Saturday, October 29, 2022

"उग हे सुरुज देव... भेल भिनसरवा... अरग के बेरवा..."

छठ के गीत सुनते ही चेहरे पर मुस्कान और ह्रदय में भक्ति आ जाती है। व्रत पास आते ही, अपने साथ लाती है, उत्साह भरी तैयारियां; सूखते हुए गेंहू, मिटटी के चूल्हे, आम की सूखी लकड़ियां, रेत, ईख, सूप, ढेरों फल और फिर बनता है हमारा प्रिय प्रसाद- 'ठेकुआ'....!
बचपन मे छठ के ठेकुए का इंतज़ार तो सारे लोगों को होता था। लगता था कब भोर वाली दूसरी अर्घ्य आ जाये और हम जमकर ठेकुआ, ईख और बाकि प्रसाद खाएं, लेकिन असली टारगेट तो सूप वाला काजू-किसमिस-छुहाड़ा-गड़ी रहता था। दिन भर चलता था ईख चबाने और ठेकुआ खाने का सिलसिला। इस ठेकुवे के सिलसिले के बाद में, माँ ठेकुआ पसंद लोगो को दोबारा खिलाने के लिए ढेरों और ठेकुआ बनाती थीं। पर छठ के लिए बने ठेकुवे की बात ही कुछ और होती है, एक अलग सा छठ वाला स्वाद होता है उसमें।
आज भी ठेकुआ से मेरा प्यार वैसा ही है।
खैर, व्रत की शुरुआत होते ही कठिन नियम के अनुसार सारी चीज़ों को शुद्ध स्थान पर रखने से लेकर व्रतियों के एक स्थान पर रहकर, तन-मन से शुद्धता व एकाग्रता का पालन करना, हमें ऐसे कई यादों से भर देता है, जब हम बच्चों को व्रत संपन्न होने तक पूजा घर में जाने की अनुमति नहीं होती थी। दादी और फुआ, छठ के पूरे समय पूजा घर में ईश्वर में ध्यान और एकाग्रता के साथ तैयारी करती थीं। पता नहीं 36 घंटे का उपवास दादी और उनकी तरह लाखों अन्य व्रती, इतनी प्रसन्नता से कैसे कर लेती थीं। ऐसे ही इन व्रतियों को पूज्य नहीं माना जाता। कोई दिव्य शक्ति ही है, जो इनकी रक्षा करती हैं।
नहाय खाये के स्वादिष्ट खाने के बाद हमें इंतज़ार होता था खरना(खड़ना) का, जब दादी द्वारा मिटटी के चूल्हे पे बनाये गुड़ के खीर वाली प्रसाद से तृप्त होते थे, हमारे साथ-साथ हमारे आस-पास के कई सारे लोग..और सबके साथ खुशियां दुगनी हो जाती थी।
अगले दिन संध्या अर्घ्य के लिए घर के लोग दौउरा सूप लेकर घाट पर जाते..जहाँ का नज़ारा ही देखने लायक होता था..आज भी होता है, लेकिन परदेश में रहने के कारण अब तो सिर्फ वीडियो में ही देख पाती हूँ। बाद में छठ घर के कुआँ पर होने लगा, पर वातवरण बिलकुल वैसा ही रहा, पवित्र और अलौकिक।
सजे हुए घाट पे ईख, जोड़े सिन्दूर में गीत गाती महिलाएं और भीनी शीतलहर वाले वातावरण में अद्भुत आध्यात्मिक एहसास कराती थी। हर तरफ से दिए में जल रहे घी और अगरबत्ती की सुगंध और शारदा सिन्हा की आवाज़। लगता था दोनों दिन प्रकृति के सबसे बाल रूप की ताज़गी को महसूस कर रहे हों। आज भी हर तरफ छठ बिलकुल वैसा ही है, आज भी नदियों के घाट का सुन्दर दृश्य मन को अपनी ओर खींच लेता है। संध्या अर्घ्य के बाद कुछ देर शान्ति से बैठना, सूर्य देव की आराधना, आदित्य हृदयँ जैसे पाठ..असीम शांति दे जाती है।
थोड़े बचे श्रद्धालुओं के बीच बिलकुल शांत वातावरण में बहती नदी के समक्ष ढलते सूर्य को देखना, जीवन में बहुत कुछ सीखा जाती है। जीवन उगता ढलता है, पर सृष्टि का चक्र यूंही चलता रहता है। समय बहती नदी सा बीतता रहता है।
अब उत्साह होता, अगली सुबह भोर में उठकर तैयार होकर घाट पर जाने का। भोरे-भोर छठ के गीत से वातावरण आनंदमयी और हृदय भक्तिपूर्ण हो जाता था। मैं भी साथ-साथ गीत गाती थी और तब से ही छठ गीत मेरा सबसे प्रिय गीत रहा है। मुझे छठ व्रत में कभी ठण्ड महसूस नहीं हुई। दिवाली में हलकी लगती थी और दूसरे अर्घ्य के होते ही अगले दिन से बहुत ठण्ड लगने लगती थी।
भोर के हलके अँधेरे और भीनी ठण्ड में व्रतियों का उत्साह ऊर्जा और निष्ठा हमसब में आस्था की अपनी जगह बना देती थी। भोर का अर्घ्य सूर्य देव के उगते ही सही समय पर दिया जाता है। उस दिन हम सबको सूप पे अर्घ्य देने मिलता था।
छठी मईया और सूर्य देव की ध्यान उपासना, दीये, के बाद हवन करके व्रत का समापन। हमलोग छठी मईया से सभी के स्वास्थ्य, सुख, शांति की प्रार्थना: करते थे और व्रतियों के चरण स्पर्श कर आशीर्वाद और प्रसाद लेते थे, जिसका हमें बेसब्री से इंतज़ार होता था। उस दिन घर पर रिश्तेदार, परिवार और आस-पड़ोस के लोगों की बहुत भीड़ होती थी। सबके लिए आशीर्वाद और प्रसाद कीमती होते थे, छठ जो है। कई लोग अर्घ्य देने भोर में भी आकर हमारा साथ देते थे।
उगता हुआ..आसमान चढ़ता हुआ सूर्य धीरे-धीरे सब कुछ अपनी रोशनी के अगोश में भर देता और हम देखते रह जाते। ऐसे ही अपने जीवन में आगे बढ़ने और उन्नती करने की प्रेरणा लेते हुये..!
छठ हमें बहुत कुछ सीखा जाती है। हमारी झोली में स्नेह आशीष भरने के अलावा जीवन के उतार-चढ़ाव, उनके महत्व और समय के कभी न रुकने का सन्देश दे जाती है। ढलते सूर्य की उपासना हमें अपने या दूसरों के गिरते, ढलते वक़्त को भी सम्मान देना सिखलाती है। छठ व्रत आज भी वैसा है, पर समय के साथ लोग बदल गए। आज भी छठ की आनंदमयी छवि मन में समायी है। छठ अलौकिक शक्ति और सुख प्रदान करने वाला महापर्व है.. और सदा रहेगा..!
छठी माई के किरपा सबे लोगन पर बानल रहे। छठी माई बुलइहें घाट पर, त अबरी छठ हमहूँ नदी घाट पर देखे पारब।
जय छठी मईया।
© आभा रश्मि
May be an image of 6 people, sky and text that says "Chhath puja: worshipping the nature © आभा रश्मि ठेठ पलामू"

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