इनका देखते पहचान लिए न!
ई हैं नारद मुनिि पांडेय ज़ी उर्फ़ "ए खाजा वाला"!
इहे कह के न आवाज़ देवल जाता है इनको। कोई अंदाजा भी नहीं कि इनका केतना खाजा और बालूशाही खाएँ होंगे हम?
केतना साल से देख रहे हैं हम इनको. हम बाछा से बैल हो गए लेकिन ई अभियो तक वैसे के वैसे ही हैं! ना तो इनका चेहरा पर बुढ़ापा चढ़ा है ना अंदाज़ में सुस्ती. दुईए गो चीज़ बढ़ा है खाली - इनका पेट और खाजा के रेट!
हम पहिले 1 रुपया में लेते थे अब 5 रूपया हो गया है एक पीस का मोल। नारद मुनि चाचा बता रहे थे कि उ जब शुरु किए थे खाजा बेचना तो जेबी में पैसा भर के जाते थे छून छून बजाते हुए. चवन्नी अठन्नी मे पेट भर आइटम हो जाता था गाहंक को.
नालंदा से 32 साल पहले आए थे चाचा Apna Daltonganj. और आठ हज़ार रुपया में दू कट्ठा जमीन किने थे. फिर तो यहीं के हो के रह गए, हमीदगंज में मकान बना लिए. चाहते तो अब दूसरा धंधा भी कर सकते थे कम मेहनत वाला. लेकिन बोलते हैं कि-" बबुआ जौन दउरी के कपार पर ढोते हुए पेट पाले हैं उसके साथ नमक हरामी नहीं न करेंगे? कोन ऐसन गली है टाउन के जहां हम खाजा नहीं खिलाए हैं? बड़का बड़का कारीगर सब हम से सीखता है गुर! कुछ लोग बोला कि दूकान खोल के बैठ जाइए, लेकिन बहता पानी को रोकने से तो सड़ ना जाएगा हो? यही ला हम सुबह से शाम तक गली मुहल्ला में बहते रहते हैं. आज के रेंगन के चॉकलेट और जवान के पुड़िया खाए से फुर्सत नहीं है लेकिन जे असली जीभ के राजा है न उ मेरा वैल्यू पहचानता है. हम हूँ चिन्ह लेते हैं दूरे से... "
जब हम फोटो खींच रहे थे तो लजा गए कि ठीक से तैयार न होके खिंचवाते!
खैर इनकर खाजा बहुते बढ़िया रहता है. अगर कहीं दिख जाएँ तो गाड़ी रोक के खुद खाएं और सबको खिलाएं भी. खाली लज़ीज और किनारा जैसा महंगा होटल में पैसा फूंकने से पलामू का तरक्की नहीं होगा. कभी इनके जैसे इंसान से भी कुछ खरीद के देखिए, दिल में संतोष, मन में अभिमान और जीभ पर वाहवाही होगा चैलेंज लगा के कहते हैं. और इसी तरह तो हम अपनी संस्कृति अपनी धरोहर और परंपराओं को सहेज पाएंगे. नहीं तो इसी आइटम को कुछ साल बाद अमेरिकन कंपनी पैक में डाल के पेटेंट करा के बेचेगा और हमलोग प्लास्टिक चुनेंगे.
खाजा Balushahi ही आने वाली पीढ़ी को
हमारी असली पहचान बताएगा।
ना कि मंचूरियन चिली जिसको देख कर
हमारा पेट और रेट दोनों बिगड़ जाएगा।
एक बार खाइएगा तो याद रह जाएगा।
वो आयटम नहीं कि पानी पीते ही बह जाएगा।
आइए पुरखों की विरासत को बचाएं
ठेठ पलामू के अनुरोध पर खाजा खाएं और खिलाएं.
अगली बार हम लकठो खिलाएँगे.
© Sunny Shukla
https://thethpalamu.blogspot.in
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