Tuesday, November 30, 2021

#गांव_के_बियाह

 


पहले गाँव मे न टेंट हाऊस थे और न कैटरिंग।
थी तो बस सामाजिकता।
गांव में जब कोई शादी ब्याह होते तो घर घर से चारपाई आ जाती थी, हर घर से थरिया, लोटा, कलछुल, कराही इकट्ठा हो जाता था और गाँव की ही महिलाएं एकत्र हो कर खाना बना देती थीं। औरते ही मिलकर दुलहिन तैयार कर देती थीं और हर रसम का गीत गारी वगैरह भी खुद ही गा डालती थी। तब डीजे अनिल & डीजे सुनील जैसी चीज नही होती थी और न ही कोई आरकेस्ट्रा वाले फूहड़ गाने। गांव के सभी चौधरी टाइप के लोग पूरे दिन काम करने के लिए इकट्ठे रहते थे। हंसी ठिठोली चलती रहती और समारोह का कामकाज भी। शादी ब्याह मे गांव के लोग बारातियों के खाने से पहले खाना नहीं खाते थे क्योंकि यह घरातियों की इज्ज़त का सवाल होता था।
गांव की महिलाएं गीत गाती जाती और अपना काम करती रहती।
सच कहु तो उस समय गांव मे सामाजिकता के साथ समरसता होती थी। खाना परसने के लिए गाँव के लौंडों का गैंग समय पे इज्जत सम्हाल लेते थे। कोई बड़े घर की शादी होती तो टेप बजा देते जिसमे एक कॉमन गाना बजता था-मैं सेहरा बांधके आऊंगा मेरा वादा है और दूल्हे राजा भी उस दिन खुद को किसी युवराज से कम न समझते। दूल्हे के आसपास नाऊ हमेशा रहता, समय समय पर बार झारते रहता था कंघी से और समय समय पर काजर-पाउडर भी पोत देता था ताकि दुलहा सुन्दर लगे। फिर दुवारा का चार होता फिर शुरू होती पण्डित जी की महाभारत जो रातभर चलती। फिर कोहबर होता, ये वो रसम है जिसमे दुलहा दुलहिन को अकेले में दुइ मिनट बतियाने के लिए दिया जाता लेकिन इत्ते कम समय मा कोई क्या खाक बात कर पाता।
सबेरे खिचड़ी में जमके गारी गाई जाती और यही वो रसम है जिसमे दूल्हे राजा जेम्स बांड बन जाते कि ना, हम नही खाएंगे खिचड़ी। फिर उनको मनाने कन्यापक्ष के सब जगलर टाइप के लोग आते। अक्सर दुलहा की सेटिंग अपने चाचा या दादा से पहले ही सेट रहती थी और उसी अनुसार आधा घंटा कि पौन घंटा रिसियाने का क्रम चलता और उसी से दूल्हे के छोटे भाई सहबाला की भी भौकाल टाइट रहती लगे हाथ वो भी कुछ न कुछ और लहा लेता...फिर एक जय घोष के साथ खिचड़ी के गोले से एक चावल का कण दूल्हे के होठों तक पहुंच जाता और एक विजयी मुस्कान के साथ वर और वधू पक्ष इसका आनंद लेते...
उसके बाद अचर धरउवा जिसमे दूल्हे का साक्षात्कार वधू पक्ष की महिलाओं से करवाया जाता और उस दौरान उसे विभिन्न उपहार प्राप्त होते जो नगद और श्रृंगार की वस्तुओं के रूप में होते.. इस प्रकिया में कुछ अनुभवी महिलाओं द्वारा काजल और पाउडर लगे दूल्हे का कौशल परिक्षण भी किया जाता और उसकी समीक्षा परिचर्चा विवाह बाद आहूत होती थी... और लड़कियां दूल्हा के जूता चुराती और १०१ रुपये में मान जाती।
फिर गिने चुने बुजुर्गों द्वारा माड़ौ (विवाह के कर्मकांड हेतु निर्मित अस्थायी छप्पर) हिलाने की प्रक्रिया होती वहां हम लोगों के बचपने का सबसे महत्वपूर्ण आनंद उसमें लगे लकड़ी के शुग्गों ( तोता) को उखाड़ कर प्राप्त होता था और विदाई के समय नगद नारायण कड़ी कड़ी १० रूपये की नोट जो कहीं २० रूपये तक होती थी....
वो स्वार्गिक अनुभूति होती कि कह नहीं सकते हालांकि विवाह में प्राप्त नगद नारायण माता जी द्वारा आठ आने से बदल दिया जाता था...
आज की पीढ़ी उस वास्तविक आनंद से वंचित हो चुकी है जो आनंद विवाह का हम लोगों ने प्राप्त किया है.....लोग बदलत जा रहे है परंपरा भी बदलत चले जा रहे है आगे चलकर यह सब देखन को मिलेगा की नही उ त विधाता जाने लेकिन जवन मजा उ समय मे रहा उ अब धीरे धीरे बिलुप्त हो रहा है।
Sent by Arun kumar

Thursday, November 25, 2021

अनु जी का अनूठा निमंत्रण पत्र

 

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देवथान (देवोत्थान) के साथ ही पलामू में शादी-बियाह का लगन प्रारम्भ हो जाता है। बियाह के तैयारी का सबसे पहला चरण है- 'नेवता छपवाना' और हित-नाथ, गांव-जवार, दोस्त-महिम सब तक नेवता पहुचाना।
वही नेवता जिसे हिंदी में 'निमंत्रण पत्र' और फैशन में 'इनभिटसन कार्ड' कहते हैं। इस परंपरा ने 'नेवता से इनभिटीशन तक का सफर' बहुत रोचकता के साथ तय किया है।
हमारे दादा परदादाओं के समय यह हल्दी के छीटों वाले सादे कागज के रूप में रहा जिस पर स्याही से विवाह तिथि अंकित रहता था। बाद के समय में इसने थोड़ा श्रृंगार किया और तब सादा कागज राम -सीता के रंगीन चित्रकारी में रंग गया। विवाह तिथि हस्तलिखित न हो कर टंकित होने लगे। विवाह तिथि एवं वर वधू परिचय के साथ-साथ कार्ड पर मंगलकामनाएं और कुछ स्नेह अनुरोध भी देखने को मिले, जैसे:
"भेज रहा हूँ स्नेह निमंत्रण, प्रियवर तुम्हे बुलाने को
हे मानस के राजहंस तुम भूल न जाना आने को"
कार्ड के बीच में एक मोती वाला चमकीला माला भी लगा दिया जाता था। धीरे-धीरे ये इनभीटीशन कार्ड और भी अंखफोर होता चला गया। इस नंगे कार्ड को पहनावा मिल गया। अलग अलग प्रकार के महंगे कभर, स्टिकर, झालर, मोती आदि लगा कर इसे बरहरूपया बना दिया गया। हद तो तब हो गया जब डूड(वर)और डुडनी (वधु) अपना फोटो वाला कार्ड छपवाने लगे। बाकि रहा-सहा कसर डिजिटल इंडिया ने निकाल लिया। कार्ड में से उसकी आत्मा (कागज) ही निकाल ली।
एक समय था जब पलामू के घरों में या तो छप्पर में कार्ड खोंस कर रखे जाते थे या फिर एक पतले तार में खोंस कर लटका दिया जाता था। बच्चे उन निमंत्रण पत्रों को जोर से उच्चारण कर के पढ़ते थे। इस प्रकार वे हिंदी के कुछ कठिन शब्दो से भी परिचित हो जाते थे। "मेले चाचू की छादी में जुलूल छे जुलूल आइयेदा" जैसे बाल सुलभ हठ मन को और भी आकर्षित करते थे। ची० का मतलब 'चिरंजीवी' और आयु० का मतलब 'आयुष्मति' होता है ये हमने कार्ड से ही जाना था।
आज जब चारो तरफ डिजिटल कार्ड का बोलबाला है। कार्ड छप भी रहें हैं तो या तो अंग्रेजी में या विशुद्ध हिंदी में। ऐसे में असली धरतीपकड़ हमारे आनन्द भाई आपन बियाह के कार्ड पलमुआ में छपवाए हैं। हमको तो डाउट है कि एतना त आज कल के डुड-डुडनी बोलियो नहीं पाता है।
बहुत दिन बाद ऐसा कार्ड मिला जिसको पढ़ते ही चेहरे पर मुस्कान आ गया, और लगा कि पलामू के प्यार में आनन्द बाबू अपना कलेजा निकाल के रख दिहिस हैं। का है कि हमनी इनवाइट नहीं करते हैं अंगया बीजे मांगते हैं। जब से कार्ड में संगीत छपने लगा था तब से आजी लोग के सांझा बिहाना-गायब ही हो चुका था, झूमर के जगह कोरियोग्राफी वाला गुरुजी ले लिए थे। ई सब भी बढ़िया है। हम बुराई नहीं करते हैं। लेकिन अपना परम्परा को भूलना भी सही नहीं है। आनन्द जी ने तो इस तरह से एक नयी परम्परा की शुरुआत कर ही दी है, साथ ही बहुत से लोगों को ताकत भी दे रहे हैं कि हमारा रिवाज परिपूर्ण है उस पर गर्व किजिए, और कितना भी USA में रह लीजिए लेकिन पलामू की गलियों को भूलिए मत। काहे की दिल यहीं धड़केगा पलामू में, अमेरिका में तो सिर्फ हार्ट-बीट ही नापने का रिवाज हैं।
ध्यान से देखिए इस कार्ड को, बहुत से साहित्यिक क्रांतिकारी प्रयोग मिलेंगे इसमें. कमेन्ट मे बताइए कि इस कार्ड में और क्या अनूठा और आकर्षक लगा आप सब को.
और साथ ही ठेठ पलामू की टीम के तरफ से आप सब से नम्र निवेदन भी है कि आइये हम सभी मिल कर एक शुरुआत करते हैं शादी-बियाह, गृहप्रवेश, जन्मदिन, मुहजूठि, सत्तईसा, पूजा पाठ, या किसी भी आयोजन का निमंत्रण पत्र अपने पलमुआ बोली में छपवाते हैं, जिससे हमारी ये मिसरी सी मीठी बोली सबके जुबाँ तक पहुँचे और एक कभी न मिटने वाली मिठास घोल दे.....।
© ठेठ पलामू की ओर से:अजय शुक्ला, जया, सन्नी उर्फ रोहन

Wednesday, November 24, 2021

जाड़ा के दिन

 


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पहिले दशहरा घरी से ही आदमी साल सूटर निकाल लेता था, बक्सा मे से. कम से कम हाफ वाला तो पहिन ओढ़ के मेला पंडाल घूमने जाता ही था. संदूक से निकला कपड़ा साल में से जो फिनाइल का सुगंध आता था न, कि एकदम यादों का पिटारा खुल जाता था. आदमी सालों पीछे घूम कर आ जाता था. इसीलिए इस गंध को कई बार प्रेम के कवि लोग पुराने प्यार के अहसान से तुलना कर देता है. अरे बात हो रहा है जाड़ा का तो प्रेम? कैसे नहीं आएगा इश्क का बात! 'माफ़लर और हाफ स्वेटर महबूब के हाथो बिना हुआ' ये लाइन भले ही बहुत काल्पनिक और cliche लगे, लेकिन इसका रूमानी अहसान एकदम रियल जैसा लगता है, सीधा करेजा मे उतर जाता है, रोम रोम में रोमांस उभरने लगता है.
अच्छा! प्रेम का पर्यावाची शब्द है ममता. तो आपलोग के पास भी माँ चाची मौसी का बिना हुआ स्वेटर होगा ही. वही जो कभी पुरान ही नहीं होता है, एक भाई से दूसरा जगह ट्रांसफर होता था खाली साइज के हिसाब से. थोड़ा मोड़ फूदरुसी तो कोई ध्यान भी नहीं देता था. डबल कांटा का बिना हुआ स्वेटर में तो सुन्दर सुन्दर डिजाइन भी रहता था. कोनो कोनो मे नाम भी लिखा रहता था. मजेदार बात ये कि स्वेटर का उन रीसाइकल भी होता था, उघार के उन फिर से नया डिजाइन का स्वेटर बन जाता था. ढेरे याद जुड़ा हुआ है जी इस बात से! फेरी वाला से उन खरीदना, नया नया डिजाइन का बुनाई देखते दीदी लोग का उलट पलट के स्वेटर को देखना, नया डिजाइन गाँव में आते ही गहमागहमी से उसका चर्चा हो जाना गाँव भर के लेडीज लोग में, मास्टरनी मेम लोग का स्कूल में भी स्वेटर बुनना विद्यार्थियों को टास्क धरा के, बियाह के लिए एक अनिवार्य योग्यता का पूछा जाना कि लड़की को बुनाई कढाई आता है कि नहीं!
खैर! पर्यावरण बदल रहा है. एक समय सितंबर के धूप को प्यार का पहला अहसान बताते थे गुलजार सहाब अपनी नज़्मों में, और आज दिसम्बर में भी कहीं कहीं पंखा चला कि सोना पड़ता है. तब भी, तनी मानी जाड़ा तो शुरू हो ही गया है. खोलीए संदूक के साथ यादों की गठरी और बताइए अपना संस्मरण...
अच्छा बच्चा लोग! मां बाबुजी का बात मान लो. फूटानी छोड़ के साल स्वेटर पहन लो अब.
© Awanish Prakash

Sunday, November 14, 2021

गुड़हिया जलेबी



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जब तक जीवन है तो स्वाद ही सत्य है। कहीं सुना भी था कि - "दीवाने सिर्फ इश्क के ही नहीं होते, स्वाद के भी होते हैं।"

स्वाद की बात हो तो देशी मिठाइयों की एक लम्बी श्रृंखला है। जिसमें 'गुड़हिया जलेबी' का नाम महत्वपूर्ण है।

वैसे डाल्टनगंज में जलेबी की जगह '#जलेबा' का ज्यादा प्रचलन है। फिर भी कुछ खुशकिस्मत लोगों ने पलामू के गाँव-देहात में लगने वाले बाजार-मेलों में गुड़हिया जलेबी के स्वाद को अवश्य चखा होगा। जो भी इसे चखता है ,उसे इस अद्भुत स्वाद से मोहब्बत हो जाती है और फिर जीवन भर इसकी तारीफ करने में डूबा रहता है।

टप-टप, टपकते हुए गुड़ के गाढ़े पाग (चाशनी) में डूबी यह गरम-गरम जलेबी, जिसका कुरकुरापन और मिठास उस असीम आनंद का बोध कराता है, जिसे शास्त्रों में परम आनंद की संज्ञा दी गयी है। सिर्फ स्वाद की दृष्टि में ही नहीं बल्कि पारंपरिक चिकित्सकों का यह मानना है कि इसे खाने से सर्दी जुकाम और खांसी में भी बहुत फायदा मिलता है।

नगरों -महानगरों की चकाचौंध में पारम्परिक ग्रामीण स्वाद वाली 'गुड़हिया जलेबी' भले विलुप्त मिष्ठानों में शामिल है लेकिन गाँव -देहात के नुक्कड़ और साप्ताहिक हाट-मेलों में अक्टूबर से मार्च तक के महीने में इसकी जोरदार आमद होती है क्योंकि इस समय गन्ने का ताजा रस और नया गुड़ मिलता है। फिर यह अपने शौकीनों की जीभ से होते हुए उनके पेट तक को तर कर देता है।

आप में बहुत सारे लोगों ने इस विशुद्ध देसी 'गुड़हिया जलेबी' को अवश्य चखा होगा। कुछ लोग इस पोस्ट को पढ़ने के बाद इसकी खोज में लग जाएंगे कि कैसे स्वाद के इस परमानंद की प्राप्ति करें? सम्माननीय पाठकों से निवेदन है किआपके आसपास इस देसी स्वाद की उपलब्धता के बारे में कोई जानकारी हो तो हम सभी से अवश्य साझा करें।

अगर आप पलामू के किसी और पकवान के बारे में पढ़ना जानना चाहते हैं तो उसका जिक्र भी जरूर करें.
#ठेठ_पलामू #पलामू_के_पकवान

© अजय शुक्ला

पड़ोस वाली आंटी की बतकही

 सच की झूठ? #पड़ोस_वाली_आंटी की बतकही



पलामू के एकमात्र जीवित स्वतंत्रता सेनानी नीलकंठ सहाय जी

 पलामू के एकमात्र जीवित स्वतंत्रता सेनानी नीलकंठ सहाय जी का आज निधन हो गया। पलामू के लिए अपूर्णीय क्षति।


#ठेठ_पलामू की तरफ से इन्हें सादर नमन।



शिवरात्रि (शिवबेल का मेला )



#शिवबेल जैसा कि नाम से ही बिल्कुल स्पष्ट है, यहाँ पर #शिवलिंग भी है और बेल का पेड़ भी। शिव जी बेल के पेड़ के नीचे ही है। पर अब यहाँ पिछले साल ही मंदिर का निर्माण हो गया है। जैसे #शिवरात्रि का मेला #पलामू के लगभग हर क्षेत्र में लगता है वैसे यहाँ भी हर साल शिवरात्रि का मेला लगता है। ठीक से याद तो नहीं है कि आख़िरी बार कब गए थे मेला देखने कम- से-कम 10 साल से ज्यादा तो हो ही गया होगा। पर बचपन में कोई भी मेला ऐसा नहीं रहता था कि नहीं जाते थे। हर बार स्कूल में तो छुट्टी रहती ही थी, सो तैयारी 1 महीना पहले से ही शुरू हो जाता था। आए गए मेहमान लोग से जो भी #गोड़लगाई मिलता था सब #मेला के नाम से अलग रख लिया जाता था। अब बचपन मे कमाते तो थे नहीं और पॉकेट मनी वाला सिस्टम शायदे कउनो पलामू के घर में रहा हो। तो हमलोग के इनकम का एकमात्र उपाय यही रहता था। इसके अलावे गाहे-बगाहे सर-समान लाने में बचा हुआ #अठन्नी_चवन्नी रहता था। मतलब सब मिला जुला के 20-25 रुपया जमा कर के रखते थे।


उस दिन सुबह से ही अलग माहौल रहता था। घरे माई चाची लोग का तो पूजा, उपवास रहता था। पर हमलोग का अलग, चाचा घर मे शिव जी का चबूतरा में पूजा करते थे और एक बाहर में #बिंदु_चाचा के कुआँ के पास शिव जी का चबूतरा था, तो वहाँ भी पूजा वही करते थे। साथ-साथ में उनके पूजा का सामान पानी ये सब लेकर जाने का काम मेरा ही रहता था और इस काम में उस समय अलग ही आनंद आता था।

दिन के लगभग 1 -2 बजे से ही एकदम बाल में तेल लगा के कपड़ा पहिन के तैयार हो जाते थे और फिर इंतज़ार होता था #महतो_बाबा का। वैसे तो उ घर के #हरवाहा थे, पर हमलोग के लिए तो बस महतो बाबा ही थे। हर आसपास लगने वाले में मेला के लिए विशेष बख़्शिश का नियम रहता था। चूँकि मेला घर से लगभग 2 -3 km दूर लगता था, इसलिए मेला घुमाने का जिम्मा उन्हीं का रहता था। जब वो आ जाते तो दादी बाबा को बुलाती , फिर बाबा सबको उसके उम्र के हिसाब से 5 -10 महतो बाबा को अलग से 20-30 रुपया पकड़ा देते। उसके बाद हमलोग निकल जाते थे मेला के लिए। अब कुछ दूर तो पूरा तेज चलते, लेकिन अब बच्चा थे आखिर केतना चलते। चलते-चलते थक जाते तो महतो बाबा उठा के कंधा पे बैठा लेते थे और कसम से कंधा पर बैठ के मेला से आते-जाते लोगों को देखना ऐसा लगता था जैसे #वॉच_टावर पर चढ़ के पूरा मेला पर नजर जमाये हुए हैं।

मेला पहुँचने से पहिले गिनती करते कि केतना लोग आया है। इसके बाद सब एक-दूसरे का हाथ पकड़ के इधर-उधर घूमते। पसन्द के खिलौना का दाम पूछ-पूछ के हिसाब लगाते कि पॉकिट में जेतना पैसा है उसमें आ तो जाएगा न। अगर नहीं आए तो फिर दिमाग मे उथल-पुथल कि किसको ले, किसको छोड़े। फिर अंत मे 2-3 खिलौना ले लेते। असली #मोलाई करने का अनुभव तो हमलोग को मेला से ही मिलता था और यहाँ मोलाई करना हमारा शौक नहीं मजबूरी रहता था। यहाँ का अनुभव अभी तक काम आ रहा है मुंबई-दिल्ली से लेकर कहीं भी काम कर जाता है।

सब खरीदने के बाद जब शाम होने लगती, तो भूख भी लग जाती। अब हम भले 5 साल के थे लेकिन पलामू के लईकन में घर के #🎂सवांग होने का फीलिंग जरूर आ जाता है। इसलिए एक खिलौना कम ले तो चल जाता पर माई चाची लोग के लिए #लकठो और #चिनिया_बेदाम जरूर लेकर आते थे। उसके बाद अगर पैसा बचे तो फिर मेला में मिलने वाला #चाट और कच्चे छान के निकाला हुआ #सिंघाड़ा खाते थे। बगल में #दुगोला का आयोजन भी रहता था, पर उस समय उतना समझ में आता नहीं था, इसलिए दूर से ही देख के आ जाते थे, पर बड़े लोगों के लिए तो वही मेन रहता था। फेसबुक में देखे कि इस बार सब भोजपुरी गायक '#चंदन_यादव को बुलाए हैं, तो जाकर प्रोग्राम का मजा ले सकते हैं। अब सोचे तो थे कि इसबार शायद मेला देखने आ पाते पर इसबार भी हम नहीं ही आ पाएंगे। आपलोग अपने-अपने क्षेत्र में लगने वाले मेला में जाइये मेला के बारे में बताइए। सभी पाठकों को ठेठ पलामू की तरफ से शिवरात्रि की बहुत-बहुत शुभकामनाएँ। हर-हर महादेव।

©Anand Keshaw

Thursday, November 4, 2021

#दीवाली के #मुरहा #आलूबम #पटाखा

 #दीवाली के #मुरहा #आलूबम #पटाखा

#diwali2021 

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दीवाली हो और पटाखा न हो, अइसा कइसे हो सकता है। तो आज आपको सुनाते हैं बाबा के घरी के पटाखा के कहानी। पहिले तो मुर्गा छाप के ही दबदबा कायम रहा ढेरे टाईम तक।
लेकिन अब धोनी, कोहली, करीना, कटरीना,स सलमान सब मार्केट में थोक के भाव बिक रहा है। बस पउकिट में काम भर रुपिया होना चाहिए। तो अभी के जमाना से तनी पीछे चलते हैं और आपन समय मे घुंसते हैं। लेकिन ओकरो से पहिले एगो कहानी जे बाबा बराबर सुनाते हैं, उ बताते हैं आपको।

बाबा से जब बम पड़ाका के बात निकलता था न, तो एगो कहानी हमेशा सुनाते थे। ओ घरी आज तरी सतरँगिया और रॉकेट तो था नहीं। उस समय के फ़ेमस आईटम था #मुरहा। मुरहा के खासियत ई था कि ई बम तो था लेकिन फूटता नहीं था। खाली सुरसुराता था और छोड़ने के बाद एने-ओने खुबे भागता था। 10 गो मुरहा में दुईये-चार गो ठीक निकलता था। बाकी सब तो फुसफुसा के आपन जगहे पर टाँय-टाँय फीस कर देता था। मुरहा लमलोल रहता था, एक देने से मोट, एक देने से पातर। पातर देने से जरावे पे , हर-हरा कर के भागे लगता था। मुरहा जलावे वलन में भी अलगे उमंग रहता था कि केकर उड़ेगा आउ केकर फड़फड़ा के दरे पे रह जायेगा। अइसही बाबा लोग भी सब ख़रीद के लाये थे मुरहा 1 आना में 5 गो आउ छोड़ना शुरू किए। लगातार 3, 4 गो छोड़े, सब वहीं मुर्गा जईसन फड़फड़ा के रह गया एके जगहिया पे। आसपास के लईकन मज़ाक़ भी उड़ाया कि ठगा गइले। ई सब से तनी दूर एगो बुढऊ बाबा बईठल थे दती पर, आपन में मगन। तब हमर बाबा जलाए एगो मुरहा और उ ससुरा लहरते मिर्गी उपटल जईसन एने होने उड़ियाये लगा, आउ जाके घुस गया अलगे बईठल बुढऊ बाबा के धोती में। फिर का था, नयका धोती के कल्याण हुआ आउ का। न जाने उ बेरा में केतना के धान के पूरा के गांज में आग लगा है, केतना गरीब के फूस के झोंपड़ी में आग लाग गइल ई मुरहा के चक्कर मे।

अब हमीन के टाईम में एगो बम था- 'आलू बम', जेकरा सही मायने में पटाखा कहल जाता था। पटके से फाटत रहे सेही ला। एकदम रंगीन कागज में लपेटल गोल-गोल बम, छोट ढेका नियन साइज़। इहो आधा से ज्यादा फुटबे नहीं करता था। टीवी में सिनेमा में दिखाता था कि सब बम मुँह से चुम्मा ले के फूंक के पटकता है, आउ गढ़ाम से फटता है। फिलिम में भले कांटी निकाले ला करता हो, पर हमीन आलू बम के फूँक-फूँक के गरम् करते थे आउ तब अईसन हाव भाव के साथ दीवाल पे फेंकते न जइसे सामने वाला दीवाल के धज्जी उड़ा देवेगा। एकर बाद तो न जाने केतना रकम के बम आया गया, लेकिन उ आनंद नहीं मिला फिर।

बम-पड़ाका छोड़िये मन लगा के छोड़िये। लेकिन थोड़ा बच के, बचा के, दीवाली के ढेरे मानी शुभकामना। आउ कुछु आप लोगन के किस्सा कहानी होइ तs कमेंट बॉक्स में डालिये। हमिनियों तनिक नॉस्टैल्ज़िक हो जायें।

© आनंद केशव 'देहाती'