Tuesday, November 30, 2021
#गांव_के_बियाह
Thursday, November 25, 2021
अनु जी का अनूठा निमंत्रण पत्र
Wednesday, November 24, 2021
जाड़ा के दिन
Sunday, November 14, 2021
गुड़हिया जलेबी
स्वाद की बात हो तो देशी मिठाइयों की एक लम्बी श्रृंखला है। जिसमें 'गुड़हिया जलेबी' का नाम महत्वपूर्ण है।
वैसे डाल्टनगंज में जलेबी की जगह '#जलेबा' का ज्यादा प्रचलन है। फिर भी कुछ खुशकिस्मत लोगों ने पलामू के गाँव-देहात में लगने वाले बाजार-मेलों में गुड़हिया जलेबी के स्वाद को अवश्य चखा होगा। जो भी इसे चखता है ,उसे इस अद्भुत स्वाद से मोहब्बत हो जाती है और फिर जीवन भर इसकी तारीफ करने में डूबा रहता है।
टप-टप, टपकते हुए गुड़ के गाढ़े पाग (चाशनी) में डूबी यह गरम-गरम जलेबी, जिसका कुरकुरापन और मिठास उस असीम आनंद का बोध कराता है, जिसे शास्त्रों में परम आनंद की संज्ञा दी गयी है। सिर्फ स्वाद की दृष्टि में ही नहीं बल्कि पारंपरिक चिकित्सकों का यह मानना है कि इसे खाने से सर्दी जुकाम और खांसी में भी बहुत फायदा मिलता है।
नगरों -महानगरों की चकाचौंध में पारम्परिक ग्रामीण स्वाद वाली 'गुड़हिया जलेबी' भले विलुप्त मिष्ठानों में शामिल है लेकिन गाँव -देहात के नुक्कड़ और साप्ताहिक हाट-मेलों में अक्टूबर से मार्च तक के महीने में इसकी जोरदार आमद होती है क्योंकि इस समय गन्ने का ताजा रस और नया गुड़ मिलता है। फिर यह अपने शौकीनों की जीभ से होते हुए उनके पेट तक को तर कर देता है।
आप में बहुत सारे लोगों ने इस विशुद्ध देसी 'गुड़हिया जलेबी' को अवश्य चखा होगा। कुछ लोग इस पोस्ट को पढ़ने के बाद इसकी खोज में लग जाएंगे कि कैसे स्वाद के इस परमानंद की प्राप्ति करें? सम्माननीय पाठकों से निवेदन है किआपके आसपास इस देसी स्वाद की उपलब्धता के बारे में कोई जानकारी हो तो हम सभी से अवश्य साझा करें।
अगर आप पलामू के किसी और पकवान के बारे में पढ़ना जानना चाहते हैं तो उसका जिक्र भी जरूर करें.
#ठेठ_पलामू #पलामू_के_पकवान
© अजय शुक्ला
पलामू के एकमात्र जीवित स्वतंत्रता सेनानी नीलकंठ सहाय जी
पलामू के एकमात्र जीवित स्वतंत्रता सेनानी नीलकंठ सहाय जी का आज निधन हो गया। पलामू के लिए अपूर्णीय क्षति।
#ठेठ_पलामू की तरफ से इन्हें सादर नमन।
शिवरात्रि (शिवबेल का मेला )
#शिवबेल जैसा कि नाम से ही बिल्कुल स्पष्ट है, यहाँ पर #शिवलिंग भी है और बेल का पेड़ भी। शिव जी बेल के पेड़ के नीचे ही है। पर अब यहाँ पिछले साल ही मंदिर का निर्माण हो गया है। जैसे #शिवरात्रि का मेला #पलामू के लगभग हर क्षेत्र में लगता है वैसे यहाँ भी हर साल शिवरात्रि का मेला लगता है। ठीक से याद तो नहीं है कि आख़िरी बार कब गए थे मेला देखने कम- से-कम 10 साल से ज्यादा तो हो ही गया होगा। पर बचपन में कोई भी मेला ऐसा नहीं रहता था कि नहीं जाते थे। हर बार स्कूल में तो छुट्टी रहती ही थी, सो तैयारी 1 महीना पहले से ही शुरू हो जाता था। आए गए मेहमान लोग से जो भी #गोड़लगाई मिलता था सब #मेला के नाम से अलग रख लिया जाता था। अब बचपन मे कमाते तो थे नहीं और पॉकेट मनी वाला सिस्टम शायदे कउनो पलामू के घर में रहा हो। तो हमलोग के इनकम का एकमात्र उपाय यही रहता था। इसके अलावे गाहे-बगाहे सर-समान लाने में बचा हुआ #अठन्नी_चवन्नी रहता था। मतलब सब मिला जुला के 20-25 रुपया जमा कर के रखते थे।
उस दिन सुबह से ही अलग माहौल रहता था। घरे माई चाची लोग का तो पूजा, उपवास रहता था। पर हमलोग का अलग, चाचा घर मे शिव जी का चबूतरा में पूजा करते थे और एक बाहर में #बिंदु_चाचा के कुआँ के पास शिव जी का चबूतरा था, तो वहाँ भी पूजा वही करते थे। साथ-साथ में उनके पूजा का सामान पानी ये सब लेकर जाने का काम मेरा ही रहता था और इस काम में उस समय अलग ही आनंद आता था।
दिन के लगभग 1 -2 बजे से ही एकदम बाल में तेल लगा के कपड़ा पहिन के तैयार हो जाते थे और फिर इंतज़ार होता था #महतो_बाबा का। वैसे तो उ घर के #हरवाहा थे, पर हमलोग के लिए तो बस महतो बाबा ही थे। हर आसपास लगने वाले में मेला के लिए विशेष बख़्शिश का नियम रहता था। चूँकि मेला घर से लगभग 2 -3 km दूर लगता था, इसलिए मेला घुमाने का जिम्मा उन्हीं का रहता था। जब वो आ जाते तो दादी बाबा को बुलाती , फिर बाबा सबको उसके उम्र के हिसाब से 5 -10 महतो बाबा को अलग से 20-30 रुपया पकड़ा देते। उसके बाद हमलोग निकल जाते थे मेला के लिए। अब कुछ दूर तो पूरा तेज चलते, लेकिन अब बच्चा थे आखिर केतना चलते। चलते-चलते थक जाते तो महतो बाबा उठा के कंधा पे बैठा लेते थे और कसम से कंधा पर बैठ के मेला से आते-जाते लोगों को देखना ऐसा लगता था जैसे #वॉच_टावर पर चढ़ के पूरा मेला पर नजर जमाये हुए हैं।
मेला पहुँचने से पहिले गिनती करते कि केतना लोग आया है। इसके बाद सब एक-दूसरे का हाथ पकड़ के इधर-उधर घूमते। पसन्द के खिलौना का दाम पूछ-पूछ के हिसाब लगाते कि पॉकिट में जेतना पैसा है उसमें आ तो जाएगा न। अगर नहीं आए तो फिर दिमाग मे उथल-पुथल कि किसको ले, किसको छोड़े। फिर अंत मे 2-3 खिलौना ले लेते। असली #मोलाई करने का अनुभव तो हमलोग को मेला से ही मिलता था और यहाँ मोलाई करना हमारा शौक नहीं मजबूरी रहता था। यहाँ का अनुभव अभी तक काम आ रहा है मुंबई-दिल्ली से लेकर कहीं भी काम कर जाता है।
सब खरीदने के बाद जब शाम होने लगती, तो भूख भी लग जाती। अब हम भले 5 साल के थे लेकिन पलामू के लईकन में घर के #
©Anand Keshaw
Thursday, November 4, 2021
#दीवाली के #मुरहा #आलूबम #पटाखा
#दीवाली के #मुरहा #आलूबम #पटाखा
#diwali2021दीवाली हो और पटाखा न हो, अइसा कइसे हो सकता है। तो आज आपको सुनाते हैं बाबा के घरी के पटाखा के कहानी। पहिले तो मुर्गा छाप के ही दबदबा कायम रहा ढेरे टाईम तक।
लेकिन अब धोनी, कोहली, करीना, कटरीना,स सलमान सब मार्केट में थोक के भाव बिक रहा है। बस पउकिट में काम भर रुपिया होना चाहिए। तो अभी के जमाना से तनी पीछे चलते हैं और आपन समय मे घुंसते हैं। लेकिन ओकरो से पहिले एगो कहानी जे बाबा बराबर सुनाते हैं, उ बताते हैं आपको।
बाबा से जब बम पड़ाका के बात निकलता था न, तो एगो कहानी हमेशा सुनाते थे। ओ घरी आज तरी सतरँगिया और रॉकेट तो था नहीं। उस समय के फ़ेमस आईटम था #मुरहा। मुरहा के खासियत ई था कि ई बम तो था लेकिन फूटता नहीं था। खाली सुरसुराता था और छोड़ने के बाद एने-ओने खुबे भागता था। 10 गो मुरहा में दुईये-चार गो ठीक निकलता था। बाकी सब तो फुसफुसा के आपन जगहे पर टाँय-टाँय फीस कर देता था। मुरहा लमलोल रहता था, एक देने से मोट, एक देने से पातर। पातर देने से जरावे पे , हर-हरा कर के भागे लगता था। मुरहा जलावे वलन में भी अलगे उमंग रहता था कि केकर उड़ेगा आउ केकर फड़फड़ा के दरे पे रह जायेगा। अइसही बाबा लोग भी सब ख़रीद के लाये थे मुरहा 1 आना में 5 गो आउ छोड़ना शुरू किए। लगातार 3, 4 गो छोड़े, सब वहीं मुर्गा जईसन फड़फड़ा के रह गया एके जगहिया पे। आसपास के लईकन मज़ाक़ भी उड़ाया कि ठगा गइले। ई सब से तनी दूर एगो बुढऊ बाबा बईठल थे दती पर, आपन में मगन। तब हमर बाबा जलाए एगो मुरहा और उ ससुरा लहरते मिर्गी उपटल जईसन एने होने उड़ियाये लगा, आउ जाके घुस गया अलगे बईठल बुढऊ बाबा के धोती में। फिर का था, नयका धोती के कल्याण हुआ आउ का। न जाने उ बेरा में केतना के धान के पूरा के गांज में आग लगा है, केतना गरीब के फूस के झोंपड़ी में आग लाग गइल ई मुरहा के चक्कर मे।
अब हमीन के टाईम में एगो बम था- 'आलू बम', जेकरा सही मायने में पटाखा कहल जाता था। पटके से फाटत रहे सेही ला। एकदम रंगीन कागज में लपेटल गोल-गोल बम, छोट ढेका नियन साइज़। इहो आधा से ज्यादा फुटबे नहीं करता था। टीवी में सिनेमा में दिखाता था कि सब बम मुँह से चुम्मा ले के फूंक के पटकता है, आउ गढ़ाम से फटता है। फिलिम में भले कांटी निकाले ला करता हो, पर हमीन आलू बम के फूँक-फूँक के गरम् करते थे आउ तब अईसन हाव भाव के साथ दीवाल पे फेंकते न जइसे सामने वाला दीवाल के धज्जी उड़ा देवेगा। एकर बाद तो न जाने केतना रकम के बम आया गया, लेकिन उ आनंद नहीं मिला फिर।
बम-पड़ाका छोड़िये मन लगा के छोड़िये। लेकिन थोड़ा बच के, बचा के, दीवाली के ढेरे मानी शुभकामना। आउ कुछु आप लोगन के किस्सा कहानी होइ तs कमेंट बॉक्स में डालिये। हमिनियों तनिक नॉस्टैल्ज़िक हो जायें।
© आनंद केशव 'देहाती'





