#ठेठ_पलामू : वट सावित्री
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सुबह सुबह ऑफ़िस पहुंचे ही थे कि यहाँ म्यांमार के प्रोजेक्ट मैनेजर ने एक लोकल आदमी (जो हिंदी जानते हैं) से कहा कि उनको बरगद का पेड़ और बांस का बेना चाहिए, उनकी वाइफ को पूजा करना है। तभी हमको इंडिया और पलामू के साथ ई भी याद आया कि अरे आज तो वट सावित्री है।
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सुबह सुबह ऑफ़िस पहुंचे ही थे कि यहाँ म्यांमार के प्रोजेक्ट मैनेजर ने एक लोकल आदमी (जो हिंदी जानते हैं) से कहा कि उनको बरगद का पेड़ और बांस का बेना चाहिए, उनकी वाइफ को पूजा करना है। तभी हमको इंडिया और पलामू के साथ ई भी याद आया कि अरे आज तो वट सावित्री है।
बचपन मे इस दिन पूरा मजा आता था, काहे कि ई लू वाला गरमी में भी दुपहारिया में बाहर निकलने का मौका मिल जाता था उ भी घर के सब माई-चाची साथे।
पूजा के 2 दिन पहिले ही नहाय-खाय दिन पुरा धमके वाला खाना। अरवा के धमके वाला भात-दाल आउ घी में बनल सब्जी सब। उसका टक्कर तो 56 भोग में भी न है! दूसरा दिन भी गुड़ वाला खीर। जनाना लोग भले एक ही बार खाये, हमनी तो जेतना मन ओतना बार। और तीसरा दिन उनलोगो का तो निर्जला उपवास।
प्लान बनता कि एकदम सुबह सुबह जाना है।पूजा करते करते ढेर धूप निकल जाता था। इसीलिए हर बार प्लान बनता कि अबकी बार भोरे भोरे पहुंच जाना है। घर से बगल वाला गाँव मे गमहेल बाबा के पास बूढ़ा बरगद के पेड़ का पूजा करने जाना रहता था। (अब तो उ बर के गिरे हुए 15 साल हो गया होगा)। पर केतनो जल्दी करे, सजते संवरते 11-12 बजिये जाना था। और बजे काहे न? जेतना चढ़ल गहना, खरीदल गहना, मांगटीका सब आझे तो पहिनती थी औरत लोग। सज धज के तो दादी भी लगे कि कौनो दुलहिन है!
सब पूजा करने पहुचते। कम से कम 2-4 घर का लेडिस लोग एक साथ पहुँचिये जाते थे।अब एके गो पंडीजी सब का पुजा करवाते काथा सुनाते।
"हिमालय घरे
सावित्री जन्म लेले ,
नारद बाबा अइले ,
ई बेटी के बरवा अपने खोजले हे।।
एतना सुनले सावित्री,
लेले सेर भर सतुआ
चली सखी आपन बरवा खोजे हे।।
पहिले पर्वतवा लांघने सावित्री,
मिली गइले धोबिन बिटिया,
पहीले अपसगुनवा होई गइले हे।।
माई अब का होइहें?
दूसरे पर्वतवा जब लाँघिले
मिली गेले तेलिये बेटवा हे।।
चलत- चलत होइले बड़ी अपसगुनवा
सावित्री चले गेले बर तर
मिलले सतवान बरवा हे।।"
सावित्री जन्म लेले ,
नारद बाबा अइले ,
ई बेटी के बरवा अपने खोजले हे।।
एतना सुनले सावित्री,
लेले सेर भर सतुआ
चली सखी आपन बरवा खोजे हे।।
पहिले पर्वतवा लांघने सावित्री,
मिली गइले धोबिन बिटिया,
पहीले अपसगुनवा होई गइले हे।।
माई अब का होइहें?
दूसरे पर्वतवा जब लाँघिले
मिली गेले तेलिये बेटवा हे।।
चलत- चलत होइले बड़ी अपसगुनवा
सावित्री चले गेले बर तर
मिलले सतवान बरवा हे।।"
इहे गीत में कहानी रहता था।
सब उहे बांस के बेना, मौनी, ओकर में सिंगार के सामान दान किया जाता था। पंडीजी के बेना से हुंका भी जाता था। और ओतना उपवास में भी जब गीत शुरू होता तो एक से बढ़कर एक ठहकार आवाज़ मे। सुन के पतो न चलता कि उपासलो है कोई!
"बर तर गेली
बेनिया दोलवाली
कौड़ी आनी कौड़ी आनी
अहियात बे सहली
आपन बरवा सावित्री
अपने खोजले हे
कौड़ी आनी कौड़ी आनी
अहियात बे सहली।"
बेनिया दोलवाली
कौड़ी आनी कौड़ी आनी
अहियात बे सहली
आपन बरवा सावित्री
अपने खोजले हे
कौड़ी आनी कौड़ी आनी
अहियात बे सहली।"
और तो और! जब गीत में पापा लोग के नाम पकड़ाने लगता तो सब याद दियाता कि - अरे ओकर पापा के नाम न लेलिआई। ओकरे में फलनवा देवी चिलनवा पांडेय सबका नाम भी याद हो जाता था।
और आते समय कहीं से मलाई बर्फ वाला आ जाये तो बिना जिद करले लिया जाता था। वैसे भी उपवास माई लोग के न था, हमनी के तो 3 दिन तक च्यवनप्राश।
Camera: Sunny Shukla
https://www.facebook.com/palamuxpress/videos/1783481465028929/
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