Thursday, July 28, 2022

महाश्वेता देवी की नजर में 'पलामू स्वयं में भारत है, भारत का आईना है'

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आज छठी पुण्यतिथि है महान साहित्यकार की
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उस दिन महाश्वेता देवी भंडरिया के एक गांव में थीं। उन्होंने एक महिला से पूछा, 'आज का खाया है'। इस पर महिला का जवाब था, 'गेंठी आऊ सरई खईले ही मईंया'। ये दोनों चीजें महाश्वेता देवी के लिए नई थीं। साथ में पलामू के वरिष्ठ पत्रकार रामेश्वरम भी थे। वह अपनी 'दीदी' (महाश्वेता देवी) को बताते हैं, 'ये जंगली कंद-मूल है। पौधों की जड़ी, इस महिला ने इसे उबाल कर खाया है।' इस पर दीदी बोल पड़ती हैं, 'इतनी गरीबी...दर्दनाक।'
आज महाश्वेता देवी की छठी पुण्यतिथि है। बांग्ला की इस महान लेखिका का पलामू से गहरा जुड़ाव था। यूं कहें कि पलामू उनका दूसरा घर था तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। महुआमिलान, मैक्लुस्कीगंज होते हुए वह पलामू आईं और डालटनगंज के एक चौपाल में कहा, 'पलामू स्वयं में भारत है, भारत का आईना है'। उनकी कही हुई यह बात वर्षों तक क्रांति कुटीर के सामने शिवाजी मैदान की दीवार पर लिखी हुई थी।
एक बार महाश्वेता देवी रामेश्वरम जी के यहां आई हैं। मैं तुरंत वहां पहुंच गया। 'चचा हमरा महाश्वेता जी से मिलेला बा' मेरे यह कहते ही वह तुरंत मुझे भीतर के कमरे में ले गए और महाश्वेता जी से कहा, 'ये प्रभात सुमन हैं, छात्र नेता रहे हैं, अभी पत्रकार हैं।' इसके बाद महाश्वेता जी ने थोड़ी देर बातें की और कहा, 'जब मौका मिले तब पलामू पर लिखना।' आज जब भी पलामू पर कुछ लिखता हूं तो महाश्वेता जी और रामेश्वरम जी बहुत याद याते हैं।
प्रो. सुभाष चंद्र मिश्रा टाउनहॉल के एक कार्यक्रम में थे। लोग मंच पर महाश्वेता देवी की तारीफ कर रहे थे। उन्हें यह अच्छा नहीं लग रहा था। जब प्रो. मिश्रा की बारी आई तो उन्होंने कहा, 'मैं आपकी तारीफ नहीं कर रहा हूं। मैं आपके लेखन की तारीफ कर रहा हूं। आप साहित्य, सौम्यता और संघर्ष की संगम हैं। आपका लेखन समाज को नई दिशा दिखाता है, आपकी सौम्यता लोगों को आकर्षित करती है और आपका संघर्ष लोगों को जीने की प्रेरणा देता है।'
महाश्वेता देवी के साथ रामेश्वरम के बाद सबसे ज्यादा समय बिताने का मौका बलराम तिवारी जी को मिला है। पेशे से अधिवक्ता बलराम जी कहते हैं, 'मैं कई गांवों नेऊरा, सेमरा, पनेरीबांध, भंडरिया व न जाने कितने और में दीदी के साथ रहा। वह टूटी-फूटी हिंदी बोलतीं थी। पलमूआ बोली भी समझ जाती थी। जहां नहीं समझ पातीं थी वहां रामेश्वरम जी को माने बताने के लिए कहतीं थी। एक बार एक वृद्ध महिला ने कहा-'का कहूं दीदी उठे-बईठे में ना बनला, इसपर महाश्वेता ने कहा-लाठी रखा करो, उठने-बैठने में भी काम देगा और जानवर व लोगों को भगाने में भी काम देगा।' बलराम जी के अनुसार, 'दीदी, पलामू के लोगों को नई राह दिखा कर गई हैं। अगर वह कम समय के लिए पलामू आतीं तो रामेश्वरम जी शिवाजी मैदान में ही चौपाल लगा देते थे। इस चौपाल में मजदूर, ग्रामीण से लेकर बुद्धिजीवी वर्ग के लोग बड़ी संख्या में मौजूद रहते थे।'
रवींद्र त्रिपाठी वरिष्ठ पत्रकार हैं। उन्होंने महाश्वेता देवी का साक्षात्कार तब लिया था जब वे जनसत्ता, दिल्ली में कार्यरत थे। त्रिपाठी जी बताते हैं, 'महाश्वेता बेबाक और साफगोई से अपनी बात रखतीं थी। उन्होंने झांसी की रानी और भगवान बिरसा मुंडा को आधार बना कर कई रचनाएं लिखीं। इनमें महिला और आदिवासी समाज के संघर्ष की झलक साफ दिखती है। जब उन्हें पता चला कि मैं पलामू से हूं तो आत्मीयता और बढ़ गई। उन्होंने बंधुआ मुक्ति चौपाल से लेकर पलामू की कई घटनाओं का का जिक्र किया।' रवींद्र त्रिपाठी जी ने इस महान लेखिका का इंटरव्यू दूरदर्शन के लिए भी लिया था।
एक बार डालटनगंज के टाउन हॉल में 'जंगल के दावेदार' नाटक का मंचन हो रहा था। यह महाश्वेता देवी की महान कृतियों में से एक है। इस नाटक का रुपांतरण और निर्देशन उपेंद्र मिश्र (वर्तमान में इप्टा के झारखंड महासचिव) ने किया था। उपेंद्र जी के शब्दों में, 'महाश्वेता जी ने मिलने के बाद कहा कि अपनी कृति का नाट्य रुपांतरण विस्मित करने वाला है। मुझे नहीं लगता था कि इसका इस तरह से मंचन भी हो सकता है। नाटक देखकर मुझे बहुत अच्छा लगा, मैं पूरी टीम को बधाई देती हूं।'
सैकत चटर्जी आज रंगमंच और फोटोग्राफी के चर्चित नाम हैं। उन्हें भी रामेश्वरम ने ही महाश्वेता देवी से यह कहते हुए मिलवाया था, 'ई सैकत हव दीदी। फोटो खींच हव, नाटककार हव।' सैकत कहते हैं, 'इस मुलाकात में तो कुछ खास नहीं हुआ। किसी ने मेरे कैमरे से ही उनके साथ मेरी तस्वीर ली और मैं वहां से चला आया। अगले दिन मैं अपनी खींची तस्वीरें लेकर उनके पास पहुंचा। इन्हें देखकर उन्होंने जो प्रतिक्रिया दी वह मेरा उत्साह बढ़ाने वाली थीं। उन्होंने कहा था-तुम्हारे फोटो में तो पूरा पलामू दिखता है।' सैकत 'जंगल के दावेदार' के मंचन के समय वहां मौजूद थे। वह कहते हैं, 'महाश्वेता जी ने नाटक देखने के बाद कहा कि लिखे तो सोचा भी नहीं था कि पलामू के भाई लोग इसका मंचन करेंगे। इस दौरान उन्होंने कहा था कि अन्याय हो रहा है, इसी पर बात की जानी चाहिए।'
शंभू चौरसिया पलामू के वरिष्ठ पत्रकार हैं। वह कहते हैं, 'मैं पहली बार पनेरीबांध में आयोजित बंधुआ मुक्ति चौपाल के समय उनसे मिला था। मिलाने वाले रामेश्वरम जी ही थे। महाश्वेता जी मिलने के बाद लोगों का उत्साह बढ़ातीं थी। पलामू के प्रति उनका गहरा लगाव था जिसे यहां के लोग कभी नहीं भूल सकते हैं।'
महाश्वेता देवी का जन्म 14 जनवरी 1926 को अविभाजित भारत के ढाका (अब बांग्लादेश) में हुआ था। 28 जुलाई 2016 को उन्होंने कोलकाता में आखिरी सांस ली। आदिवासी, दलित, वंचित समुदाय के लिए जीवन भर लिखने वाली और संघर्ष करने वाली इस महान लेखिका को सादर नमन।
तस्वीर डालटनगंज के एक कार्यक्रम की है। इसमें महाश्वेता देवी के साथ रामेश्वरम, प्रो. सुभाष चंद्र मिश्रा, सत्यकेतु संजय, पंकज श्रीवास्तव, डॉ. ब्रजकिशोर पाठक, अनूप तुलस्यान, पंडित विजयानंद सरस्वती और अन्य लोग हैं।
©प्रभात मिश्रा सुमन
वरिष्ट पत्रकार, अमर उजाला नोएडा
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Saturday, July 23, 2022

 #पलामू_के_मक्के_की_रोटी

पलामू के स्वादिष्ट व्यंजनों की लंबी श्रृंखला है।यहाँ की मिट्टी में प्रकृतिप्रदत्त कुछ खास गुण है।जिससे यहाँ पर उत्पन्न सामान्य अनाज से असामान्य व्यंजन तैयार होना यहाँ की खासियत है।
आज लिट्टी-चोखा,घुसका,पुआ,केरा जैसे व्यंजन सिर्फ क्षेत्रीय स्तर पर ही नहीं बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित हो चुके हैं।फिलहाल हम मक्के के बारे में आपकी स्मृतियों के साथ अपनी स्मृतियों को ताजा करेंगे।मक्का,मकई,भुट्टा...ढ़ेरों नाम है इस मोटे अनाज की....।सही मायनों में कहा जाए तो यह मोटा अनाज सिर्फ अपने बेमिसाल स्वाद के कारण ही नहीं बल्कि अपने पौष्टिक गुणों के कारण भी बहुत लोकप्रिय है।हमारे गांव 'सिंगरा' में मक्के की बंपर पैदावार होती है।किसी ने कहा भी था कि सिंगरा 'घाठा और माठा के लिए' पूरे पलामू में जानी पहचानी जगह है।
यूँ तो मक्के से देशी से लेकर विदेशी नाम वाले बहुत सारे व्यंजन बनाये जाते हैं।परंपरागत रुप से पलामू के अधिकांश घरों में भी दो-तीन व्यंजन बहुत खास है।उसमें 'मकई की रोटी' खास है।हमारे यहाँ साल में दो बार मक्के की फसल तैयार होती है।दो प्रकार की 'मकई की रोटियां' भी प्रसिद्ध है।एक तो पौधे से तुरंत तोड़ी हुई दुधिया मकई की रोटी...जिस नर्म ताजे मक्के के दाने में दूध जैसी नमी,मिठास और स्वाद हो,उसे दुधिया मकई कहते है।इस 'दुधिया मकई' के दानों को निखोरकर(निकालकर),भीगे हुए चावल को मिलाकर उसे सिलबट/मिक्सी में पीसकर हल्का पेस्ट बनाकर उसे तवे में फैलाकर स्वादिष्ट रोटी तैयार किया जाता है।जिसे पलामूवासी दही,मट्ठा,गुड़ या फिर सब्जी और चटनी के साथ चाव से खाते हैं।
दूसरे प्रकार की मक्के की रोटी सूखे हुए मक्कों के दाने से बनायी जाती है।मक्के को सुखाकर उसके सूखे हुए सुनहरे दाने को पीसकर उसके आटे की रोटी में जीरा,अजवाइन,मिर्च और स्वादानुसार नमक मिलाकर थोड़ा गाढ़ा गूंथा जाता है।जिससे मोटे लेयर की सोंधी सुगंध वाली स्वादिष्ट रोटी बनायी जाती है।पंजाब-हरियाणा में इस प्रकार के 'मक्के की रोटी और सरसो के साग' की ब्रांडिंग देश ही नहीं विदेशों में प्रसिद्ध हो चुकी है।
सही मायनों में विश्लेषण किया जाए तो पलामू के मक्कों का स्वाद अन्य जगह की अपेक्षा कुछ खास है।अन्य राज्यों की अपेक्षा हम अपने देशी व्यंजनों की ब्राडिंग और मार्केटिंग में भले ही थोड़े पीछे हों लेकिन पलामू की नयी पीढ़ी अब अपने परंपरागत व्यंजनों को राष्ट्रीय/अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित करने के लिए पुरजोर कोशिश कर रही है।
सही कहा जाए तो यहाँ के कृषक बहुत स्वाभिमानी हैं।प्रत्येक वर्ष प्राकृतिक प्रकोप को झेलते हुए और बहुत कम संसाधनों में भी अपने अथक परिश्रम और अटूट जीवनशक्ति से मिट्टी से सोना उगाने का काम करते रहे हैं।राजनैतिक अस्थिरता और असंतुलन की वजह से अन्य राज्यों की अपेक्षा यहाँ फर कृषक/मजदूरों को वह पर्याप्त सुविधाएं नहीं मिल पाती हैं,जिसके वह हकदार है।फिर भी अपने अद्भुत परिश्रम और जागरूकता की वजह से वह अनेकों अनाज उत्पन्न करते रहे हैं।घर की गृहणियाँ उस अनाज में स्वाद भरती हैं।कहा भी गया है कि "परिश्रम का फल ज्यादा मीठा होता है।" यही कारण है कि पलामू के मक्के की रोटी का स्वाद सबसे मीठा होता है। आपने भी इस मक्के की रोटी को चखा होगा,मन भरकर खाया होगा।अपनी स्मृतियों को और नयी जानकारी को कमेंटबॉक्स पर शेयर करेंगे तो हमें बहुत अच्छा लगेगा।
©अजय शुक्ल
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Tuesday, July 19, 2022

पलामू के रविशंकर पांडेय के गीत को भूपिंदर ने थी आवाज

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नशेमन के तिनकों से सपने सजाना, मुश्किल अगर हो नया घर बसाना।
अगर हौसला हो तो चलते चलो तुम, कहीं तो मिलेगा कोई आशियाना।
उस दिन तारीख थी 22 नवंबर 2005 और झारखंड विधानसभा की पांचवीं वर्षगांठ मनाई जा रही थी। महान गायक भूपिंदर सिंह और उनकी पत्नी मिताली सिंह 'गजल संध्या' के मौके पर प्रस्तुति देने के लिए मंच पर थे। मंच पर भूपिंदर बोलते हैं, ’अब मै रविशंकर पांडेय द्वारा लिखित उस गीत को प्रस्तुत करने जा रहा हूं जिसे मैंने 'घरौंदा' नाटक के लिए गाया था। शुरुआत में लिखी गईं पंक्तियां उसी गीत की हैं। जैसे ही भूपिंदर यह गीत गाते हैं, पूरा हॉल तालियों से गूंज उठता है।
यह विधानसभा के अधिकारी और पलामू जिले के बड़कागांव निवासी रविशंकर पांडेय के लिए यादगार मौका था। मखमली आवाज वाले गायक भूपिंदर के निधन के बाद वह काफी दुखी हैं, उनकी यादों में खोए हैं। वह कहते हैं, 'सच पूछिए तो भूपिंदरजी एक महान गायक ही नहीं, महान इंसान भी थे। आज मैं रोम-रोम से उनके लिए श्रद्धांजलि अर्पित कर रहा हूं। मेरी आवाज ही पहचान है... दिल ढूंढता है फिर वही फुरसत के रात दिन... कभी किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता... और एक अकेला शहर में रात में या दोपहर में...जैसे गीतों को आवाज देने वाले भूपिंदरजी को भला कौन संगीत प्रेमी भूल सकता है? उनका निधन हिंदी सिनेमा जगत के लिए एक अपूरणीय क्षति है।'
रविशंकर पांडेय उन दिनों मुंबई में रहते थे। वहीं लेखन करते थे। उनकी कविताएं और संवाद कई नाटकों के हिस्सा रहते थे। वह रहते थे अंधेरी पश्चिम जैसे पौश इलाके में। उनके घर के सामने एक ट्रिनी टाॅट स्कूल था। बच्चों की कक्षा चलने के बाद यह स्कूल दोपहर दो बजे से रात दो बजे तक रिहर्सल के लिए बुक रहता था। मराठी रंगमच से जुड़े अनिल महात्रे और हिंदी रंगमंच से जुड़े राकेश दुबे से इनकी गहरी मित्रता हो गई थी। वह बताते हैं, 'एक संयोग ऐसा हुआ कि प्रधानमंत्री राहत कोष के लिए दो-दो नाटकों का एक साथ रिहर्सल चल रहा था। इनके निदेशक राजेश दुबे थे और प्रोड्यूसर थे डीएन मूंदरा। एक नाटक था शंकर शेष लिखित 'घरौंदा' जिस पर फिल्म भी बन चुकी थी। दूसरा नाटक था 'क्या यही है जिंदगी' । दोनों ही बड़े बजट के नाटक थे। फाइनेंसर भी मूंदराजी ही थे। पता नही किसके दिमाग मे ये बात आई कि इन नाटकों के लिए भी गीत लिखवाए जाएं और किसी बड़े गायक से गवाया जाए। तब मेरे सामने प्रस्ताव आया कि पांडेय साहब आप घरौंदा नाटक के लिए ठीक वैसा ही लिखिए जैसा फिल्म घरौंदा के लिए गुलजार साहब ने लिखा था। बैक ग्राउंड से वह गीत पूरे नाटक में चलेगा। गीत भी डुवेट होना चाहिए जिसे नायक और नायिका दोनों गाएंगे। मूंदराजी ने तत्काल मुझे इस काम के लिए अनुबंधित भी कर लिया। मैंने जो गीत तैयार किया उसके पांच अंतरे थे। मुखड़ा था- "नशेमन के तिनकों से सपने सजाना, मुश्किल अगर हो नया घर बसाना। अगर हौसला हो तो चलते चलो तुम, कहीं तो मिलेगा कोई आशियाना।" गीत की धुन बनाी थी शत्रुघ्न तिवारी ने। भूपिंदर जी ने तो पहले ना कर दिया था। पर गीत की धुन और बोल सुनने के बाद राजी हो गए और रिकॉर्डिंग मे पूरे पांच दिन का समय लगा। रिकॉर्डिंग का काम पूरा होने के बाद भूपिंदर जी ने शत्रुघ्न तिवारी से कहा था- यार तिवारी तूने पैसे दिलवाये एक गीत के और गवा लिए पांच गाने। दरअसल नाटक के सिचुएशन के हिसाब से जो पांच अंतरे थे उसके कारण पूरा गीत 15 मिनट का हो गया जब कि एक गीत अमूमन तीन-चार मिनट का होता है। पर वह गीत ऐसा हुआ कि जिसने भी सुना मंत्र मुग्ध हो कर सुनता रह गया।
जब विधानसभा में भूपिंदर ने रविशंकर पांडेय ने गीत गाया तो उस समय विधानसभा अध्यक्ष इंदर सिंह नामधारी भी पलामू के थे। उनके निजी सहायक अनूप कुमार लाल भी पलामू के थे। अनूप कुमार लाल उस क्षण को याद करते हुए कहते हैं, ‘यह हर पलामूवासी के लिए अत्यंत ही गर्व की बात थी कि भूपिंदर जैसे महान गायक पलामूवासी के गीत को मंच से गा रहे थे। भूपिंदर जी के निधन की खबर के बाद वे सारे दृश्य सामने आ गए हैं।’
पलामू के गीतकार के गीत को आवाज देने वाले महान गायक भूपिंदर सिंह को पलामूवासियों की ओर से श्रद्धांजलि।
©प्रभात मिश्रा सुमन
वरिष्ठ पत्रकार अमर उजाला नोएडा
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Monday, July 18, 2022

श्रावण की पहली सोमवारी

 आज श्रावण की पहली सोमवारी है. पुराने मंदिर में पूजा करते वक़्त जब अर्सों बाद आज ताज़े बेलपत्र देखा तो मन यादों में खो गया. तभी पति से पत्तों पर "राम" लिखने वाली बात कही तो मन उत्साह से चहक उठा, कि हाँ ऐसा ही तो पहले करते थे... पहले यानी सालों पहले. मज़ा आएगा दोहराने में.

राम नाम लिख रही थी तो आभास हुआ, मानो वही पुराने पूजा घर में नन्ही सी मैं, बैठकर लिख रही हूँ. मन यादों से अभिभूत हो गया. ऊपर नज़र उठाई मेहँदी के पेड़ को ढूंढने तो एहसास हुआ कि मैं तो सालों दूर और मीलों दूर हूँ, उन सभी यादों से..घर से..बचपन से..यहाँ !
श्रावण के सुबह की शुरुआत आस पास बजते शिव जी के भजन से होती थी. यानी जो कहानी न मालूम हो वो किसी भजन से पता चल जाता था. कुछ कुछ ऐसे भी किस्से बजते थे जो शायद स्वयं शिव जी को भी नहीं पता होगा.
घर में एक विशाल बेल का पेड़ था,100 वर्ष पुराना,आज भी है. सावन में आस पास के लोगों के साथ हँसते चहकते हम बच्चे भी अपने बाबा संग बेलपत्र तोड़ते थे. बड़ा मज़ा आता था. उन्मुक्तता में हमेशा सोचती थी, एक रिसर्च करुँगी इन सारे औषधीय पौधों पे घर पर ही.
मुझे याद है श्रावण के सोमवारी को सुबह जो पूजा होती थी उसमे सारे बच्चे भी ध्यान से पूजा करके ही स्कूल जाते थे. बड़ी अलग सी सकारात्मकता आती थी पढाई में. पढाई, मूल्य और अनुशासन में बहुत सख्ती होती थी, इसलिए आस्था पर एकाग्रता बनी रही. बाद में बैद्यनाथ धाम, काशी विश्वनाथ जी और कई स्थानों पर गयी तो मन में अटूट छवि बैठ गयी.
सावन में बाबा धाम की याद गेरुए रंग में लिपटी भक्तों की आस्था के साथ आती है. और घर की याद में आते हैं वो छुट्टी के दिन, जब हम पर-बाबा का बनवाया, पुश्तैनी राम मंदिर में अभिषेक करते थे बाबा दादी के साथ. काफी भीड़ होती थी. बहुत ही सुन्दर वातावरण और ढेर सारे प्रफुल्लित लोग मंत्र गाते हुए...
सावन के महीने में बारिश और हरे हरे पत्ते ऊर्जा को और बढ़ा देते थे. स्कूल से उन्मुक्तता के साथ घर आते थे , बारिश में कभी मौका पाकर थोड़े भीगते हुए. वो ख़ुशी न जाने कहाँ खो गयी. सबकुछ वैसा ही है, बारिश भी है पर वो उन्मुक्तता अब और नहीं!
एक बार की बात है. मैं छोटी थी. बचपन के कई यादों में से ये साफ़ साफ याद है. तेज़ बारिश हो रही थी. पेड़ों की कुछ टहनियां तहस नहस हो गयीं. मैं बरामदे से तेज़ बारिश बहुत ध्यान से देख रही थी. अचानक मेरा सारा ध्यान उस नन्हे से बेल के पेड़ पर अटक कर रह गया जो इतनी बारिश और तेज़ हवा में भी पूरी तरह सुरक्षित था. एक भी पत्ता तक नहीं टूटा उसमे से. उस पेड़ को किसीने लगाया भी नहीं था. मेरी एकाग्रता उसपर टिकी रही और बारिश थमते ही मैं उस पेड़ के पास गयी, तो पायी उसमे सारे 6 पत्तों से अधिक वाले बेलपत्र. कोई 7, तो कोई 11. मैं देखकर अचंभित हो गयी. ये तो ईश्वर का आशीर्वाद स्वरुप ही था. पत्ते तो प्राकृतिक हैं, पर वो बचे रहे. शायद मेरी आस्था को और मज़बूती देने के लिए. कुछ बातें विश्वास की होती हैं. मैं वो बेलपत्र शिव जी पर चढ़ा आई.
घर में खासकर बाबा, दादी, माँ, औरों को जब सोमवारी में शिव जी पर जल बेलपत्र चढ़ाते देखती थी तो मेरा मासूम बाल-मन सोच में पड़ जाता था कि क्या सचमे शिव जी को ये अर्पित करने से ख़ुशी मिलती है. पर जिनके पास येसब न हुआ तो ? वो कैसे....? मुझे बड़ी चिंता होती थी ऐसे लोगों की, जिन्हे मैं सड़क पर बेसहारा देखती थी, उन मरीज़ों की जो अस्पताल में तकलीफों में असहाय होते थे. कितनी आस्था होगी उनके अंदर....पर क्या करें.. ? कैसे...? मुझे पूजा करते समय उनसब की याद आती थी और ऐसे अमिट सवाल.. माँ उनसब ज़रूरतमंद लोगों के नाम से संकल्प करवा देती थीं.
बचपन में श्रावण के आते ही परिवार व आस पास की बड़ी बहने घर में लगी मेहँदी के पेड़ से ताज़े पत्ते तोड़कर उसे पीसने और मेहँदी लगाने के उमंग में लग जाती थीं. फिर राखी भी तो आ रहा होता था. तो महिलाओं को हम भी राखी में भाई के नाम मेहँदी कहकर शुरुआत से ही मेहँदी पीसने लगाने में जुट जाते थे. उस मेहँदी के रंग चढ़ना अलग ही मुश्किल उपलब्धि होती थी. और जो चढ़ गया तो उतरना मुश्किल. रंग धीमे धीमे जाते थे. आजकल के कृत्रिम मेहँदी जो तुरंत चढ़े और उतरे, ऐसा नहीं.
मज़ेदार बात ये है कि इन सारी चीज़ों का आनंद तो मैं लेती थी पर मैं मेहँदी कभी नहीं नहीं लगाती थी, बचपन में इनसब का शौक नहीं था. और स्कूल में अनुमति न होना मेरे मन में उमड़ रहे मेहँदी के प्रति लगाव के बावजूद, पसंद न होने के मलाल को कम करता था. अब बहुत अच्छा लगता है मेहँदी लगवाना, पूजा ध्यान से सुख शांति बटोरना और फिर आने वाली राखी में उन्ही आशीर्वाद में ढेरों दुवाएं मिलाकर भाइयों पर न्योछावर कर देना..
आज भी कहीं पुराने सा घर देखती हूँ तो नज़रें बेल के, मेहँदी के पेड़ को ढूंढती हैं. जब घर जाती हूँ तो उन पेड़ों को देखकर अपने हँसता खेलता बचपन याद करती हूँ, जिनके ये पेड़ साक्षी हैं, जिन्होंने अपने आस पास हमें बड़ा होते देखा है.
सचमुच श्रावण का महीना पुराने हरी भरी यादों की कई खिड़कियाँ खोलता है. जाने कहाँ गए वो दिन.! मन सोच में खो जाता है फिर उन्ही यादों से ताज़गी लेकर नयी खिलखिलाती यादें बनाने में जुट जाता है.
अचानक ध्यान आया कि आज पूजा के बाद मैं काफी देर तक पहाड़ों के बीच इस पुराने स्वयंभू मंदिर में बैठी रही. ईश्वर को लाखों धन्यवाद् मुझे फिर से बचपन में ले जाने के लिए. इस पवित्र आभास के लिए.🙏
©रश्मि.
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Sunday, July 3, 2022

#अदरा

 #ठेठ_पलामू-

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अविभाजित बिहार की गौरवशाली कृषि परंपरा का एक महत्वपूर्ण उत्सव है- 'अदरा'। हो सकता है कि नयी पीढ़ी के बहुत लोगों के लिए अदरा एक नया शब्द हो, लेकिन पुरानी पीढ़ी के लोग इस शब्द से भली-भांति परिचित हैं। इस लोकपर्व को मनाने के पीछे बहुत सारी सांस्कृतिक मान्यताएं जुड़ी हुयी हैं और जनमानस के लिए यह परंपरागत महत्व का पर्व है, जिसे हम सैकड़ों साल से मनाते रहे हैं।
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार सत्ताइस नक्षत्रों में 'आद्रा' नक्षत्र भी सम्मिलित है। शाब्दिक अर्थ की दृष्टि से आद्र का अर्थ 'नमी' होता है। ज्येष्ठ महीने में भीषण गर्मी के बाद सूर्य के आद्रा नक्षत्र में प्रवेश करते ही मानसून का आगमन होता है। कृषक संस्कृति में मानसून का विशेष महत्व है। जब तपती हुयी जमीन की प्यास बुझती है, तो धरती माँ,अपने बच्चों के पालन-पोषण और जीवन के लिए अपने गर्भ से अन्न उत्पन्न करने के लिए कमर कस के तैयार हो जाती है।उसके कृषक पुत्रों के लिए यह महोत्सव का समय होता है।
भारतीय संस्कृति की सबसे बड़ी पहचान उसकी उत्सवधर्मिता है। सुख हो या दुख हो, हम उसे उत्सव के रुप में मनाकर अपने जीवन को सहज बनाने में विश्वास रखते हैं। हमारे यहाँ 'अदरा' में दलपूड़ी, खीर, आम, जामुन, मिठाई आदि खाने की परंपरा रही है। आम के साथ जामुन का सामंजस्य या दलपूड़ी या चटकदार सब्जी के साथ मिठाई खाने का न सिर्फ वैज्ञानिक महत्व है, बल्कि यह हमारी साझा संस्कृति को प्रदर्शित करता है। 'अदरा' में खीर बनाने की परंपरा एक पौराणिक कथा से जुड़ी हुई है। एक गरीब धार्मिक महिला थी, उसे 'आदर' नाम का एक पुत्र था, जिसका जन्म आद्रा नक्षत्र में हुआ था। एक बार इसी समय वह खीर खाने की हठ कर रहा था, जबकि उसके घर मे कोई बर्तन नहीं था और भारी बरसात के कारण मिट्टी की हाँडी सूख नहीं पा रही थी। उसकी माँ बैठ कर रोने लगी और ईश्वर को याद करने लगी, तभी उसके सामने एक बड़ा सा घोंघा आया और अपना शरीर त्याग दिया। उस पात्र में आदर की माँ ने खीर बनाया और भगवान को भोग लगाने के बाद अपने पुत्र को खिलाया। इस तरह अदरा माँ-बेटे के प्रेम का भी प्रतीक है। तभी से 'अदरा' में हर माँ अपने बच्चों के लिए खीर बनाती है।
हमारे पूर्वज इस विश्वास के साथ इस त्योहार को खुशी के साथ मनाते होंगे कि अब भीषण गर्मी रुपी दुख का समय समाप्त हो गया। मानसून के प्रवेश के साथ ही वह नयी आशा और नये विश्वास के साथ अपने श्रम से जीवन को एक नया आयाम देने में जुट (तैयार होते) जाते थे।
इस लोकपर्व के संबंध में आपके पास भी बहुत सारी जानकारी होगी।दलपूड़ी, खीर, रसीले आम, मिष्ठान्न आदि के साथ आपलोगों ने भी 'अदरा' मनाया होगा या मनाने वाले होंगे। इस गौरवशाली परंपरा के विषय में कुछ नया बताएंगे, तो हम सभी को बहुत आनंद आएगा। तो इस संबंध में आपकी जानकारी रुपी बहुमूल्य कमेंट का हम बेसब्री से इंतज़ार कर रहे हैं.......
©अजय शुक्ल
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