Thursday, August 9, 2018

सांप और हम

(अंतरराष्ट्रीय हिंदी पत्रिका सेतु के जून 2018 अंक में प्रकाशित सांप एवं सर्पदंश से जुड़े कई अंधविश्वासों और भ्रांतियों से पर्दा उठाता डॉ Govind Madhaw का रोचक एवं ज्ञानवर्धक आलेख. जरूर पढ़ें. ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाएं.)

साँप’ यह शब्द सुनते ही आँखों के आगे आश्चर्य, रहस्य, भय, कौतूहल, से भरे अनेक दृश्य उपस्थित होने लगते हैं जिनमें शामिल हैं - ब्रह्माण्ड को अपने मस्तक पर धारण किये शेषनाग, शिव की ग्रीवा में शोभित विषधर, कालकादह में कृष्ण का नृत्य, परीक्षित का काल तक्षक, विषकन्या, नागमणि, इच्चाधारिणी नागिन की कहानियाँ, नागपंचमी का पर्व, नागराज के रोमांचक कॉमिक्स, और बीन बजाते संपेरों का जीवन इत्यादि। शायद इसीलिए पश्चिमी देश भारतभूमि को ‘साँप और संपेरों का देश’ कहते हैं।

मगर दुखद पहलू यह कि हमारे देश में ही हर साल विश्व में सबसे ज्यादा यानि लगभग 20 हजार मौतें सिर्फ सर्पदंश से होती हैं। उस से भी ज्यादा कष्टकर बात ये कि इनमें से 90 फीसदी मौतें सिर्फ और सिर्फ इसीलिए होती हैं क्योंकि हम साँप और सर्पदंश के बारे में सटीक वैज्ञानिक जानकारी नहीं रखते, समय पर इलाज न कराके झाड़-फूँक-टोटका जैसे अंधविश्वास को प्राथमिकता देते हैं। कई बार मेरे हॉस्पिटल में भरती सर्पदंश के मरीज़ के पढ़े लिखे परिजन हमसे कहते हैं- “सर! हम चाहते हैं कि अपने मरीज की झाड़फूंक करा लें यहीं पर, बस थोड़ी देर के लिए उन्हें ICU से निकाल दीजिये। मेरे गाँव से आये बाबा बाहर बरामदे में ही उनका देहाती इलाज कर देंगे। कुछ जड़ी-बूटी और सिद्ध मन्त्र है उनके पास, बहुत लोगों को मौत के मुँह से निकला है उन्होंने। ठीक है कि आप इन बातों में भरोसा नहीं रखते, लेकिन हम तो भरोसा रखते हैं न! आपका मेडिकल साइंस अभी उतना आगे नहीं पहुँचा है, एक दिन आपको भी इनकी शक्ति पर भरोसा हो जायेगा। अगर आप हमारे मरीज को नहीं छोड़ेंगे तो हम हिंसक रास्ता अपनाने के लिए मजबूर हो जायेंगे।”

© Govind madhaw (www.setumag.com)

भारत में मानसून का आगमन हो चूका है और यही समय है जब हमारे हॉस्पिटल में सर्पदंश के सबसे अधिक मामले आते हैं। क्यों? हम मनुष्य अपने शरीर का तापमान स्थिर रखते हैं। पिछले लेख में आपने पढ़ा कि किस तरह ठंढे मौसम में चर्बी पिघलाकर, रोमछिद्र बंद कर के तथा कंपकंपी के सहारे हम शरीर में गर्मी पैदा कर लेते है। ठीक इसके उल्टे बाहरी वातावरण गर्म होने पर पसीना निकालकर हम शरीर का अंदरूनी तापमान बढ़ने नहीं देते। मगर साँप के शरीर में तापमान नियंत्रण की ऐसी कोई प्रणाली नहीं होती। उनकी त्वचा शुष्क और चिकनी होती है, वे पसीना नहीं निकाल सकते, शायद इसीलिए क्योंकि पैरों के बिना रेंगने के लिए उन्हें ऐसे शरीर की आवश्यकता है जो घर्षण को बर्दाश्त कर पाए। उन्हें आंतरिक क्रियाओं को सुचारू रूप से चलाने के लिए अपने शरीर का तापमान 30 डिग्री सेल्सियस रखना पड़ता है। जबकि मनुष्य के लिए यह 37 डिग्री सेल्सियस है। इसीलिए साँप का स्पर्श ठंडा होता है और उन्हें ‘कोल्ड ब्लडेड एनिमल’ कहा जाता है। अत्यधिक ऊष्म या शीत वातावरण में साँप अपने शरीर के तापमान को अनियंत्रित होने से बचाने के लिए लम्बी निद्रा में चले जाते हैं जिसे ग्रीष्मनिद्रा या शीतनिद्रा कहते हैं। इस दौरान साँप ना तो खाते-पीते हैं ना ही कोई क्रियाकलाप करते हैं। बस हृदय और फेफड़े की मंदगति के सहारे मौसम परिवर्तन का लम्बा इंतजार करते हैं। क्या मनुष्य भी बिना भोजन-पानी के महीनों तक जीवित रह सकता है? क्या योगी भी  शीतनिद्रा जैसी किसी अवस्था के सहारे हिमालय जैसे ठंडे क्षेत्र में वर्षों समाधि में लीन रहते हैं? क्या शीतनिद्रा के सहारे मनुष्य को सदियों तक जिन्दा रखा जा सकता है ताकि हम सुदूर ब्रह्माण्ड की यात्रा कर सकें? इस विषय में गहन शोध चल रहे हैं। आइये हम साँपों पर लौटते हैं।

© गोविंद माधव
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संस्कृत का शब्द ‘सर्प’ और फ्रेंच में ‘सर्पेंटाइन’ भाषाविज्ञान की दृष्टि से ‘एकीकृत भारोपीय (इंडो-यूरोपियन) भाषा परिवार’ की अवधारणा और ‘डाईवर्जेंट थ्योरी ऑफ़ इवोल्यूशन’ को पुष्ट करते प्रमाण हैं। हालाँकि भारत के अलावा अन्य देशों में भी साँपों से जुड़ी कई कहानियाँ और मान्यताएँ-परम्पराएँ पाई जाती हैं। इंडोनेशिया और थाईलैंड में लोग पौरुषवृद्धि के लिए सर्प-रक्तपान करते हैं, कुछ पश्चिमी देशों में सर्प-निर्मित शराब का भी प्रचलन है। मिश्र में क्लियोपेट्रा का आत्मदाह और तुत-अंखामन का सिंहासन हो या मध्यएशियाई क्षेत्र के दंतकथाओं में पर-पैर वाले ड्रैगन का वर्णन। दरअसल साँपों का विकास लिजार्ड/छिपकली से हुआ है। दोनों ही सरीसृप परिवार के सदस्य हैं। बस इवोल्यूशन के दौरान साँपों ने पैरों की जगह लम्बी पूँछ और पतले-लम्बे वक्ष को अपनाया। लेकिन छिपकली की तरह साँप की पूँछ काटने पर वापस नहीं बढती। मगर एनाकोंडा और अजगर की कुछ प्रजातियों में अल्पविकसित पैरों के अंश पाए जाते हैं। क्रमिक-विकास की किसी अवस्था में संभव है ये पैर ज्यादा विकसित रहे हों और उनके अवशेष देख कर ही ड्रैगन की अवधारणा का जन्म हुआ हो।

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साँपों से जुड़े अंधविश्वासों और रहस्यों का कारण शायद उनकी विशिष्ट शारीरिक रचना और व्यवहार है। आइये उनसे जुड़े कुछ रोचक तथ्यों पर नजर डालें। संसार में कुछ ऐसे स्थान भी हैं जहाँ साँप बिलकुल नहीं पाए जाते, जैसे – अन्टार्कटिका, न्यूजीलैंड, आइसलैंड, आयरलैंड, हवाई द्वीप और हिमालय की ऊँचीबर्फीली श्रृंखलाएँ। शायद इन स्थानों का निम्न तापमान या अनुकूल भोजन के अभाव की वजह से। या फिर उद्गमस्थल से वहाँ तक साँपों के पूर्वज तैर कर नहीं पहुँच सके हों, या फिर सरीसृप का क्रमिक विकास वहाँ अलग दिशा में हुआ हो। साँपों की लम्बाई 10 सेंटीमीटर से लेकर 7 मीटर तक हो सकती है। संसार का सबसे लम्बा साँप अजगर और सबसे भारी साँप एनाकोंडा है। साँप के कान नहीं होते, वह सुन नहीं सकता लेकिन अपने पेट और जबड़े को सतह पर टिका कर उसके कम्पन को बहुत ही प्रभावी ढंग से महसूस कर सकता है। संपेरे के बीन पर नाचने वाले साँप बीन की आवाज़ पर नहीं नाचते बल्कि संपेरे के द्वारा उनकी आँखों के सामने हिलाते डुलाते बीन के फुले हुए हिस्से को शिकार समझकर उसकी तरफ झपटते हैं। अगर संपेरा एक जगह शांत बैठकर बीन बजाये तो साँप भी शांत पड़े रहेंगे। इसीलिए कभी कभी संपेरे अपने हाथ से मुट्ठी बनाकर साँप की आँखों के सामने घुमा-घुमा कर उसे उकसाते है तब बीन बजाकर उन्हें भड़काते हैं। हालाँकि भारतीय वन्य जीव अधिनियम 1971 के हिसाब से साँपों पर दिखाए जानेवाले खेल गैर क़ानूनी हैं और ‘जीवों पर अत्याचार’ जैसे अपराध की श्रेणी में आते हैं।

साँप की आँखें भी बहुत विकसित नहीं होती, अधिकतर साँप बस अँधेरे और उजाले में फर्क कर पाते हैं। कुछ साँप अपने शिकार को उसकी गति के सहारे पहचानते हैं। शायद इसीलिए साँपों के पूर्वज डायनासोर की फिल्मों में अक्सर हीरो उनके सामने आते ही जान बचाने के लिए एकदम स्थिर हो जाता है। आप समझ सकते हैं कि ‘साँप अपने हत्यारे की तस्वीर खींच लेता है’ जैसी अवधारणा एक गप्प के सिवाय कुछ भी नहीं है। वैसे भी उनका दिमाग इतना विकसित नहीं है कि वे बदला लेने या पीछा कर के खोज निकालने जैसे जटिल काम को अंजाम दें। हालाँकि पेड़ पर रहने वाले साँप की दृष्टि अधिक विकसित होती है, वे रंग भी पहचानते हैं। साँप अपने शिकार को उनके शरीर की गर्मी से पहचानते हैं इन्फ्रारेड सेंसर के सहारे। इसीलिए वे अँधेरे में भी अपना शिकार पकड़ लेते हैं। शिकार का पीछा करने के लिए वे अपनी दोमुँही जीभ को बार-बार हवा में निकालते हैं और वातावरण में मौजूद कणों को अपने तालू के पास ले जाते हैं जहाँ गंध और स्वाद के लिए अतिसंवेदनशील अंग मौजूद होते हैं। साँपों के जबड़े कई छोटी-छोटी हड्डियों से मिलकर बनते है और बहुत चौड़े शिकार को भी निगलने में सहायक होते हैं। साँप की छाती में डायाफ्राम नहीं होता, इस कारण उनका हृदय एक जगह स्थिर नहीं होता बल्कि काफी बड़े शिकार को निगलने के दौरान आगे पीछे खिसक सकता है। उनके पास एक ही फेफड़ा होता है और किडनी अगल बगल ना होकर आगे-पीछे एक पंक्ति में होते हैं।

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साँप हमेशा मांसाहारी होते हैं, वे पानी की कुछ बूंदें चाटते हैं यदा-कदा लेकिन दूध कभी नहीं पीते। बल्कि जबरन दूध पिलाने से वे बीमार भी पड़ जाते हैं। नागपंचमी के दिन दुग्धपान करते दिखने वाले सर्प कई सप्ताह से भूखे-प्यासे रखे जाते हैं। अक्सर गाँवों की गोशालाओं में दिख जाने वाले साँप वहाँ चूहों की तलाश में जाते हैं ना कि दूध पीने। संभव है गाय की थन को वे शिकार के भ्रम में पकड़ लेते हों और डर से उनके पैरों से लिपट जाते हों। 

नर-सर्प का जननांग एक जोड़ा अर्धशिष्ण होता है जो छुपा हुआ होता है, सिर्फ मैथुन के समय मादा-सर्प के जननद्वार में टेढ़ा घुस कर अटक जाता है और वीर्य स्खलन करता है। भारत के कई गाँवों में ऐसा अंधविश्वास है कि ‘नाग’ नर होते हैं और ‘धामिन’ मादा। जी नहीं, साँप सिर्फ अपनी प्रजाति के सदस्य से मैथुन करते हैं। नर सर्पों को मादा को रिझाने के लिए बहुत मशक्कत करनी पड़ती है। अपनी कला का प्रदर्शन करना पड़ता है, प्रतियोगी नरों से युद्ध करना पड़ता है, कोबरा तो प्रतियोगी नर को निगल भी जाता है। अपनी टेरिटरी पर कब्ज़ा जमाने वाले विजयी नर को कई मादाओं से संसर्ग करने का मौका मिलता है। अधिकतर साँप परिवार नहीं बसाते, वे अंडे देने के बाद उन्हें छोड़ कर चले जाते हैं। हालाँकि कोबरा और अजगर मादाएँ अपने अण्डों को लिए घोसला बनाती हैं और अण्डों से लिपटी रहती हैं जबतक उनमे से संपोले बाहर नहीं निकलते। सर्प-मैथुन से मणि का प्रकट होना महज कोरी-कल्पना है।

केंचुली भी लोगों के कौतुहल का विषय होता है। कई परिवारों में लोग इसे सौभाग्य और सम्पन्नता का वाहक समझ कर रखते हैं। दरअसल साँप ऐसे जीव हैं जो जीवनभर लम्बाई में बढ़ते रहते हैं। रेंगने के कारण भी इनकी त्वचा की बाहरी परत जीर्ण-शीर्ण होती जाती है। उनकी आँखों में पुतली नहीं होती बल्कि उसकी जगह पारदर्शी सतह होती है, केंचुली की एक परत यहाँ भी पड़ जाती है जिससे इनकी दृष्टि कमजोर हो जाती है। तब सर्प खाना-पीना छोड़ कर किसी सुरक्षित स्थान में जाकर निष्क्रिय हो जाते हैं। भोजन और उर्जा के अभाव से कुछ दिनों में इनकी मोटाई कम हो जाती है, तब ये किसी कठोर रुखड़े सतह पर रगड़ते हुई खुद को निर्जीव, टूटे-फूटे, छोटे पड़ गए केंचुली से बाहर निकलते हैं। बाहर निकलते ही सर्प स्फुर्तिशील और चमकीले हो जाते हैं। जवान साँप साल में दो तीन बार केंचुली छोड़ते हैं जबकि बूढ़े हो गए साँप साल-दो साल में एक बार। चुकि केंचुली साँपों को एक तरह से नया जीवन देती है इसीलिए मेडिकल साइंस और चिकित्सकों के लोगो में ‘एक स्तम्भ से लिपटे दो सर्प’ हीलिंग के प्रतीकस्वरुप अंकित होते हैं।

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कुछ पेड़-पौधों के गंध साँपों को आकर्षित करते हैं, तो कुछ पौधों के इर्द-गिर्द शिकार की प्रचुरता उन्हें वहाँ ले जाती है। केंचुली छोड़ने के अलावा शिकार को निगलने के बाद उसे पचाने के लिए भी इन्हें किसी कठोर डंठल के चारो तरफ लिपटने की आवश्यकता होती है। चन्दन के पेड़, केवडा, रातरानी और कनेर की झाड़ियाँ साँपों के आश्रय के रूप में मशहूर हैं। पुराने खंडहर चूहों के लिए भी सुरक्षित घर होता है तो साँप भी ऐसे स्थान काफी पसंद करते हैं। शिकार निगलने के बाद उन्हें पचाने के लिए साँपों को करीब 4-5 घंटे लगते हैं, इस दौरान वे एकदम सुस्त हो जाते हैं, खतरे की स्थिति में या तो शिकार को उगल कर भाग जाते हैं या फिर मारे जाते हैं। एक चूहे का भोजन चार-पांच दिन के लिए पर्याप्त होता है। सभी साँप तेज नहीं रेंग पाते, इसीलिए प्रकृति ने उन्हें शिकार में सहायता के लिए ‘विषदंत’ यानि ‘फैंग’ प्रदान किया है। दुनिया का सबसे जहरीला साँप ‘करैत’ बहुत सुस्त और बेवकूफ होता है। इसीलिए यह इंसानी बस्ती के आसपास ही रहता है जहाँ शिकार की प्रचुरता होती है और इसे ज्यादा भागना नहीं पड़ता। अक्सर यह घर में घुस जाता है, बिस्तर में घुसकर इंसानों को काट लेता है, मगर काटने के बाद भी वहीँ पड़ा रहता है, भागता नहीं और इसीलिए मारा भी जाता है। जबकि कोबरा थोडा तेज भाग लेता है इसीलिए इंसानों से दूर ही रहना पसंद करता है। जबकि अधिकतर विषहीन साँप बहुत तेज भागने में सक्षम होते हैं। किसानों के घरों में पाए जानेवाले विषहीन ‘धामिन’ यानि ‘रैटस्नेक’ सबसे तेज दौड़ते हैं। चुकि ये हानिरहित सर्प घर से चूहों का सफाया कर देते हैं इसीलिए बहुत से किसान इन्हें मारते ही नहीं, बल्कि सौभाग्य का प्रतीक मान कर अनौपचारिक तरीके से पालते भी हैं।

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सभी साँप विषैले नहीं होते। विश्व में साँपों की कुल 3,600 स्पीशीज हैं, उनमे से करीब 2 हजार प्रजातियाँ भारत में भी मिलती हैं, मगर मात्र 725 प्रजातियाँ विषैली हैं। समुद्री जल में पाए जाने वाले सभी सर्प जहरीले होते हैं, मगर मीठे पानी के साँप विषहीन होते हैं। जलीय साँपों की पूँछ तैरने में सहायता करने के लिए चिपटी होती है।
जमीन पर पाए जानेवाले सांपो में कौन विषधर हैं और कौन विषहीन, ये कैसे पहचानें? अगर साँप पकड़ में नहीं आया या दिखा ही नहीं तो कैसे जानेंगे कि सर्पदंश विषयुक्त था या नहीं? क्या सभी सर्पदंश प्राणघातक होते हैं? क्या सर्पदंश बिना उपचार के भी ठीक होता है? झाड़-फूंक से भी सर्पदंश ठीक होता है क्या? सर्पदंश होने पर तुरंत क्या करें? सर्पदंश के उपचार में डॉक्टर क्या करते हैं, यह कितना प्रभावी है, क्या यह सर्वसुलभ है? सर्पदंश की दवा कैसे बनती है?

इन प्रश्नों के उत्तर जानने के लिए अगले अंक की प्रतीक्षा करें। (क्रमशः) 

(साभार : सेतु जून 2018 अंक)

रजहरा

1857 की क्रांति में पलामू के लोगों ने भी बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया था. गवाह है रजहरा का बरगद. हमारे सैकड़ों क्रांतिकारियों को इसी बरगद के पेड़ से लटका कर फांसी दी गई थी !

अपने इतिहास के सूत्रों और आजादी की लड़ाई के स्वर्णिम पन्नो और गवाहों को ढूंढते-ढूंढते हम पहुंच गए रजहरा गाँव के बरगद की छाँव में. जहाँ कभी भरे बाजार में हजारों ग्रामीणों ने अंग्रेजों के खिलाफ क्रांति का बिगुल फूंका था. लगभग पांच हजार ग्रामीणों ने पारंपरिक हथियारों से लैस हो कर रजहरा के माइंस को घेर लिया था और #बंगाल_कोल_माइंस कम्पनी के सभी मशीनों को बर्बाद कर दिया था, उसे आग के हवाले कर दिया था. वहाँ एक कोठी भी होती थी अब उसके सिर्फ खंडहर ही बचे हैं. उस समय अंग्रेजों के सभी बंगलो और कोठियों को भी घेर लिया गया था और सबको बर्बाद कर दिया गया था !

उस समय यह इलाका #बिश्रामपुर_राजघराने के अंतर्गत आता था. तथा तत्कालीन राजा भवानी बक्स राय थे. कहा जाता है अंग्रेजो और उनके बीच इस क्रांति को दबाने को ले कर समझौता भी हुआ था, परन्तु इसके दस्तावेज उपलब्ध नहीं है. सिर्फ जुबानी कहानियों में इसके कुछ किस्से क़ैद हैं.

रजहरा में इलाके का सबसे बड़ा बाजार लगता था. कोल माइंस होने के वजह से वहाँ भीड़ भी होती थी क्यूंकि सबसे सुखी सम्पन्न बाजार था वहां. इसीलिए अंग्रेज जनता में भय पैदा करने के लिए भरे बाजार में ही क्रांतिकारियों को फांसी दिया करते थे. 27-29 नवंबर 1857 को लगातार तीन दिन तक सैकड़ों ग्रामीण क्रांतिकारियों को फांसी दी गई थी!

जैसा कि पुरे देश में हजारों क्रांतिकारीयों ने मौत के फंदे को गले लगाया था, हमारे पूर्वजों ने भी जालिम अंग्रेजों की फांसी को हंसते हुए देश की खातिर स्वीकार कर लिया. और यह बरगद उन्ही की याद में अकेला आज भी खड़ा है.

नमन है उन शहीदों को जिन्होंने भारत के सबसे बड़े क्रांति में भाग लिया और अंग्रेजो के सामने झुकने की जगह उनसे लड़ना और शहीद होना पसंद किया!

परन्तु हमने क्या किया इन क्रांतिकारियों के सम्मान में?

जहाँ शहीदों की वेदी होनी चाहिए, जहाँ उनकी याद में शिलालेख होने चाहिए, जहां उनकी पूजा होनी चाहिए, वहाँ आज हमने शौचालय बना रखा है!

ये आज़ादी मुफ्त में नहीं मिली है हमे. ये हजारों-लाखों जानों के बदले मिली आज़ादी है. हमें सोचना होगा, कुछ करना होगा उन शहीदों के लिए. वरना इस आज़ादी के लायक ही नहीं हम!

हमारे सांसद Vishnu Dayal Ram जी खुद डीजीपी रहें हैं. उन्हें तो शाहदत की कीमत पता होगी. उनसे अनुरोध है कि इस जगह का सम्मान वापस दिलाएं.

और सभी पलामू वासियों से अनुरोध है कि इतिहास की जीती जागती तस्वीर को ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाने में सहयोग करें.

© Sunny Shukla

धनेसरी

हमारे दरवाज़े पर आना और प्यार से आवाज़ लगाना 'लकड़ी रख ले मउसी'। बचपन मे ये सुनना हमारी आदत सी थी, क्योंकि वो हर बाज़ार वाले दिन आती थी। हमारे गाँव में शनिवार और मंगलवार दो दिन बाज़ार लगता है। और दोनों दिन ये आवाज़ हम जरूर सुनते थे।

गाँव से दूर, पहाड़ियों के पीछे इनका घर था। खाने-पीने की जरुरतो के लिए हर बाज़ार के दिन जंगल से लकड़ी काट के लाना और आसपास के गांव में बेचना ही उसका पेशा था। पर न जाने क्यों, जब से मेरी दादी से उसने रिश्ता बनाया था तबसे वो आसपास के गांव की जगह सिर्फ मेरे घर ही आती थी, मेरा घर ही उसका बाज़ार हो गया था।

ऐसे ही एकदिन लकड़ी लेकर आयी थी बेचने, और बेचने के बाद बात-बात में दादी से पता चला कि उसकी माँ का घर भी दादी के मायके के आसपास ही था। बस उस दिन से दादी उसकी मउसी हो गयी और वो हमलोग की फुआ। अब तो मानो मौसी-बेटी के प्यार के आगे कुछ था ही नही! हर बाजार के दिन वो लकड़ी का बोझा लेकर आती जिसमें बाकी लोगो से ज्यादा मात्रा और ज्यादा सुखी हुई लकड़ियाँ होती थी। भले ज्यादा लकड़ी देखकर रास्ते मे आने समय कितने लोग उससे लकड़ी माँगते, पर वो उतनी दूर से लगभग 100 घर पार कर के मेरे ही घर लकड़ी देती। कभी पैसा रहा तो पैसा, न रहा तो चावल और कभी बिना पैसा लिए भी दे देती। वो इसलिए नही कि अगले बार मिल जायेगा, बल्कि इसलिए कि मउसी के लिये लाया लकड़ी किसी दूसरे को कैसे दे देती! अब अगर किसी बाजार को वो नही आये तो मउसी की भी बेचैनी बढ़ जाती। दादी बाकी लकड़ी बेचने वाली से पूछने लगती कि धनेसरी ना आइलक हो! आज नइखे आइल का? अब इस बेचैनी का राज कोई न जान पाया।

लकड़ी तो एक बहाना था दोनो को मिलने का। लकड़ी रखने के बाद दादी बिना कुछ खिलाये कभी नही जाने देती।कभी-कभी अगर शाम हो जाता तो प्लास्टिक में कुछ भी खाने का सामान बांध के दे देती, और ऐसा नही था कि ये एकतरफा था। वो भी साल भर कुछ न कुछ लेकर आते ही रहती थी जैसे - करील, खुखड़ी, कनवद , बैर, मकई! जब भी जिस चीज का सीजन रहे लाकर दे देना था। अगर दादी गलती से कुछ देने लगती उसके बदले तो कभी न लेती। हमेशा कहती- "फुआ हियई तो लइकन ला कुछु न लनतीअई, इहो सब का सोचतथी कि फुआ हर घरी अइसही आ जायेला!"  वो अपने साथ आये औरतों से उराँव भाषा मे कुछ बात करती थी, और हमलोग उसका नकल कर के चिढ़ाने, गुस्सा दिलाने की कोशिश भी करते। पर वो चिढ़ती ही नही थी। उपर से जब दादी डांटने लगती तो दादी को ही मना करती थी, कहती" छोड़ न दे मउसी, अब लइकन फुआ से ना खेलतथी तो केकरा से खेले जइतथीन।"

बचपन से चला ये सिलसिला बड़े होने तक चलता रहा। हमलोग भी फुआ -फुआ कहते रहे, वो भी सबको भाई-भउजी दीदी बोलते रही। यहाँ तक कि कभी उसके पति भी आते तो खाली हाँथ नही आते। जरूर कुछ न कुछ सीजन के हिसाब से जो भी होता साथ लाते और लाते भी क्यों नही ससुराल जो था। आने के बाद उनका स्वागत भी एक दामाद की तरह होता। खाना पीना खिला के कुछ विदाई के बहाने चावल-दाल जो भी रहता वो दादी दे देती कि घर मे काम लगेगा या धनेसरी फुआ को दे देने।

जब दादी गुजर गयी तो पूरा दिन भर आकर रोयी थी। और काम भर जितना पतल-दोना लगा सारा वो खुद अपने घर से बना के रोज-रोज आकर पहुंचा के गयी। और इसके लिए एक रूपया भी नही ली।पापा लोग बहाना भी बनाये देने के लिए कि ये सब मे पैसा किसी का नही रखना चहिये, तो बोली कि "मउसी के काम ला हम पइसा लेब, हमर कोई न हलक का?"

उसके 1-2 साल बाद वो भी गुजर गयी। गये थे सब समान लेकर उसके घर काम-क्रिया के दिन। माँ भेजी थी तब। पर पता नहीं क्यों बहुत ज्यादा उदास लगने लगा! बहुत मुश्किल से अपनी भावनाओं को दबा कर वहाँ से निकल गया।

जैसे वो हर सीजन में  कुछ न कुछ जंगल से लेकर आती थी, ठीक उसी तरह उसके बेटे भी घर आकर दे जाते है। माँ से आकर कहते है "गोतनी भेजले हउ।" मउसी और बेटी के बीच निस्वार्थ भाव से बना वो रिश्ता आज भी कायम है। जरूरी नही रिश्ता खून का ही हो, कुछ रिश्ते प्रेम से भी बनते हैं। और वो ही सबसे टिकाऊ भी होते हैं। शायद ये रिश्ता भी उसी में से एक है।

©️ Anand Keshaw

कोयल

यह किसी पक्षी का नहीं झारखंड की प्रमुख नदी का नाम है. दो नदियां हैं - उतर कोयल और दक्षिण कोयल.

जैसा कि हम सब जानते हैं कि सभ्यता नदी किनारे ही विकसित होती है. और '#पलामू_का_इतिहास' में सत्यान्वेषी ज़ी ने यहां की नदियों और कैसे उनके किनारे हम बसे उसके बारे में हमें बताया. आज हम अपनी लाइफ लाइन #कोयल के बारे में पढ़ते हैं.

#दक्षिण_कोयल नदी झारखण्ड और ओडीशा से होकर बहती है। यह राँची से कुछ किमी पूर्व में पठार से निकलती है और दक्षिण की तरफ मुड़ जाती है. और अंत में यह उड़ीसा में प्रवेश करती है, गंगापुर में यह शंख नदी में मिल जाती है. इसका नाम यहां ब्राह्मणी हो जाता है  इसकी प्रमुख सहायक नदी कारो है.

#उत्तर-कोयल यानी हमारी कोयल. यह नदी राँची के पठार के मध्य से निकलकर पाट के घुमावदार प्रवाह क्षेत्र से होती हुई उत्तर की ओर प्रवाहित होती है.

अपने उदगम से 255 किलोमीटर की दूरी तय कर यह सोन नदी में मिल जाती है. यह नदी गर्मी के मौसम में सूख जाती है, लेकिन वर्षा के दिनों में तुरन्त बाढ़ के साथ उमड़ कर बहने लगती है. मेदनीनगर के शहरवासी के साथ-साथ बेतला के जानवर भी लाभान्वित होते हैं, इसने कई गांवों को बसाया है. नेतरहाट की खूबसूरती हो या केचकी का पिकनिक स्पॉट सब की जिन्दगी इसी के सहारे है. इधर ही औरंगा और कोयल का खूबसूरत संगम है.

राँची और हज़ारीबाग़ पठार से होते हुए आने वाली औरंगा नदी और अमानत नदी इसकी सहायक नदियाँ हैं.

#औरंगा नदी राँची ज़िले के सोहिदा गाँव से निकलकर 80 किलोमीटर की यात्रा तय करती है और कोयल नदी में मिल जाती है. जब अंग्रेजों ने पलामू के चेरो राजाओं पर चढ़ाई की थी तो इसी नदी ने प्रहरी की तरह राज परिवार की सुरक्षा की थी. इसकी नदियों में शहादत के खून घुले थे.

#अमानत नदी हज़ारीबाग़ ज़िले से निकलकर कोयल मेदिनीनगर के पास 10 किलोमीटर उत्तर-पूर्व में मिलती है, और आगे जा कर यह सिंगरा गांव में कोयल में मिल जाती है.

इस नदी पर #बूढ़ा_प्रपात है, जिसकी ऊँचाई 450 फ़ीट है. यह झारखण्ड का सबसे ऊँचा प्रपात है, जो महुवाडांड़ में है, और इसकी खूबसूरती देखते ही बनती है.

कोयल सिर्फ एक नदी नहीं बल्कि पलामू की जीवन रेखा है. छठ पूजा के वक़्त इस नदी की शान शौकत देखते ही बनती है. लगभग सभी घाटों पर छठ पूजा धूम धाम से मनाया जाता है. खासकर डालटनगंज के पुल के नीचे वाला दोनों घाट. अब शहरवासी सिंगरा में जहां कोयल-अमानत का संगम है वहाँ हजारों के संख्या में छठ का आनंद लेते हैं और गंगा आरती के रूप में नदी की आरती भी करते हैं जो काफी आकर्षक होता है.

केचकी जहाँ कोयल और ओरंगा नदी का संगम है ये पलामू का सबसे बड़ा पिकनिक स्पॉट बन चूका है. इस पर बना पुल तो सेल्फी ले कर डीपी लगाने का सबसे पंसदीदा जगह बन चूका है. नये साल पर तो यहाँ लोगों का सैलाब उमड़ जाता है.

सावन के महीने में लगने वाला झूलन भी इसी नदी के किनारे लगता है.

शाहपुर-मेदिनीनगर पुल जिसका नाम अब 'पूरनचंद सेतु' हो चूका है गढ़वा-मेदनीनगर मुख्य मार्ग को जोड़ता है और शहर का मुख्य मार्ग है, यह भी फोटो खिंचवा के डीपी लगवाने के लिए मशहूर है. अभी हाल में ही अभिनेता अर्जुन रामपाल अपनी आने वाली फिल्म '#नास्तिक' फ़िल्म की शूटिंग यहीं कर रहे थे.

जब पूल नहीं था तो इस पर नाव चलता था, कुछ लोग तैर कर भी आते थे.

मंडल डैम कोयल को बांध कर ही बनाया गया है. जिससे 25 मेगावाट बिजली की उत्पादन होगी परन्तु गेट नहीं लग पाने के वजह से यह चालू नहीं हो पाया. इसके चालू होने के बाद बिजली के साथ-साथ सालों भर पानी भी उपलब्ध हो पाएगी. मोहम्मद गंज में एक बराज भी है जिससे बिहार औरंगाबाद के इलाके भी लाभान्वित होते हैं.

शहर और गांवों का विकास तो हो रहा है, परंतु सभी लघु उद्योंगो एवं नाली-गटर की गंदगी सीधे नदी में छोड़ दी जाती है. जिससे नदी गन्दी हो रही है. साफ देखा जा सकता है कि किनारों पर पानी का रंग काला है मेदनीनगर में.

कितनी कहानियाँ हैं कि बाढ़ मे कोई कोयल में बह गया और सीधे गंगा में मिलते हुए समंदर मे विलीन हो गया.

आइए हम अपनी जीवन रेखा को नमन करें जिससे हम उपजे हैं और हमारा पलामू पोषित है.

© Sunny Shukla