सरस्वती पूजा के प्रसाद मे तीन चार गो आइटम ऐसा होता है जिसको हमलोग पहिला बार 'नेवान' करते हैं। जैसे कि गाजर, मटर, #बैर। अब आप कोई भी हमीन के पूजा पाठ देख लीजिए, नियम के हिसाब से ऊ सीजन मे पाया जाने वाला फल-सब्जी या मिला जुला के कहा जाए तो खाए-पीए वाला आइटम, सब का विशेष ध्यान दिया जाता है, जैसे कि संक्राति मे लाई-तिलकूट, बीसो में सत्तूआ। खैर इस बार हुआ कि संजोग ऐसा बना कि एक दिन गए सब्जी लाने आऊ दिख गया बैर, अब केतना कन्ट्रोल किए सोचे जाड़ा है खांसी होगा, तो सरस्वती पूजा आने मे देर है। इस तरह का तमाम चीज़ दिमाग में चल रहा था, तब तक टेस्ट करने के नाम पर चार-छौ बैर तो खाइए लिए थे। बेचे वाली भाऊजाई पूछी केतना तौल दे, अब टेस्ट कर चुके थे स्वाद भी हइये था, रहा नहीं गया, पाव भर सोचते-सोचते आधा किलो लेंईए लिए। रास्ता भर खाए, घरे भी खाए, फ्लैट मे बिया कहा थूकते, इसलिए छोटका भाई के साथे मुँह से बगल वाला बाउंड्रीवाल पार पहुचाने का कंपटीशन भी लगाए। और हमेशा कि तरह खांसी सर्दी भी करवाये जिसका सजा अभी तक भुगत रहे हैं।
खैर अब जे कहिये समय के अभाव या गांव मे कम रहे के मौका या बैर के पेड़ के कमी, लेकिन बैर भी कहीं खरीद के खाए वाला चीज़ है। सोचिए के ऐसन बुझाता है जैसे कोई कहे दुधौरी आऊ पीठा रेस्टोरेन्ट मे जा के खाए जैसा। अरे जब तक दु चार बार लेबदा ना फेंके, आठ-दस ढेला ना फेंके, दु चार गो खपड़ा ना फूटे, एकाध गो के कपार ना फूटे, तब तक बैर खाए मे का मज़ा कहाँ आता है। हर एक गांव मे बैर के पेड़ केतना हो जाए, लेकिन स्वाद उहे होता था जहा से झाड़ना और चुराना ओतने मुश्किल। चाहे तो केकरो अईसन खड़ूस #आमदिन बारी मे जे ना तो अपने खाता ना दूसर के झाड़े देता। नाम ले लेंगे तो झूठों के लड़ाई हो जाएगा, इसलिये आपलोग भी मने-मन अपना गांव वाला के #ईयाद कर गरिया सकते हैं। या ना तो आइसा जगह जहां खूब कांटा वाला झुर्र #घोरानी रहे। और बैर जैसे ही झाड़ते ना अवस के ओकरे मे जा के 'पकलका' गिरता था। अब लईकन फिर कांट गड़े कपड़ा फाटे के चिंता किए, बिना हाथ डाल के घुस के एक-एक बैर निकाल के खाते थे। कुछ-कुछ बैर तनी देरी से पकता था, तो होली बाद भी जब दुपहरिया मे #मुड़कटवा के डर से सब के सूतेला कहल जाता था, तब भी जा के झाड़ते थे। मिला जुला के जे कहिये बैर खाए के मजा उहे में था, हमीन के बारी में भी बैर था, लेकिन घरे वाला में मजा कहाँ आता है। बाकि लईकन हमार बारी मे तो हम केकरो आऊ के बारी मे।
कांचा तो कांचा पकल के बाद सुखल बैर भी मिल जाए, तो समझिए सब खजूर छोहाड़ा फेल है। हमरा इतना पसंद था कि दादी लकड़ी बेचे आती थी, ऊ सब से कह के मंगवा के और सूखा के जोगा के रख देती थी। दादी के बाद माई-चाची यहां तक कि अब बहिन लोग भी जानती हैं कि हमको बैर इतना पसंद ,है इसलिए स्पेशल सूखा के रख देती है। बैर के खटाई अपने आप मे अमृत वाला आइटम है, बाद मे ना #आमचूर #गुरुचेला यही सब के पैक कर के बेचना शुरू किया ना, तो हमीन तो घर ही वाला पाउडर से काम चाला लेते थे। केतना लाईकन तो उहे खटाई से खैनी खाने का नाटक भी करता था, ई अलग बात है कि ससुरा सही मे सब खैनी खाने लगा हमीन 2-4 गो के छोर के। हमर गांव मे शंखपति सिंह के, पटन सिंह के, घर के बगल वाला रोशना के और इगो जंगल मे नाहर पास पपुआ के बैर बड़ी स्वाद था। हमरा स्कुल मे जंगल दन से आने वाला दोस्त सब भी एक से एक बैर ला के खिलाता था। अब लिखते-लिखते मन करने लगा बैर खाने का और सबसे बड़ा दुःख यहां होता भी नहीं है, खैर कह देते हैं घरे फोन कर के कम से कम सूखा के तो रख देंगे। तब अब आपलोग भी बताइये आपके गांव मे केकर बैर फेमस था और का का कांड किए थे ई बैर के चक्कर मे।
आर्टिकल: Anand Keshaw "देहाती"
सर्वाधिकार सुरक्षित: ठेठ पलामू

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