Wednesday, December 28, 2022

'बोरोलीन'

ब ठंड से दाँत किटकिटा रहे हों और आप बाबा रामदेव का आलसी वाला हथेली रगड़ योग कर इत्त-बित्तु गर्मी पैदा करने की कोशिश कर रहे हों, बोले तो ठंड में कोंकड़ा गए हों। आप और आपका बुतरू दूनो फाटल गाल की रक्षा के लिए 200 रुपया वाला चेरी-फ्रूट कचुमर वाला चैपस्टिक चपोत रहे हों, तो बूझिए बढ़िया ठंडा पड़ रहा है।
आज-कल के छवड़न के बोल दीजिये कि कड़ुवा तेल या नारियल तेल लगा लो, तो अइसन खरूवा के देखेगा कि जइसे हम गुफा मानव हों। फिर पैकिट से महंगा वाला अंड-बंड क्रीम निकाल के चपोत लेगा आपन नमूना वाला मुँह पर।
बोरोलीन-बोरोप्लस तो आजी-बाबा के लगावे के चीज रह गया है। सुपर मार्केट में कोई पूछबो नहीं करता है, इतना सारा क्रीम आ गया है, डे-क्रीम, नाईट-क्रीम, मॉइस्चराइजर-क्रीम, तैलीय स्कीन क्रीम, सुखल स्कीन क्रीम, दूध क्रीम, हल्दी क्रीम मत कहिए का नहीं डाल के क्रीम बनाता है सब।
पलामू की ठंडी में हम सभी बच्चों के गाल फट कर चकत्ते-चकत्ते हो जाते थे। रात में मम्मी याद से होंठो और गाल पर सोते समय बोरोलीन लगा देती थी। ये आदत ऐसी रही कि कहीं भी रहूँ, बैग में बोरोलीन की एक ट्यूब जरूर पड़ी रहती है। बोरोलीन के बारे में एक सीक्रेट बात है, खास करके रगड़-रगड़ के चेहरे को स्क्रब कर बोकला छुड़ाने वालों के लिए। ढेर सारा बोरोलीन चेहरे पर रात में मल कर सो जाएं और सुबह में गीले तौलिए से रगड़ कर पोंछ लें, किसी भी स्क्रब से हज़ार गुना कारगर उपाय है ये।
ऐसा नहीं है कि बोरोलीन पर भरोसा रातोंरात हो गया है, पूरी आधी शताब्दी का विश्वास है ये। फटी हुई एड़ियों को डालडा पीला कर सुलाने से लेकर, इतवार को चापाकल, कुआं या तालाब के पत्थरनुमा घाट पर ईंट से रगड़ के चिकनाई प्रदान करने तक सब आजमा चुके। नेनुआ का झांवा, प्युमिक स्टोन और फैंसी पत्थर से समय का पहिये घूमते-घूमते बोरोलीन तक जा कर रुक गया। कहीं कट-छट गया हो, कहीं जल गया हो, कोई कीड़ा काट दे या ठंड में फटे होंठ, फटे गाल, फ़टी एड़ियां सबका एक ही इलाज "खुशबूदार असरदार एन्टीसेप्टिक क्रीम बोरोलीन।"
कहते हैं बस एक जले, टूटे और आतंकित दिल को छोड़, बोरोलीन सबकुछ मरम्मत कर देता है। हमको तो शक है कि कलेजा में लगा के कोई देखा नहीं है, ट्राइ करने में क्या हर्ज़ है, हो सकता है वो भी फिक्स हो जाये। क्या पता? तो बस, अपने थोबड़े पर बोरोलीन वाला स्माइल चिपकाइये औऱ दुनिया जीत लीजिये।
आज FMCG प्रोडक्ट के दौड़ में कहीं पिछुआ गया है हमारा बोरोलीन। लेकिन साथ में पीछे छूट रही है वो गर्माहट, वो अपनेपन की महक, वो बाकी इन्द्रियों पर हावी सुगंधैनींदरी, जिसकी कूवत आपको चुटकी बजाते घर की यादों सी थपकी देने में कामयाब होती थी, तो लगे हांथों बोरोलीन चपोतिए और मस्त यादों का पिटारा खोलिए कमेंट बॉक्स में।
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Monday, December 26, 2022

बहुत जाड़ा बढ़ गया है!

  हाथ तापते हुए चोखा पका लो फ्रेंड्स

🤣
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Sunday, December 25, 2022

" बड़ा दिन बोले तो "

चपन मे समझ में ही नहीं आता था कि बड़ा दिन माने क्या? दिन बहुत बड़हन होता होगा इसीलिए क्या? लेकिन दिनवा तो तुरंत भाग जाता जाता है, कइसन बड़ा दिन है ये? बाद में बाबूजी ने बताया कि दिन बड़ा होने की शुरुवात होने लगती है, तब जा कर उलझन कुछ कम हुई।
घर के बगल में एक मिशन हॉस्पिटल था - "तुम्बागड़ा नवजीवन"। हम बहाना खोज-खोज के जाते थे, काहे की वहाँ पर पढने के लिए ढेरों किताब मिलता था यीशु मसीह, चरवाहों, जेरुसलेम, पवित्र तारों और ऐसी ही रोचक घटनाओं का खूबसूरत व्याख्यान। साथ में विदेशी नाम और स्थान का जिक्र, समुद्री यात्रा और रेगिस्तान का जिक्र, परिकथा की तरह बाल मन कल्पना लोक में पहुँच जाता था।
मेरी छोटकी बहन आबादगंज वाले मिशन स्कूल में पढ़ती थी। उसके अनुभव क्रिसमस को लेकर थोड़े अलग थे। जितना हंगामा होली दशहरा में नहीं होता था, उससे ज्यादा बड़ा दिन पर स्कूल औऱ सिस्टर लोग के कान्वेंट में तैयारी होती थी। केक बनने, बेकिंग की खुशबू कई दिनों पहले से खिड़की से तैर सुबह की सभा में यीशु का गुणगान करते चेहरों तक पहुँच जाती थी। पेड़किया को डंपलिंग बोल उसमें नारियल का बुरादा, खोवा, मेवा भरके बनाया जाता था। निमकी, खाजा तो देशी प्रभाव में आ कर सिस्टर लोग बनाने लगी थीं। ई सब भले बच्चों को नहीं मिलता था, सिर्फ उन अतिथियों के लिए होता था, जो सिस्टर लोग को बधाई देने 25 को कान्वेंट पहुँच जाते थे। मैं भी कौतुहल में एकाध बार अपने चाचा संग लटक के गया था, इसीलिये इतना डिटेल पता था। VIP गेस्ट होने के भी अलग फायदे हैं, जबरदस्त सुन्दर झांकी देखने को मिला, ए ग्रेड अतिथि वाला ट्रीटमेंट हुआ सो अलग। स्कूल बंद होने से पहले एक दिन 19-22 दिसंबर के बीच में बच्चों का सेलिब्रेशन होता था। किसी मोटे बच्चे को रुई वाला दाढ़ी मूंछ लगा के लाल कोट पैंट और टोपी पहना, 'संताबाबा' बना दिया जाता था, हर बच्चे से 5-10 रुपया उगाही कर कॉपी, पेंसिल, साबुन टाइप गिफ्ट् खरीद के चिमचीमिया में लपेट, संता बाबा झोला ले के पक्कल दाढ़ी पर हाथ फिराते बच्चा लोग को बाँट देते थे। मेरी छोटकी बहन बहुत लाजवंती थी लेकिन उसको भी दो तीन बार संताबाबा बनाया गया था, ऊ तो घाँस पट्टी में पक्कल दाढ़ी मूंछ खरीदने के लिए गयी, कितना परेशानी हुआ खोजने में, ई बताते हुए बोल गयी तो हम पकड़ लिए।
ग्रीटिंग कार्ड बनाने, खरीदने और बांटने का जबरदस्त प्रचलन था। एकदम अमला टोली का बाजार तो जगमगा जाता था नया साल औऱ क्रिसमस् का कार्ड से, उस समय मोबाइल था नहीं और चिट्ठी पत्री का ज़माना ही था। फूल, पट्टी, प्राकृतिक दृश्य वाले ग्रीटिंग कार्ड ज्यादा चलते थे। कागज़ को मोड़ पॉप अप कार्ड थोड़ा महंगे पड़ते लेकिन उनका भी फैशन था। अंदर में खूब कलात्मक डायलॉग मारते थे हमलोग औऱ कुछ तुकबंदी भी -
"यह कार्ड खोलना तुम हंसते-हंसते
मेरे खास दोस्त को नए साल की बधाई और नमस्ते."
"लिफाफा खोलिये मगर प्यार से! "
"नया साल, नया दौर,
मुबारक हो आपको नये मौसम का नया बौर "
डिजिटल युग के दौर में वो मासूमियत शायद अब खो गयीं है। सब कुछ इतना सुलभ और फैंसी हो गया है कि इसके महत्त्व का पता ही नहीं चलता है, तो गाजर का हलवा, प्लम केक खाइये और आपके अनुभव बड़ा दिन को लेकर क्या हैं, लिख मारिये। ठीक है ना !!!
© ठेठ पलामू
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Saturday, December 24, 2022

" बोरसी "

दि आप गाँव में रहे हैं, तो बोरसी शब्द से आप जरूर परिचित होंगे और संभवतः इसका आनंद भी उठाए होंगे। किसी घर की कामकाजी महिला, जो दिन रात घर वालों की सेवा में लगी रहती है और जब उसकी किसी इच्छा की पूर्ति नहीं होती है, तो उसे शायद यह कहते हुए भी सुना होगा "हमर परवाह केकरो नइखे। खाली हम सबके बोरसी भरे ला ही।" जब कभी कोई महिला किसी से नाराज होती है और उसे मनाने या कुछ देने की बात हो, तो गुस्से में कहती है कि " हो, ओकर हम बोरसी नई भरब, ओकरा हम मनावे जात ही?"
कभी कभी "बोरसी-भरौना" मीठी गाली के रूप में भी सुनने को मिल जाता है। हो सकता
कभी आपके घर की बूढ़ी दादी या काकी ने आपसे जाड़े में बोरसी भर देने की विनती भी की होगी।
यह बोरसी ग्रामीण जिंदगी में काफी महत्व वाला रहा है। बोरसी वास्तव में कम ईंधन में अधिक देर तक गर्मी देने वाला पात्र या अंगीठी है, जो विशेष रूप से वृद्धों के लिए जाड़े में वरदान है। यह एक मिट्टी की पकी हुई या कच्ची कड़ाही होती है, जिसमें जाड़े में सुलभ 'धान की भूसी' का प्रयोग ईंधन के रूप में किया जाता है। शाम को इस कड़ाही में पूरी तरह धान की भूसी को भर दिया जाता है और फिर उस पर जलती चिपरी(उपला) का एक टुकड़ा रख दिया जाता है। कुछ समय तक काफी धुंआं निकलता है और धीरे धीरे बोरसी सुलग जाता है और धुआँ समाप्त हो जाता है। फिर अक्सर वृद्ध महिला इसे अपने पास रख कर बैठ जाती है और धीरे-धीरे हाथ पांव सेंकते रहती है। रात को इस बोरसी को कभी कभी खटिया के नीचे भी रख दिया जाता है, जिससे सोने वाले को नीचे से गर्मी मिलते रहती है।
इस बोरसी की विशेषता है कि इससे कभी आग की लपटें नहीं निकलती और न एक बार जल जाने के बाद धुंआं ही निकलता है। इसकी आग 15-20 घंटे तक जलती रहती है, केवल ताप कम होता जाता है। जब जाड़े में दिन को धूप नहीं होता, तो दिन भर बोरसी का आनंद लिया जा सकता है। बच्चे तो इस बोरसी का मजा कई प्रकार से लेते हैं। दादी के पास बैठ कर उनकी मजेदार बातें या कहानी तो सुनते ही हैं, साथ ही उस बोरसी में सेम या आलू या शकरकंद घुसेड़ कर पकाते हैं और निकाल निकाल कर खाते जाते हैं।बोरसी का इस प्रकार पकाये गए आलू या शकरकंद के स्वाद का क्या कहना!!!
आप भी अपने बोरसी से जुड़े किस्से कहानी कमेंट बॉक्स में शेयर करें।
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Thursday, December 22, 2022

New film

 लामू के धरती से एक से बढ़कर एक कलाकार पैदा हुए हैं. कुछ को हम जानते हैं कुछ से अनजान. ठेठ पलामू की कोशिश है कि हम आप सब को पलामू के ऐसे रत्नों से मिलवाते रहें.

फ़िल्मकार राहुल शुक्ला पलामू के ऐसे ही अनमोल रतन हैं. उनकी फिल्म उपन्यास रिलीज हो रही है. खास बात यह है कि फिल्म के कई किरदार पलामू के ही हैं जैसे सैकत चटर्जी आदि. उससे भी ज्यादा खास बात यह है कि फिल्म के अधिकांश हिस्सों की शूटिंग भी पलामू में ही हुई है. रिलीज से पहले ही यह फिल्म कई सारे पुरस्कार अपने खाते में दर्ज कर चुकी है.
तो अब हमारा फर्ज बनता है कि अपनी माटी अपनी बोली का कर्ज उतारें और इस फिल्म को ज्यादा से ज्यादा दर्शक दिलाने में अपना योगदान करें.
फिल्म तो आपको पक्का पसंद आएगी ही ये हमारा दावा है.
©ठेठ पलामू

Wednesday, December 21, 2022

" ओभर-ब्रिज "

मूर्ख होते हैं वो, जो ओवरब्रिज से नीचे उतरते समय साईकल पर पैडल मारते हैं - ये डॉयलॉग हमारे हिंदी वाले गुरुजी का मनपसंद वन-लाइनर था।

डालटनगंज के ओवरब्रिज पर चढ़ते समय कभी सोचे हैं कि ये ओवरब्रिज कितना अभिन्न अंग हो चुका है हमारे जिंदगी का? आम दिनचर्या का वो हिस्सा है ये, जिसे हम नोटिस भी नहीं करते, बस कचहरी के सामने से चढ़ते हैं और रेडमा चौक पर उतर जाते हैं। कहते हैं ना कि किसी चीज की महत्ता तभी पता चलती है जब उसकी कमी हो। आज की पीढ़ी को अंदाजा भी नहीं कि जब ओवरब्रिज नहीं था, तो कितना वक्त बर्बाद होता था, कितना घूम कर जाना पड़ता था, कितना रेलवे क्रासिंग पर इंतेजार करना पड़ता था।

अब तो शहर में ढेरों ओवरब्रिज हो गए हैं, लेकिन एक वक्त जब ये अकेला था, तो ऊपर चढ़ कर मैं नीचे जाती ट्रेन देखे बिना कभी आगे नहीं बढ़ती थी। गर्मी में ब्रिज के ऊपर सर्र सी जाती हवा के थपेड़ों में जहाँ आत्मिक सुख की अनुभूति होती थी, वहीं ठंड के दिनों में ये अनुभव हाड़ कंपा देने वाला था। पुल के नीचे गिरजा घर के घंटे की ध्वनि, किसी रेलगाड़ी के आगमन से उत्पन्न मोहक तस्वीर, ऊपर से किसी दुपहिया, चारपहिया, चरणजीप में सवार हो कर जाते आप...अगर मन थोड़ा भारी या स्ट्रेस में हो, तो आप देख भी ना पाएंगे औऱ ये पुल यात्रा समाप्त हो जाएगी। लेकिन किसी दिन सुबह 5-6 बजे, दोपहर 3:00- 4:00 या रात में 11:00 बजे के बाद ये करके देखिये कितना मज़ा आता है, निर्मल आनंद है ये।

बहरहाल दिन भर में कई बार हम ओवरब्रिज के ऊपर नीचे चढ़ते उतरते हैं। बिना ये जाने की इसी आनंदमयी पुल के नीचे, आबादगंज के तरफ वाली सडक से सटा हुआ - छुटकी मुनिया का घर है जो कई बार बस-उजड़ चुका है। दहिसर भूईयां रेलवे क्रासिंग औऱ पेट्रोल पंप के बीच एक बहुत ही कामयाब चाय-समोसा-बन का दूकान चलाते हैं औऱ जो ये रेलवे फाटक आगे जाकर आबादगंज औऱ जेलहाता को जोड़ती है ना, उसके फाटक को नजरअंदाज़ करके मालगाड़ी से कोयला चोरी कर के भाग रहे अजईया ने अपना एक पैर पिछले साल गवां दिया था। जब पुल नहीं बना था 1980 के दशक के पूर्वआर्द्ध तक, ऐसी घटनाएं औऱ ज्यादा होती थीं।

घटनाएं होती हैं, हमारा चेतन मस्तिष्क उन्हें सुनता, जानता है, समझता है, लेकिन समय के बालू के पड़ते ही भुला भी जाता है। हाँ दो एक बार अवचेतन को ये याद रह जाता है कि इन सब के मध्य निश्छल, निर्विकार, अक्षुन्ण, शांति से अपनी जगह खड़ा है, सब कुछ का गवाह बना हमारा ओवरब्रिज।
बावजूद इसके जब भी हम रेडमा चौक पर जबरदस्त ट्रैफिक जाम में फँसते हैं, तो ये कहने से बाज नहीं आते... " पुलवा पे चहड़बे नहीं करते तो सही रहता, जाम से बच जाते, नवाटोली होते हुए चल आते , चाहे तो रेलवे कॉलोनी, स्टेशन रोड होते हुए, चाहे आबादगंज में से घुस कर निकल जाते"। आप आज़ाद हैं जो चाहे सोचिये, लेकिन इसमें पुल का कोई दोष नहीं। वो आपकी सोच से अनिभिज्ञ यूँ ही खड़ा रहेगा, कई सालों तक एक महल्ले को दूसरे से, एक पाट को दूसरे पाट तक पाटता रहेगा।
आप चाहे उसे बचपन का वो रबर का 'हिट मी' वाला खिलौनिया होता था ना, वो समझ लें। रबर प्लास्टिक का बना हुआ - आते जाते एक घूँसा मार हम हँसते हुए निकल जाते थे, वो थोड़ा सा आपके प्रहार से प्रभावित हो हिलता, लेकिन तुरंत ही सीधा हो जाता था। उसका तो काम ही था ऐसा करना। बहुत ही सुविधाजनक रूप से हम उस पर भड़ास निकाल निकल जाते थे।
तो बस बॉटमलाइन ये है कि नेकी करना, लोगों, संबंधों को जोड़ना, दायित्वों का निर्वाह सम्पूर्ण करना, नेक काम में आना अच्छी बात है लेकिन अति होने से पहले थम जाईये। ये ना हो कि आप जिनका भला कर रहे हैं, वो ही आपकी भलमनसाहत को राउंदते चले जाएं ऊपर से गरियाने से भी बाज नहीं आयें। एक संतुलन आवश्यक है और यदि आपको लगता है कि ये संभव नहीं तो बस शक्ति का औऱ संचय करिये और मजबूती से आप और आपकी रीढ़ खड़े रहिये।
© आर्टिकल: शिवांगी शैली
© तस्वीर: सुधांशु रंजन
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Monday, December 19, 2022

" ठाट "

 

    पहिले खपड़ा वाला घर के छप्पर छवात रहे, ओकरा हमनी "ठाट" करेला कहअ हली। उभी का समय रहे, बिना पईसा     के पुरे घर के एक दिन में ठाट हो जात रहे।

ठाट करे के एक दिन पहिले शामे में पुरे गांव में घर-घर जा कहल जात रहे कि ठाट करे के अज्ञा हवा भाई। दुसर दिन पुरे गांव के लोग आ जइतन, आऊ शुरू हो जाइत ठाट।
बढ़ बुढ़ छप्पर पर चढ़ जइतन, कुछ नीचे रहतन। ऊपर से हाला करतन चोप....,चोप...., बाती...., बाती...., त फिर कहतन बीड़ के चोप, बीड़ के बाती। गार्जियन लोग बांस बाती धरवतन आऊ हमनी लइका सब के चोप धरावे वोला काम रहे। बांस मे चोप लगा-लगा के दउड़- दउड़ के धरवती। सबसे नीचे मोहबत बन्हात रहे, त हाला हाईत की मोहबत के बाती..., मोहबत के बाती..., मोहबत के चोप, त उहे मुताबिक हमनी समान धरवती।

सब अलग-अलग मांग होत रहे, एह से की अलग नाप रहे।
एक दिन पहिलही जमीन में गड़हा खान के पानी भर देतन, उहे में चोप डला जाईत, रात में फुलल रहित, आऊ ऊहे में से निकाल-निकाल के देल जात रहे।

बीच में रावा गुड़ के शरबत डुभा (बड़ा कटोरा) में मिलत रहे। शरबत बनावे ओला के अलगे डीउटी रहत रहे।
दुपहर में सातु प्याज खएला मिलत रहे। एकर तइयारी अगल बगल के चाची लोग के हांथ में रहत रहे।
उ दुपहरिया में हंसी खुशी से "ठाट" के काम पुरा हो जाइत, पता भी ना चलित।
शाम के सब कोई के खातिर दाल भात आऊ एकाध गो सब्जी बनित। सभे कोई पंगत में बईठ के खाना खईतन आऊ आपन-आपन घरे जइतन।
© दधिबल मेहता
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Sunday, December 18, 2022

जाड़े में कउवा स्नान



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बात जाड़े के दिन की हो और स्नान करने पर बात न की जाय, तो एकबारगी अन्याय होगा उनपर जो सुबह-सुबह स्नान करके अपने दोनों केहुनियों को सीने से चिपकाये हथेलियों में घर्षण से उष्मा का संचार करते काफी फुर्सत में नज़र आते हैं और दूसरा उनपर जो एकाद अठवरिया में (साप्ताहिक) कौवा स्नान कर के कुम्भ स्नान का अनुभव करते है।
अठवरिया स्नान से याद आया जब मै तीसरी कक्षा में था, उन दिनों अपने विद्यालय में बिना स्नान किये जाना भी दंडनीय था। ठंडी के दिनों में सुबह-सुबह स्नान करना वो भी कुएं से पानी से बड़ी कष्टदायक था। हम तीन भाई-बहनों का विद्यालय भी एक ही था। इसकी मुख्य वजह थी बड़ी और समझदार बहन का सानिध्य तथा निगरानी में दो अनुज हमेशा रहे और गार्जियन टेंशन फ्री रहे। इसका दूसरा पहलु भी था, एक ही घर के दो बच्चों के मासिक फ़ीस पर तीसरे बच्चे का फ़ीस माफ़। विद्यालय के आचार्य जी प्रार्थना के पश्चात ही सभी विद्यार्थीयों का यूनिफार्म और साथ में शारीरिक साफ़-सफ़ाई की जाँच बारीकी से करते थे और जो छात्र-छात्राएं उनकी परिपाटी में फिट नही होते, दण्डित किये जाते।
मेरी दीदी ने ठंडी के दिनों में हमें नहाने से बचाने और आचार्य जी के दंड से ईजात पाने का संयुक्त उपाय ढूंढ लिया था। अब हम तीनों भाई-बहनों की न सिर्फ अच्छी कट रही थी बल्कि वर्ग में आचार्य जी हम तीनों की प्रशंसा भी कर रहे थे। दूसरे बिन स्नान किये विद्यार्थियों को हमारी तरफ दिखा के बोलते - देखो इनलोग ठण्ड में भी रोज स्नान कर के आता है और तुमलोग…… ऐसा लगता है जैसे लेदरा (कम्बल) हटा के सीधा बस्ता टांग लिए होगे; सबसे ज़्यादा पाला तुमलोग पर ही पड़ रहा है…. आएं..... तनी लानो तो डंटवा जी..... कातो ढ़ेर पाला इन्हीं लोग पर गिर रहा है.....
और फिर उनकी उतनी धुनाई हो जाती थी कि उनके शरीर से उष्मा का संचार होने लगता था।
खैर…. ज्यादा दिन हमलोग का चालाकी भी नहीं चल सका। दीदी की सहेली जो की पड़ोस की ही थी बोली-
‘ आएं जी तुमलोग तो कभी कुएं पर दिखाई ही नहीं देते, कब स्नान कर लेते हो ? ’
‘ अरे दीदी हमलोग आंगन में न पानी ले जा कर नहाते है ‘ ऐसा कहते वक़्त मेरा आत्मविश्वास चरम पर था।
‘ अच्छा…! ‘ उन्होंने मेरे कथन पर विस्मय प्रगट की ।
और एक दिन वे विद्यालय जाने से पूर्व हमलोग के घर, आंगन में आ गई। फिर क्या… ..
उन्होंने देखा हम तीनों भाई बहन, यूनिफार्म पहिन के, उकड़ू बैठ के, मुंडी निचे गाड़ के, लोटे से गर्दन पर जल अर्पित कर रहे है जो की सर के केशों को भिगोते हुए भूमिगत हो रही थी।
‘ अच्छा जी… तो यही है तुमलोग का स्नान; कौवा स्नान…… खाली मुंडी धो-धो के आचार्य जी को अच्छा उल्लू बना रहे हो तुमलोग…… चलो स्कूल आज…’
फिर क्या…. विद्यालय में कुछ दिन उपहास के पात्र बने रहे हम तीनों।
चलिए अब एक अन्य घटना का जिक्र करते है, एक बार की बात है मेरे दो परम मित्र बड़ा दिन की छुट्टी में मेरे क्वॉटर में पधारे, मेरा पोस्टिंग उन दिनों गोला (रामगढ़) में था, प्रयोजन कुछ मूल्यवान समय एक साथ व्यतीत करना और रजरप्पा के छिन्नमस्तिके माता के दर्शन। क्वार्टर में पानी एक ही टाइम आता था जिसका समय निश्चित नहीं था और वो भी आधा घंटा। उन दिनों मेरा काम साइट पर ही ज्यादा चलता था तो मै सुबह निकलता और देर शाम अपने क्वार्टर में पहुँचता। अब अनिश्चिचित समय पर आने वाले सप्लाई वाटर को स्टोर करने के लिए, हमने कंक्रीट के ढलाई से बने हौदी में लगे नल को हटा दिया, अब पानी कभी भी आता स्टोर हो जाता। सुबह इस स्टोर्ड वाटर का तापमान इसके अधिकतम घनत्व वाले तापमान के आस-पास तो अवश्य होता था वो ऐसे कि इस पानी से स्नान करने पर ऐसा लगता था मानो आधा कपाल फ्रीजर में और बाकि का बॉडी चील ट्रे में रख दिया गया हो। अब योजनानुसार हम तीनों मित्रों को सुबह इस स्टोर्ड वाटर से स्नान कर के रजरप्पा मंदिर जाना था। वैसे पानी गरम करके स्नान की जा सकती थी पर उसमे ताज़गी ज्यादा देर तक नहीं बनी रह पाती। एक बात और ठंडे पानी के पहले लोटे को शरीर पर उड़ेलते ही बाकि का वीडियो फ़ास्ट फॉरवर्ड होने लगता है और आप जल्द ही बाल्टी भर पानी से स्नान कर लेते है, दूसरी और अगर सुसुम (लूकवार्म) पानी हो तो यही वीडियो स्लो-मोशन में चलती है और आप ज़्यादा देर तक पानी के संपर्क में रहना पसंद करते हैं। खैर हमलोग फ़ास्ट फॉरवर्ड वाले ही थे पर तीन में से बस दो जन। एक मित्र स्नान करने से पाहिले हमसे एक मलिया करुआ तेल मांग के फूल बॉडी पर चोप लिए फिर ऊपर से एक बाल्टी पानी उड़ेल लिए, मुझे तो ये समझ नहीं आया कि वे खुद नहाये या फिर एक मालिया करुआ तेल को नहलाये... खैर दूसरे मित्र ने रजरप्पा पहुंच के भैरवी नदी में स्नान करने की इच्छा जाहिर की हलाकि वो बात अलग है मान्यवर वहां भी अपने बात से मुकर गए बोले- ‘मन चंगा तो कठौती में गंगा ’।
कुछ मातायें बहने आज भी सूर्योदय पूर्व कार्तिक स्नान करती है, कहा जाता है जो फल सामान्य दिनों में एक हजार बार गंगा स्नान का होता है, प्रयाग में कुंभ स्नान का होता है वही फल कार्तिक माह में सूर्योदय से पूर्व किसी भी नदी में स्नान करने मात्र से प्राप्त हो जाता है। मैं उन तमाम माताओं बहनों की चरणवंदना करता हूँ, जो इस कलयुग में इतनी निष्ठा ला पाती हैं। अंत में उम्मीद करता हूँ कि आप सब भी जाड़े के स्नान से जुड़ी कुछ रोचक यादों को अवश्य साझा करेंगे।
© Article: अवनीश प्रकाश
© Picture: शिवांगी शैली

Wednesday, December 14, 2022

पुसपिट्ठा

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जब सर्द मौसम में हवा में नमी घटने लगे और कनकनी बढ़ के दिन भर साल-सुटर ओढ़ने पर मजबूर कर दे, तो समझ जाइए कि पौस महीने का आहट सुनाई देने लगी है। सुरुज भगवान का जैसे-जैसे उत्तरायण में जाने का समय नज़दीक आने लगता है, वैसे-वैसे धूप में बइठ कर सुस्ताने का आनंद और खटिया में बइठ के खाने का मज़ा दुनों दुगुना हो जाता है ।
अब आज खटिया पर सुबह का रऊदा में मतलब की धूप में अलसा ही रहे थे कि माँ पुसपिट्ठा बना के ले आयी।
पिट्ठा आजकल मिक्सी सब के चलते घर पे झटपट बन जाता है। इसको पकाने में उतना समय नहीं लगता जितना की तैयारी करने में। पहिले तो जांता(चकरी) में चावल पीस के बनता था, पर अब आजकल कौन इतना धोना-पीसना करता है। समय के साथ सब चीज़ शॉर्टकट हो गया, तो उसमें पिट्ठा भी नहीं बचा। अब बहुत लोग जल्दी के लिए सूजी(रवा) से बना लेते है, पर हाँ अंदर का भरावन में कोई समझौता मंज़ूर नहीं है हमको। चना-दाल और मसाला भर के जो स्वाद आता है न, उसका बात ही कुछ और है !!!
'पुसपिट्ठा' या सिर्फ़ 'पिट्ठा' कह लीजिए एक्के बात है। चूँकि ये पूस(पौष) के मौसम में ख़ासकर के अधिक बनता है, इसलिए समय के साथ उसके आगे इसका नाम जुड़ गया।
अच्छा ये तो बात दाल-चावल वाले पिट्ठा का हुआ, लेकिन जैसी विविधता हमारे संस्कृति के हरेक अंश में है , वैसी ही वेराइटी पिट्ठा में भी देखने को मिलता है। कुछ लोग गोल बनाते है, तो कुछ गुझिया-पेड़किया के जैसा या मॉडर्न स्टाइल में बोले तो डंपलिंग के आकार का।
पिट्ठा बहुत लोग गुड़-नारियल का भरावन डालते हैं, तो कुछ लोग दूध में पकाकर मीठा खीर के जैसा बनाते है। पिट्ठा सिर्फ़ झारखंड-बिहार ही नहीं पूरे पूर्वी भारत यहाँ तक की बांग्लादेश में भी खूब प्रसिद्ध है। मेरे ओड़िया मित्र के चलते कई बार ओड़िसा का 'अरिसा-पिट्ठा' खाने को मिला। यहाँ तक की भगवान जगन्नाथ के महाप्रसाद भोग में भी प्रतिदिन पिट्ठा चढ़ाया जाता है। असमिया बंगाली लोग भी इसको अपने तरीक़े से बनाते हैं।
तो आप भी आलस छोड़िए, रजाई से निकलिए और बनाइए अपने घर पर पुसपिट्ठा और कोई बच्चा खाने में नखरा करे तो बोलिये की देसी मोमोज है। दावा है पूरा परिवार दबा कर खायेगा। ना तलना ना भूँजना, बस भाप में सिझा के पका देना है। इसीलिए ये पेट पर भारी भी नहीं होता और स्वाद में भी बेमिसाल है। अब इससे आसान और सेहतमंत और क्या होगा। बस साथ में कड़ू तेल-नमक और धनिया-पत्ता का चटनी जरूर ले लीजिएगा, फिर बैठ कर लेते रहिए पुसपिट्ठा का मज़ा पूरे परिवार के साथ।
© अनुज
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