Thursday, April 28, 2022

गर्मी, बुखार, और लू

डॉ. गोविंद माधव
भारत में गर्मी का आगमन हो चुका है। डॉक्टरों के लिए गर्मी को ‘शादी का मौसम’ और बारिश को ‘हनीमून सीज़न’ कहा जाता है। कहने का अर्थ यह है कि अपने देश में लोग सबसे ज्यादा इसी दौरान बीमार पड़ते हैं। आग से जलने की चर्चा हमने पिछले अंक में की थी, आज चर्चा गर्मी के अंदरूनी प्रभाव पर।
सबसे पहले यह समझते हैं कि हमारा शरीर भी एक यंत्र जैसा ही है। इसके कल-पुर्जों को ठीक से कार्य करने के लिए एक स्थिर तापमान की आवश्यकता होती है। यह नॉर्मल बॉडी टेंपरेचर कहलाता है, यानी 35.5 से 37.5 डिग्री सेल्सियस। अगर तापमान इसके नीचे गया तो शरीर का इंजन ठंडा और ऊपर गया तो इंजन गर्म।
हम जब भी अपने मांसपेशियों से ज्यादा काम करते हैं तो शरीर में ऊष्मा ऊर्जा का उत्पादन बढ़ जाता है। ठीक उसी तरह जैसे मोबाइल फ़ोन या कोई अन्य उपकरण ज्यादा चलने पर या गर्म वातावरण में रखा रहने पर गर्म हो जाता है। अब सोचिए कि अगर आपके मोबाइल को धूप में या भट्टी के पास बहुत देर रख दिया जाए तो क्या होगा? क्या उसके चिप में लगे सेमीकंडक्टर विद्युत् तरंगों का सही प्रवाह करा पायेंगे? पदार्थों के विद्युतचुंबकीय गुणों की स्थिति यथावत बनी रहेगी? गर्म होने पर ठीक यही परिस्थिति हमारे शरीर के संकेत तंत्र (सिग्नलिंग सिस्टम) की होती है। तंत्रिकाएँ (nerves) बिजली के तार की तरह दिमाग और पूरे शरीर के बीच संकेतों का आदान-प्रदान करती हैं।
कुछ सूचनाएँ वायरलेस भी होती है। यहाँ कुछ संवाददाता (मेसेंजेर) रूपी मॉलिक्यूल किसी चिट्ठी की तरह, ख़ुद यात्रा करते हैं। तापमान में बदलाव होने से इनकी संरचना और कार्यक्षमता प्रभावित होने लगती है। तो इस स्थिति को पूरे देश में संचार साधन ठप्प होने की तरह से समझ सकते हैं। अगर चिट्ठी में से स्याही गीली हो कर अर्थ का अनर्थ कर दे तो?
लेकिन मशीन की तरह हम अपने शरीर को ठंडा होने के लिए स्विच ऑफ तो नहीं कर सकते हैं न! इसीलिए हमारे मस्तिष्क के एक हिस्से में जिसे हाइपोथैलामस कहते हैं, वहां एक सेन्सर लगा होता है, ठीक AC के सेन्सर की तरह। जैसे ही शरीर का तापमान ऊपर नीचे हुआ, यह सेन्सर मस्तिष्क को सूचित करता है। अब उपाय की बारी मस्तिष्क की होती है। शरीर का तापमान घटा कर सामान्य तक लाने के लिए दिमाग ने अपने सहयोगी ऑटोनोमिक नर्वस सिस्टम को कुछ शक्तियाँ दी हुई है। जैसा कि सहयोगी के नाम से ही स्पष्ट है - 'ऑटोनोमस' यानी स्वायत्तता प्राप्त। यह स्वायत्त तंत्र छोटी-छोटी बातों के लिए बार बार दिमाग को परेशान नहीं करता है बल्कि कुछ निर्णय स्वयं लेने के लिए स्वतंत्र एवं सक्षम है। तापमान के अलावा भूख, गुस्सा, नींद, धड़कन, यौनाचार, रक्तचाप और साँसों की गति जैसे मुख्य काम भी इसी सिस्टम के जिम्मे है।
तापमान को कम करने के लिए हमारे शरीर में एक कूलिंग सिस्टम बना हुआ है। हाइपोथैलामस को जैसे ही पता चलता है कि तापमान बढ़ रहा है, यह सिस्टम स्वतः चालू हो जाता है। सबसे पहले पसीना बहना शुरु होता है। पानी एक कूलेंट की तरह अंदरूनी तापमान को सोखकर पसीने के रूप में बाहर सतह पर लाता है। अगला उपाय है दिमाग की एक्टिविटी को कम करना, ताकि शरीर में ऊष्मा का उत्पादन कम से कम हो, साथ ही महत्वपूर्ण संयंत्र गर्म हो कर खराब न होने लगें। इसीलिए हम गर्मी में सुस्त पड़ने लगते हैं।
परन्तु बचाव के ये उपाय हमेशा कारगर साबित नहीं हो पाते। एक सीमा तक ही ये हमें गर्मी के दुष्प्रभावों से बचाए रख सकते हैं, उसके ऊपर जाने पर शरीर की बनावट और कर्यव्यवस्था चरमराने लगती है। शरीर का तापमान बढ़ने लगता है। पसीने के रूप में बह बह कर शरीर से पानी ख़त्म होने लगता है। कभी कभी तो ज्यादा तापमान होने पर अन्दर का पानी सतह पर आते ही सीधे भाप बन कर उड़ जाता है, हमें पता भी नहीं चलता कि पसीना भी बहा है। ऐसी ही स्थिति गर्म हवाओं के चपेट में आने पर बनती है। लू लगने में क्या होता होगा अब आप समझ रहे होंगे। पसीना भी नहीं निकला, पानी भाप बन कर निकलता रहा इस कारण से बाहरी सतह यानि त्वचा का तापमान भी ज्यादा नहीं बढ़ा, मगर कोर टेम्परेचर यानि अंदरूनी ताप असंतुलित। हाइपोथैलामस का सेंसर भी हैंग कर जाता है, अब मस्तिष्क को समझ नहीं आता कि शरीर का तापमान बढ़ाना है या घटना है। हो सकता है कि शरीर में थरथरी या कम्पन होने लगे जो कि ठंढ में तापमान बढ़ने की एक प्रक्रिया है। कुलेंट यानी शरीर में मौजूद पानी की मात्रा में भारी कमी, पानी की कमी तो रासायनिक प्रक्रियाएँ चौपट, किडनी द्वारा गंदगी को मूत्र रूप में बाहर निकलने की प्रक्रिया बाधित। रक्त के आयतन का दो तिहाई हिस्सा भी पानी ही होता है, तो पानी की कमी से शरीर में खून के बहाव, संगठन, ओस्मोलारिटी, कार्यप्रणाली सब बाधित। खून ही समूचे शरीर को जरुरी पोषक तत्व और ऑक्सीजन पहुंचता है, तो इस तरह से सारे अंग प्रभावित होने लगते हैं। तापमान कितना बढ़ा और कितने देर तक बढ़ा रहा, इस पर निर्भर करेगा कि शरीर में कितनी गड़बड़ी हुई। पानी के साथ साथ जरुरी आयन जैसे सोडियम और पोटासियम भी बह जाते हैं पसीने के रूप में। इसीलिए पसीना नमकीन होता है। हमारे अन्दर के सभी सिग्नलिंग सिस्टम को काम करने के लिए इन आयनों की आवश्यकता होती है। इन इलेक्ट्रोलाइटस की कमी से हाथ पैर की मांसपेशियों में क्रेम्प्स होने लगते हैं। हृदय की गति बाधित होने लगती है, पेट में पाचन प्रभावित होने लगता है तो अतिसार (डायरिया) होने लगता है। दस्त से शरीर में और ज्यादा पानी की कमी होने लगती है।
अब आप समझ सकते हैं कि गर्मी की चपेट में आने से आपका शरीर किस तरह प्रभावित होता है। गर्म भट्टी के नजदीक ज्यादा काम करने वाले मजदूर, धुप में ज्यादा देर तक लगातार पसीना बहाने वाले खिलाडी और ठंडे प्रदेश में रहने के अभ्यस्त लोग जो अभी अभी गर्म प्रदेश में आये हैं - ये सब खतरे में पड़ सकते हैं। अगर किसी अन्य कारण से भी आपके शरीर में पानी और लवण - इलेक्ट्रोलाइटस की कमी होती है तो आप खतरे में हैं।
गर्मी से उत्पन्न होने वाली बीमारी को ही ‘हीट-स्ट्रोक’ कहते हैं। जबकि किसी भी कारण से शरीर के तापमान बढ़ने को हाइपरथरमिया, फीवर या आम भाषा में बुखार (या ज्वर) कहा जाता है। ध्यान रहे कि ज्वर के अनेक कारण हैं जिनमे संक्रमण (इन्फेक्शन) और सूजन (इन्फ्लामेशन) सबसे मुख्य हैं।
अभी तक आपने समझा शरीर की ताप-नियंत्रण प्रणाली, उसमे होने वाली गड़बड़ी के ‘कारण और प्रभाव’ को। कोई भी व्यक्ति जो रिस्क पर है, उसमें ऊपर बताये लक्षणों पर गौर करते हुए हीट-स्ट्रोक को शुरुआत में ही पहचान कर हम बड़े खतरे से बच सकते हैं। आपने यह भी समझ लिया कि हमें गर्मी के हानिकारक प्रभावों से बचाने के लिए पानी और नमक कितने आवश्यक हैं। अब आप यह भी निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि हीट-स्ट्रोक से बचने के लिए हमें क्या करना चाहिए।
लेकिन फिर भी यदि आप गर्मी की चपेट में आ ही गए तो क्या करना चाहिए? शरीर को ठंडा करने के लिए त्वचा को बर्फ या ठंडे पानी से पोंछें। कोर टेम्परेचर को कम करने के लिए ठंडा पानी पियें। इलेक्ट्रोलाइटस की कमी को पूरा करने के लिए ओरल रिहाइड्रेशन सोल्यूसन यानि ORS का प्रयोग करें।
‘कितना पानी पीना है?’- यह एक महत्वपूर्ण सवाल है। जटिल गणित से बजते हुए एक सरल सूत्र आप लोगों को बता रहा हूँ जो कि अन्य रोगों में भी एप्लीकेबल है। हमें रोज़ इतना पानी पीना चाहिए कि दिन भर में हम करीब डेढ़ लीटर पेशाब कर सकें।
अब सबसे जरुरी बात - इस आलेख को मैंने इस उद्देश्य से लिखा है कि आप बीमारी को बेहतर तरीके से समझें और उससे बचाव के उपाय कर सकें। मगर स्थिति जब भी सिवियर हो, कृपया प्रशिक्षित चिकित्सक की सलाह शीघ्र लें, अन्यथा रोगी की जान खतरे में पड़ सकती है।
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Sunday, April 24, 2022

#मोबाइल_चौक

 आपका ध्यान बहुतेरे बार अजीब नाम वाले गांव, चौक, चौराहे पर पड़ा होगा। कुछ नाम अजीब होने के साथ ही बहुत रोचक भी होते हैं और उस नाम के पीछे की कहानी को जानने की उत्सुकता पैदा करते हैं।

आज मैं ऐसी ही एक चौक की कहानी लेकर आपके सामने आया हूँ। मैं बात कर रहा हूँ अपने गांव #पोलपोल के सुप्रसिद्ध चौक की। जिसका नाम अपने आप में बड़ा रोचक और अजीब है '#मोबाइल_चौक'।
इस चौक का नाम 'मोबाइल चौक' यूँ ही नहीं पड़ा था। बात उन दिनों की है जब हमारे यहाँ मोबाइल फ़ोन रखना स्टेटस सिंबल हुआ करता था। लैंडलाइन की विदाई धीरे-धीरे होने लगी थी और लोग अपने घरों में शौचालय बनवाने के बजाए हांथ में मोबाइल फ़ोन रखना स्टेटस सिंबल समझते थे। मोबाइल नेटवर्क के पीढ़ी,' 2G में G का मतलब क्या है?' - SSC में प्रश्न पूछा जाता था। लोग सामने वाले को फोन करके जोर से याद दिलाना नहीं भूलते थे कि मोबाइल फोन से फोन किये हैं। मोबाइल कम्पनियाँ भी एकाध टावर बना कर बस ज्यादा से ज्यादा सिम बेचने में लगी रहती थी। हम गांव के लोग भी कॉल करने से ज्यादा मिस्ड कॉल करने में विश्वास रखते थे और उसके बाद फोन पे नज़र गड़ा के बइठल रहते थे।
उस समय नोकिया के कीपैड वाले मोबाइल का एकछत्र राज हुआ करता था। लेकिन नेटवर्क कमजोर होने के कारण घर मे अंदर आवाज़ अच्छे से नहीं आती थी और जैसे ही व्यक्ती मोबाइल लेके हैलो-हैलो करते चौक पे आता तो फिर बातों का संचार स्पष्ट रूप से बड़ी सरलता से हो जाता था। अब नेटवर्क की समस्या कहिये या मोबाइल चमकाने की खुजली। इलाज़ तो अपना मोबाइल चौक ही था।
एगो आउ बात है। बाद में जब नेटवर्क ठीक भी हो गया था लेकिन जवानी की दहलीज पर कदम रखते नव प्रेमी जानबूझकर नेटवर्क का बहाना कर के घर से निकल कर यहीं घंटों समाधि लगाते हुए पाए जाते। हालांकि वीडियो कॉल के बाद स्थिति में कुछ बदलाव जरूर हुआ है..
इसीलिये गांव के कुछ जिंदादिल बुद्धिजीवियों ने उस चौक का नाम मोबाइल चौक रख दिया और सड़क किनारे खड़ी बिजली के खंबे पर चौक से 'मोबाइल चौक' भी लिख दिया गया। उम्मीद है आप भी कुछ ऐसी ही रोचक नामों की कहानियों कमेन्ट में शेयर करेंगे।
©बालेन्दु शेखर
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Saturday, April 23, 2022

23 अप्रैल: बाबु कुँवर सिंह का जगदीशपुर फतह

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पलामू जिला स्कूल में हमलोगों के शिक्षक थे कुंवर कामेश्वर प्रसाद सिंह। हर साल 23 अप्रैल को कुंवर सिंह विजयोत्सव के मौके पर वह स्कूल में समारोह का आयोजन करते थे। उनकी बात शुरू होती थी मनोरंजन प्रसाद सिंह की प्रसिद्ध कविता की इन पंक्तियों से-
"मस्ती की थी छिड़ी रागिनी, आजादी का गाना था।
भारत के कोने-कोने में, होगा यह बताया था ॥
उधर खड़ी थी लक्ष्मीबाई, और पेशवा नाना था।
इधर बिहारी वीर बाँकुरा, खड़ा हुआ मस्ताना था ॥
अस्सी वर्षों की हड्डी में जागा जोश पुराना था।
सब कहते हैं कुंवर सिंह भी बड़ा वीर मर्दाना था॥"
ये पंक्तियां हम बच्चों में जोश भर देतीं थी। अपने पूर्वज की गाथा सुनाते हुए कुंवर बाबू काफी आक्रामक और भावुक हो जाते थे। उनके हाथ की 'बंकुली' 'तलवार' की तरह चलने लगती थी और फिर उनकी आंखों से अश्रुधारा फूट पड़ती थी। बाद में हमलोगों ने आगे के क्लास में भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास पढ़ा तो इसमें 1857 के आंदोलन को 'सिपाही विद्रोह' के रूप में बताया गया। फिर पता चला कि यह विद्रोह नहीं बल्कि क्रांति थी। इसे वीर सावरकर के नाम से जाने जाने वाले विनायक दामोदर सावरकर ने '1857 का स्वातंत्र्य समर' कहा और इसी नाम से पुस्तक लिखी। इस पुस्तक में विजय दिवस के दिन का जिक्र करते हुए उन्होंने लिखा है, '23 अप्रैल को अंग्रेजी सेना को ऐसी धोबी पछाड़ देकर उस वृद्ध युवा राजा कुंवर सिंह ने अपने जगदीशपुर के राजमहल में विजयश्री के साथ प्रवेश किया।'
इस पुस्तक में वीर सावरकर ने बाबू कुंवर सिंह के गंगा पार करने से लेकर राजमहल तक पहुंचने का जिस तरह से विवरण किया है वह उनकी वीरता की जीवंत तस्वीर खींचने के समान है। उन्होंने लिखा है, 'सारी सेना कुंवर सिंह ने पहले ही गंगा पार उतार दी थी और क्षण-दो क्षण में अपनी सेना को सुरक्षित नदी पार हुआ देखकर वह भी पार हो गया होता; परंतु हाय! हाय! एक क्षण ने कितना घात किया! भारत भूमि का वह सौभाग्य तिलक, वीरांगन का वह अभिमान, स्वतंत्रता की वह तलवार- राणा कुंवर सिंह! गंगा घाट में बीचोबीच पहुंच गया तब शत्रु की एक गोली आई और उसके एक हाथ में घुस गई। यह देखते ही उस भीष्म ने क्या किया? अश्रु बहाने लगा क्या? रक्त का बहाव रोकने के लिए किसी की सहायता मांगने लगा क्या? क्या उसका आसन उस तीव्र वेदना के किंचित भी विचलित हुआ? नहीं-नहीं, ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। हाथ पर मक्खी बैठे, उतना भी कंपित नहीं हुआ। उसने एक बार उस गोली को तिरस्कार से देखा और कुंवर सिंह को मैंने एक क्षण भी अस्वस्थ किया, उस फिरंगी गोली को यह अभिमान भी न हो- ऐसा उसे लगा। उसने दूसरे हाथ से अपनी तलवार खीच ली और फिरंगी गोली से भ्रष्ट हुआ हाथ कुहनी से छांट दिया और यह काटा हुआ टुकड़ा गंगा को अर्पण करते हुए कुंवर सिंह ने गंभीर गर्जना की- हे माता, हे गंगा! बालक का यह शेषोपहार स्वीकार कर। भागीरथी को हे माता, हे माता कहने वाले सैकड़ों पृथजन आज तक जनमे और जनमेंगे, पर कुंवर सिंह, तेरे कारण यह देवी जाह्नवी पुत्रवती हुई है।'
पुस्तक के इस हिस्से को पढ़ते समय एक बार फिर जिला स्कूल में पहुंच गया। हमलोगों के शिक्षक कुंवर बाबू ने 1979 या 80 में इस टाउन हॉल 'कुंवर सिंह' नाटक का मंचन टाउन हॉल में कराया था। इसमें विद्यासागर शर्मा ने कुंवर सिंह का जीवंत अभिनय किया था। उन्होंने करीब-करीब इसी अंदाज में मां गंगा को अपनी कुहनी के नीचे का हिस्सा अर्पित किया था।
वीर सावरकर आगे लिखते हैं, 'इस लोकोत्तर पुरुष द्वारा यह अलौकिक उपहार अपनी त्रिलोक विख्यात मातृगंगा को अर्पित करते ही उसकी शीतर फुहारों ने उसका देह सिंचन किया और इस मातृप्रेम से उत्साहित हो वह वीरवर अपनी सेना के साथ गंगा पार हो गया। उसका पीछा करती अंग्रेजी सेना हताश होकर गंगा के इस ओर ही कुंवर सिंह का नाम लेना छोड़कर बैठी हुई थी। तब वैर भाव से रहित हुआ वह सिंह शाहाबाद प्रांत के अपने जन्मसिद्ध जंगल में फिर एक बार घुसने लगा। 22 अप्रैल को उसने जगदीशपुर में भी प्रवेश किया और इस तरह जिस राजमंदिर से उसे कोई आठ माह पूर्व अंग्रेजों ने निकाल दिया था उसी जगदीशपुर के राजमहल में उसका अपना राजा फिर एक बार बिराजने लगा। कुंवर सिंह के गंगा उतरकर आते ही उसका समान वीर बंधु अमुर सिंह हजारों सशस्त्र ग्रामीणों के साथ आकर मिल गया। इन लोगों को और गंगा उतरकर आए शूर सिपाहियों को कुंवर सिंह ने जगदीशपुर के चारों ओर के जंगलों में निशाने-निशाने पर नियुक्त किया और छापामार युद्ध से विजयश्री पाया हुआ वह वीर रणपुरुष रण के लिए सज्जित होकर फिर से रण में उतरा।'
इसके बाद अंग्रेजी सेना और कुंवर सिंह की सेना में फिर जोरदार युद्ध हुआ। अंग्रेज सेना के पास तोपें थी पर कुंवर सिंह की सेना में देशप्रेम और आजादी की ललक थी। वीर सावरकर के शब्दों में,'झाड़ी में घुसते ही कुंवर के लोगों पर अंग्रेजी सेना गुर्राते हुए गोले छोड़ने लगी। कुंवर के पास तोपें तो थी नहीं, पर ऐसा होते हुए भी कुंवर की सेना अंग्रेजी सेना की तोपों की खिल्ली उड़ाकर उन्हें बांधना चाहती थी। फिर अब छोड़े अंतिम बाण! अंग्रेजी सेना ने जोरदार हमला करने का निश्चय किया। वे कालदूत की तरह कुंवर पर टूट पड़े, कुंवर की सेना झाड़ियों में से उनका सामना करने लगी। अरे! अंग्रेजी सेना की हिम्मत एकदम टूट गई, पीछे लौटने का बिगुल बज उठा। कुंवर ने अंग्रेजी सेना को ऐसी जगह और इस रीति से फांस लिया था कि वहां खड़ा रहना या वहां से भागना-ये दोनों समान रूप से घातक थे। इधर कुवंर सिंह के आदेश से उसके राजमहल का सारा महत्वपूर्ण सामान दूसरी जगह भेज दिया गया था। वैसे ही सरकार कागज आदि न जलाकर उसने सिपाहियों को कहा कि अंग्रेजों को यहां से भगा देने के बाद वास्तविक वसूली और न्याय करने के लिए ये कागज अवश्य रखे जाने चाहिए। लोगों का उसके प्रति इतना आदर था कि उसके सामने कोई धूम्रपान करने की हिम्मत नहीं करता था।'
पुस्तक में आगे लिखा गया है, 'श्री कुंवर सिंह की भूमिका किसी वीर काव्य के नायक स्थान पर शोभित हो सकती है। सन 1857 के क्रांतियुद्ध में यदि कोई सब प्रकार से योग्य नेता था तो वह कुंवर सिंह ही था। युद्धकला में उसकी बराबरी कर सके ऐसा कोई नहीं था।' वीर सावरकर की पुस्तक का पहला संस्करण 1909 में आया था। उन्होंने उसी समय कुंवर सिंह को काव्य के नायक के रूप शोभित होने की बात लिखी थी। इसे 1929 में मनोरंजन प्रसाद सिंह ने 'वीर कुंवर सिंह' शीर्षक से कविता लिखकर सही साबित कर दिया। यह कविता इस साल रामबृक्ष बेनीपुरी के संपादन में निकलने वाली 'युवक' में छपी। जिस तरह वीर सावरकर की पुस्तक को अंग्रेजों ने प्रतिबंधित किया था उसी तरह इस कविता को भी प्रतिबंधित कर दिया। इस प्रतिबंध के बाद भी कुंवर सिंह की यश और कीर्ति को रोका नहीं जा सका। इस गीत के अलावा 'बाबू कुंवर सिंह तेगवा बहादुर, बंगला में उड़ेला अबीर' भी बिहार-झारखंड सहित पूर्वांचल में गाया जाने वाला सबसे प्रचलित गीतों में से है।
बाबू कुंवर सिंह की चर्चा करते हुए मुझे अपने कॉलेज के दिन भी याद आ रहे हैं। तब मैं छात्र राजनीति में भी था और विद्यार्थी परिषद के कार्यकर्ताओं के साथ जीएलए कॉलेज में कुंवर सिंह विजयोत्सव के मौके पर साइकिल रेस का आयोजन करता था। यह परंपरा वर्षों तक चली।
आइये, विजयोत्सव के मौके पर वीर बलिदानी बाबू कुंवर सिंह को याद करें।
नोट-विनायक दामोदर सावरकर ने यह पुस्तक कई दस्तावेजों के आधार पर लिखी है। कुंवर सिंह वाले अंश में उन्होंने रजनीकांत गुप्त कृत 'आर्य कीर्ति, बंगाल का जिक्र किया है।'
© प्रभात मिश्रा सुमन
वरिष्ठ पत्रकार, अमर उजाला नोएडा
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Tuesday, April 19, 2022

मुड़ कटवा

 #ठेठ_पलामू :

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घर में छोटकी बहिन से फोन पर बतियात हली तो पूछे लागल कि - "आंय भईया! तोहनी के गरमी छुटटी कब होतऊ?" अब ओकरा के बतावे कि इहाँ गरमी छुट्टी होना तो दूर, सोंचलो पर सैलरी कटे के चांस रहेला!
छुट्टी तो आपन बचपन मे होइत रहे, पूरा 1 महीना जम के। एके हफ़्ता में फूल स्पीड से पूरा महीना भर के होम वर्क ख़त्म! अगर पढ़ाई के ई स्पीड 6 महीना भी रह जईतक न तो कसम से गाँधी डिवीजन के नौबत ना अइते हलक क्लास में। पढ़ाई से नीमरला के बाद तो फिर केतनो लहर चलो, केतनो गरमी पड़ो हमिन के काहे ला जे नींद लगे। सब के सुतला पर निकल जइती आम तर। ओकरो से मन न भरे तो आउ दूर घूमता वाला (उहां रोड घूमावदार बा, इहे ला ई नाम) जामुन तर। उहंउ ना तो बेंगी पर (बेंग ढेरे रह हथीन इहां) मिसिर जी के खेत में पंप चले तो ओकर में नहाए चल जइते हली। माजा भी आव हलक पूरा। लेकिन उ मजा के खराब कर देलक एगो नाम- '#मुड़कटवा'
घरे-बहरे सब जगह हाला हो गेल हलक कि सब लइकन-चेंगन के संभाल के रखअ, मुड़कटवा चलल बा। अब हमीन लइका जात के डर से जादे तो ई जाने के अकबकी हलक कि ससुरा मुड़कटवा होला कइसन? कोई कहे कि लइकन के उठा के ले जाला! तो कोई कहे कि नाह, खाली मुड़ीये काटे ला! अब बाकी के टेंसन अलगे, आउ हमीन के टेंसन अलगे।
अब मान लेली कि दू गो लइका के पकड़िये लेलक, तो अकेले ले के जाइ तो कइसे जाइ? तो कोई कह देतक डेरावेला भी कि बड़का बोरा में भर के लेगअ हथीन हो! कोइ कहलक कि मलाईबरफ लेमचुस दे के ठग लेव हथीन पहिले फिर बेहोश कर के ले जा हथीन! एगो कहलक कि घर में प्याज रोटी मांगे आव हथिन आउ माइ जइसहीं भीतरे जइहें प्याज लावे, उ लइका चोरा के गायब।
अब हमीन हली तो लइके न! घरे अइते बड़का बोरा जुगाड़ कर के ओकर में घुस के देखती कि मने सही में ओकर में भर के लेजल जा सकेला कि ना। फिर आपस मे जे बड़का लइका हलक ओकरा से पीठ पर बैठ के कहती कि चल तो कुछ दूर हो! अब बचपन से ही हम तनी गोल-मटोल हइये हलीर, हराम जे लइकन दू से चार कदम हमरा लाद के चले परतन। अब हमीन के एतना प्रयोग से ई तो साबित हो गेल हलक कि हमरा टांग के लेजहूं ला मुश्किल बा आउ बोरा में भरबो मुश्किले बा। अब हमीन के दिमाग मे थोड़े ई बात हलक कि अगर उ मुड़कटवा के ग्रुप भी हो सकेला! 2-3 गो आदमी मिल के भी मुड़ कटवा हो सक हथ?
जइसन बतावल गेल हलक, हमनी बस अंगुलीमाल डाकू वाला इमेज बना के रेडी हली, कि उहे टाइप से कोई होइ देखे में कूचु-कुचु करिया। हाथ मे तलवार, साथ मे बोरा आउ एक दु ठो काटल मुड़ीयो! अब अपराधी के इमेज सब लइकन के दिमाग मे बन गइल रहे। बूतरू गैंग सब मिल के इहे रिजल्ट पर पहुँचली कि अब अकेले कोई लइका कहूँ आम चुने ना जाई। जब भी जाये तो कमसे कम तीन चार के टीम बना के। काहे कि एगो से ज्यादे तो मुड़कटवा के बोरा में अंटबे ना करी। तो ग्रुप में रहला पर बेचारा चाह के भी नइं लेगे पारी।
ओकर अलावे जब भी खेत तरफ लोटो लेके जइती तो पैंट के पाकिट में चोंख-चोंख पथल कम-से-कम तीन चार गो। सब के हाथ में बढियां बांस के मजगर लेबदा ताकि आम भी जादे झराये आउ जरूरत पड़ला पर मुड़कटवा के तलवार से भी लड़े पारे। दिमाग में रामायण के देवासूर संग्राम जीवंत हो गेलक। जबला युद्ध के तैयारी हो गेल तब तक सब हल्ला गुल्ला भी कम हो गेल हलक।
(सब के बता देउं कि उ घरी बड़ा बड़ा पुल ई सब बने में नर बली के बड़ा हल्ला रहे, अउर ओकरे चलते कै जगह बच्चा चोर पकड़ाईलो हलन। इहे से घरे वलन हमीन के मुड़कटवा के नाम से डरवईले हलन। एक बार तो एगो आदमी के मुड़कटवा समझ के सब खूब कूट देलन ट्रेन में काहे कि ओकर पास एगो बोरा रहे जेकर में मुड़ी होखे के शक रहे! बाद में पता होइलक कि बेचारा तरबूज बेचे जाइत हलक। हालांकि अभीयो झारखंड में कई जगह ई अमानवीय जघन्य परंपरा जिंदा बा, हाले में पुलिस छापामारी करले रहे!)
हाला कम हो गेल रहे तो मन में डर भी कम होए लागल। अब जीभ नाचे लगल फिर से कि बेंगी पर बलदेव सिंह के पेड़ पर बड़ी बड़का आम। उनकर गःड़ासा के पहरा के चलते बड़कन के तो हिम्मते ना पड़ हलक जे उ सोचबो करतन उ आम तोड़े ला।लेकिन अब हमनी के खुराफाती दिमाग के इसे रोकल जाव! हमिन पहुँच गेली पेड़ तर आउ का। एगो लइका चढ़ल उपरे आउ तोड़-तोड़ के गिरावे लागल। हमनी तीन गो चुने वाला। 20-25 गो आम चुनले होइब कि ओने से दू गो आदमी के रास्ता में आवईत देखली।
लमहर दाढ़ी, जटाधारी बाल, बगल में झोला, एकदम अजनबी विचित्र! तानी दुरे में हली हमिन चिनहे के कोशिश में, अब के हो सकेला ई? तबतक एगो कह देलक कि 'मुड़कटवा'! अब ई सुनला भर के देर कि सब युद्ध के प्लानिंग गइल तेल बेचे। जे उहां से दउड़ेला शुरू करली, जबतक अहरि (अहरा के मेहरारू, नन्हे गो के तालाब) के पींड़ी पार ना हो गइली, तबतक पीछे मुड़ के देखबो ना करली। जब ढेर दूर पहुंच के देखली कि अभियो दुनो अइते हथ तब सब आपन आपन घरे पैक! जा के जे मुड़ी जांत के सुतली से दू घण्टा तक हराम जे सुगबुगइबो करुं।
बेर डूबला पर उठली तो दूरा पर केकरो गावे के आवाज़ सुनली। माई के पीछे-पीछेे गेली देखे कि के बा? तो का देखाइत ही कि उहे दुनो मुड़कटवन एकदम इत्मीनान से सारंगी बजा बजा के गीत गाइत हथ। बाद में पाता चलल कि उ दुनो तो जोगी हलन, जे अइसही गा गा के भीख मांगे आव हलन।
राउरिनो जरुर मुड़ कटवा के बारे में कुछ न कुछ हाला सुनले होइब! कमेंट बॉक्स में जरूर बताऊँ।
© Anand Keshaw
No photo description available.

Saturday, April 16, 2022

गर्मी की छुट्टी में गाँव और आम का पेड़

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#गर्मी की छुट्टियों में ही गांव गुलजार होता है। आम के पेड़ की छांव में दरबार सजती है। इस मौसम में दही और मट्ठा के साथ #अमझोरा की सोंधी खटास और दलपुड़ी के साथ #गुड़ामा के मिठास की यादें अविस्मरणीय रहती है। यह मौसम किस्से -कहानी सुनने का, नीले आसमान में चमकते चांद-सितारों को देखने का होता है। जहाँ बड़ों के ठहाके और महिलाओं की गंभीर #गप्पबाजी के साथ-साथ प्रत्येक घर आंगन में सिर्फ बच्चों की #किलकारियां गूंजती है।
शहर के लोगों में तो खुशियों की तलाश के लिए किसी त्योहार का इंतज़ार रहता है। औपचारिकता और दिखावे के लिए वह खूब तैयारियां भी करते हैं। लेकिन गांव में तो हर मौसम ही त्योहार की तरह होता है।खासकर छोटे बच्चों और बूढ़ों के लिए तो, गर्मी का मौसम गांव का सबसे बड़ा त्योहार होता है। चाहे कितनी भी आग उगलती गर्मी हो लेकिन आम के पेड़ की घनी छांव में बच्चों की ही नहीं बल्कि बड़ों की भी #पंचायत बैठती है।
#फाल्गुन महीने के शुरू होते ही आम के पेड़ों में मंजर आने लगती है और हो जाता है गर्मी के मौसम का आगाज..... । #चैत माह में आम के पेड़ पर छोटे छोटे,कच्चे फल आ जाते है। लेकिन बच्चों को इस से क्या फर्क पड़ता है, उन्हें तो बस कच्चे आम ही चाहिए होते थे। सभी गांव की तरह ,हमारे गांव में जगह-जगह आम के पेड़ हैं। हम उन पेड़ों के अलग-अलग #मजेदार नाम से जानते हैं।
हमारे गांव के प्राईमरी सरकारी स्कूल के बाहर एक आम का पेड था। जिसका नाम था '#नटवा'। उस घने पेड़ के आम छोटे- छोटे होते थे। इसी क्रम में दोहर खेत में आम के दो पेड़ साथ-साथ थे। उसका नाम था #लहसुनिया। उसका फल एकदम लहसुन के आकार जैसा होता था, पतला-पतला। जबकि जामुन के पेड़ के पास जो आम का पेड़ था, उसका नाम था-'#सवनी'। यह सिर्फ सावन के महीने में ही पकता था। ऐसे ही सिंदूरिया,चरकाही, जिरवा जैसे आम के पेड़ों के अनेक नाम थे। और उन सभी के नाम के पीछे की एक ठोस वजह भी थी ।
आमतौर से दोपहर के वक़्त हमारी मम्मी सारे बच्चो को डांट- डपटकर सुला देती थी ताकि हमलोग #लहर धूप में निकल नहीं पाए। लेकिन उसको क्या पता कि आंधी जितनी तेज चलती है, हम सभी के मन में उत्साह, उतना ही उफान पर होता था। आखिर आम जो गिरते थे हवा के थपेड़ों से। और जब भी ऐसा हो, कोई हमें रोक नहीं पाता था। हम पूरी गति के साथ आम के पेड़ तक पहुंचने के लिए बेतहाशा दौड़ पड़ते थे। अपने आप में ही कॉम्पटीशन होता था कि सबसे पहले पेड़ के नीचे जाना है और सबसे ज्यादा आम चुनना हैं। कोई नटवा पेड़ के नीचे तो कोई लहसुनियां के तो कोई जीरवा के..... ।
और अगर तूफान नहीं भी आए। फिर भी बहाने बनाकर हम आम के पेड़ के नीचे पहुंच जाते थे। साथ में लकड़ी, ज्यादा लंबी तो नहीं, बस एक - ढेढ़ फुट का #झेब्दा या #लेबदा, ताकि पेड़ पर लगे आम को गिराया का सके। और जब तक तूफान कम न हो जाए , शाम न हो जाए या घर से मम्मी छड़ी लिए न आ जाए तब तक हटना नहीं था आम के पेड़ के नीचे से। हम पूरी निष्ठा, समर्पणशीलता और कर्मठता के साथ वहीं पर डटे रहते थे।
कच्चे आम को धोकर खाना, नमक के साथ खाना या फिर अमझोरा बनाकर स्वाद का आनंद लेना। इन सभी प्रक्रिया के लिए हमारे पास धैर्य नहीं था। अपने परिश्रम से अर्जित इस बहुमूल्य संपत्ति को हम लोगों ने न तो घर पर अचार बनाने के लिए दिया और न ही अमझोरा बनाने के लिए। हम लोग तो आम को बिना धोए ही तत्काल चट्ट करने में विश्वास रखते थे। कहा जाता था कि कच्चे आम के #लस्सा से मुँह में घाव हो जाता था।यह लोकोक्ति तब प्रमाणित होती थी जब हमारे मुंँह में होंठ के आसपास #घाव हो जाता था और हम बंदरमूंहा दिखलाई पड़ने लगते थे।
कच्चा आम खाकर उसकी #गुठली, जो ज्यादा मजबूत नहीं होती थी उससे हम मनोरंजक खेल खेलते थे। और वह ऐसा खेल था, जिस से हमें पता चलता था कि किसकी शादी किधर होगी, भले ही उसका परिणाम गलत साबित होता था। कभी-कभी सच भी हो जाता था। हम आम की गुठली हाथ में एक छोर पर लेकर, बोलते थे -
"कोल कोलास, भादो मास, पुजवा के बियाह कने ?? " और जिधर गिरता गुठली, समझ जाते पुजवा के बियाह उसी दिशा में होगा। और फिर पूजा, यही चीज मेरे नाम के साथ भी करती कि मेरी शादी किस दिशा में होगी। पूजा मेरी दोस्त का नाम था और वह भी मेरे साथ-साथ आम चुनने आती थी ।अब तो पूजवा का सच्चे में बियाह हो गया है। अनजाने में गुठली वाली वह बात सच साबित हो चुकी है।
और जैसा कि हर कहानी में सुख के साथ दुख भी रहता है। हीरो के साथ विलेन भी रहता है, वैसे ही कभी-कभी हम बच्चों के साथ भी होता था। अब बच्चों को क्या मालूम कि आम के पेड़ पर किसी दूसरे का स्वामित्व होता है। जैसे आम चुराना बच्चों का काम था, उसी प्रकार #फुरसतिया बूढों का काम आम की रखवाली करना था। एक बार तो बड़ी मुश्किल से एक प्लास्टिक की बड़ी थैली में आम भरकर जमा किए थे। एक बाबा डंडा लेकर पीछे पड़ गए। डराने लगे। आत्म सम्मान जगने और (डर में आकर) हम भी पूरी भरी थैली को, उस निर्दयी बूढ़ऊ के सामने फेककर, रोते-रोते घर चले आए। बाद में बहुत अफसोस भी हुआ कि इतनी मेहनत से एक प्लस्टिक की बड़ी थैली भरकर आम चुने थे।थोड़ा जोर लगाकर भाग जाना चाहिए था। वैसे गाँव में बच्चा और बूढ़ा की लड़ाई हमेशा ही बड़ी मजेदार होती है, और वह भी गांव के #भौकुली साथ रखने वाला बाबा से..... ।
गांव में आम के पेड़ से जुड़ी कहानी तो, और भी है।लेकिन पोस्ट बहुत लंबा हो गया है। अगर आपको यह स्मृतिकथा अच्छी लगी तो बताइएगा जरुर....। गर्मी की छुट्टियों में आपके घर के पास वाले आम की पेड़ के साथ, आपकी कुछ नयी स्मृतियां उछाल मारने लगे तो कमेंट बाक्स में लिखिएगा जरूर। हम सभी को, पढ़कर बहुत अच्छा लगेगा।
May be an image of text that says "गाँव, गर्मी का मौसम और आम Theth palamu © रिया"