Wednesday, May 30, 2018

अर्रे आवअ बर्रे आवअ

अर्रे आवअ बर्रे आवअ
नदिया किनारे आवअ
सोने के कटोरे में
दूध भात ले ले आवअ
ए बाबू के मुंह में घूं ... ट!

एगो आउर छोटे गो के गीत माई सुनावत रहे.

चंदा मामा दूर के
पुआ पकावे गुड़ के
अपने खाए थाली में
मुन्ना के देवे प्याली में
प्याली गया फूट
मुन्ना गया रूस!

जब हमनी लैकइयाँ में रही, तब भी गरमी तो पड़ते रहे! मागिर से घरी के मज्जा कुछ आउ रहे। तब के मज्जा के बात मत पूछूं।

गरमी के दिन में अंगना में खटिया के लाइन लगाके जब हमनी आजी, माई, चाची, बहिनी और छोट भाई के साथे लेदरा बिछाके सुतती, और तखनिए छोटका बचवा आपन राग में रोएला शुरू करतक, तब माई और आजी में से कोई आपन गान कढ़ावे ला शुरू करते हलन...

"अर्रे आवअ बर्रे आवअ
नदिया किनारे आवअ
सोने के कटोरे में
दूध भात ले ले आवअ
ए बाबू के मुंह में घूंट!"

आउर बार बार गईला पर भी नन्हका चुप ना होए तो फिर से एगो आउर छोटे गो के गीत माई सुनावत रहे।
चंदा मामा वाला। एतना सुनते सुनते बाबू मइँयां कब सुत जइतन माइयो के ना पता चलतक।

उ शीतल मन्द मन्द हवा चलइत रहे कि बड़का बड़का आज के कूलर भी फेल रहे। आकाश पूरा साफ रहत रहे। आकाश में दूधिया प्रकाश के छटा आउर लाखों करोड़ों तेज चमचमात तरेंगन। आउर आकाश में एतना रौशनी कि हमनी के बड़ भाई तारा गिने में लगा देवत रहन। आउर हमहुँ इतने हशियार रही कि सच में गिने लगती। फिर का बा, एगो, दुगो, तिनगो, चारगो... चौदहगो, पन्द्रहगो...। तबले कौनो भाई बहिन चूंटी काट देतन! बस सब भुला जइती कि कोन तारा के गिनत रही आउर कोवन के नाही। फिर से शुरू करती। यही करते करते कखनी सुत जइती पतो ना चलतक।

ई रहे प्रकृति से सीधा सम्बाद और प्रदूषण रहित गाँव के खुशनुमा वातावरण। आउर संयुक्त परिवार के अपनापन और रिश्ता!

कल रात के फिर से मन कईलक कि खुला छत पर ही आज सुतल जाए। पर ई का? छत पर तो कोई हयीय नइखे! जब कि हमर परिवार में 18 गो आदमी बड़न। सभे आपन आपन कमरा में कूलर पंखा में बड़न। हम सोचली कि घर के छोटे छोटे लइकन के बोला के आपन बचपन के याद ताजा कर लेऊं आउ नाया नाया बचवन के भी प्रकृति से सम्वाद कराऊं। इहे सोंच के बेटा लड्डू गोपाल आउर भतीजी पीहू परी के छत पर बुलएली। फोल्डिंग बिछाके बचवन के खुला आकाश के तरफ देखेला कहली। लेकिन ई का? 'बर्रे' के तो अते-पते नाहीं! बड़ी ध्यान से देखली त बड़ी मुश्किल से गिने भर तारा देखइलक। आकाश प्रदूषण से भरल रहे, उमस भर रात। आज हम बिन तरेंगन के कइसे रेंगन के सूनाऊं- "अर्रे आवअ बर्रे आवअ..."

चनरमा पर नजर गेलक। चांद में ओतना चमक तो नाहिं रहे, आउ ना पहिले जइसन शीतलता, फिर भी
दुसरका गीतवा माई वाला सुनावेला शुरू कईली- "चंदा मामा दूर के, पुआ पकावे गुड़ के...।"

पर हमार बेटा-भतीजीन के ई कहाँ से मनभावन लगते हलक? उ सब तुरन्ते हमरा से पिंड छोड़ाके कार्टून-सीरियल  टीभी में देखे नीचे चल गेलन। अब हम अकेले छत पर आपन बचपन के समय के पारिवारिक सम्बन्ध आउ प्रकृति में बदलाव पर सोचते सोचते नींद में घोलट गेली। पर अचानक ढेरे मच्छर काटे लगलन। तब फिर हमहुँ नीचे कूलर पंखा में आके आपन शरीर के कमरा में कैद कर लेली। पर मन में तो उहे 40 साल पहले के दृश्य चलईत रहे। सोचते सोचते रात के एक बज गइल रहे। फिर जल्दी जल्दी सूते के कोशिश कईली काहे कि सुबह में पौने छौ बजे स्कूल जाए ला रहेला न।

© Dinesh Kumar Shukla

रसम

हम खाना बनाने के बहुत शौकीन हैं, इसलिए कहीं भी रहे किचन ढूंढ ही लेते है। देश मे तो छोड़िये विदेशो में मौका मिले तो बाज नही आते हैं।

पिछले साल ज़ाम्बिया (अफ़्रीका) में थे तो उहां देखे कि बहुत लोग अभीयो चारकोल मने ओहि बिना धुवाँ वाला लकड़ी का कोयला से चूल्हा जला रहा था। तभी हमारे मन में गांव का सिनेमा चलने लगा कि कैसे उ टाईम घरे घर चूल्हा जलना शुरू होता था बेर डूबते।

आज न सब के घर में गैस सिलेंडर हो गया है, पहिले तो सब घर माचीस भी नही होता था। कोई एक घर चूल्हा जोरा गया तो धुवाँ देख के आसपास के सब घर से लेडीज़ लोग ओकर घर #रसम लेने आती थी। रसम मने बूझे कि नहीं? चूल्हा जलाने के लिए जो आग जलाने का जुगाड़ होता था न उसी को रसम कहते हैं. अब सोचियेगा कि एक घर से रसम सब औरत कैसे ले जाती होगी? और सब लेइये जाती होगी तनीए तनी कर के, तो बांटे वाला घर का चूल्हे नहीं बिता जाएगा? सब जलावन नहीं सिरा जाएगा? तो होता ई था कि सब लेडिज लोग आपन घर से खपड़ा में कर के दू- दू ठो गोइठा लाती थे। एगो गोइठा बांटे वाला घर के चूल्हा में डाल दिये टैक्स के रुप में और दुसरका के उपर चूल्हा में से जरईत- सूलगइत गोइठा लेकर आपन घर रसम जोरे, दिया बाती करे चल जाती थी। अरे भाई ओतना किरोसिन तेल, माचिस आउ जलावन नहीं न रहता था सब भीर? आपसी सहयोग से पूरा गाँव का चूल्हा जलता था।

और मान लीजिए कि कौनो घर जल्दी धुआँ दिख गया और आपके घर अभी हुर-हार (मने सब्जी काटना, आटा सानना इत्यादि) भी नहीं हुआ है तो ताना-गारी-डांट सुनने के लिए रेडी रहिये। आइते के साथ ओने से मरदाना ठोंणा मारना शुरू कर देते कि- "तोहनी के हियाँ अभी गपे चलइत बा, हुआं फलनवा घर रसम जोरा गेलइ कखनिए से! का जन ईसब के बारह-बजिया खाना बनावे वाला आदत कब खत्म होइ?"

ई सिस्टम तनीए-मानी ही सही पर कोयला चूल्हा वाला जमाना तक चलता रहा था। पर जब से ई ससुरा गैस सिलेंडर आया है रसम माँगने वाला सिस्टमें खत्म हो गया!

खैर जाम्बिया मे देखे कि लोग अगरबत्ती से आग ले के एक घर से दूसरा घर जाते थे। हम भी एगो चूल्हा सुलगाने में लग गए। अपने खाना नहीं बनाते तो पता नहीं ई लोग हमको का खिला देता, शाकाहारी आदमी को कष्ट तनी मानी है ई घोर कलजुग में?

© Anand Keshaw

बरवाडीह

#ठेठ_पलामू : बरवाडीह
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Sunny Shukla के साथ Amit Pandey और Rohit Pathak आज आपको लिए चलते हैं बरवाडीह के सफर पर. Apna Daltonganj से महज कुछ किलोमीटर दूर है प्रकृति की गोद में अवस्थित यह रमणीय पर्यटन स्थल. आप ट्रेन से भी पहुंच सकते हैं यहाँ. सड़क से Betla National Park की ओर से भी यहां आया जा सकता है.

चारों तरफ से पहाड़ और जंगल से घिरे इस सुन्दर स्थल पर अंग्रेज़ अफसर भी मोहित हुए थे, इसलिए नजदीक के केचकी में डाक बंगला बनवाया था उन्होने पर्यटन और प्रकृति दर्शन के उद्देश्य से. बाद में रेलवे के विकास के साथ बरवाडीह जंक्शन का भी निर्माण हुआ. BDM ट्रेन का नाम तो सुना होगा आपने, जी हाँ इसमे B- बरवाडीह है, डेहरी मुगलसराय के साथ साथ.

आज आपको लिए चलते हैं हम बरवाडीह पहाड़ी पर. काफी गर्मी है यहाँ मगर बादलों को देखकर हम ने पहाड़ चढ़ने का फैसला कर लिया है. ऊंचाई से आस पास का मनोरम नजारा देखकर सारी थकान गायब हो गई.

मंदिर दर्शन के लिए ग्राम देवी के मंदिर से शुरुआत करते हैं और फिर शिव-पार्वती प्रतिमा दर्शन के पश्चात सीढियां चढ़ते हुए राम भक्त बजरंगबली का दर्शन करते हैं. और आगे चढ़ने पर माँ काली के मंदिर दर्शन करने का भी सौभग्य प्राप्त होता है. प्रति वर्ष शिवरात्रि पर बड़ी संख्या में लोग यहाँ पूजा करने आते है. तकरीबन 40 वर्ष पूर्व इस नए वाले मंदिर को स्थापित किया गया था, हालांकि यहां के निवासियों की आस्था तो सदियों पुरानी है. कई तरह की मान्यताएं हैं और उतनी ही तरह की रोचक कहानियां. कोई रामायण कालीन बाली सुग्रीव के साम्राज्य से सूत्र जोड़ता है तो कोई पाण्डवों के अज्ञातवास से.

मंदिर के प्राचीन होने का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पार्वती मंदिर निर्माण हेतु 'श्री श्री अनन्त श्रीनाथ बाबा चरितबन (बक्सर)' के सानिध्य में बसंत पंचमी विक्रम संवत २०३०को यज्ञ किया गया था.

हम तीनों की मंदिर यात्रा गर्मी के दिनों में है तो हमने यहाँ बहुत कुछ देखा और समझा. इस स्थान में एक सुसज्जित और व्यवस्थित पर्यटन स्थल बनाए जाने की सारी संभावनाएं मौजूद हैं. प्राकृतिक दृश्य, जंगल, पहाड़, मंदिर, आस्था और ऐतिहासिक महत्व. सरकार से बस थोड़ी सी मदद मिले तो यह स्थान पर्यटन नक्शे पर चमकने लगेगा.

कुछ सुझाव हमारी तरफ से जो हम ने महसूस किया. ~बिजली और पानी की समुचित व्यवस्था हो.
~सीढ़ियों को सही आकार में बनाया जाए.
~मंदिर के आप पास के पेड़ पौधें को भी बचाया जाए व पौधरोपण भी किया जाए. इससे पर्यावरण का भी फायदा है.
~यात्रियों के लिए कुछ चिन्हित जगहों पे बैठने के लिए स्थल का निर्माण भी किया जा सकता है.
~जगह के हिसाब से यहाँ एक उद्यान भी बनाया जा सकता है.
~सुरक्षा के दृष्टि से अभी यहाँ पर सीसीटीवी कैमरा लगवाया जा चुका है.
~सरकार के द्वारा इस मंदिर को पर्यटन स्थल घोषित किया जाए ताकि इसका समुचित विकास किया जा सके. यह कदम इस क्षेत्र के लिए एक अवसर प्रदान कर सकेगा.

खैर ये तो हुई सुझाव और विकास की बातें जो सरकार करेगी. हमारा आपसे अनुरोध है कि इस मंदिर का भ्रमण जरूर करें. पर्यटन बढ़ेगा तो क्षेत्र और स्थल दोनों का विकास ख़ुद ब खुद होने लगेगा. जाइए और वहां की तस्वीरें हम से शेयर किजिये. पेश है बरवाडीह की कुछ झलकियां.

© रोहित पाठक

पलामू की यादें 2 : पलाश

(झारखंड के जानेमाने साहित्यकार श्री Dhanendra Prawahi की पलामू संस्मरण श्रृंखला)

प से पलाश, ला से लाह आउ मू से.....
आप आपन रुचि, कल्पना या बुद्धि का परिचय देवे ला कुछो लगा लीजये। हालांकि किसी 'रूढ़ शब्द' को जबरन 'योगरूढ़' बनाना धर्म-परिवर्तन के जइसा एक अपराध लगता है हमको, संधि-विच्छेद की जगह आत्मा-विच्छेदन की इस फूटानी-पूर्ण हरकत को हम ओछी रुचि मानते हैं। एगो उदाहरण देते है- ग से गणेश, ग से गमला और ग से गदहा भी। तो गणेश नहीं, गमला नही, हर घड़ी केकरो गदहा ही लउके तो ऐसी रुचि वाले सज्जन को आप का कहियेगा- 'दुर्वाकन्द नृकिंतन'? ई वाला गधे का संस्कृत नाम है। किसी संस्कारी सज्जन ने 'गधा' के अभिधात्मक भद्दापन और व्यंजनात्मक ओछेपन से बचाते हुए लक्षणार्थ देने की कोशिश की है। #ठेठ_पलामू पढ़ रहे है विद्यार्थियों और भाषा विश्लेषकों को तो जरूर ई एंगल पर विचार करना चाहिए!

खैर! पलामू का पहिला अक्षर प से पलाश, जिसको परास या टेसू भी कहते है। ई पलामू के शरीर की शोभा तो हईए है, ई हृदय के समस्त सौंदर्य के सकारात्मक पक्ष का प्रतीक भी है। होली जैसे जैसे नजदीक आने लगता है कि पलाश अपने पूरे प्रस्फुटन से सौंसे पलामू को लाल रंग के ओढ़नी ओढ़ा देता है। जैसे कि समूचे पलामू को टेसू ने अपने रंग से सरोबार कर दिया हो। कुछ क्रांतिकारी विचार वालों को लगता है कि समूचा पलामू शोषण व्यवस्था के विरुद्ध दहक कर लाल हो उठा है। आध्यात्मिक प्रवृत्ति वालो की उत्प्रेक्षा होती है कि अंनत विभूति भूषण आनंदकन्द भगवान ने कैसे अपने विराट वैभव के प्राचुर्य से सारी दिशाओ को भर डाला है। खैर जाकी रही भावना जैसी...

हम थोड़ा मोह में पड़ गए हैं ई प्रसंग में। दरअसल मेरी पहली कविता जो 1967 में लेस्लीगंज प्रवास के दौरान लिखी गई थी और सन 70 में #सप्ताहिक_हलधर में प्रकाशित हुई थी उ #पलाश पर ही थी, टेसू पर। एक मिनट की कविता है, पढ़िए -

#टेसू_फूले

टेसू फूले।
और
वे भी खूब फूले।
मौसम ने
उनका पत्ता-पता छिन लिया।
मूक वे छिनते गए।
किंतु
ठूंठ टेंसू भी न माने।
फूले
और
वे भी खूब फूले।
पत्तियों से अधिक फूले।

उस जमाने में पलामू साहित्यिक विमर्श का केंद्र हुआ करता था, वर्तमान की स्थिति का तो मुझे अनुमान नहीं, आपलोग ही बताएंगे। प्रकाशित होते ही इस कविता ने धूम मचा दी। #साहित्य_समाज के सम्मेलन में इसके बारे में कहा गया -"देखन में छोटे लगे घाव करे गंभीर"। बहुत दूर तक और देर तक पलामू में इस कविता का असर रहा। एक सम्मेलन में डॉ चंद्रेश्वर कर्ण (अब स्वर्गीय, प्रोफेसर डिग्री विभाग जी .एल. ए. कॉलेज) ने 'जिजीविषा' कहकर देर तक इसपर प्रकाश डाला। फिर तो पलामू के साहित्यकारों की प्रशंसा की बाढ़ सी आ गयी और मै एक स्थापित कवि ही माना जाने लगा। लेफ्ट-राइट-न्यूट्रल सबो ने इसकी चर्चा की।

शायद अब आप भी बोर होने लगे होंगे। तो एक बात बताके विराम लेते है कि इस सीरीज में आगे हम यहाँ के पुराने साहित्यकारों और साहित्य गोष्ठीयों की चर्चा करेंगे। अब आज अतने। धन्यवाद। आपकी टिप्पणियों का इंतजार रहेगा...

Saturday, May 26, 2018

गर्मी, बुखार और लू

#ठेठ_पलामू :गर्मी और आपका स्वास्थ्य
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~गर्मी के मौसम के शुरू होते ही हमें लू लगने का खतरा क्यों बढ़ जाता है?
~गर्मी के मौसम में और किन बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है?
~बुखार क्या है?
~लू लगने पर बुखार क्यों होता है?
~हमारा शरीर तापमान को किस तरह से नियंत्रित करता है?
~पानी हमारे लिए क्यों जरूरी है?
~ORS किस तरह से लू में उपयोगी है?
~लू से बचाव के लिए क्या करना चाहिए?

अगर आप इन सब सवालों के जवाब जानना चाहते हैं तो अंतरराष्ट्रीय हिंदी पत्रिका #सेतू के अप्रैल अंक में प्रकाशित डॉ Govind Madhaw का यह स्तंभ पढ़ें. और अगर उपयोगी लगे तो अपने दोस्तों से शेयर करें.

इस गर्मी में आपके अच्छे स्वास्थ्य के लिए शुभकामनाएं.
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डॉ गोविंद माधव पलामू के ही हैं. ठेठ पलामू के अनुरोध पर उन्होंने हमें ये आर्टिकल भेजा है.

आर्टिकल पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें या नीचे दिए गए एड्रेस पर login करें.

सेतु अप्रैल 2018

Thursday, May 24, 2018

कहाँ खो गया मेरा गाँव

#ठेठ_पलामू : कहाँ गया मेरा गाँव?
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(अपने निश्चल गाँव की स्मृति में जीता एक भावुक मन की तरल अभिव्यक्ति. शायद सभी गांवों की नियति ऐसी ही हो गयी है.)

हे मेरे गाँव! हर पल मै तुम्हारी पुरानी स्मृति मे खोया रहता हूँ. आज की तुम्हारी स्थिति देखकर मेरे मन मे पीड़ा होती है. और, जब मै तुम्हारे पुराने स्वरूप का चित्र अपने मानस पटल पर अंकित करने की कोशिश करता हूं, तो मन कितना आह्लादित होता है उसका बयान भी मैं नहीं कर सकता.

आज शहर की अधकचरी संस्कृति के प्रदूषण ने तुम्हारी मिठास में जहर घोल दिया है. बम -बारूद के गोलों ने आज तुम्हारी सुगंधि को ग्रस लिया है. भाई-भाई की कटुता व वैमनस्य ने तुम्हारे रागात्मक सम्बंधों पर तुषारापात कर दिया है. जंगल उजड़ गए हैं, पेड़-पौधों का आस्तित्व ही समाप्त हो गया है. ढोल एवं मांदर की थाप पर थिरकते लय एवं ताल आज समाप्त हो गए हैं. रासायनिक खाद ने तुम्हारी   मिट्टी को ऊसर बना दिया है. आज ना तो कोयल की 'कुहू' सुनाई देती है और ना अन्य पक्षीयों का सुमधुर गान ही. वनांचल (झारखंड) प्रदेश में #गढ़वा जिले के मध्य में बसे तारे की तरह टिमटिमाने वाले हे मेरे छोटे से गांव #बघमार! आज मैं तुम्हारी दुर्दशा पर रो रहा हूँ.

आज से सवा सौ वर्ष पूर्व तुम प्राकृतिक रूप मे सजे-धजे थे. तुम्हारे आँगन में वनराज जैसे वन्य जीव किलकारी मारकर खेलते -कूदते थे. तुम्हारे 'उर्वर-ऊरू' प्रदेश पर निवास करनेवाले मनुष्य को वनवासी या आदिवासी कहा जाता था. वे उत्सवों पर हंसते -खेलते व ढोल मांदर की थाप पर नाचते गाते थे. पूरब की ओर कलकल-छलछल कर बहती '#बिरहा' नदी एक सीमा रेखा की तरह '#ओबरा' गांव से इस गांव को अलग करती थी. पास में ही एक शिवालय था, जिसमे प्रस्तर के अनगढ़े पशुपति विराजते थे, दक्षिण मे ग्राम आस्था के प्रतीक #डीहवार (ग्राम देवता) का स्थान था, जिनकी पूजा अगहन मास मे बैगा (पुजारी) #चेगना_बलि (मुर्गी का बच्चा), खंस्सी बलि एवं #तपावन (देशी शराब) आदि से किया करता था, जिसे '#गंवहेल_पुजाई' भी कहा जाता था.

ग्रामवासियों का विश्वास था कि गांव पर आनेवाली विपत्ति को डीहवार बाबा दूर करेंगे तथा उनकी पूजा से गाँव धन-धान्य से पूर्ण होगा तथा वे सबका भला करेंगे. अगर डीहवार कुपित होंगे, तरह-तरह की विपत्तियां आएँगी. गाँव के उत्तर में पहरेदारी करते छोटे-छोटे पहाड़ तथा #बारून (एक देहाती लकड़ी) का जंगल था. गाँव के पश्चिम में घनघोर जंगल एवं पहाड़ था. गाँव में समय -समय पर 'जितिया', 'कर्मा', 'सरहुल' आदि सामूहिक रूप से मनाया जाता था. देशी शराब पर्वों-उत्सवों पर पीने -पिलाने का रिवाज था.

गाँव मे महुआ, मकइ, तिल, कोदो, धान आदि की खेती होती थी. बस्ती एक जगह इकट्ठी नहीं थी. दूर-दूर पर मिट्टी खपड़े के बने हुए ईक्के-दुक्के घर दिखाई पड़ते थे. घरों मे लकड़ी के दरवाजे नहीं होते थे, बल्कि पशुओं से बचाव के लिए बांस की '#टाटी' लगाई जाती थी. मकई एवं धान की रखवाली खेत में मचान आदि बनाकर होती थी ताकि जंगली सुअर एवं सियार का फ़सलों पर आक्रमण ना हो. साज- सिंगार के लिए जंगली फूल एवं लताओं का उपयोग किया जाता था. बाल संवारने के लिए लोग लकड़ी के कंघी का इस्तेमाल करते थे. चटाई एवं पुआल इनके  बिछावन थे. सर्दी भगाने के लिए मोटी-मोटी लकड़ी के #अलाव जलाये जाते थे. जिसके चारों ओर बैठ कर सुबह -शाम सुख -दुख की बातें होती थी. कभी-कभी किस्से कहानियाँ भी हुआ करती थी.  कुछ टो-टा कर पढ़े-लिखे व्यक्तियों द्वारा '#सोरठी_बिरजाभार'  '#बीजय_कुँवरमल' जैसे पारम्परिक गीतात्मक काव्यों का पाठ भी होता था. कई स्मृति पंक्तियाँ अक्सर सुनने को मिल जाती-

'माथवा मूडवल हो जोगी चेलवा बनवल हो
विपत्ति मे होख न सहाय नू रे की ...'

'रामा हवेली कवेली दुई रे बहिनिया रे न.. रामा ..'
आदि.

तब ना तो धन संग्रह की ललक थी और ना ही हिस्से बखरे के लिए तकरार. तब गाँव मे शांति की देवी विराजती थी.

कहते हैं, 1880 मे हमारे पूर्वज इस गाँव मे आये थे, उनका नाम था-' लीलाधर मिश्रा'. उन्होने इस गाँव की जमींदारी ख़रीद ली और इसी गाँव मे रच बस गये. ग्राम्य-संस्कृति, रीति-रिवाज आदि मे गोत्र परिवार की तरह उनलोगों के साथ घुल मिल गए. 1908 मे छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम बना. 1914 से 18-19 तक गाँव का सर्वे हुआ. हमारे पूर्वज गाँव के जमींदार के रूप मे दर्ज किए गए. सर्वे के दरमियान 18 रैयतों का खाता बना, जिनमे कोरवा, मल्लाह, भुईयां, कहांर आदि खातेदार रैयत के रूप मे दर्ज किए गए.

तब भी गाँव मे कोई हर-हर कट-कट नहीं था. जमीन की लूट-छीन नहीं थी. पूराने समय से चली आ रही परम्परा एवं संस्कृति अक्षुण्ण थी. चोरी -डाके का कोई नाम तक नहीं जानता था. चौबिसो घंटे कोई कहीं भी निर्बाध रूप से आ जा सकता था. होली -दशहारे मे प्रेम एवँ भ्रातृत्व से लोग मिलते-जुलते थे. सभी लोग संपन्न थे और खुश भी. इसी तरह से समय सरकता गया.

फिर शुरू हो गयी आजादी की लड़ाई. देश-व्यापी राजनीतिक परिवर्तन का शोर सुनाई पड़ने लगा. लोग दूर -दूर से आकर इस इलाके में बसने लगे. इनके साथ ही आये घृणा, कटुता एवं संचय का वायरस गाँव में भी फैलने लगा. यहां की भोली जनता के सीधेपन का फ़ायदा उठाकर आगत अतिथियों ने शोषण प्रारंभ कर दिया.

फिर देश आजाद हुआ. जमीन छीनने-हड़पने का बाज़ार गर्म हो गया. गाँव में राजनीतिक आँधी चलने लगी. वोट की राजनीति ने अगड़ा, पिछड़ा, हरिजन, आदिवासी, शोषित दलित आदि की श्रेणी मे लोगों को बाँटना प्रारंभ कर दिया. इससे हमारा गाँव भी अछूता नहीं रहा. गाँव की संस्कृति, वेशभूषा एवँ भाषा में भी धीरे-धीरे परिवर्तन आना शुरू हो गया. प्रेम-भाईचारे का सम्बन्ध दरकना शुरू हो गया. ढोल और मांदर की जगह फिल्मों के अश्लील गानों ने अपना रंग जमाना शुरू कर दिया. जंगलों की बेतहाशा कटाई शुरू हो गयी.  गांव उग्रवाद का चारागाह बन गया. सूर्यास्त के बाद अगर कोई कहीं आता जाता भी, तो वह भी सहम कर. अब गाँव की कोमल घास या तो पुलिस के बूटों तले रौंदी जाती या उग्रवादियों के बंदूकों तले.

आज गाँव मे मेहनत और परिश्रम से कोई खेती करना नहीं चाहता, बल्कि हर कोई लूट-खसोट-धोखे  एवँ फरेब से अर्जित कमाई में विश्वास करता है.

पहाड़ के पत्थर की लगातार ढुलाई से और वृक्षों की निरंतर कटाई से पहाड़ के नाम का अस्थि पंजर ही बचा है. अब कोई डीहवार की पूजा नहीं करता. आज गाँव मे ना तो अलाव जलते है और ना उसके इर्द -गिर्द बैठ कर सुख -दुख की बातें ही होती हैं. अब सभी बातें करते हैं तो अपनी जाति के आस्तित्व की, वोट की राजनीति की व दूसरो को नीचा दिखाने की.

पूरब तरफ की कल कल करती बिरहा नदी खेत एवँ क्यारियों में परिणत हो गयी है. गाँव की कोमल कोकिला की आवाज और पक्षियों की चहचहाहट की जगह अब चील-कौओं एवँ सियार के स्वर सुनाई देते है. लगता है, गाँव में निवास करनेवाली शांति की देवी रूठ कर कहीं चली गयी है.

बार बार मेरा मन उस गाँव को खोजता है- जो कभी अपना था! जो शांति, प्रेम एवं भाईचारे की भावना से परिपूर्ण था, जिसकी मिट्टी की महक मीठी थी व जिसका नैसर्गिक मधुर संगीत था. पता नहीं कहाँ खो गया मेरा गाँव? क्या आपका भी गाँव...

© सतीश कुमार मिश्र
अधिवक्ता एवं साहित्यकार
गढ़वा जिला