Tuesday, February 28, 2023

" डेढ़-गोड़िया साईकिल "

डेढ़-गोड़िया जो हमलोग अपने भाषा मे बोलते हैं साइकिल सीखने का दूसरा स्टेज है। कोई-कोई इसको "कैची" भी बोलता है। डेढ़-गोड़िया इसलिए क्योंकि इसमें एक पैर इधर और दूसरा आधा पैर डंडी के बीच मे होता है।
हमलोग के गाँव मे उस समय मोटर साइकिल का चलन नहीं आया था। किसी-किसी के घर मे ही राजदूत या हीरो-हौंडा दिखता था, लेकिन साइकिल लगभग हर घर में यातायात का प्रमुख साधन हुआ करता था। अब तो जबसे ये फाइनेंस का सिस्टम आया है, सब लोग मोटर-साइकिल और कार खरीद रहे हैं और साइकिल बेचारा उपेछित विलुप्ति के कगार पे आ गया है।
अभी की तरह उस समय बहुत प्रकार के साइकिल नहीं हुआ करते थे, जैसे छोटा साइकिल, तीन पहिया वाला बच्चों का साइकिल और अगर होता भी होगा तो गाँव मे देखने को नहीं मिलता था। गाँव मे बुढ़वा साइकिल 24 इंच वाला ही हर घर मे पाया जाता था। रेंजर-वेंजर ले के कोई लइका ट्यूशन मे आ जाता, तो वो आकर्षण का केंद्र बन जाता था।
उस दौर मे साइकिल का सुरक्षा का ख्याल भी काम नहीं रखा जाता था। नार्मल ताला के साथ पाइप वाला ताला अलग से लगाया जाता था। उसका नाम तो नहीं पता, लेकिन स्पोक के बिच मे घुसा के पूट से लॉक हो जाता था। अगर किसी को उसका नाम पता हो तो कमेंट बॉक्स में जरूर बताइएगा।
अभी के लइकन मे जितना ललक मोटर साइकिल सिखने का है, उससे ज्यादा ललक हमलोग को साइकिल सीखने का हुआ करता था। उस समय साइकिल का चाभी प्राप्त कर लेना कोई मिशन से कम नहीं होता था। चलाने भले ना आता हो, लेकिन साइकिल को डुगरा के ले जाने मे ही हमलोग परम आनंद की प्राप्ति कर लेते थे। फिर सिखने का प्रयास का प्रारम्भ होता था, एक गोड़ डंडी के अंदर डाल के पैण्डल पे रखते थे, फिर दूसरा पैर से धकेलते हुए पैण्डल को ऊपर नीचे करते थे। फिर कोशिश करते थे कि दूसरा गोड़ जिससे धक्का दे रहे थे, उसको भी दूसरा पैण्डल पे रख ले। यकीन मानिये नील आर्म स्ट्रांग को चाँद पे पैर रखते हुए इतना खुशी नहीं हुआ होगा, जितना खुशी हमको तब हुआ था, जब दोनों पैर हम पैण्डल पे रख लिये थे। दोनों गोड़ पैण्डल पे रखने के क्रम मे जब गिरते थे, तो सीधे ठेहुना फुटता था। अगर साइकिल सिखने मे आपका ठेहुना ना फूटा तो आप क्या ही साइकिल सीखे।
साइकिल सिखने के बाद भी एक समस्या है अपने घर वालो को यकीन दिलाना की आप सीख चुके हैं। फिर ये साबित करने के लिए आपको जबरदस्ती चला के दिखाना पड़ता है। इस दौर को पार करने के बाद आप घर के लिए आटा पिसवाना, दवाई लाना, कंपाउंडर बुला के लाने जैसा काम के लिए उपयोगी हो जाते हैं। सीट पे बैठ के चलना भी JPSC उत्तीर्ण करने जैसा कठिन होता है जो अगला भाग में मजेदार तरीके से प्रस्तुत करेंगे।
आपके रंग मे रंगते हुए....
✍️ Gyan Singh
सर्वाधिकार सुरक्षित: ठेठ पलामू
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Monday, February 27, 2023

घर का चिप्स, पापड़, अचार

 पलामू में त जाड़ गया नहीं कि गर्मी बरसे लगता है। बसंत फसन्त के कल्चरे नहीं रखे हैं हम लोग आपन यहां। साल-शूटर उतरा नहीं कि डाइरेक्टे पंखा कूलर चालू।

जाड़ के मौसम जइते घाम बोले तो रऊदा बड़ी तेज होये लगता है। आऊ एकरे फायदा उठाके घर की माताएं लगे हांथ चिप्स, पापड़ आऊ सुखौटा बनावे में लग जाती है। वइसे तो सबसे बढ़िया लगता है आलू के चिप्स(उपरे से चाट मसाला छिड़क के बड़हन डूभा से भर के कबो सकार सकते हैं), पर अब नयका दौर में केला, शकरकंद, सूजी, साबुदाना आउ चावल के पापड़ और चिप्स भी बनने लगा है। बहुत से घरों में होली के पहले से ही महिलाएं लग जाती हैं चिप्स, पापड़ बनाने में या फिर होली खतम होत बड़का-बड़का आलू आ जाता है और फिर पसेरी के पसेरी आलू किनाये लगता है।
हालांकि संयुक्त परिवार की समाप्ति और ऑनलाइन मार्केटिंग और नयी महिलाओं की आलसीपन ने इस परंपरा को खासा प्रभावित किया है। अब महिला के वश की बात नहीं कि दैनिक कार्य निबटाकर वो चिप्स, पापड़ भी बना ले। और जब ऑनलाइन घर तक ये प्रोडक्ट आ ही जाते हैं तो कोई भला मेहनत क्यों करना चाहे! पर हमारी पीढी ऐसी पीढ़ी रही जिसने चिठ्ठी भी देखी, लैंडलाइन फोन देखा, स्मार्टफोन देखा, घर में अचार, पापड़, चिप्स और मसाले बनते देखा। हमने लेदरा का सुख भी अनुभव किया, तोसक पर भी सोए और कर्ल ऑन गद्दे भी देखे। हमारी पीढ़ी के बच्चे अपनी मांओं के साथ गर्मी की शुरुआत में अहले सुबह उठकर चिप्स, पापड़, अचार बनाने में उनका हाथ बंटाते थे, उसके बाद स्कूल जाते थे।
घाम होने से पहले ही बाध वाला खटिया घामा में लग जाता, ओकरा पे सूती वाला पातर साड़ी चाहे ओढ़नी बिछा के ओकरे पर चिप्स पसारल जाता था। सबसे मशक्कत था आलू छिलके पानी में डालना आऊ फिर पतला-पतला सांचे में काटना। जितना पतला चिप्स कटता उतना ही बजरूआ दिखता, एकदम कागज जैसा, भकभक उजर! चिप्स काटने के बाद भी चैन नहीं था फिर ओकरा खौलत पानी में डालके तुरंत निकाल के सूप में छानना पड़ता था ताकि पानी गर जाए। नमक, फिटकरी आऊ लालमिर्च वाला इ पानी चिप्स के स्वाद और सुंदरता बढ़ा देता था। फिर पानी निथार के एकरा घामा में खटिया पर डालना होता और पलटना भी पड़ता ताकि दूनो बगल सूख जाए। बढ़िया घाम रहला पर दू तीन दिन में सुखा के एकरा हवा बंद डिब्बा में रखना होता आऊ खिचड़ी के साथे, चाहे पहुना अइला पर चाय के साथे एकरा परोसल जाता था।
कभी सब्जी एके गो रहे तो दालभात पर भी चिप्स छान के खाना के स्वाद बढ़ा देवल जाता था। ससुराल में रहे वलन बेटी को भी माताएं ये सब भेजा करती थीं! एतना पर भी घर के लेडीज लोग कहां मानती थी, फिर आलू, साबुदाना, सूजी, तिल, मसूर, उड़द, चावल के पापड़ भी बनता। ओकरो में पूरा मेहनत था । साबुदाना के गलाके ओकरा चिकन प्लास्टिक पर चम्मच से डालना होता था, फिर दोनों बगल पलट के सुखाया जाता, तब डिब्बे में रखल जाता था। साबुदाना वाला पपड़वा के एगो खास बात था कि गर्म तेल में जइते इ अपन साइज से एकदमे दुगुना-चौगुना बड़ा हो जाता है। थोड़ा बड़ा तो आलू के चिप्स आउ तिलौरी, चरौरी भी होता लेकिन इ त एकदमे आपन आकार बदल देता है, बड़ी बढ़िया लगता था इ सब देख के!
बाजार से चाहे ऑनलाइन मार्केट से केतनो मंगाकर चिप्स, पापड़, अचार खा लें पर घर के बने चिप्स, अचार, पापड़, अदौड़ी की तो बात ही निराली है । इ जो आजकल के बचवन Lays-कुरकुरे के नाम से अगज-बगज मसाला लपेटल चिप्स खाता है न, एकरा से स्वाद में तनको कम नहीं था हमर जमाना के आलू चिप्स। हमनी एकबार में एक एक प्लेट चिप्स अइसहीं खा जाते, आजकल के बचवन जइसन नहीं कि दस, बीस रूपया में आधा हवा भरल चिप्स के पैकेट में ही संतोष करेला पड़े।
बेशक आज की माताएं ज्यादातर कामकाजी हैं, पर जरा भी समय मिले तो एक दो किलो आलू का ही सही, थोड़े से चावल का ही सही घर का चिप्स, पापड़, अचार बनाकर पुरानी परंपरा और अपने हाथों के प्यार को अवश्य जिंदा रखें। चिप्स, पापड़, अचार, सुखौटा, अदौड़ी को लेकर अपनी पुरानी यादें अवश्य शेयर करें।
आर्टिकल एवं तस्वीर: शर्मिला शुमी
सर्वाधिकार सुरक्षित: ठेठ पलामू
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Friday, February 24, 2023

अर्रे आवअ बर्रे आवअ

अर्रे आवअ बर्रे आवअ
नदिया किनारे आवअ
सोने के कटोरे में
दूध भात ले ले आवअ
बाबू के मुंह में घूं ... ट!
एगो आउर छोटे गो के गीत माई सुनावत रहे.
चंदा मामा दूर के
पुआ पकावे गुड़ के
अपने खाए थाली में
मुन्ना के देवे प्याली में
प्याली गया फूट
मुन्ना गया रूस!
जब हमनी लैकइयाँ में रही, तब भी गरमी तो पड़ते रहे! मागिर से घरी के मज्जा कुछ आउ रहे। तब के मज्जा के बात मत पूछूं।
गरमी के दिन में अंगना में खटिया के लाइन लगाके जब हमनी आजी, माई, चाची, बहिनी और छोट भाई के साथे लेदरा बिछाके सुतती, और तखनिए छोटका बचवा आपन राग में रोएला शुरू करतक, तब माई और आजी में से कोई आपन गान कढ़ावे ला शुरू करते हलन...
"अर्रे आवअ बर्रे आवअ
नदिया किनारे आवअ
सोने के कटोरे में
दूध भात ले ले आवअ
ए बाबू के मुंह में घूंट!"
आउर बार बार गईला पर भी नन्हका चुप ना होए तो फिर से एगो आउर छोटे गो के गीत माई सुनावत रहे।
चंदा मामा वाला। एतना सुनते सुनते बाबू मइँयां कब सुत जइतन माइयो के ना पता चलतक।
उ शीतल मन्द मन्द हवा चलइत रहे कि बड़का बड़का आज के कूलर भी फेल रहे। आकाश पूरा साफ रहत रहे। आकाश में दूधिया प्रकाश के छटा आउर लाखों करोड़ों तेज चमचमात तरेंगन। आउर आकाश में एतना रौशनी कि हमनी के बड़ भाई तारा गिने में लगा देवत रहन। आउर हमहुँ इतने हशियार रही कि सच में गिने लगती। फिर का बा, एगो, दुगो, तिनगो, चारगो... चौदहगो, पन्द्रहगो...। तबले कौनो भाई बहिन चूंटी काट देतन! बस सब भुला जइती कि कोन तारा के गिनत रही आउर कोवन के नाही। फिर से शुरू करती। यही करते करते कखनी सुत जइती पतो ना चलतक।
ई रहे प्रकृति से सीधा सम्बाद और प्रदूषण रहित गाँव के खुशनुमा वातावरण। आउर संयुक्त परिवार के अपनापन और रिश्ता!
कल रात के फिर से मन कईलक कि खुला छत पर ही आज सुतल जाए। पर ई का? छत पर तो कोई हयीय नइखे! जब कि हमर परिवार में 18 गो आदमी बड़न। सभे आपन आपन कमरा में कूलर पंखा में बड़न। हम सोचली कि घर के छोटे छोटे लइकन के बोला के आपन बचपन के याद ताजा कर लेऊं आउ नाया नाया बचवन के भी प्रकृति से सम्वाद कराऊं। इहे सोंच के बेटा लड्डू गोपाल आउर भतीजी पीहू परी के छत पर बुलएली। फोल्डिंग बिछाके बचवन के खुला आकाश के तरफ देखेला कहली। लेकिन ई का? 'बर्रे' के तो अते-पते नाहीं! बड़ी ध्यान से देखली त बड़ी मुश्किल से गिने भर तारा देखइलक। आकाश प्रदूषण से भरल रहे, उमस भर रात। आज हम बिन तरेंगन के कइसे रेंगन के सूनाऊं- "अर्रे आवअ बर्रे आवअ..."
चनरमा पर नजर गेलक। चांद में ओतना चमक तो नाहिं रहे, आउ ना पहिले जइसन शीतलता, फिर भी
दुसरका गीतवा माई वाला सुनावेला शुरू कईली- "चंदा मामा दूर के, पुआ पकावे गुड़ के...।"
पर हमार बेटा-भतीजीन के ई कहाँ से मनभावन लगते हलक? उ सब तुरन्ते हमरा से पिंड छोड़ाके कार्टून-सीरियल टीभी में देखे नीचे चल गेलन। अब हम अकेले छत पर आपन बचपन के समय के पारिवारिक सम्बन्ध आउ प्रकृति में बदलाव पर सोचते सोचते नींद में घोलट गेली। पर अचानक ढेरे मच्छर काटे लगलन। तब फिर हमहुँ नीचे कूलर पंखा में आके आपन शरीर के कमरा में कैद कर लेली। पर मन में तो उहे 40 साल पहले के दृश्य चलईत रहे। सोचते सोचते रात के एक बज गइल रहे। फिर जल्दी जल्दी सूते के कोशिश कईली काहे कि सुबह में पौने छौ बजे स्कूल जाए ला रहेला न।
आर्टिकल: दिनेश कुमार शुक्ल
तस्वीर: सन्नी शुक्ला रोहन
सर्वाधिकार सुरक्षित: ठेठ पलामू
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Thursday, February 23, 2023

" नीम्बू की निमकी "

संभवतः शीर्षक पढ़ते हुए आपके मुंह में पानी जरूर आ गया होगा। मेरे हिसाब से नीम्बू की निमकी को अचारों का राजा कहा जाये, तो शायद ही किसी को आपत्ति हो। Old is Gold वाला कहावत भी पहले इसी के लिए बना होगा, काहे कि इ जितना पुराना हो, उतना ही बढ़िया माना जाता है।
आजकल के समय में विधा के अभाव में या फिर अन्य तरह के अचारों के बाजार में सुलभ होने के कारण, यह हाशिये पर गया हुआ मालूम पड़ता है (अगर आपके विचार इससे भिन्न हों तो मुझे ख़ुशी होगी), लेकिन एक समय था कि हम कल्पना भी नहीं कर सकते थे कि किसी के घर में नीम्बू की निमकी न मिले। गाँव में लगभग हर घर में छप्पर/छत/ओटा/अंगना, कहीं न कहीं आपको नीम्बू की निमकी से भरा एक-दो बोइयाम(बोवाम/बोयाम/मर्तबान) जरूर दिख जाता था।
अच्छा, इसे बनाने में भी किसी तरह का कोई रॉकेट साइंस और महारत नहीं चाहिए। चाहे तो समूचे नीम्बू को या फिर जरूरत के अनुसार उसको काटकर बोइयाम में भरिये, नमक डालिए और रहने दीजिये धुप में कुछेक दिन, हो जायेगा कुछ दिनों में तैयार। बाकि मसाले वाले अचारों की तरह कोई विशेष खर्च नहीं, न ही इसके खराब होने का डर। वैसे बाकि सभी अचारों के बारे में एक बात होती थी कि फलना के हाथ का अचार बहुत बढ़िया सुतरता है, हम लगाते हैं, तो भुवा जाता है आदि-आदि। निमकी लगाने में कोई डर नहीं, निश्चिंत हो के लगाइए और परफेक्ट अचार पाइए।
वैसे तो नीम्बू का मसालेदार अचार भी बनाया जाता है लेकिन फिर उसे हम बाकि अचारों की श्रेणी में ही रखेंगे।और नीम्बू की निमकी को एकदम अलग। हमारे बचपन के समय का शाश्वत नास्ता, सूजी का हलवा का सहगामी के रूप में आप इसे जरूर याद करेंगे। सूजी के हलवा के साथ नीम्बू का अचार - बहुत ही स्वर्गिक संयोग होता था, इस खट्टे-मीठे स्वाद का। हमारे मनोनुकूल भोजन न बना हो घर में, तो वैसी स्थिति में मिन्नत कर इसे अपनी थाली में शामिल कराना और फिर चाव से खाना खतम करना लगभग एक नियम सा बना लिया था हमने।
और गुणकारी इतना कि पूछिए मत, पेट सम्बन्धी विकारों के लिए पुदीन-हरा से पहले इसी का बोलबाला था। किसी को अपच हो, धुवईन्धा ढकार आये, पेट खराब हो, सबके लिए नीम्बू का निमकी रामबाण होता था। कुछेक परिस्थितियों में तो इस अचार का पानी पीने (सादे पानी में घोलकर) की सलाह भी मिलती रही थी और ये तो एकदम आजमाया हुआ है कई बार।
एक बात गौर किये होंगे आप कि पुराना वाला नीम्बू के अचार को बीच से काटिए तो छिलके के अन्दर वाला हिस्सा पककर एकदम सुनहले रंग के शीशे की तरह का हो जाता था और मजे की बात तो यह कि लईकाई में हमलोग सोचते थे कि शायद शीशा इसी से बनता होगा और फिर कई तरह की कल्पना कि दुनिया में जितना शीशा है (मतलब हमलोग जितना देखे थे) उसको बनाने में कितना निमकी बनाना पड़ा होगा, कौन लगाता होगा इतना निमकी और पता नहीं क्या-क्या आला-गाजा।
एक बात और लगभग सभी ऑनलाइन प्लेटफार्म पर मैंने देखा कि नीम्बू की निमकी उपलब्ध है, सुन्दर डिब्बा में पैक करके और अंग्रेजी में इसका वर्णन करके इसको हज़ार रुपये किलो तक बेचा जा रहा है। क्या कहें, हज़म नहीं हुवा एकदम, भला ऐसा क्या कर दिए आप इसमें, कौन सा घीव लगा के बनाये हैं। वैसे भी, हम तो अपने लिए नीम्बू का अचार लगा लिए हैं, बेचते रहिये आप।
आप भी अगर नीम्बू के अचार के शौक़ीन है, तो फिर कमेंट बॉक्स में जरूर साझा कीजिये अपनी खटमीठ यादों को।
आर्टिकल: ऋतेश कुमार
सर्वाधिकार सुरक्षित: ठेठ पलामू
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Tuesday, February 21, 2023

अगुआ

 अगुआ, मतलब बेटी की शादी के लिए लड़के वाले के घर आने वाले मेहमान। आज भी अगुआई की प्रथा प्रचलित है, पर अब यह बीस-तीस साल पहले की तरह नहीं होता। तब न तो आवागमन के इतने साधन थे और न ही तेज गति से संचार के साधन। यदि बेटी की शादी करनी है, तो न जाने लड़के की खोज में पिता के कितने जोड़ी जूते घिस जाते थे। इस अगुवाई के पहले पिता, अपने पुराने सगे संबंधियों या इष्ट मित्रों से अपने बेटी के लिए योग्य वर का पता करते थे। अधिक से अधिक जानकारी प्राप्त कर उस लड़के के घर जाते थे। साथ में वह व्यक्ति भी होता था, जिसने पता बताया हो या उस लड़के वाले के घर से परिचित हों। साथ ही एक दो ऐसे व्यक्ति भी साथ होते, जो शादी व्याह तय कराने के एक्सपर्ट माने जाते थे। इस प्रकार चार पाँच लोगों की टोली कभी लड़के के घर वालों को सूचना दे कर या कभी-कभी अचानक निकल पड़ती थी, अगुवाई के लिए।

अगर सूचना है, तो लड़के वाले हैसियत के अनुसार थोड़ी बहुत तैयारी कर लेते थे, जैसे घर में चीनी, आटा, घी आदि मंगा कर रखा जाता। बिछावन वगैरह की साफ सफाई या व्यवस्था, दरवाजे की लिपाई इत्यादि काम कर लिए जाते थे। पर मुश्किल थोड़ी बढ़ जाती थी, जब अगुआ बिना सूचना अचानक धमक पड़ते थे। घर की औरतें कुछ ज्यादा ही परेशानी महसूस करने लगती थीं, तब जब घर पर कोई मर्द उपस्थित नहीं होते। वे पड़ोस से किसी युवा या बच्चे को बुला कर उन्हें बैठाने का प्रबंध करवाती और शर्बत-पानी का इंतजाम करती। शर्बत के लिए नीबू न होने पर जीरा या सौंफ पीस कर डाल दिया जाता। फिर बारी आती नास्ता का, तो सबसे बेहतर माना जाता था आटा का हलवा जिसे मोहनभोग भी कहा जाता है। फिर हलवा के लिए जितने लोग, उतनी तस्तरी का इन्तजाम। यदि कम पड़ा तो फिर पड़ोसी के यहाँ से मंगवाना, उसी पड़ोस के लड़के से। तब तक मर्द भी खेत खलिहान से घर पहुँच ही जाते थे। फिर हलवा की तस्तरी में आम के अचार के साथ दालमोट परोस दिया जाता था।
अब जो अगुआ होते, वे बड़ी बारीकी से हलचल को नोट करते कि शर्बत आने में कितनी देर लगी। हलवा कैसा बना है और एक जैसे बर्तन में परोसा गया कि नहीं। घर की सफाई कैसी है। आखिर बेटी को किसी सम्पन्न खाते-पीते घर में ही तो दिया जा सकता है। अब घर के मुखिया के साथ अगुआ से बात शुरू होने का समय आ जाता। घर के मुखिया शुरू करते, "रउआ सब आपन परिचय दिहुँ और रउआ सब के इहाँ के बारे में कइसे पता चलल?"
अब अगुआ में से एक जो उन्हें ले कर आये थे, बोलना शुरू करते।
"हमार नाम फलां बा और रहे वाला फलां गाँव के ही। रउआ हमरा त नई जानब, पर हमार बाबुजी के जानत होखब। उनकर नाम बा --------------- । उनकर ममहर उहे गांव में राउर ममहर बा। उनकर नाना ---------- रहन।"
"अच्छा-अच्छा। अरे उ त ओने के नाता से हमार मामा भइलन, आउर तू तब त हमर भाई हो गइले। कह हमार मामा के का हाल-चाल बा, कह।"
"वइसे उमर त होइए गइल हइन, लेकिन अभी टन-मने बड़े। अभी आपन क्रिया-करम सब अपने से कर ले वले"
और फिर बाकी लोगों के बारे में वही बारी बारी परिचय कराते हुए आने का कारण तक बता देते।
"हाँ, हाँ, शादी बियाह त लगावे से होइबे करला। अब तू जब ले के इनका आइल बड़, त सोचहीं के पड़ी। वैसे दो तीन गो अगुआ आइल रहन, पर अभी तक सोचले ना रही। सबमें कोई खराबी त ना रहे और बढ़िया तिलक दहेज भी देत रहन, पर हमरा कोई खास मन नाहीं भरल।हमरा त लईकी बढ़िया चाही, जे घर के काम धंधा कर सके और मेल मिलाप से रहे। दहेज-वहज त बाद के चीज बा। जेतना मिलला, उ बचे ला थोड़े, ओकरा से बेसिये खर्चा हो जाला। सब पइसा के बर्बादी बा। असली चीज लड़किये बा। कुछ लईकी के बारे में बताऊँ, कुछ पढ़े लिखे जानला की नाहीं। घर के काम-काज करला की नाहीं। देखे-लेखे में कइसन बा। फिर बढ़िया लागी त विचार करब।"
इस तरह बात-चीत का सिलसिला शुरू हो जाता और दोनों पक्ष एक दूसरे को संतुष्ट करने के लिए अपने को श्रेष्ठ सिद्ध करने की होड़ में लग जाते। अब सांझ होने को है। घर के मुखिया कहते हैं, "हम रउआ सब के बात से संतुष्ट ही। बाकी बात बाद में होई। अब सांझ होवे के बा। अब चलल जाव, खेत-खलिहान देखल जाव और दिसा-मैदान भी हो लेल जाई।"
और सब खेत की ओर निकल पड़ते, हाथ में एक-एक लोटा ले कर। पानी खेत के कुआं से भरा जाएगा। रास्ते भर खेती बारी के बारे में बताते हुए अपना दो हर बैल, गाय, भैंस भी दिखाया जाता, खलिहान और पुआल का ढेर की ओर इशारा कर बताया जाता कि कितना धान का खेत है और कितना धान पैदा हो जाता है, ताकि अगुआ को यह न लगे कि पैदावार बढ़ा-चढ़ा कर बताया जा रहा है। साथ में यह भी कहा जाता कि एतना पैदा पैदाइश हो जाला कि भगवान के कृपा से कभी खाने की कमी नहीं होती। खा पी कर इतना बच जाता है कि बेच कर बाकी सब काम चल जाता है। बस एक ही ई इच्छा है कि दोनों बेटे बढ़िया से पढ़-लिख जाएं। वैसे इतना तो 'अरज' ही दिए हैं कि नौकरी-चाकरी नहीं भी करेंगे तो कभी भूखे नहीं रहेंगे।
अब दिसा - मैदान के बाद वापस द्वार पर आ गए हैं। एक राउंड चाय भी चल चुका है। इस बीच अगुआ के खबर सुन गाँव के दो तीन और लोग भी आ गए, या संदेश भेज बुला लिए गए हैं चाय पीने के बहाने। बात-चीत का अगला दौर शुरू होता है। लड़के के पिता से गाँव बुजुर्ग पूछते मेहमानों की जानकारी लेते हैं और बातचीत कहाँ तक पहुँची, यह जानने की जिज्ञासा प्रकट करते हैं। सारी बातें सुनने के बाद कहते, अगुआ से पूछते हैं कि सबकुछ देख-जान ही लिए, तो रिश्ता पसंद है कि नहीं। लड़की के पिता अब बोलना शुरू करते हैं।
"हमरा तो सब कुछ पसंद बा, अब त इहाँ का के बतावे ला बा कि हमार रिश्ता पसंद बा कि नई?"
"ना, ना, हमरा आउ का चाही। लड़की कामकाजी बा, मैट्रिक तक पढलो बा। फिर रिश्ता पसंद काहे न आई? हमरो ई रिश्ता पसन्दे बा।"
अब बुजुर्ग मध्यस्थ बन कर रिश्ता करवाने का श्रेय लेने को सोच कर शुरू हो जाते हैं, "जब दुनों के मन भरिए गइल बा, तो आगे लेन-देन के बात भी करिये लेवे के चाही। काहे कि एकरा बिना तो रिश्ता पक्का होइ नाहीं। कुछ एकरो पर बातचीत होईल बा कि नाहीं।"
"नाहीं, अभी त बात नइखे भईल। लेकिन हम निराश ना करब। बेटी के देवे के शौक हमरो बा।लेकिन कुछ बतावल जाई और हमरा शक्ति भर होइ, तो जरूर देवब।"
"ई त अपने नहींए बोलिहें। आखिर रउरो तो कुछ बताईं, त इहो आपन कुछ कहीहें"
इस बीच लड़के के पिता बुजुर्ग को कुछ इशारा कर, कुछ बहाना बनाते हुए अंदर चले जाते हैं।
फिर बुजुर्ग कहते हैं, " ई तनी ई सब मामला में लजालू हथ, हमरा से कुछ कहूँ, कुछ ओकरे में ऊपर नीचे कर करा के रिश्ता पक्का करवा देब।उ हमार बात त नाहीं उठहीहें।" लड़की के पिता अपनी औकात के अनुसार प्रस्ताव रख देते हैं। पिता के आने पर बुजुर्ग उन्हें एक तरफ ले जा कर प्रस्ताव को बताते हैं। फिर आ कर कहते हैं "ऊ तैयार बाड़े, बस रउआ थोड़ा सा और बढ़ जाऊं। बेटी वाला के थोड़ा हिम्मत देखावे के पड़ला।"
लड़की के पिता ने हिम्मत की और प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया। फिर बारी आई लड़के को कुछ देने की। लड़का कॉलेज में साइंस का स्टूडेंट है। उसे भी खुश रखना जरूरी है। अब बुजुर्ग फिर बात आगे बढ़ाते हुए कहते हैं, " बासन-बर्तन त अंगना के शोभा होखला। उ सब त रउआ जे समझ में आई, देबे करब। लेकिन लड़का के आजकाल डिमांड रह ला साईकल, घड़ी आउ बाजा ( ट्रांज़िस्टर)के। लोग भी देख ले कि लड़का के का का मिलल।
त हमरा तरफ से तीनों चीज दे देब।आउर अब शादी पक्का समझूँ।"
लड़की के पिता ने यह बात भी मान ली।
तब बुजुर्ग ने लड़के के पिता से कहना शुरू किया, "अब त सब डिमांड पूरा करेला तैयार ही इहाँ का।तब अब शादी ला हाँ कर द। "
"हमरा तरफ से हाँ बा। लेकिन तनी लइकवा के माई से भी पूछ लिही ला।" और यह कह कर अंदर चले जाते हैं, लड़के के पिता। फिर कुछ देर में बाहर आ कर कहते हैं , " लइका के माइयो के रिश्ता पसंद बा। उ कहत बाड़ी की बर्तन तनी ठोस चढ़ाइहें, न तो अंगना में जग हंसाई हो जाई। जाके कहूँ कि समधिन के एगो डिमांड बा लोहा के अलमारी भी दे दीहें।आउ बियाह पक्का कर देउँ।"
अब बात समधिन को खुश करने की है। लड़की के पिता के औकात से अब बाहर हो रहा है। पर बेटी को तो सास के साथ ही रहना है, तो यह बोझ भी उन्होंने ने सहन कर लिया।
और तरह बियाह पक्का हो गया। रात को कच्ची खाना (भात, दाल, कई तरह की तरकारी, तिलौरी, अदौरी और घी) परोसा गया।खाने के बाद अगले दिन पक्की भोजन (पूड़ी, धुस्का, दुधौरा, केरा-दुधौरी) कर के ही जाने की बात हुई, क्योंकि पक्की भोजन का मतलब शादी का पूरी तरह पक्की हो जाने की बात की पुष्टि हो जाती है। और हाँ, पक्की भोजन के समय गारी भी गाई जाएगी।
उसके बाद लड़का आ कर पवलगी करेगा। होने वाले ससुर उसे कुछ पैसे देंगे, जिसे बरछिया (छेंका) मान लिया जाएगा।
मैंने ने यह लेख अपने बाबुजी से बात कर के साठ-सत्तर के दशक में उनके गांव और आस पड़ोस के अनुभवों को साझा किया है। कई अन्य लोगों और जगहों पर तरीका अलग होगा, पर एक बात सामान्य जरूर होगी कि दहेज सभी जगह किसी न किसी रूप में मौजूद था और आज भी है। मैंने जान-बूझ कर किसी ऐसे शब्द का प्रयोग नहीं किया है, जिससे लेख में किसी जाति का बोध हो।
हाँ, एक बात का उल्लेख नहीं किया है, लड़की देखने का। तब सचमुच हमारे गांव में लड़की देखने की प्रथा नहीं थी। जैसा बताया गया, मान लिया जाता था कि लड़की अच्छी ही होगी। बाकी लड़का का भाग्य।
आर्टिकल: Sunny Shukla Rohan
सर्वाधिकार सुरक्षित: ठेठ पलामू
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Monday, February 13, 2023

इश्क से शायरी तक

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‘सोलहवां साल का पहुंचना, होठ के ऊपर रोयें की गहरी रेघारी बनना शुरू हो जाना और फिर चुम्बक से भी ज्यादा मजबूत प्यार के आकर्षण बल में खुद को बहकते हुए महसूस करना, जीवविज्ञान में डोपेमाइन, ऑक्सीटोसिन, एण्ड्रोजन, एस्ट्रोजन वाले पन्ने पे कुछ ज्यादा ही ठहरना और कुछ चेहरे को देखते ही अपने दिल को इन होर्मोनो के झरने में भीगते हुए लहस जाना, किसी और के मुंह पे उसका नाम आते ही मरने-मारने पे आमदा हो जाना, किसी के जिक्र मात्र से सबकुछ अच्छा सा लगने लगना, या फिर भविष्य के सारे सपनों में किसी के सुनहरी तस्वीर को सजाने लग जाना' ये तो थी प्रेम की फिलोसोफी. अब हम आपबीती पे आते हैं.
दरअसल ये बिलकुल सच है कि आदिकवि के टाइम से ही प्रेम और वियोग रस से ही हर कवि की शुरुआत होती है. ठीक से याद किया जाए तो सबसे पहला शेर हम एक ग्रीटिंग कार्ड में पढ़े थे और पहिले-पहल लिखे भी थे तो दोस्त के लिए लव लेटर में. उधर से तारीफ क्या मिली जैसे हमको चस्का सा लग गया. फिर धीरे धीरे स्कूल कॉपी के आखिरी पन्ना में भारी-भरकम हिंदी-उर्दू शब्दों का कलेक्शन तैयार होने लगा था. सर्किल में इमेज भी भयंकर होने लगा था.
हालाँकि तबतक हम शब्दों के भाव में नहीं उतर पाए थे. मगर फिर एकजोड़ी आँखों ने मुझे शब्दों की गहराई में झांकना सिखा दिया. आह! फिर तो कागज में दो शब्द लिखते ही पूरा फ़िल्मी सिन दिमाग में घुमने लगता. ‘हमने सनम को ख़त लिखा’ गाना मन के बैकग्राउंड में बजने लगता. हम कागज को सीने से लगा चूमने लग जाते. नदीम-श्रवन और समीर के गानों से शब्द चुराने का सिलसिला गुलजार तक पहुंच गया था.
मगर कुदरत मुझे शायद मैच्यूर शायर बनाना चाहती थी. इसीलिए प्रेम के बाकी रंगों से भी जल्द ही मेरा पाला पड़ गया. दिल टूटने की कहानी बाद में. मगर बस इतना समझ लीजिये कि पहली बेवफाई या जुदाई में इंसान जितना रोता है न, माँ-कसम कौनो और गम का मजाल नहीं कि उतना आंसू निकलवा दे. साला आँख था कि मुनिसिपलिटी का फटा पाइप, धार बंद ही ना हो. सबसे बड़ा दिक्कत कि आप किसी से कह भी नहीं सकते. बाप भाई से बोलिए तो और सोंटाइए. दोस्त को क्या बोलते, एक तो खुद ही देवदास बना बैठा था और दूसरा हमारी वाली को आइसक्रीम खिला के स्लैमबुक भरवा रहा था. और ऐसे मे ही मेरी शायरी ने मेरा साथ दिया.
फिर तो दर्द की दास्ताँ लोर की लकीर पर ऐसे लहराने लगी कि महफील दर महफील हम मशहूर होने लगे. मेरे शेर पे जिधर सबसे ज्यादा ताली बजती, हम समझ जाते कि उधर अभी-अभी ही ग़मों की गंगा फूटी है. इन सब के बाद हम भी इन भावनाओं के भंवर में कई बार गोते लगा चुके, कई बार तैरकर वापस आये और कई बार डूब कर शहीद हुए. आप देख रहें हैं न मेरे लिखने में साहित्य का पुट आने लगा है. हमारे गुरूजी कहते थे परिपक्व प्रेमी ही परिपक्व कवि हो सकता है.
खैर कागजों के दौर से हम मोबाइल के दौर में जैसे आये, मेरी डिमांड और बढ़ गयी. sms लिखवाने के लिए. हालाँकि रोमन में लिखे लफ्ज़ कई बार अर्थ का अनर्थ कर जाते थे. अब एक्साम्प्ल हम यहाँ नहीं लिख सकते, आप अपनी कल्पना का सहारा लीजिये. स्टॉक रखने के लिए बस स्टैंड से दस-रुपैयवा शायरी की किताब का दामन थामना पड़ा. मगर मानना पड़ेगा कि उस सस्ते साहित्य में भी विलक्षण प्रतिभा थी. जितने भी ट्रक-बस में शेर पढ़े थे अबतक, सब के सब उसी किताब में थे. पल भर मुझे लगा कि शायद शायर भी शब्दों के सफ़र में निकला एक ड्राईवर ही होता है.
जैसे जैसे हम कॉलेज में पहुंचे, जमाना थ्रीजी फॉर जी होता हुआ तेज़ी से बदलने लगा. जवानी के दहलीज पर जकड़ी जनता बुक में कम और फेसबुक पर ज्यादा समय बिताने लगी. सोशल महफ़िलों की जगह सोशल मीडिया के ग्रुपों ने ले ली थी. फोल्लोवर बढ़ाने की रेस में सबके अन्दर का राइटर करेजा फाड़ के निकलने लगा था. आकर्षक डीपी वाले प्रोफाइल्स से रेस में हम पिछड़ने लगे. लाइक-कमेंट के पैमाने पर हारने लगे.
एक दिन ऐसे ही निराश हताश मोबाइल में डूबे हुए उनकी गली (प्रोफाइल) में दुबारा कदम नहीं रखने की कसम खाते हुए मीलों तक स्क्रॉल कर रहे थे. तभी बिजली चली गयी. चौक पर मुंह-मिजाज फ्रेश करने के उद्देश्य से लॉगिन करने वाले थे कि सड़क में ठोकर खा कर गिर गए. कसम से इतना गुस्सा आया व्यवस्था और सरकार पर! जैसे किसी ने ओझाई-मंतर कर दिया हो, टप-टप टाइप करते रह गए आधे घंटे तक. और फिर नींद की आगोश में चले गए. सुबह सुबह घर के बाहर फिर से दोस्तों की महफ़िल लग गयी थी. हम समाज के मुद्दों को आवाज़ देने वाले नए सोशल मीडिया स्टार हो गए थे. इनबॉक्स में बवाल मचा हुआ था. सब अपने अपने मुद्दे भेज रहे थे. भेजने वालों में कुछ नाम उन खुबसूरत चेहरों के भी थे जिनको देख कर हमने मुस्कुराना सिखा था.
और इस तरह ‘इश्क से शुरू हुई शायरी’ और अब ‘शायरी से इश्क’ में तब्दील हो गयी.
आर्टिकल: Sunny Shukla Rohan
सर्वाधिकार सुरक्षित: ठेठ पलामू
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