Monday, May 21, 2018

नईहरा बिसरत नाहीं

#ठेठ_पलामू : नईहरा बिसरत नाहीं
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ठेठ पलामू के आग्रह पर, ठेठ पलामू को समर्पित चंद यादें।
पांकी रोड, बारालोटा, चरखी भट्टा के सामने वाली गली। तब भी और आज भी, ये हमारा परमानेन्ट ठिकाना है। ये अलग बात है कि अब हम पलामू की बेटी कहलाते हैं और परमानेन्ट एड्रेस टाटा नगर लिखते हैं। पर दिल तो मानो परमानेन्टली अभी भी उसी मुहल्ले, उसी रोड और उन्ही पुरानी यादों की खाक छानता रहता है।
ठीक मेरे घर के पीछे पलाश का घना जंगल था. यह जंगल पूर्वी ओर में अहरा के पीछे और घना होता चला जाता था।
इधर फगुनाहट में ब्रज के छोरे की असंख्य लोकगीतों में जब मन डूब सा जाता धा,उधर पूरा जंगल लाल रंग के फूलों से दिपदिपाता था।ऐसे मे जब होरी की रात पूनम का चाँद अहरा पर अपना प्रतिबिम्ब बनाता था,मैं महज कुछ सालों की,मंत्रमुग्ध हो,अपनी खिड़की के लोहे को पकड़,उस दृश्य को अपलक निहारती थी।
आइस्क्रीम वाला ढक-ढक ढक्कन तब तक बजाता जब तक कि हम बाहर निकल कर चवन्नी का नारंगी रंग वाला बार (मलाई बरफ) अपने नाम न कर लेते।
अपने पेड़ का बेल और माँ का बनाया हुआ नींबू का शरबत, वह स्वाद तो आज पांच सितारा होटल के स्वीट लाइम सोडा में भी नहीं।
रात को बाहर खटिया पर लेटे तारे गिनते हुए खुले आसमान के नीचे, अपने को अनन्त से एकाकार करते थे। बंद कमरे में एसी में सोने के लिए बरसों अभ्यास करना पड़ा था मुझे।
फिर सखियों के साथ सुबह का वह टहलना, चहुँ दिस व्याप्त महुआ के फूलों की खुशबू। कभी-कभी तो मीलों चल दिया करते थे मुह अंधेरे। एक बार तो रजवाडीह तक! घर वापसी पर मिली डांट आज भी कानों में गूंज रही है।
यह कहना मुश्किल होता था कि कौन शैतान किसके घर में क्या कर रहा होगा। हम कभी किसी के अमरूद पर लटके हुए पाए जाते, तो कभी किसी के अचार के डब्बे में में सारे बच्चों का हाथ एक साथ घुसा हुआ होता। हमारे घर-घर खेलने के लिए कभी किसी की माँ की साड़ियों पर आफत आई होती थी। तब हमारी माँयें हुआ करतीं थीं, माॅम नहीं।
शाहपुर से जब अरसा वाली नीलकमल के आजी की पोटली आती थी, हमारी फौज कुछ यूँ टूट पडती थी उस पर मानो पानीपत के युद्ध में सारे दुश्मनों का खात्मा किये बिना दम नहीं लेना है। शोभा के घर वाले केराव और लकठो भी इसी श्रेणी में आते थे।
सैक्रेड हार्ट की बस से आते जाते, बारिश के मौसम की धन रोपनी का विहंगम दृश्य, नयनों में मानो बस सा गया है।
ऐसी ही किसी शाम में, पलाश में लुका छिपी खेलते वक्त किसी कुंडली मारे विषधर के दर्शन हो गये थे, होरहोरवा तो अक्सर चलते फिरते दिख जाया करता था। उस दिन से हमारा खेलना बंद।
अपने बगान का मीठा भुट्टा(मकई) तुरंत तोड़ कर पकाना, बारिश की सोंधी खुशबू को और मनमोहक बना देती थी।
फिर तीज का पिड़किया जमा करते हुए टीन भर लेते थे हम लोग। पुत्र के लिए जितिया तो भाई के लिए गोधन... अशेष स्मृतियाॅ हैं मानस पटल पर अंकित। पूर्ण विवरण के लिए शायद पूरी एक किताब ही लिखनी पड़े। यादों की फेहरिस्त में शामिल हैं दुर्गा बाड़ी की पूजा, कोयल और अमानत का छठ और कभी न भूलने वाला जनकपुरी का वो नवाह परायण यज्ञ। जल्दी जल्दी पढ़ कर पापा से डरते डरते रामलीला देखने की आज्ञा लेना और माईक पर कई कोस दूर तक गूंजती मुखिया चाचा की 'हार्दिक अभिनन्दन' वाली आवाज़। इस बार सालों बाद फिर से मुझे सौभाग्य प्राप्त हुआ यह सब देखने सुनने का।
युग बदल गया, पीढियाँ बदल गईं, नहीं बदले तो हमारे संस्कार। बहुत गौरवान्वित महसूस किया मैंने अपने आप को।
सर्दियों में वो ट्रेन से वनभोज के लिए केचकी-बेतला जाना। सखियों के साथ शादी-विवाह के पहले झूमर नाचना, मड़वा के दिन का साग-भात और रात भर बैठ कर शादी देखना। बचपन की वो मीठी यादें है जो सिर्फ वहां के निवासी ही समझ सकते हैं।
कभी कभी सुनने को मिलता है - "ये पलामू की भाषा का प्रयोग मत किया करो"। मैं बहुत निर्विकार भाव से कहती हूँ - "हूँ मैं डाल्टनगंज की ,तो भाषा कहाँ की लाऊँ।"
निस्संदेह यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि हमारा रोम-रोम ऋणी है इस पलामू की धरती, हमारे माता-पिता और गुरूजनों का, कि आज हम पलामू वासी जहाँ भी हों, अपने मूल से जुड़े हैं और पलामू की अक्षुण्ण सांस्कृतिक धरोहर अपने हर कण में महसूस करते हैं।
शायद इसीलिए आज भी पलाश के फूल देख कर मेरे आंखों के कोर कुछ भीग से जाते हैं।
© priyanki mishra

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