Sunday, February 27, 2022

आपन बोली (कुन्डलीया छंद)

 

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आपन बोली मीठ बा, जइसन माई दूध।
भाषा बोलs जान के, ई हे सबसे सूध।
हे सबसे सूध, दूध बा सहज पवितर।
बानी पानी एक , बतावे भाव चलितर।
सुनs बेलौंजी लोग, ज्ञान के ई बा मापन।
माटी के बा महक, बोली बोल तू आपन।।
©श्रीधर प्रसाद द्विवेदी
(पलामू के प्रसिद्ध कवि)
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Saturday, February 26, 2022

काव्य_कलश

 पेरात बाटे ऊख बा

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(गाँव में आजकल ऊख पेरा रहल बा, कोलसार चल रहल बा। ओकर दृश्य येही गीत में देखावे के कोशिश बा।)
गाँव के बगीचा में पेरात बाटे ऊख बा।
हुलसत लोग, बिहंसत बाटे रुख बा।
काट के केतारी छिल तोड़ के अगेर के,
शुरू कोलसार भइले, सुदिन सबेर के।
छोटी मोटी कुटिया में अगिन अथाह बा,
कल चले आवे रस, आग पर कड़ाह बा।
सबके "दुलारी" ऊख बाटे परमुख बा।
गाँव के बगीचा में........
महके मिठास माते गाँव केरा लोगवा ,
गरम गरम गुड़ के लागत बाटे भोगवा।
मुँह मीठा करि करि जाय राहगीर भी,
दान आउर भोग के जुड़ल संजोग बा।
मन खुशहाल, केहू के न बाटे दुःख बा।
गाँव के बगीचा में.......
कहत किसान सुन मेरी प्यारी धनिया,
तोहे के गढ़ाई देबो, नाक के नथनियाँ।
बाली देबो कान में, पयेर में पायलिया,
सुन सुन हुलसे, किसान के घरनियाँ।
खा ल पिया तोहे के लागल बाटे भूख बा।
गाँव के बगीचा मेें.....
©हरिवंश प्रभात
पलामू के प्रसिद्ध कवि
May be an image of animal and outdoors

Thursday, February 24, 2022

रसियाव

 #ठेठ_पलामू- #रसियाव


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पलामू में शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति होगा ,जो रसियाव से परिचित नहीं हो। इस शब्द को सुनते ही मन मिठास से भर जाता है।
ठेठ पलामू के पिछले पोस्ट में आपने पलामू के प्रसिद्ध कवि #हरिवंश_प्रभात जी की कविता को अवश्य पढ़ा होगा। उन्होंने अपनी कविता के शुरुआत में ही स्पष्ट कर दिया था कि -" गाँव में आजकल ऊख पेरा रहल बा।" शहरी भाषा में जिसे गन्ना कहते हैं। हमारे यहाँ उसे #ऊख या #केतारी कहते हैं। पहले हमारे यहाँ बनने वाले #रसियाव में इस गन्ने के रस का प्रयोग होता था। उत्तर प्रदेश के अवध इलाके में इसे रसियावल या बखीर के नाम से भी जाना जाता है।
तो यह #रसियाव पकाना कोई आसान काम नहीं है, बल्कि बहुत परिश्रम का काम हैे। कुछ लोगों का मानना है कि गोईठे की धीमी आंच पर इसे पकाया जाए, तब ही इसमें असली स्वाद आता है। इसे बनाने के लिए गन्ने के ताज़े रस को मिट्टी के बर्तन में उबलने दिया जाता है। उबलते समय रस में से जो ख़राब हिस्सा निकलता है, उसे कटोरी या चम्मच से निकाल कर अलग करते रहना पड़ता जाता हैं। जब रस ख़ूब गाढ़ा हो जाता है, तब इसमें (नया)अरवा चावल पड़ता है। इसमें शुद्ध दूध और मलाई के साथ कुछ लोग काजू, किशमिश, गरी, मेवा आदि ड्राई फ्रूट्स भी मिला देते हैं।
जब रसियाव पक जाता है, तब इसे और सोंधापन देने के लिए मिट्टी के नए बर्तन में रख दिया जाता है। फिर इसे कम-से-कम एक पहर बाद खोला जाता है। अब स्वादिष्ट रसियाव तैयार है। इसे सुबह बासी खाने का ग्रामीण अंचलों में ख़ूब चलन है। दरअसल दूसरे दिन बासी खाने से परम आनंद की प्राप्ति होती है। यह तो पहले जमाने की बात हुई। वैसे ग्रामीण अंचल में अभी भी, इस प्रक्रिया से स्वादिष्ट रसियाव बनता है।आपने भी इस प्रक्रिया से बने हुए स्वादिष्ट रसियाव को अवश्य चखा होगा।
अब शहरी क्षेत्रों और महानगर म़े लोग जानते भी नहीं कि कोलसार क्या होता है? हाँ! कभी-कभी ठेले में मशीन से पेराते गन्ने के रस को पीते हैं। जिसमें भी आधा बर्फ,नींबू रस और अन्य सामग्री का मिश्रण रहता है ‌ तो आजकल हमारे यहाँ भी गन्ने के ताजे रस की बजाय,उससे निर्मित गुड़ से ही रसियाव बनता है। बाकी बनाने की वही प्रक्रिया होती है। आपके यहाँ भी रसियाव बनता होगा, आप भी अपने अनुभव को बताइएगा तो हम सभी को बहुत अच्छा लगेगा।
©अजय शुक्ला
प्राध्यापक-हिन्दी
विशेष रुचि: #पलामू_के_पकवान
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Monday, February 21, 2022

पलामू, मगह और भोजपुर में रेल के सवारी

 


-अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस विशेष
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हमीन दूनो भाई नाया आंगा-पैंट में तैयार होत रही कि गांव के लइकन आके कहलन, ‘का गोय...ममहर जात बड़े का।’ हमीन के जवाब रहे, ‘हं गोय...जात त हिअ। ऊहां से डिहरी जाएब फिर पंडुका जाए के बा।’ ई बात सुन के सब ई कह के हंसे लगलन की वाह ईआर तोहिन त एके बार में पलमूआ, मगही आऊ भोजपुरी तीनो बोल देले। असल हमीन के दू गो गांव के निवासी ही। पनेरीबांध पलामू में बा त पंडुका रोहतास (पुराना आरा-भोजपुर) जिला में। ममहर मगह औरंगाबाद (पुराना गया) में। ये ही कारण बा कि हमीन दूनो भाई करीब-करीब समान अधिकार से तीनों जगह के बोली में बतिआ लिही ला। आज हम बचपन के रेल यात्रा के वर्णन करत ही। जब हम पलामू में रहब त भाषा पलमूआ रही, मगह में रहब त मगही आऊ रोहतास में रहब त बात भोजपुरी में लिखल रही।
लईकाई में हमीन दूनो भाई आपन मां के दिदिया कहत रही। दादी हमीन के माई रहन। स्कूल में छुट्टी होइला पर पहिले का आझो ममहर जाए के परंपरा बा। हमीनियो मां-पापा के साथ रेल धरे ला डालटनगंज स्टेशन पहुंचली। हम बढ़ रही त हमार हाथ में पानी से भरल सुराही रहे त छोटका भाई के हाथ में कचौड़ी, भुंजरी आऊ आम के अचार के झोला रहे। तब ना त ट्रेन में आझ लेखे पानी बेचात रहे न खाए-पिए के सामान। खैर, धुआं उड़ावत रेल आईल। पापा पहिले मां के चढ़ईलन फिर हमीन दूनो भाई के फिर अपने चढ़लन। रेल बरवाडीह से आवत रहे एही से सीट मिले में आसानी भईल। रेहला पहुंचते ही भूख लागे लागल। फिर का रहे कचौड़ी-भुंजरी पर टूट पड़ली। अचार भी तनी-तनी चाटे में जे सुख मिलल ओकरा खाली फील कईल जा सकला। सोननगर से रेल बदल के हमीन अनुग्रह नारायण रोड पहुंचली।
टिशन पर नाना हमनी के लेवेला पहुंचल हलन। उनका देखते ही हम ‘नाना हो’ कहके चिचिआए लगली। दौड़ के दूनो भाई उनकर गला में लिपट गेली। हमनी के कपार में लगल कोइला से उनकर ऊज्जर कुर्ता करिआ हो गेल। असल में हमनी खिड़की दने बइठल हली। रेल कोइला आउ भाफ से चले वाला हल। ई वजह से कोइला के छोट-छोट टुकड़ा हमनी के कपार में घुसल हल। नाना अप्पन लाल गमछी से हमनी के माथा झाड़ के पांवरगंज में मुंशी नाना के होटल में ले गेलन। मुंशी नाना के मिठाई आऊ उनकर मीठ बोली के कोई जोड़ ना हल। हमनी भर पेट मिठाई खाके ‘डॉज’ (मिनी बस नियन गाड़ी) पर सवार होके पाठक बिगहा पहुंचली।
हॉल के बहरे मामू लोग से 'ममुआ-भगिनवा’ के उद्घोष बाद बुढिया नानी से भेंट। फिर गांव घूरे के मजा। अगिला दिन से कभी टिशन तो कभी जम्होर, कभी मोर डिहरी तो कभी रेल लाइन के सैर। रेहट से लेके चहभच्चा मशीन पर स्नान के बाद आश्रम या बगईचा में खेलकूद।
अब यात्रा पैतृक गांव पंडुका के। तब हमीन दूनो भाई हाई स्कूल में पहुंच गईल रही। डिहरी से फूफेरा भाई के बरात नौहट्टा के बगल में कोई गांव में जाए के रहे। हमीन डिहरी से तिउरा-पीपराडीह जाए वाला रेल पर सवार होइली। ई ट्रेन एकदम ट्वाय ट्रेन लेखे रहे। साथे बढ़का चाचा भी रहलन। ऊ इलाका के इतिहास से लेके ट्रेन के बारे में बतावे लगलन। ई अईसन रेल रहे जेकर अगिला डिब्बा से उतर के खेत से झंगरी उखाड़ के पिछला डिब्बा में चढ़ल जा सकत रहे। ट्रेन जब रोहतास पहुंचल त आपन परबाबा के लिखल 'विनय षष्ठिका’ के ई श्लोक सामने आ गईल-
भुवन शेखर रोहित दुर्गतः;
सुनद शोणतटानु सृतिक्रमात्।
नयन योजन मार्गमतीत्सया,
सुनगरी निऋतेर्दिशि पण्डुका।
ये ही श्लोक गांव के परिचय बा। रोहतास गढ़ से दो योजन पर स्थित गांव जाए घड़ी रास्ता एतना सुंदर बा कि जेकर शब्द में चित्रण ना कईल जा सके। एक दने सोन नद त दोसर दने कैमूर के पहाड़ी। खेत-खरिहान के बीच से गुजरत ट्रेन। एकदम मन जुड़ाए वाला इलाका। भइया के बिआह के बाद पंडुका पहुंचला के बाद हित-नात से भेंट-मुलाकात। खांटी भोजपुरिया अंदाज में सेंकाईल लिट्टी-चोखा के मन भर भोजन। रोज सोन में स्नान फिर कुछ दिन बाद लौटे की तैयारी। नाव से सोन पार करके पलामू के श्रीनगर में इंट्री।
श्रीगर पहुंचते पापा के कुछ छात्र लोग मिल गईलन। यहां पहुंचते पलमूआ में बोली शुरू गईल। बस के नाम त ईआद नईखे पर ओकरा से हमीन भवनाथपुर पहुंचली। ईहां से डालटनगंज ला बस मिलल। गुड़ के मिठाई से लेके चिनिया बेदाम खात-खात हमीन फिर से डालटनगंज पहुंच गईली। बाबा के भोजपुरी में, माई (दादी) के पलमूआ में आऊ मां के मगही में सऊंसे कहनी सुना के दूनो भाई 'का गोय कने बड़े’ कहत ईआर लोग से मिले निकल गईली।
आज हम भले नौकरी करेला दिल्ली-एनसीआर के गाजियाबाद में ही पर पलमूआ, मगही आऊ भोजपुरी बोली सुनके मन खुश हो जाला। हमारे लेखे भावना न जाने केतना लोग के होखी। सभी के अंतराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस के शुभकामनाएं।
©प्रभात मिश्रा सुमन
वरिष्ठ पत्रकार, अमर उजाला नोएडा
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Wednesday, February 16, 2022

#पापा_का_स्कूटर

 #पापा_का_स्कूटर

बार-बार झुका कर स्कूटर को, पापा का किक मारना और गुस्से से बुदबुदाना। मेरा रास्ते के किनारे खड़े होकर इंतज़ार करना और प्रार्थना करना- "प्लीज् गॉड अब और नहीं सह सकता। हर आने जाने वाले देख रहे हैं। हंस रहे होंगे मुझपे। अभी गोलू भी पार होगा इधर से ही अपने पापा की कार से। देख लिया उसने तो जीना मुश्किल कर देगा क्लास में।"
समय बदला। पहले सुंदर बाइक, फिर लोन पर कार लिया। पर आज भी वो सुकून और खुशी नहीं मिली, जो पापा के स्कूटर में पीछे बैठ कर मिलती थी।
सीटबेल्ट और एयर-बैग्स भी वो सुरक्षा का एहसास नहीं दे सकते जो उस वक़्त महसूस होती थी। मेरी प्यारी सवारी तो भाई पापा की स्कूटर ही रहने वाली है।
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