अर्रे आवअ बर्रे आवअ
नदिया किनारे आवअ
सोने के कटोरे में
दूध भात ले ले आवअ
ए बाबू के मुंह में घूं ... ट!
एगो आउर छोटे गो के गीत माई सुनावत रहे.
चंदा मामा दूर के
पुआ पकावे गुड़ के
अपने खाए थाली में
मुन्ना के देवे प्याली में
प्याली गया फूट
मुन्ना गया रूस!
जब हमनी लैकइयाँ में रही, तब भी गरमी तो पड़ते रहे! मागिर से घरी के मज्जा कुछ आउ रहे। तब के मज्जा के बात मत पूछूं।
गरमी के दिन में अंगना में खटिया के लाइन लगाके जब हमनी आजी, माई, चाची, बहिनी और छोट भाई के साथे लेदरा बिछाके सुतती, और तखनिए छोटका बचवा आपन राग में रोएला शुरू करतक, तब माई और आजी में से कोई आपन गान कढ़ावे ला शुरू करते हलन...
"अर्रे आवअ बर्रे आवअ
नदिया किनारे आवअ
सोने के कटोरे में
दूध भात ले ले आवअ
ए बाबू के मुंह में घूंट!"
आउर बार बार गईला पर भी नन्हका चुप ना होए तो फिर से एगो आउर छोटे गो के गीत माई सुनावत रहे।
चंदा मामा वाला। एतना सुनते सुनते बाबू मइँयां कब सुत जइतन माइयो के ना पता चलतक।
उ शीतल मन्द मन्द हवा चलइत रहे कि बड़का बड़का आज के कूलर भी फेल रहे। आकाश पूरा साफ रहत रहे। आकाश में दूधिया प्रकाश के छटा आउर लाखों करोड़ों तेज चमचमात तरेंगन। आउर आकाश में एतना रौशनी कि हमनी के बड़ भाई तारा गिने में लगा देवत रहन। आउर हमहुँ इतने हशियार रही कि सच में गिने लगती। फिर का बा, एगो, दुगो, तिनगो, चारगो... चौदहगो, पन्द्रहगो...। तबले कौनो भाई बहिन चूंटी काट देतन! बस सब भुला जइती कि कोन तारा के गिनत रही आउर कोवन के नाही। फिर से शुरू करती। यही करते करते कखनी सुत जइती पतो ना चलतक।
ई रहे प्रकृति से सीधा सम्बाद और प्रदूषण रहित गाँव के खुशनुमा वातावरण। आउर संयुक्त परिवार के अपनापन और रिश्ता!
कल रात के फिर से मन कईलक कि खुला छत पर ही आज सुतल जाए। पर ई का? छत पर तो कोई हयीय नइखे! जब कि हमर परिवार में 18 गो आदमी बड़न। सभे आपन आपन कमरा में कूलर पंखा में बड़न। हम सोचली कि घर के छोटे छोटे लइकन के बोला के आपन बचपन के याद ताजा कर लेऊं आउ नाया नाया बचवन के भी प्रकृति से सम्वाद कराऊं। इहे सोंच के बेटा लड्डू गोपाल आउर भतीजी पीहू परी के छत पर बुलएली। फोल्डिंग बिछाके बचवन के खुला आकाश के तरफ देखेला कहली। लेकिन ई का? 'बर्रे' के तो अते-पते नाहीं! बड़ी ध्यान से देखली त बड़ी मुश्किल से गिने भर तारा देखइलक। आकाश प्रदूषण से भरल रहे, उमस भर रात। आज हम बिन तरेंगन के कइसे रेंगन के सूनाऊं- "अर्रे आवअ बर्रे आवअ..."
चनरमा पर नजर गेलक। चांद में ओतना चमक तो नाहिं रहे, आउ ना पहिले जइसन शीतलता, फिर भी
दुसरका गीतवा माई वाला सुनावेला शुरू कईली- "चंदा मामा दूर के, पुआ पकावे गुड़ के...।"
पर हमार बेटा-भतीजीन के ई कहाँ से मनभावन लगते हलक? उ सब तुरन्ते हमरा से पिंड छोड़ाके कार्टून-सीरियल टीभी में देखे नीचे चल गेलन। अब हम अकेले छत पर आपन बचपन के समय के पारिवारिक सम्बन्ध आउ प्रकृति में बदलाव पर सोचते सोचते नींद में घोलट गेली। पर अचानक ढेरे मच्छर काटे लगलन। तब फिर हमहुँ नीचे कूलर पंखा में आके आपन शरीर के कमरा में कैद कर लेली। पर मन में तो उहे 40 साल पहले के दृश्य चलईत रहे। सोचते सोचते रात के एक बज गइल रहे। फिर जल्दी जल्दी सूते के कोशिश कईली काहे कि सुबह में पौने छौ बजे स्कूल जाए ला रहेला न।
© Dinesh Kumar Shukla
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