Saturday, March 20, 2021

ठेठ_पलामू- ढेंकी

 #ठेठ_पलामू- ढेंकी

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"आ के दू चार चोट मार न देबहीं #नन्हका, भिन्सरहीं ढेंकिया वाला ढाबा लीप-पोत देले हीवा।" आंगन में काँसे के लोटे से बासी पानी को पीते हुए चाचा ने कहा - "खाली हमरे कहे से होतइ माई! एकाध गो आऊ #सवांग के कहबहूँ तब न।" दादी ये बुदबुदाते हुए कि "इन्करा केतना दिन से कहत ही कि लक्षुमणा के बोल कि तनी ढेंकिया के छिलवा देथिन तो हमर बात कोई सुनते नइखे“ नेताइन चाची के घर सवांग खोजने चली जाती है।
दरअसल घर के भारी भरकम ढेंकी को कुशलतापूर्वक चलाने के लिए अनाज पलटने वाली एक कुशल गृहणी के साथ-साथ कम-से-कम दो सवांग और एक #रेंगा को एक साथ लगना पड़ता था। ढेंकी को पैर से चलाने वालों के हाँथों को आराम देने के लिए #ठाट से बंधा हुआ रस्सी लटकता रहता था, बिल्कुल दिल्ली मेट्रो के हैंड हेंगर के जैसा। जब तीन-चार सवांग मिलकर एक साथ इसको चलाते थे, तो आपस में गप-सप के साथ गीत-गाना, #खिसा_कहानी भी होते रहता था, जो ढेंकी की ध्वनि से मिलकर स्फूर्ति और ऊर्जावान परिवेश में बदल जाया करता था। शायद इसलिए ढेंकी को छिलवाने के विचार में दादा नहीं थे,क्योंकि उनको भी घर में ये चहल-पहल खासा पसंद था।
#धनकटनी के बाद तो धान कूटने वालों का दो दिन पहले से छेकनि करल रहता था। मने का कहे ढेंकी चाऊर के भात में उ मीठास था कि खाली माड़े भात एक थरिया सलटा दें। अब पाँच सितारा होटल में #ब्रॉउन_राइस के नाम पर पॉकिट ढीला कीजिएगा न तब उसका महत्व अपने आप बुझा जाएगा। बाकी घर के मुर्गी दाल बराबर तो होबे करता हैं। आज भी ऐसे कई सज्जन मिलेंगे, जो ढेंकी वाला चूड़ा खोजले चलते है।
उच्चतम पढ़ाई-लिखाई, जीविकोपार्जन और जीवनशैली के स्तर को और बेहतर करने के लिए गाँव-घर से धीरे-धीरे एक-एक करके सवांग की संख्या घटते चली गई और उसी अनुपात में ढेंकी को छीलकर कम किया जाता रहा। अब उसे सिर्फ बारह-पंद्रह साल के बच्चे से भी चलाया जा सकता था। लेकिन अब उसकी जरुरत ही कहाँ पड़ती है। आज परम्परागत ढेंकी का स्थान बिजली से चलने वाले कई छोटे-छोटे उपकरणों ने ले लिया है, जो जगह और समय तो बचाते ही हैं रसोई घर की खूबसूरती को भी निखार देते है। आज जहां स्पेस सेविंग आइडिया की बात की जाती है मोबाइल फोन के साथ-साथ फर्नीचर और घर भी स्मार्ट बनाये जा रहे हैं। अब ऐसे परिवेश में कोई कैसे अपने घर में बत्तीस वर्ग फिट का जगह सिर्फ ढेंकी के लिए छोड़ दे।
ढेंकी तो आज भी गाँवों में पड़ा है,पर ना तो वो बात है ना ही भात में वो मिठास, ना तो अब पहले जैसा महौल है और ना ही वो परिवेश। न्युक्लियर होते परिवारों में ना ही सवांग बचे हैं ना ही खिसा-कहानी सुनाने वाली दादी है। अब जहां एक ही कमरे में बैठकर चार प्राणी चैट से बात कर रहे हों, वहाँ एक लकड़ी के तख्ते पर पैर रखकर कोई सिंपल हार्मोनिक मोशन करे, इसकी इच्छा भी कोई आखिर कैसे प्रगट करे।
दैनिक जीवन के हर गतिविधि को पलामू के जन जीवन में एक उत्सव की तरह मनाया जाता है ताकि जीवन में उर्जा और नवीनता बनी रहे. यही कारण है कि डिप्रेशन जैसी बीमारियाँ यहाँ नहीं मिलती. इसीलिए यहाँ हर रस्म-रिवाज के साथ साथ दैनिक क्रियाकलापों के लिए भी गीत बने हुए हैं. कुछ बानगी पेश है यहाँ, विस्तृत चर्चा फिर कभी -
"कहवां के चन्दन काठी, कहवां के कील हे
ढेकियां गड़न भइले बड़ा मुसकिल हे....."
अगर किसी अवसर पर ढेंकी कूटते हैं उसी का गीत गाते हैं. जैसे विवाह के लिए अरिसा या कसार का चावल कूट रहे हो तो विवाह का गीत ऐसे है-
" राजा दसरथ जी के चार रे ललनवा..
अरे चारो के बियाहब एके माड़ो रे ललनवा..."
छठ-एतवार के लिए धान कूट रहे हो तो ये गीत होठो पे चढ़ते हैं.
"नदिया अररवा हो बुनलो मैं राई.....रैनि जीती अइले स्तरन देइ के भाई...."
और अगर ऐसे ही धान कटने के बाद माड़ भात खाने के लिए धान कूट रहे हो तो चौदिशी, बारहमासी, या कोई विरहा या पूरबी गाते हैं. ननद भौजाई हो तो एक दूसरे से चुहलबाजी करते हुए मीठी नोंक झोंक वाली गलियां भी गाते हैं.
" कूँटईत रहली मैं डाल भरी धानवा ..ओहि रे बेरिया न..
ननद ठुनुके अँगनवा...का तुहु ननद हो ठुुनकू अँगनवा...
भेजी रे देहब न अगहन में गवनवा.....भेजी रे देहब न......
आलेख: अवनीश प्रकाश
गीतों के लिए: जया शुक्ला का आभार
May be an image of text that says "ठेठ पलामू' ढेंकी © अवनीश प्रकाश"

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