देवथान (देवोत्थान) के साथ ही पलामू में शादी-बियाह का लगन प्रारम्भ हो जाता है। बियाह के तैयारी का सबसे पहला चरण है- 'नेवता छपवाना' और हित-नाथ, गांव-जवार, दोस्त-महिम सब तक नेवता पहुचाना।
हमारे दादा परदादाओं के समय यह हल्दी के छीटों वाले सादे कागज के रूप में रहा जिस पर स्याही से विवाह तिथि अंकित रहता था। बाद के समय में इसने थोड़ा श्रृंगार किया और तब सादा कागज राम -सीता के रंगीन चित्रकारी में रंग गया। विवाह तिथि हस्तलिखित न हो कर टंकित होने लगे। विवाह तिथि एवं वर वधू परिचय के साथ-साथ कार्ड पर मंगलकामनाएं और कुछ स्नेह अनुरोध भी देखने को मिले, जैसे:
"भेज रहा हूँ स्नेह निमंत्रण, प्रियवर तुम्हे बुलाने को
हे मानस के राजहंस तुम भूल न जाना आने को"
कार्ड के बीच में एक मोती वाला चमकीला माला भी लगा दिया जाता था। धीरे-धीरे ये इनभीटीशन कार्ड और भी अंखफोर होता चला गया। इस नंगे कार्ड को पहनावा मिल गया। अलग अलग प्रकार के महंगे कभर, स्टिकर, झालर, मोती आदि लगा कर इसे बरहरूपया बना दिया गया। हद तो तब हो गया जब डूड(वर)और डुडनी (वधु) अपना फोटो वाला कार्ड छपवाने लगे। बाकि रहा-सहा कसर डिजिटल इंडिया ने निकाल लिया। कार्ड में से उसकी आत्मा (कागज) ही निकाल ली।
एक समय था जब पलामू के घरों में या तो छप्पर में कार्ड खोंस कर रखे जाते थे या फिर एक पतले तार में खोंस कर लटका दिया जाता था। बच्चे उन निमंत्रण पत्रों को जोर से उच्चारण कर के पढ़ते थे। इस प्रकार वे हिंदी के कुछ कठिन शब्दो से भी परिचित हो जाते थे। "मेले चाचू की छादी में जुलूल छे जुलूल आइयेदा" जैसे बाल सुलभ हठ मन को और भी आकर्षित करते थे। ची० का मतलब 'चिरंजीवी' और आयु० का मतलब 'आयुष्मति' होता है ये हमने कार्ड से ही जाना था।
आज जब चारो तरफ डिजिटल कार्ड का बोलबाला है। कार्ड छप भी रहें हैं तो या तो अंग्रेजी में या विशुद्ध हिंदी में। ऐसे में असली धरतीपकड़ हमारे आनन्द भाई आपन बियाह के कार्ड पलमुआ में छपवाए हैं। हमको तो डाउट है कि एतना त आज कल के डुड-डुडनी बोलियो नहीं पाता है।
बहुत दिन बाद ऐसा कार्ड मिला जिसको पढ़ते ही चेहरे पर मुस्कान आ गया, और लगा कि पलामू के प्यार में आनन्द बाबू अपना कलेजा निकाल के रख दिहिस हैं। का है कि हमनी इनवाइट नहीं करते हैं अंगया बीजे मांगते हैं। जब से कार्ड में संगीत छपने लगा था तब से आजी लोग के सांझा बिहाना-गायब ही हो चुका था, झूमर के जगह कोरियोग्राफी वाला गुरुजी ले लिए थे। ई सब भी बढ़िया है। हम बुराई नहीं करते हैं। लेकिन अपना परम्परा को भूलना भी सही नहीं है। आनन्द जी ने तो इस तरह से एक नयी परम्परा की शुरुआत कर ही दी है, साथ ही बहुत से लोगों को ताकत भी दे रहे हैं कि हमारा रिवाज परिपूर्ण है उस पर गर्व किजिए, और कितना भी USA में रह लीजिए लेकिन पलामू की गलियों को भूलिए मत। काहे की दिल यहीं धड़केगा पलामू में, अमेरिका में तो सिर्फ हार्ट-बीट ही नापने का रिवाज हैं।
ध्यान से देखिए इस कार्ड को, बहुत से साहित्यिक क्रांतिकारी प्रयोग मिलेंगे इसमें. कमेन्ट मे बताइए कि इस कार्ड में और क्या अनूठा और आकर्षक लगा आप सब को.
और साथ ही ठेठ पलामू की टीम के तरफ से आप सब से नम्र निवेदन भी है कि आइये हम सभी मिल कर एक शुरुआत करते हैं शादी-बियाह, गृहप्रवेश, जन्मदिन, मुहजूठि, सत्तईसा, पूजा पाठ, या किसी भी आयोजन का निमंत्रण पत्र अपने पलमुआ बोली में छपवाते हैं, जिससे हमारी ये मिसरी सी मीठी बोली सबके जुबाँ तक पहुँचे और एक कभी न मिटने वाली मिठास घोल दे.....।
© ठेठ पलामू की ओर से:अजय शुक्ला, जया, सन्नी उर्फ रोहन


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