#ठेठ_पलामू : तिलउरी,चरउरी,अदौरी, कंढ़उरी
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गांव में मनोजवा घर तिलउरी, चरउरी पराय लगलक. बुझात बा ओकर बियाह ठीक हो गईल, दिन-तारीख धरा गईल होई तबे न सब जल्दी - बल्दी लागल बड़े. लेकिन कवनो सहुन नईखन कहत, तनिको धाह नइखे लागत! डेरात बड़े की कोई बिअहवा काट दिहन?
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गांव में मनोजवा घर तिलउरी, चरउरी पराय लगलक. बुझात बा ओकर बियाह ठीक हो गईल, दिन-तारीख धरा गईल होई तबे न सब जल्दी - बल्दी लागल बड़े. लेकिन कवनो सहुन नईखन कहत, तनिको धाह नइखे लागत! डेरात बड़े की कोई बिअहवा काट दिहन?
मेरी दादी के यह बात बोलते ही मां ने भी सहमती में सिर हिलाया और तार्किक रुप से बोली कि - "अब कोई जानहू देवेला, तिलक के दिन त पाता चलेला!" मैं वहीं चुल्हा के पास बैठ के दादी और मां की बाते सुन रहा था और मजे से रोटी खा रहा था.
मैंने सोचा कि एक हमारा फेसबुकिया समाज है. कितना मिलनसार और समाजिक है कि यहां किसी लड़का-लड़की का नैन भी लड़ जाता है, ताका-ताकी भी होता है तो भाई लोग पोस्ट कर जानकारी दे देते हैं. शादी, इंगेजमेंट का तो लाइव रिपोर्टिंग कर देते हैं. बिना सगुन के ही आपन बहुरिया के फोटो तक देखा देते हैं. और एक हमारा समाज है कि जब टेंट गड़ाए लगता है तब पता चलता है कि फलनवा के बिआह होत बा
🤔!
अब आते हैं मुद्दा पर. हम सोचे कि आखिर बिआह के पहिले इ सब तिलउरी वगैरह काहे पराता है? जब दादी से पुछे त बोली -"जेकरा घर बिआह होखेला उ बिआह के बाद साल भर तक तिलउरी, चरउरी, अदौरी, अचार इ सब बनावे ओली काम ना करेला." हम पुछे कि काहे त कोई ठोस जवाब त ऊ नहीं दी, बोली -"अइसहीं नियम चलत आवत बा बाबू".
हमरा बहुत अजीब लगा. बगल में पापा भी बईठे थे. उनका एक खासियत है कि उनके पास हर सवाल का 'रेडिमेड' जवाब होता! उ बोले कि- "पहिले लोग गरीब होते थे. सभी के पास उतना अन्न-धन नहीं होता था. बेटी-बेटा के शादी करने से पहिले सब अनाज पानी के व्यवस्था गांव-समाज, हीत-जन मिलकर करते थे. मदद से ही सब तिलवरी, चरउरी, अदौरी पराता था और उहे शादी बिआह में सब्जी के जगह पर चलाया जाता था. शादी के बाद लोग उस स्थिती में नहीं होते थे कि पुनः ई सब पार (बना) सकें. और वही प्रथा आज तक चला आ रहा है." पापा की बाते मुझे तर्कसंगत लगी, लेकिन पता नहीं सच्चाई क्या है!
फिर हम ठेठ पलामू के सत्यान्वेषी स्वामी जी से पूछे. उनका जवाब भी एक अलग दृष्टिकोण लिए हुए था- " बियाह एक सामाजिक आयोजन है. इसमें न सिर्फ उस परिवार की बल्कि पुरे गाँव-समाज की प्रतिष्ठा दाँव पर लगी होती है. इसीलिए सब की समुचित भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए कुछ कुछ ग्रुप इवेंट्स तैयार किये गए. तिलौरी पारना भी एक ऐसा ही आयोजन है जिसमे दूर से आये मेहमान रूपी औरतों के अलावा पास-पड़ोस की सभी औरतें बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेती हैं. सांस्कृतिक आदान प्रदान के अलावा एक सोशल क्लब के रूप में भी इसका विकास हुआ. इससे सामाजिक सरोकार में मजबूती बनी रही. लोग एक दुसरे के आयोजनों में शामिल होते रहे. रस्मो-रिवाज में शामिल बहुत तरह के नेग भी हर आयोजन में सब के महत्व और भागीदारी बढ़ने का ही एक तरीका था. हालांकि शादी लगे तो कुछ भयभीत लोग गांव में हल्ला नहीं करते हैं कि कोई काट दिही. जबकि कुछ घरों से महीनों पहले से 'बोलाहटा' आने लगता है झूमर खेलने, अदौरी पारने, चिप्स काटने, गेहूं चुनने और आटा पिसने के लिए जांता-ढेकी से." चुकि स्वामीजी की बातें anthropolgy और सोशल स्ट्रक्चर पर उनके शोध पर आधारित थी तो मैं सहमत हो गया.
लेकिन बात है मज़ेदार. सभी के गांव में या घर में यह होता है. घर में तिलवरी, चरउरी पराने लगता है वो भी किसिम किसिम के गीत के साथ. बिआह लगने के बाद कुछ खरीदारी न शुरू हो, टेंट - हलुआई बुक न हो लेकिन सबसे पहिले घर में अदउरी, तिलवरी वाला काम शुरू हो जाता है!
"समधी के दांत टूटल, ननदी के थाल फूटल
अजी पारुं हाली -हाली बारा जी ..
ढेर दिन बाकि नइखे ,पियरी चढ़ी जइहें
लाल रंग मांगे सिन्होरा जी ..."
अजी पारुं हाली -हाली बारा जी ..
ढेर दिन बाकि नइखे ,पियरी चढ़ी जइहें
लाल रंग मांगे सिन्होरा जी ..."
जो मित्र इस व्यंजन से परिचित नहीं हैं उन्हें बता दूं कि यह एक ग्रामिण व्यंजन है. तिलौरी को बनाने के लिए विभिन्न प्रकार के अनाज , मसूर /उरद के दाल, तील और कुछ मशाला डाल कर उसे पानी में फूला कर सिलवट / मिक्सी में पीस कर पेस्ट बना कर खटिया पर बैर के आकार में गोला गोला बना कर सुखाया जाता है! उसी प्रकार चरउरी चावल से, अदवरी चना दाल से, कंढ़वरी उरद दाल और रक्सा (एक प्रकार का फल, जिससे मुरब्बा भी बनता है) से बनाया जाता है!
चरवरी को छोड़ कर सभी सब्जी के स्वादिष्ट विकल्प हैं, सब्जी की तरह मशालेदार बना कर खाने में बहुत स्वादिष्ट लगता है. और हमारे समाज में तो बिआह में अगर मंड़वा के दिन अदवरी ना बने त बिआह सपन्न ही नहीं माना जाता है. आप छप्पन भोग ही क्यूं न खिलाओ सब बेकार!
यह सब हमारे पलमूवा संस्कृति की विरासत और शान है. लेकिन पता नहीं भावी और वर्तमान पीढ़ी की कन्याओं और बालिकाओं को यह सब बनाने आता होगा कि नहीं? सभी को अपनी दादाी, चाची, मां से जरूर सिखना चाहिए ताकि परंपरा बची रहे. ताकि चरवरी, तिलउरी, कंढ़वरी, अदौरी विलुप्त होने से बच सके!
और हां जो भी लोग ई सब व्यंजन से परिचित नहीं हैं, अगर उनका हितैषी पलामूं के किसी गांव में है तो यहां आकर इसका स्वाद का आनंद जरूर लें!
तिलवरी, अदवरी पर अपना विचार और याद जरूर साझा करें. सामूहिक आयोजन की तस्वीरें भी शेयर करें.
तिलवरी, अदवरी पर अपना विचार और याद जरूर साझा करें. सामूहिक आयोजन की तस्वीरें भी शेयर करें.
© राहुलदेव दुबे
आरेदाना गाँव, पलामू
आरेदाना गाँव, पलामू
Photography: Anand Keshaw

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