Saturday, March 20, 2021

रामचंद्र फूफा से एक फोन पर मिलल जीवन भर के ज्ञान

 रामचंद्र फूफा से एक फोन पर मिलल जीवन भर के ज्ञान 


हमीन जब हाई स्कूल में पढ़त रही तब इंग्लिश के एगो किताब में लिखल रहे, 'Those who killed time are killed by time'। बस इहईं से जीवन के दिशा मिल गइल। पढ़े आउ टाइम के वैल्यू उ दिन से लेके आज तक समझिला। अब कोर्स के किताब न तो पढ़ावे के उमर बा न पढ़े के लेकिन कुछ पढ़ले बिना रहल ना जाला। 'कल्याण'  न जाने केतना साल से मंगवात ही, ओकरे लेख पढ़िला। एकरे से साहित्य और धर्म दूनो के जानकारी मिल जाला।

रामचंद्र पांडेय जी के उम्र भले ही करीब 84 साल हो गइल बा पर स्मरण शक्ति नौजवानो से जादा। ढेरे दिन से मन रहे कि उनका से बतिआऊं। स्वतंत्रता सेनानी रामजन्म सिंह पर लिखे घड़ी पता चलल कि इ दूनो में काफी निकटता रहे। उनके पर कुछ जानकारी लेवे ला जब हम फोन कइली तो कृष्णा भैया कौनो लइका के फोन देके कहलन कि जो बाबा के फोन देदे की सुमन के फोन हई। जब उनका से बात होइल तो जीवन भर के ज्ञान एके फोन पर मिल गइल।

असल में रामचंद्र पांडेय हमर फूफा बड़े। अब केतना लोग के मन में ई बात उठे लागी कि प्रो. एससी मिश्रा के त आपन कोई भाई-बहिन नइखन त सुमन के फूफा कहां से आ गइलन। पापा के बढ़का मामा के बेटी यानी मनोरमा दीदी (अब स्वर्गीय)। ईहे हमार बढ़की फुआ रहीन जिनका से रामचंद्र पांडेय जी के बिआह 1955 में होइल रहे।

जब फूफा से बात शुरू होइल त हालचाल आउ रामजन्म बाबू पर बात होइला के बाद जे बात शुरू होइल उ हमरा एको आना मालूम ना रहे। उ जब बतइलन कि हम रिटायर होए से पहिले 1997 में प्रयाग संगीत समिति से 'प्रभाकर' के डिग्री हासिल करले रही तब एकबारगी हम चौंक गइली। कहां, आदमी रिटायर करे घड़ी ई सोचला कि अब चैन से सुतल जाई आउ कहां ई डिग्री हासिल करे में लागल रहन। असल में फूफा के संगीत से बचपन से ही बहुत प्रेम रहे। जेतना बढ़िया ऊ गावल ले ओतने बढ़िया सब साज भी बजा लेव लन। एही से उनकर मन में आइल की संगीत के विधिवत डिग्री लेवल जाए। प्रभाकर के पढ़ाई घड़ी उ प्रयाग संगीत समिति के रजिस्ट्रार डॉ. जगन्नाथ मिश्र के संपर्क में अइलन। सबसे पहिले 'संगीत शास्त्र मीमांसा' आउ 'राग निर्णय' के अध्ययन फिर न जाने केतना किताब। 

1959 में फूफा जीएलए कॉलेज से आईए पास करला के बाद उनकर मन में 'आत्मनिर्भर' बने के इच्छा जागल। पढ़ाई के प्रति अइसन ललक रहे कि उ मास्टर बने के मन बनवलन। 1961 में मंगलपुर प्राथमिक विद्यालय में उनकर ज्वाइनिंग भइल। अब उनकर शब्दों में, 'हमरा ला बदली होना बड़ी शुभ रहल। जब बदली होत रहे तब क्वालिफिकेशन बढ़ जात रहे। जब ओरेया में बदली होइल त प्राइवेट से 1965 में ग्रेजुएशन पूरा हो गइल। 1967 में बदली होइल त भागलपुर विश्वविद्यालय से डिपइनएड के डिग्री मिल गइल। फिर एमए करे के मन हो गेल। ई आसान ना रहे। डालटनगंज में जादे किताब मिलते ना रहे। जीएलए कॉलेज के कुछ प्रोफेसर से बढ़िया संबंध रहे। ओहनी के बतइला पर वाराणसी से जाके चौखंबा सीरिज से किताब लेली। किताब जनवरी में लेली आउ अप्रैल में परीक्षा। रिजल्ट आइल त हम सेकेंड क्लास से पास हो गेली। ई साल रहे 1973 आउ हम बदली होके सरईडीह, बरवाडीह के स्कूल में पोस्टेड रही।'

हमीन के बातचीत बीच-बीच में 'अंग्रेजिओ (खड़ी बोली)' में हो जात रहे। उनके शब्दों में, 'मेरे जीवन में हर कदम पर ईश्वरीय सहायता मिलती रही। यदि सही मार्ग पर कदम बढ़े और विश्वास हो तो ईश्वरीय सहायता मिलती ही है। जब मुझे मैट्रिक के सेंटअप की परीक्षा देनी थी तो मेरी तबीयत काफी खराब हो गई। लगा कि यह साल खराब हो जाएगा। तभी अजिया ससुर (पं. तुलसी पाठक) मिलने आ गए। उन्होंने गणेश विद्यालय के प्रिंसिपल से मुलाकात की और मेरी स्थिति बताई तो उन्होंने बिना सेंटअप टेस्ट दिए ही मैट्रिक की परीक्षा देने की अनुमति दे दी।' जब मैंने पूछा कि आपकी शादी कैसे तय हुई तो, उनका जवाब था, 'सौ के करीब अगुआ आए थे। जब पनेरी बांध से पं. तुलसी पाठक आए तो मेरे बाबा पं. भवनाथ पांडेय उन्हें मना नहीं कर सके।'

बातचीत खत्म होने से पहले उन्होंने दो-तीन बड़ी ही महत्वपूर्ण बातें कहीं। ये बातें ज्ञान और रिश्तों की अहमियत बताने वालीं हैं। उन्होंने कहा, 'शिक्षा ही सबसे हितकर और मूल्यवान है। यह न सिर्फ हितकर है बल्कि शांति देने वाला भी है।' पापा से रिश्तों पर उनकी जुबानी, 'उनका से शुरूए से बहुत प्रेम रहे, अभियो तक बा। जब रांची जा हली त उनके डेरा पर रूक हली।' अब थोड़ा सी बात उनके बहनोई के रूप में, 'मुहब्बत की नहीं जाती...मुहब्बत हो ही जाती है... समान प्रवृत्ति वाले होते हैं तो मेल हो ही जाता है... योग्य, योग्येन, यूज्ये...।' 

अंत में, 'पढ़ने में दो और संगीत में तीन का साथ जरूरी। कोई सुनने वाला मिल जाए तो आनंद।' हम रउरा सुनली बहुत ज्ञान मिलल। फूफा राउर आशीर्वाद परिवार जन पर, समाज पर बनल रहे।


नोट- इसे पढ़ने के बाद आप जिस व्यक्ति से प्रभावित हों, उसका चेहरा सामने रख लीजिएगा। बिलकुल अपनी कहानी लगेगी।

लेखक: प्रभात मिश्रा 'सुमन' 

वरिष्ठ पत्रकार, अमर उजाला नोयडा 



अंखमुना


#अंखमुंदा बचपन के प्रिय सामानों में से एक था। जेबखर्च के नाम पर जो भी पैसे मिलते थे उसमें से बचत करके अंखमुंदे को भरने की होड़ सी होती थी भाई बहनों के बीच। जिसका अंखमुंदा पहले भर जाता था वो खुद को मुकेश अंबानी से कम नहीं समझता था!
सबसे मजा तो तब आता जब घर में कोई मेहमान आ जाते, उनकी वापसी का इंतज़ार होता क्योंकि जाते समय पैर छूने पर कुछ न कुछ मिलने की प्रबल संभावना होती थी, और वैसे में खुदरा कराकर अंखमुंदे को काफी हद तक भर लेने का बड़ा स्कोप भी! पर जब कुछ मेहमान बिना मुद्रा दिए निकल जाते तो उनपर बालमन आक्रोशित भी होता कि बड़े ही कंजूस निकले ये तो।
वैसे मेहमानों से मिले सारे पैसे आसानी से हमें ही नहीं मिलते, माँ तो जीएसटी काटकर छोटी राशि ही हमें पकड़ाती थीं पर उस रेजकी की खुशी भी कम न थी उस जमाने में। तिकोन तीन कीरिया, चौकोर पांच किरिया, गोल चवन्नी, अठन्नी और कागज के एक और पांच के नोट! पांच, दस से ज्यादा की हमारी औक़ात नहीं हुआ करती थी उस जमाने में! पर हम खुद को धन्ना सेठ समझा करते थे जब हमारा 'अंखमुंदा' भर जाता था।
शिवरात्रि का बेसब्री से इंतजार हुआ करता था क्योंकि शिवरात्रि के मेले में ही तो अंखमुंदे की खरीददारी होती थी! साइकिल पर आगे बैठकर कभी ब्लॉक में लगने वाले मेले, कभी कारिहार, तो कभी कहीं और। तब लकठो, चिनियाँ बादाम, मलाई बर्फ, बनबैर, जलेबी और 'अंखमुंदा' खरीदने का अवसर मिल पाता था।शिवरात्रि मेले के बाद से अंखमुंदे को भरने की कवायद शुरू हो जाती थी।
कभी-कभी सोचती कि माटी से बने इस गोलाकार वस्तु का नाम 'अंखमुंदा' क्यों पड़ा होगा? तो बालमन में यही जवाब सूझता कि इसकी आंख मूंदकर इसमें पड़े पैसों को हम नहीं देख पाते हैं, शायद इसीलिए इसे अंखमुंदा कहते हैं!
हर दौर में कुछ गड़बड़ झाला करने वाले लोग होते हैं। हमारे साथ भी बहुत बार ऐसा हुआ कि अंखमुंदा टूटे बगैर पैसे कम होने लगे। दरअसल मेटल के छोटे चिमटे की सहायता से एक आंख बंद करके एक एक कर के सिक्के निकाले जाने लगे! तब सिरहाने रखकर सोने लगी अपने चलते फिरते बैंक को!
दुखद स्थिति तो तो तब होती थी जब कभी लापरवाही से अंखमुदा टूट जाता और पैसे फर्श पर बिखर जाते । क्योंकि भर जाने पर तोड़ने का सुख कुछ और होता था।
अंखमुंदे को शहरी भाषा में '#गुल्लक' कहा जाता है। हम तो ठहरे ठेठ पलमूंवा, सो अभीओ 'अंखमुंदा' ही कहते हैं। हालांकि अब एकर दिन लद गया अब इसकी जगह ' पिग्गी बैंक' ने ले ली है। पर जो मजा 'अंखमुदे' में था वो पिग्गी बैंक में नहीं। फिर भी इसी बहाने घर के बड़े लोग बच्चों में बचत की आदत डालते हैं जो कि बहुत ही अच्छी आदत है ! जहां बच्चों के पास छोटी छोटी बचतों के संस्कार नहीं होंगे वहां अर्थव्यवस्था चाहे कितनी भी व्यस्क क्यों न हो भरभरा कर गिर सकती है!
हमारे लिए तो अब जीवन ही 'अंखमुंदा' है, जिसमें संग्रह हैं बहुत सी खट्टी-मिठ्ठी यादें और कटु-मधुर अनुभव जीवन के! जिन्हें एक आंख बंद करके नहीं वरन दोनों आंखे खोलकर देखना पड़ता है, क्योंकि यह बचपन का सुनहरा दौर नहीं, परिपक्वता की ऊंची दहलीज है।
नोट: अपने बच्चों में छोटे से ही बचत की आदत जरूर डालें और अंखमुंदे ( गुल्लक) से जुड़ी अपनी खट्टी मिठ्ठी यादें जरूर साझा करें
© शर्मिला
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इश्क से शायरी तक


‘सोलहवां साल का पहुंचना, होठ के ऊपर रोयें की गहरी रेघारी बनना शुरू हो जाना और फिर चुम्बक से भी ज्यादा मजबूत प्यार के आकर्षण बल में खुद को बहकते हुए महसूस करना, जीवविज्ञान में डोपेमाइन, ऑक्सीटोसिन, एण्ड्रोजन, एस्ट्रोजन वाले पन्ने पे कुछ ज्यादा ही ठहरना और कुछ चेहरे को देखते ही अपने दिल को इन होर्मोनो के झरने में भीगते हुए लहस जाना, किसी और के मुंह पे उसका नाम आते ही मरने-मारने पे आमदा हो जाना, किसी के जिक्र मात्र से सबकुछ अच्छा सा लगने लगना, या फिर भविष्य के सारे सपनों में किसी के सुनहरी तस्वीर को सजाने लग जाना' ये तो थी प्रेम की फिलोसोफी. अब हम आपबीती पे आते हैं.
दरअसल ये बिलकुल सच है कि आदिकवि के टाइम से ही प्रेम और वियोग रस से ही हर कवि की शुरुआत होती है. ठीक से याद किया जाए तो सबसे पहला शेर हम एक ग्रीटिंग कार्ड में पढ़े थे और पहिले-पहल लिखे भी थे तो दोस्त के लिए लव लेटर में. उधर से तारीफ क्या मिली जैसे हमको चस्का सा लग गया. फिर धीरे धीरे स्कूल कॉपी के आखिरी पन्ना में भारी-भरकम हिंदी-उर्दू शब्दों का कलेक्शन तैयार होने लगा था. सर्किल में इमेज भी भयंकर होने लगा था.
हालाँकि तबतक हम शब्दों के भाव में नहीं उतर पाए थे. मगर फिर एकजोड़ी आँखों ने मुझे शब्दों की गहराई में झांकना सिखा दिया. आह! फिर तो कागज में दो शब्द लिखते ही पूरा फ़िल्मी सिन दिमाग में घुमने लगता. ‘हमने सनम को ख़त लिखा’ गाना मन के बैकग्राउंड में बजने लगता. हम कागज को सीने से लगा चूमने लग जाते. नदीम-श्रवन और समीर के गानों से शब्द चुराने का सिलसिला गुलजार तक पहुंच गया था.
मगर कुदरत मुझे शायद मैच्यूर शायर बनाना चाहती थी. इसीलिए प्रेम के बाकी रंगों से भी जल्द ही मेरा पाला पड़ गया. दिल टूटने की कहानी बाद में. मगर बस इतना समझ लीजिये कि पहली बेवफाई या जुदाई में इंसान जितना रोता है न, माँ-कसम कौनो और गम का मजाल नहीं कि उतना आंसू निकलवा दे. साला आँख था कि मुनिसिपलिटी का फटा पाइप, धार बंद ही ना हो. सबसे बड़ा दिक्कत कि आप किसी से कह भी नहीं सकते. बाप भाई से बोलिए तो और सोंटाइए. दोस्त को क्या बोलते, एक तो खुद ही देवदास बना बैठा था और दूसरा हमारी वाली को आइसक्रीम खिला के स्लैमबुक भरवा रहा था. और ऐसे मे ही मेरी शायरी ने मेरा साथ दिया.
फिर तो दर्द की दास्ताँ लोर की लकीर पर ऐसे लहराने लगी कि महफील दर महफील हम मशहूर होने लगे. मेरे शेर पे जिधर सबसे ज्यादा ताली बजती, हम समझ जाते कि उधर अभी-अभी ही ग़मों की गंगा फूटी है. इन सब के बाद हम भी इन भावनाओं के भंवर में कई बार गोते लगा चुके, कई बार तैरकर वापस आये और कई बार डूब कर शहीद हुए. आप देख रहें हैं न मेरे लिखने में साहित्य का पुट आने लगा है. हमारे गुरूजी कहते थे परिपक्व प्रेमी ही परिपक्व कवि हो सकता है.
खैर कागजों के दौर से हम मोबाइल के दौर में जैसे आये, मेरी डिमांड और बढ़ गयी. sms लिखवाने के लिए. हालाँकि रोमन में लिखे लफ्ज़ कई बार अर्थ का अनर्थ कर जाते थे. अब एक्साम्प्ल हम यहाँ नहीं लिख सकते, आप अपनी कल्पना का सहारा लीजिये. स्टॉक रखने के लिए बस स्टैंड से दस-रुपैयवा शायरी की किताब का दामन थामना पड़ा. मगर मानना पड़ेगा कि उस सस्ते साहित्य में भी विलक्षण प्रतिभा थी. जितने भी ट्रक-बस में शेर पढ़े थे अबतक, सब के सब उसी किताब में थे. पल भर मुझे लगा कि शायद शायर भी शब्दों के सफ़र में निकला एक ड्राईवर ही होता है.
जैसे जैसे हम कॉलेज में पहुंचे, जमाना थ्रीजी फॉर जी होता हुआ तेज़ी से बदलने लगा. जवानी के दहलीज पर जकड़ी जनता बुक में कम और फेसबुक पर ज्यादा समय बिताने लगी. सोशल महफ़िलों की जगह सोशल मीडिया के ग्रुपों ने ले ली थी. फोल्लोवर बढ़ाने की रेस में सबके अन्दर का राइटर करेजा फाड़ के निकलने लगा था. आकर्षक डीपी वाले प्रोफाइल्स से रेस में हम पिछड़ने लगे. लाइक-कमेंट के पैमाने पर हारने लगे.
एक दिन ऐसे ही निराश हताश मोबाइल में डूबे हुए उनकी गली (प्रोफाइल) में दुबारा कदम नहीं रखने की कसम खाते हुए मीलों तक स्क्रॉल कर रहे थे. तभी बिजली चली गयी. चौक पर मुंह-मिजाज फ्रेश करने के उद्देश्य से लॉगिन करने वाले थे कि सड़क में ठोकर खा कर गिर गए. कसम से इतना गुस्सा आया व्यवस्था और सरकार पर! जैसे किसी ने ओझाई-मंतर कर दिया हो, टप-टप टाइप करते रह गए आधे घंटे तक. और फिर नींद की आगोश में चले गए. सुबह सुबह घर के बाहर फिर से दोस्तों की महफ़िल लग गयी थी. हम समाज के मुद्दों को आवाज़ देने वाले नए सोशल मीडिया स्टार हो गए थे. इनबॉक्स में बवाल मचा हुआ था. सब अपने अपने मुद्दे भेज रहे थे. भेजने वालों में कुछ नाम उन खुबसूरत चेहरों के भी थे जिनको देख कर हमने मुस्कुराना सिखा था.
और इस तरह ‘इश्क से शुरू हुई शायरी’ और अब ‘शायरी से इश्क’ में तब्दील हो गयी.
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