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आज सुबह सुबह लातेहार के आगे एक गाँव में सड़क पर एक युवक को देखा दातुन लेकर बड़े इत्मीनान से चबाते हुए. तब याद आया कि पता नहीं कितने सालों से हमने खुद को इस नैसर्गिक सुख से वंचित रखा हुआ है. वो भी क्या दिन थे जब गाँव में हम बच्चे सुबह सुबह दातुन लेकर चबाते रगड़ते दांतों को चमकाने के लिए प्रयासरत रहते थे.
कभी कभी मॉर्निंग वॉक से लौटते वक्त रास्ते में ही अलाव जल जाता था पूआल बटोर कर. फिर क्या... जम जाती थी मंडली.
अब भोरे भोरे सब के हाथ में बगल की बाबुल या नीम के पेड़ से तोड़ी टहनियों से नवनिर्मित दातुन. लम्बा छोटा कद और वज़ूद के हिसाब से.
फिर तो ऐसे ऐसे टॉपिक पर लोग अपनी पीएचडी की फिलासफी झाड़ते कि... घंटे चार घण्टे कब बीत जाते होश नहीं बचपन में दातुन से दंत मंजन सीखना पड़ता है... शुरू शुरू में तो चबा चबा के दातुन के रस को हम पी जाते थे.
बाद में कूची अच्छी सुन्दर बनाने का competition होता था भाइयों बहनो के बीच. जिसकी अच्छी सुडोल न बने वो मज़ाक का पात्र. बहुत बाद में रांची रहते समय भी कोई मित्र अपनी विशिष्टता झाड़ने के लिए बाजर से दातुन लिए आते थे. कुछ का व्रत होता था कि मंगल वार को प्लास्टिक निर्मित ब्रश निषेध हो गया है...
मीठे कोल गेट पाउडर के आविष्कार ने बच्चों में दातुन इस्तेमाल की कला में क्रांति ला दिया था. कुछ विचारकों का मत है कि तंबाकू मिश्रित लाल दंत मंजन ने ऐसी ही क्रांति वयस्कों और वृद्धों मे लायी थी... हालांकि यह परिचर्चा अगले आलेख में.
दातुन प्रयोग के बाद आखिरी में जरासंध की तरह उसका वध करके उससे जीभी नाम के यंत्र के निर्माण का विधान पुराणों में वर्णित होता है. प्रयोग उपरांत इस यंत्र को अक्सर पड़ोसी के अंगना या बारी में विसर्जित करने की परंपरा का भी वर्णन कुछ ऐतिहासिक शिलालेख में मिलता है. आप भी अपने दतवन से जुड़ी यादें कमेंट बॉक्स में शेयर करें।
© ठेठ पलामू

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