(झारखंड के जानेमाने साहित्यकार श्री Dhanendra Prawahi की पलामू संस्मरण श्रृंखला)
प से पलाश, ला से लाह आउ मू से.....
आप आपन रुचि, कल्पना या बुद्धि का परिचय देवे ला कुछो लगा लीजये। हालांकि किसी 'रूढ़ शब्द' को जबरन 'योगरूढ़' बनाना धर्म-परिवर्तन के जइसा एक अपराध लगता है हमको, संधि-विच्छेद की जगह आत्मा-विच्छेदन की इस फूटानी-पूर्ण हरकत को हम ओछी रुचि मानते हैं। एगो उदाहरण देते है- ग से गणेश, ग से गमला और ग से गदहा भी। तो गणेश नहीं, गमला नही, हर घड़ी केकरो गदहा ही लउके तो ऐसी रुचि वाले सज्जन को आप का कहियेगा- 'दुर्वाकन्द नृकिंतन'? ई वाला गधे का संस्कृत नाम है। किसी संस्कारी सज्जन ने 'गधा' के अभिधात्मक भद्दापन और व्यंजनात्मक ओछेपन से बचाते हुए लक्षणार्थ देने की कोशिश की है। #ठेठ_पलामू पढ़ रहे है विद्यार्थियों और भाषा विश्लेषकों को तो जरूर ई एंगल पर विचार करना चाहिए!
खैर! पलामू का पहिला अक्षर प से पलाश, जिसको परास या टेसू भी कहते है। ई पलामू के शरीर की शोभा तो हईए है, ई हृदय के समस्त सौंदर्य के सकारात्मक पक्ष का प्रतीक भी है। होली जैसे जैसे नजदीक आने लगता है कि पलाश अपने पूरे प्रस्फुटन से सौंसे पलामू को लाल रंग के ओढ़नी ओढ़ा देता है। जैसे कि समूचे पलामू को टेसू ने अपने रंग से सरोबार कर दिया हो। कुछ क्रांतिकारी विचार वालों को लगता है कि समूचा पलामू शोषण व्यवस्था के विरुद्ध दहक कर लाल हो उठा है। आध्यात्मिक प्रवृत्ति वालो की उत्प्रेक्षा होती है कि अंनत विभूति भूषण आनंदकन्द भगवान ने कैसे अपने विराट वैभव के प्राचुर्य से सारी दिशाओ को भर डाला है। खैर जाकी रही भावना जैसी...
हम थोड़ा मोह में पड़ गए हैं ई प्रसंग में। दरअसल मेरी पहली कविता जो 1967 में लेस्लीगंज प्रवास के दौरान लिखी गई थी और सन 70 में #सप्ताहिक_हलधर में प्रकाशित हुई थी उ #पलाश पर ही थी, टेसू पर। एक मिनट की कविता है, पढ़िए -
#टेसू_फूले
टेसू फूले।
और
वे भी खूब फूले।
मौसम ने
उनका पत्ता-पता छिन लिया।
मूक वे छिनते गए।
किंतु
ठूंठ टेंसू भी न माने।
फूले
और
वे भी खूब फूले।
पत्तियों से अधिक फूले।
उस जमाने में पलामू साहित्यिक विमर्श का केंद्र हुआ करता था, वर्तमान की स्थिति का तो मुझे अनुमान नहीं, आपलोग ही बताएंगे। प्रकाशित होते ही इस कविता ने धूम मचा दी। #साहित्य_समाज के सम्मेलन में इसके बारे में कहा गया -"देखन में छोटे लगे घाव करे गंभीर"। बहुत दूर तक और देर तक पलामू में इस कविता का असर रहा। एक सम्मेलन में डॉ चंद्रेश्वर कर्ण (अब स्वर्गीय, प्रोफेसर डिग्री विभाग जी .एल. ए. कॉलेज) ने 'जिजीविषा' कहकर देर तक इसपर प्रकाश डाला। फिर तो पलामू के साहित्यकारों की प्रशंसा की बाढ़ सी आ गयी और मै एक स्थापित कवि ही माना जाने लगा। लेफ्ट-राइट-न्यूट्रल सबो ने इसकी चर्चा की।
शायद अब आप भी बोर होने लगे होंगे। तो एक बात बताके विराम लेते है कि इस सीरीज में आगे हम यहाँ के पुराने साहित्यकारों और साहित्य गोष्ठीयों की चर्चा करेंगे। अब आज अतने। धन्यवाद। आपकी टिप्पणियों का इंतजार रहेगा...
चमत्कारे करते रहते हैं 'ठेठ पलामू ' वाले!
ReplyDeleteहम त भुलाइये गये थे। भरखर फागुन में ई बौराहा परसा ' टेसू' को नेवत के छुलराइये दिए लोग बाग के।
बीढ़या किये !
हमको भी बेसे बुझाया पुनर्पाठ करके !
धन्यवाद ठेठ पलामू!.
बहुत सुंदर 🙏
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