Friday, March 3, 2023

" बासी रोटी "

भोरे-भोर भूख अपने प्रचण्ड प्रहार से मुझे पराजित करने के लिए प्रयासरत था, रसोई की तलाशी ली जा चुकी थी, फ्रिज का कई बार औचक निरीक्षण कर लिया गया था। डिब्बे में कैद निरीह बिस्कुट की ताबड़तोड़ निर्मम हत्या का सिलसिला चालू हो चुका था। जब आप घर में अकेले हों तो आलस्य भी अपने चरम पर होता है। रात कुछ भी खा कर सोने के वक़्त सुबह के इंतजाम का कहाँ आभास रहता है. सुबह देर तलक स्वप्न लोक से विचरण करने के पश्चात वास्तविकता के धरातल पर पटके जाते हैं, तो पता चलता है कि सुबह ऑफिस के लिए बहुत विलंब हो रहा है। तब स्मृति पहुंच जाती है बचपन के उस मनमोहक दृश्य पर, जब हम बच्चे भोरे भोरे मुँह धोते ही बासी रोटी पर टूट पड़ते थे। एक गिलास चाय में रोटी को रोल बना कर डुबो-डुबो कर खाते थे।
आह! क्या मनोरम युग था वो, जबकि दादी रात को बच्चों की संख्या के हिसाब से गिनती कर के, फिर थोड़ा ज्यादा ही रोटियाँ रात में ही बना देती थी। उन्हें पता होता था कि सुबह चूल्हा जोराने से पहले गृहणी को धार्मिक प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है। कुछ भी ताजा खाद्य सामग्री उपलब्ध होने में कम से कम 8:30 बज जाएंगे। मगर छोटे पेट वाले बच्चे कितना भी पेट भर के खाएं, रात की लंबाई में खाना पेट से छु मन्तर हो ही जाता। फिर सुबह सुबह पेट मे चूहे नहीं, साक्षात बिल्ली ही रेस लगाने लगती। उस ज़माने के बच्चों को बिस्कुट मिक्सचर से ज्यादा लगाव नहीं था। चाऊमिन, पास्ता तब तो हमारे शब्दकोश में भी नहीं था। भूखे आत्मा को संतुष्टि सिर्फ भात रोटी से ही प्राप्त होती थी। हालांकि संतुष्टि की परिभाषा आज भी वही है मेरे जैसे कई पलामू वासियों के लिये।
इन्हीं सब विकट भूखण्ड में प्रचंड भूख को खंडित करने के लिए दादी-नानी ने बासी रोटी नामक व्यंजन का आविष्कार किया था। अब आदत ऐसी लगी कि गर्म रोटी के लिए मार करते शहरी मित्रों को देख दया आती है, भला उन्होंने बासी रोटी के अद्भुत स्वाद को जाना ही कहाँ हैं अब तक। बासी रोटी वो जो रात भर की शीतलता को खुद मे समाहित किए हो तभी तो शक्ति प्राप्त थी उसे जठराग्नि को बुझाने की। बासी रोटी वो, जिसे बनाते वक़्त ही माँ दादी देख चुकी होती थी, उसे खाने वाले चेहरे और उसकी उषा काल की भूख की व्याकुलता और सेवन के बाद की संतुष्टि को। बासी रोटी वो जिसकी कोई फूटानी नहीं, चाहे तो चीनी पानी के साथ भी, नमक लगा के रोल बना के भी, टमाटर की चटनी के साथ भी या फिर अपनी व्युत्पत्ति के सहचर बासी सब्जी और उसके साथ मौजूद प्रचुर रस के साथ भी... सब जगह उतना ही स्वादिष्ट।
बासी रोटी की खोज में हमारा मन व्याकुल हो रहा था। फ्रिज ओवेन धोखा दे चुके थे। ठेठ पलामू पर किसी खाद्य सामग्री का नया पोस्ट भी आ गया था, मेरे कष्ट की आग को रफ्तार देने के लिए। तभी हमने अपने श्रीमती जी को संदेश भेजा कि अब से रोज रात में हमारे लिए बासी रोटी का प्रबंध किया जाए।
ताजे सुबह में बासी रोटी हमे हमारे सुनहरे बचपन की सैर कराती रहे और भोरे-भोरे हम ठेठ पलामू के पोस्ट को चाव से पढ़ते रहें।
आर्टिकल और तस्वीर: सत्यान्वेषी स्वामी
सर्वाधिकार सुरक्षित: ठेठ पलामू
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Thursday, March 2, 2023

लालटेन

 बिजली के तार में लटके इस लालटेन को देख रहे हैं आप। साहब! यह कोई काल्पनिक व्यंग नहीं, पलामू की विद्युतीय सच्चाई है।

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Wednesday, March 1, 2023

" माथा में रंगबाज़ कपरफुटा हो गया है "

 कभी किसी प्रवासी पलमुवा(अर्थात साल में एकाध हफ्ता के लिए पधारने वाले) के साथ बस 15 मिनट बिताइए। आपको पलामू को देखने का एकदम नया नज़रिया मिल जाएगा। हमारे प्रवासी भाई जी का पिछले हफ्ते आगमन हुआ और तब से मेरा अधिकतर समय उनके नॉस्टैल्जिक वाले पागलपन की संतुष्टि में ही पार हो रहा है। किसी भी झाड़-झंखाड़ को अद्भुत प्रकृति का उपहार बताने और यहाँ की मिट्टी को चवनप्राश का दर्जा सुन कर कान पक चुका था।

ये सब जैसे कम नहीं था कि भ्राताश्री की नज़र रास्ते में 'रंगबाज़ कपरफुटा का इलाज' वाले बोर्ड पर पड़ी। अब लग गए इस अजीबो-गरीब सी बीमारी औेर उसका इलाज करने वाले तथाकथित डागडर साहेब की खुफिया तफ्तीश में। छोटा-भाई होने के कारण मुझे ही नकली मरीज़ बनने का सम्मान मिला और प्रवासी भाई साहब पूरी तन्मयता से पूरे वार्तालाप का आनंद लेने में मशगूल थे।
अब आपलोग डागडर साहेब और हमारी वार्तालाप पे एक नज़र डालिये-
"डॉक्टर साहब दिमाग सनसना रहा है, एकबैगे उड़े लगता है, बहुत बथता है।"
- रंगबाजे हईये है, उहे बुझा रहा है"
"चश्मा बनवाये तबो बेस नहीं बुझा रहा है।"
- दवाई बनाना होगा, अइसे नहीं ठीक होगा...
फिर माथा छू के बोला कि
- गाढ़ा(गढ्ढा) हो गइल है माथा में.. पहिले रेंगन के होता था, अब बड़हन में भी होए लगा है..
दवाई बना दे रहे हैं, एक हज़ार लगेगा।
"पैसा नहीं है ओतना जी।"
- पांचो सौ के बना देंगे।
"ओतनो पइसा नइ है जी।"
- अच्छा बाद में बनवा लीजियेगा दवाई, 20 के तेल ले लीजिए ना, तब तक बढ़े नहीं देवेगा.. दिमाग मे कीड़ा होता है.. खात-खात गाढ़ा कर देता है। कुछ नहीं कीजियेगा त फेरा में पड़ जाइयेगा।
लौटते समय भ्राता श्री के चेहरे को देख कर मुझे अंदाज़ा लग रहा था कि नोस्टाल्जिया का भूत कुछ हद्द तक उतर चुका है। इस तरीके की धोखाधड़ी और स्वास्थ्य के नाम पर मूर्ख बना कर लूटने के प्रयास के बाद भाई जी लौटते समय इतना ही बोले " सब तरह का लोग हर जगह होता है। कमाने खाने में बुराई नहीं। लेकिन रंगबाज कपरफुटा के चक्कर में ये लोग सच में जिस मानसिक रोगी को मदद की जरूरत होगी, उस केस को भी खराब कर देता है।"
खैर! ये रंगबाज कपरफूटा नाम की हैरतअंगेज बीमारी जो कि सिर्फ पलामू में पायी जाती है, उसके बारे में गूगल भी कुछ नहीं बोल पायेगा। आप सबों से निवेदन है कि जब भी सरदर्द या कोई मानसिक बीमारी हो, तो ऐसे नीम-हकीम-खतरे-जान के चक्कर में ना पड़ें। कोई ढंग के डॉक्टर से इलाज करवाएं।
आर्टिकल एवं तस्वीर: Sunny Shukla Rohan
सर्वाधिकार सुरक्षित: ठेठ पलामू
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