपुर, हरिहरगंज के देसी हस्तकरघा में बने अच्छे खासे 'अरज वाला गमछा' हो, जिसे पहनने, ओढ़ने, बिछाने सबके लिए इस्तेमाल कर सकते हैं या फिर 'पोखरी-कला' में बनी खद्दर की धोती, कुर्ता, चादर-पलामू का हस्तकरघा काफी कुछ बोलता है, पर समझने वाले दिमाग कम ही दिखते हैं।
शिल्पीस्तान की तपोवन जैसे उस एक कमरे के कलामंदिर में बैठ आदरणीय नैयर सर ने ना जाने कितने लोगों की मुलाक़ात रंग, कूची, कैनवस से करवाई है। सैकत दादा की राष्ट्रीय स्तर की फोटोग्राफी हो, प्रेम भसीन सर का ड्रिफ्ट वुड आर्ट, सेसा के द्वारा कई विधाओं में महिला उद्यमिता को बढ़ावा देने के लिए किये जा रहे प्रयास हों; पलामू में कुशलता की कोई कमी कभी रही नहीं।
कल को आपको अगर चोट लग जाये और आप किसी काम के ना रहें, तो आप क्या करेंगे? अपने आप को बेकार घोषित करने से तो अच्छा है कि उद्यम करें और पूरी जान लगा कर कोशिश करें संसाधनों का पूरा दोहन करने की। रिपेयर, रिसाइकिल, अपसाइकिल, किनत्सुकि; हरेक में रूचि लेने का ज़माना है।
तभी ना टिके रहिएगा!! पलामू किले के ईंट-गारा की तरह चिरस्थाई बनियेगा, बरसों बाद भी चमकते रहिएगा।
"क्या कहा? चित्र बिगड़ गयी है?
तो उसको विचित्र ही रहने दें ना?
भींड़ में खो जाने से तो अच्छा है ना कि अपनी अलग पहचान बची रहेगी।"
© शिवांगी शैली
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Tuesday, October 4, 2022

लउट के बाबू, दशहरा में आये

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ढेर दिन बाद दशहरा में गाँव लउटे हैं महाराज। कोरोना के नाम पे हैभी ड्यूटी लागल है, कह-कह के बड़ी ठगे घरे वलन के। लेकिन एह बार माई धीरा दी थी कि ना अउले न बाबू, तो ओनहीं दूसर माई ढूंढ लिहे।
अबकी बार पब्लिक में अलगे लेबल के एनर्जी दिख रहा है जी। कई जनम बाद छोटहन रेंगन के संपवा-फूलौना धरले देख रहे हैं, फोंफी-सीटी सर्र-सर्र बाज रहा है। बचपन के दोस्त-इयार सब बाल बच्चेदार हो गइल है अब। करिअर के चक्कर में हम ही पीछूआ गए लग रहा है का तो।
पुरान दिन में डूब के औ-पौ होइये रहे थे कि गली में साइकिल पर झोला लटकउले छठू साव का चीर-परिचित राग सूनाई दिया-
"चिनीयाऽऽऽऽ बादाऽऽमऽऽ..."
अरे! चाचा जिंदे हैं अभी तक? एगो रिसर्च पेपर लिखे ला पड़ेगा इनकर चिरयौवन पर।
तभी पूरा टिप-टाप में संजयइया आ गया घरे, साथ में नंदूवा आऊ कमेसरो था।
"चलs-चलs मरदे! पान-पतई के नेवान करल जाव। दशहरा के इंतजार तs बस पाने खाये ला रहबे करता है।"
मुँह पजाते हुए नंदुवा बोलबे किया कि चचा टोक दिए- "आप लोगों को घूमता पर वाला पुलवा पर बईठ के, बादाम फोड़ते हुए, बतकही करने का मन नहीं हो रहा है का? जाइए जाइए... लौकडाउन खतम न हो गया हो " पूरा दांत निपोरते हुए चचा धंधा चमकाने में सफल रहे।
जल्द ही हमारे पुराने अड्डे पर मित्र मंडली जम चुकी थी। बरसों बाद नहर के पुल पर ठिठोली-ठहाके गूंज रहे थे, पूरे नमक-मिर्च के साथ। कट-किट, रट-रिट, पट-पिट बादाम फुट रहा था और नॉन-स्टॉप गप्पों का बाजार सजने लगा था। कोई चटनी के साथ बादाम के स्वाद का वर्णन कर रहा था, तो कोई बालू में भूंजल घानी में से निकले बादाम की सोंधी खुशबु मे लीन होने लगता। कोई ट्रेन में टाइम पास के बेस्ट आइटम की उपाधि से इसे नवाज रहा था, तो कोई पौरूष वर्धक दवाई के रूप में इसका गुणगान कर रहा था। लेकिन अव्वल तो मेरा दिल्ली वाला 'तेरे को/मेरे को' फ्रेंड था, "एकरा बादाम नहीं कहते हैं, तोहीन जिंदगी भर गंवारे रहोगे।" बीच-बीच में सड़े हुए पीस को अपने खास मित्र को परोसने का रिवाज़ भी निर्विरोध रूप से जारी था।
अचानक मुझे महसूस हुआ कि कितने किस्मत वाले होते हैं वो, जो आज भी अपने गांव में अपनों के बीच में रह पा रहे हैं। समाज की सेवा करने में समाज से ही दूर होता चला गया मैं तो। अब और दूर नहीं रह सकता इन सब बंधुओं से। खुद से वादा किया कि जो भी हो जाये अब मैं हर त्योहार में अपनी उपस्थिति जरूर दर्ज कराऊंगा।
आप सबों को ठेठ पलामू की ओर से दशहरा की ढेरों शुभकामनाएं। माता रानी का आशीर्वाद आप सबों पर सदा बना रहे।
खुश रहिये, स्वस्थ रहिये।
© ठेठ पलामू टीम
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Sunday, October 2, 2022

गणेश लाल अग्रवाल ने जलाया था पलामू में उच्च शिक्षा का दीया

-आज 120वीं जयंती है जीएलए कालेज के संस्थापक की
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पलामू में उच्च शिक्षा का दीया जलाने वाले महान व्यक्तित्व का नाम है गणेश लाल अग्रवाल। उन्होंने 1954 में जो ज्योति जलाई थी आज उससे कई दीपक जल चुके हैं। इनका प्रकाश चारों ओर फैल रहा है। जिस शहर या जिले में एक भी कॉलेज नहीं था वहां आज इंजीनियरिंग और मेडिकल कॉलेज तक खुल चुके हैं। इन संस्थानों से पढ़े छात्र केंद्र और राज्य सरकारों में मंत्री से लेकर केंद्रीय व राज्य की प्रशासनिक सेवा में बड़े पदों पर रह चुके हैं। प्रोफेसर, इंजीनियर, डॉक्टर, अधिवक्ता, पत्रकार से लेकर समाज का कोई तबका ऐसा नहीं है जहां यहां से शिक्षा पाए विद्यार्थी कार्यरत नहीं हैं।
आइए, कोई 67 साल पहले लौटते हैं। थोड़ी कल्पना कीजिए, थोड़ा यथार्थ को महसूस कीजिए। तब जिले (अब प्रमंडल) के छात्रों के लिए कॉलेज की पढ़ाई किसी सपने की तरह था। हाई स्कूल डालटनगंज, गढ़वा और लातेहार में तो कई थे पर इसके बाद की शिक्षा के लिए कोई संस्थान नहीं था। जिन बच्चों का जन्म संपन्न परिवारों में हुआ था वे तो रांची या पटना चले जाते थे पर गरीबों के लिए कोई जगह नहीं थी। कम पैसे वाले लोग थोड़ी हिम्मत करके अपने बच्चों को किसी तरह बगल के औरंगाबाद (तब यह गया जिले का हिस्सा था) में पढ़ने के लिए भेजते थे। इसके बाद बड़ी संख्या में लोग मैट्रिक पास करने के बाद उच्च शिक्षा से वंचित हो जाते थे। यह पीड़ा यहां के लोगों को सालती थी। यह पीड़ा ऐसी थी, जिसका निदान किसी के पास नहीं था।
शहर में गणेश लाल साहू नाम के बड़े व्यवसायी थे। इन्हें गणेश लाल अग्रवाल के नाम से भी जाना जाता था। इनके पास सुख से सभी साधन थे, बस कमी थी तो संतान की। उन्हें पता चला की जपला के पास कामदारपुर गांव में रघुनंदन सिंह जी के घर बड़े ज्योतिषी रहते हैं। ये ज्योतिषी नेताजी सुभाष चंद्र बोस के साथ आजाद हिंद फौज में भी रह चुके थे पर नेता जी के विदेश चले जाने के बाद कोलकाता से औरंगाबाद स्थित अपने गांव केताकी जाने के क्रम में रघुनंदन बाबू से मिले थे और फिर यह उनके गांव पहुंच गए। ज्योतिषी का नाम था पंडित नंदकिशोर पाठक।
पाठक जी के बेटे हैं पंडित विजयानंद सरस्वती। ये भी नामी ज्योतिषी हैं और राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित शिक्षक हैं। सरस्वती जी को अपने पिता और गणेश बाबू की मुलाकात और फिर गणेश लाल अग्रवाल कॉलेज के स्थापना की पूरी कहानी याद है। उनकी जुबानी, 'गणेश बाबू पुत्र की कामना लिए पिता जी के पास सपत्नीक पहुंचे थे। पिताजी ने कुंडली देखी और साफ कहा कि आपके भाग्य में संतान सुख नहीं है। इस पर गणेश बाबू खफा हो गए और डालटनगंज लौट आए। हालांकि कुछ वर्षों के बाद उन्हें वास्तविकता का एहसास हुआ तो उन्होंने पिता जी को डालटनगंज बुला लिया और उनके रहने की व्यवस्था वर्तमान के राजमणि धर्मशाला में की।'
कॉलेज कैसे खुला, इस पर सरस्वती जी कहते हैं, 'मेरे पिता जी सहित कई लोगों के कहने पर गणेश बाबू ने हाई स्कूल की स्थापना कर दी थी। इसके बाद बड़ा सवाल था कि यहां से मैट्रिक करने वाले बच्चे आगे की पढ़ाई के लिए कहां जाएंगे। इस स्कूल में महुगांवा के रामनाथ पांडेय संस्कृत पढ़ाते थे। उन्होंने बच्चों की आगे की पढ़ाई की चिंता पिता जी से बताई तो उन्होंने कहा कि सुबह में गणेश बाबू और वह एक जगह बैठ कर गप करते हैं आप उसी समय बच्चों को लेकर आ जाइएगा। गणेश बाबू के सामने क्या सवाल पूछना है इसकी भी जानकारी उन्हें दे दी गई।' अगले दिन सुबह गणेश बाबू और पाठक जी बैठ कर बात कर रहे थे। तभी वहां करीब तीस बच्चे नारे लगाते हुए पहुंच गए। अब सरस्वती जी के शब्दों में, 'पिता जी ने छात्रों से पूछा कि आपलोग किसके बच्चे हैं? बच्चों ने समवेत स्वर में कहा 'गणेश के'। बस यहीं से कॉलेज की स्थापना की नींव पड़ गई। पिता जी ने गणेश बाबू से कहा कि देखिए इतने बच्चे आपके हैं। आप इनके लिए अपने नाम पर कॉलेज खोलिए, सभी के सर्टिफिकेट पर आपका नाम होगा। ऐसा होने पर आप अमर हो जाएंगे। फिर क्या था गणेश बाबू ने कॉलेज खोलने की हामी भर दी और जिले में उच्च शिक्षा का द्वार खुल गया।'
गणेश बाबू खुद स्वतंत्रता सेनानी नहीं थे पर कई स्वतंत्रता सेनानी उनके मित्र थे। इन्हीं मे से प्रमुख थे यदुवंश सहाय, गणेश प्रसाद वर्मा और राजकिशोर सिंह। यदु बाबू के बेटे बृजनंदन सहाय 'मोहन बाबू' और गणेश बाबू के बेटे सतपाल वर्मा ने मुझसे बातचीत में बताया था कि गणेश लाल अग्रवाल जी ने हम दोनों के पिताजी के 1942 आंदोलन में जेल में रहने के दौरान परिवार की काफी सहायता की थी। मोहन बाबू कहते हैं, 'गणेश बाबू अपनी गाड़ी घर से दूर छोड़कर रात होने पर बाबू जी से मिलने आते थे और आंदोलन में मदद करते थे।' जब कॉलेज खोलने की बात तय हो गई तो उन्होंने इसके लिए जो दिन तय किया वह काफी ऐतिहासिक था। यह दिन था 15 अगस्त यानी देश की आजादी का दिन और साल 1954। कॉलेज खुलने के बाद पहले प्राचार्य के रूप में कैप्टन जीपी हजारी की नियुक्ति हुई। 1955 में प्रो. जगदीश नारायण दीक्षित इस कॉलेज के प्राचार्य बने। गणेश बाबू की नजदीकी यदु बाबू के छोटे भाई उमेश्वरी चरण 'लल्लू बाबू' से भी थे। उन्होंने लल्लू बाबू की पत्नी उमा देवी को कॉलेज के शासी निकाय के सदस्य के रूप में भी रखा था।
जीएलए कॉलेज की शुरुआत रांची रोड, रेड़मा में गणेश बाबू के व्यावसायिक भवन से हुई थी। वर्तमान में बारालोटा में जो भवन है इसका शिलान्यास अगस्त 1956 में बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री श्रीकृष्ण सिंह ने किया था। करीब 85 एकड़ में कॉलेज का परिसर है। यहां कई ब्लॉक बनाए गए थे। आधुनिक सुविधाएं थी, हर विभाग के लिए अगल-अलग क्लास रूम, प्रयोगशाला, लाइब्रेरी, कॉमन रूम, खेल का मैदान, ह़ॉस्टल का निर्माण किया गया था। अभी इसी परिसर में नीलांबर पीतांबर विश्वविद्यालय का भवन भी बन रहा है। स्टेडियम भी निर्माणाधीन है।
अब इस कॉलेज से निजी रिश्ते। पापा (प्रो. सुभाष चंद्र मिश्रा) ने 1967 में एमए (अंग्रेजी) की परीक्षा दी थी। कॉलेज में लेक्चरर के लिए इंटरव्यू हो रहा था और वे भी इंटरव्यू देने पहुंच गए। उनका चयन भी हो गया पर इस शर्त के साथ कि अगर रिजल्ट आने पर वे सेकेंड क्लास नहीं ला पाते हैं तो उनकी सेवा उसी क्षण समाप्त हो जाएगी। रिजल्ट आने तक सेवा भी अवैतनिक होगी। रिजल्ट आने पर पापा को सेकेंड क्लास आ गया और वे आधिकारिक रूप से कॉलेज के हिस्सा हो गए। जितना दिन अवैतनिक पढ़ाया था, उस अवधि का वेतन भी मिला। 1970-71 में पापा केंद्र सरकार की सेवा में दिल्ली आ गए पर उनका मन जीएलए कॉलेज में ही रह गया था। 1972 में उन्होंने फिर यहां नौकरी के लिए इंटरव्यू दिया। चयन होने के बाद 18 सितंबर 1972 को यहां योगदान दिया और 29 नवंबर 2007 को रिटायर हुए। उनके रिटायर होने से पहले पलामू में विश्वविद्यालय की नींव पड़ गई थी। रांची विश्वविद्यालय की शाखा यहां खुली और वे इसके पहले समन्वयक बनाए गए। खेल से लेकर सांस्कृतिक गतिविधियों में उनकी सक्रिय भूमिका रही। मैंने इस कॉलेज में 1983 में नाम लिखाया और अंग्रेजी से एमए किया। छोटे भाई हेमंत मिश्रा ने मनोविज्ञान में एमए किया तो बड़ी बहन रश्मि ने अंग्रेजी में ऑनर्स और छोटी बहन प्रियंका ने इतिहास में ऑनर्स किया। मेरे बच्चे दिल्ली और गाजियाबाद में रहे इसकी वजह से इनकी शिक्षा यहां नहीं हुई लेकिन भतीजा मानस अभी इस कॉलेज में अंग्रेजी ऑनर्स कर रहा है।
गणेश लाल अग्रवाल मूल रूप से वर्तमान के औरंगाबाद (बिहार) जिले के दाऊदनगर के रहने वाले थे। उनका जन्म दो अक्टूबर 1902 को हुआ था। पलामू में उच्च शिक्षा को नई दिशा देने वाले इस महान शख्सियत ने 14 फरवरी 1964 को आखिरी सांस ली। गणेश बाबू को उनकी 120वीं जयंती पर विनम्र श्रद्धांजलि।
©प्रभात मिश्रा सुमन
वरिष्ठ पत्रकार अमर उजाला नोएडा
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