#ठेठ_पलामू : तीज और पेंडूकिया
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दुल्हन सी सजी हुई मैं, बार- बार अपने पति देव को आवाज लगा रही थी. "देखो जी चाँद आया क्या?"
पति की लम्बी उम्र के लिए मैंने करवाचौथ का उपवास रखा था, और बिना खाये पिए १२ घंटे से बैठी थी. पुणे में चाँद बहुत लेट से दीखता है.
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दुल्हन सी सजी हुई मैं, बार- बार अपने पति देव को आवाज लगा रही थी. "देखो जी चाँद आया क्या?"
पति की लम्बी उम्र के लिए मैंने करवाचौथ का उपवास रखा था, और बिना खाये पिए १२ घंटे से बैठी थी. पुणे में चाँद बहुत लेट से दीखता है.
पति देव ने चुटकी ली - "हमारा चाँद तो हमारे सामने है, तुम्हारा वाला कहीं नहीं दिख रहा." एक छोटी सी मुस्कराहट मेरे चेहरे पे फ़ैल गयी. ये डायलाग मैंने पहले भी सुना था. बाबूजी माँ को लाड लगते हुए यही डाइलोगे बोला करते थे. अनायास ही याद आयी भादो में मनाये जाने वाली "#तीज" की. इसे ही हरतालिका व्रत भी कहते हैं.
हमारे गांव में करवाचौथ नहीं बल्कि पति की लंबी उम्र के लिए तीज का उपवास रखा जाता है. वो पूजा बहुत ग्लमौरस नहीं है पर हमारे लिए अति विशिष्ठ पूजा में से एक है.
माँ काकी लोग तीज से एक दिन पहले नहाय-खाय करती थी. उस दिन मूड़ मैसने(बाल धोने) का रिवाज है. फिर नाहा धो के, गोबर से लिपे खैकि में, घी में पूरा खाना बनता. इतना स्वादिष्ट कद्दू की सब्जी और खेख्सा का भुजिया. एकदम फट-फट सफ़ेद वाला धमकता चावल और खूब घी में छनकाया हुआ दाल.
दूसरे दिन तीन बजे भोर में सभी महिलाएं पारण करती थी. मिठाई, शरबत और जग भर पानी पी के सो जाया करती. तीज का उपवास रखने के बावजूद वो घर का सारा काम करती और दोपहर में ही जा कर थोड़ा आराम करती थी.
शाम में अंगना धुलाता. उसमे पीढा पर गौरी गणेश स्थापित किये जाते. आम के पल्लो से उस पीढ़ा को सजाया जाता. तीज से दो दिन पहले हमारे बेस्ट कुक "दरोगवा" को बुलाया जाता. उसके साथ मिल कर हम सब बड़का दौरा भर भर के #पडुकिया बनाते. खोवा वाला स्पेशल लोगो के लिए और सूजी वाला बांटने के लिए. पडुकिया बांधते हुए मुँह में पानी आ जाता. पर परसादी था न, नहीं खा सकते थे वरना पाप लगता!
माँ, फुवा घर भेजे ला दौरा सजाती. उस दौरी को 'तिजौरी' कहते हैं. दौरी को गुलाबी रंग से सजाया जाता. उसमे पडुकिया, साड़ी, चूड़ी, बिंदी और सुहाग के कई सामन रख के गुलाबिये मार्किन के कपडा से बाँध दिया जाता. चाचा और भैया तीज वाले दिन दोपहर में तीजौरी फुवा के घर पंहुचा आते.
नयी नयी बिहौती के लिए उसके ससुरा से 'हरियारी' आता जिसमे होता सूंदर हरियर साड़ी और सुहाग के सामान. हम सब जरूर देखे जाते. और सोचते कि 'हमर बियाह बाद हमरो ला आयी.' माई ला भी, नानी तीजौरा भिजवाती थी.
शाम को माँ नहा धो के वही साड़ी पहनती. सबके नैहर से तीजौरा आता. सब के नैहर वाला अपन लियाकत भर सामान और साड़ी उसमे भेजता.
सब परवैतिन(व्रतीन/व्रत धारिणी) लोग साड़ी पहन, मांग टिका लगा के और भर भर हाथ चूड़ी पहन के तैयार हो जाती. गोड़ रंगे ला हम लड़कियों को लगाया जाता. एक अलता के सीसी से पूरा मोहल्ला के लेडीज का गोड़ रँगाता.
दिन भर के निर्जला उपवास के बावजूद माँ के चेहरे की खूबसूरती और आभा में कोई कमी नहीं आती थी. बल्कि वो तैयार हो कर और अलौकिक दिखती. पुरे टोला की मेहरारू मेरे घर ही पूजा करने जुटती थीं. व्यास पंडित जी पूजा कराने आते थे. सब मेहरारू अंगना में जुटती.और हम लइकन ढाबा पर बैठते.
पूजा शुरू होता. आजी का रोल इस पूजा में पंडित जी को गाइड करने वाला होता. पंडित जी जहां शॉर्टकट अपनाने की कोशिश करते, वहीं आजी टोक देती. कहती- "नौग्रह के पूजा में शनि देव पर फूल नइखी चढ़वाइले". सहम के पंडित जी जहां नहीं भी जरुरी है वहां भी फूल चढ़वा देते. वही कहानियां हर साल हम सुनते पर फिर भी उसी इंटरेस्ट के साथ बैठे रहते.
लास्ट में पीतल के कठवत में आधा कठौत पानी डाला जाता. उसमे चाँद देखा जाता. हमलोग फिल्म में देखते थे कि हीरोइन चलनी में दिया रख पति और चाँद को देखती है. पर हमारे लाख आग्रह करने पर भी न तो माँ चाची मानती ना पंडित जी. अफ़सोस इस बात का रहता कि पूजा ख़तम होने के बाद भी उस दिन परसादी नहीं खा सकते थे. उफ़ वो एक दिन का इंतजार सालो से कम नहीं होता था.
पूजा समाप्ति के बाद सब मेहरारू दरी पर अंगना में ही बैठ जाती और कई घंटो तक सूंदर मनोहर गीत गाती. उन गीत के बोल, और वो टोन आज भी जुबान पर है.
"आज हिमाचल के बेटी प्यासी
बैठी तपस्या में तो डोले काशी
शिव जी मानीहें कि ना..
दर्शन दिहें कि न...
धन रे सुहागिन फलने की बीबी
धन रे सुहागिन चीलनी देवी
होइहें जनम जनम अहिवात
सीनूरा के अखंड भाग
शिव जी......"
बैठी तपस्या में तो डोले काशी
शिव जी मानीहें कि ना..
दर्शन दिहें कि न...
धन रे सुहागिन फलने की बीबी
धन रे सुहागिन चीलनी देवी
होइहें जनम जनम अहिवात
सीनूरा के अखंड भाग
शिव जी......"
इस गीत में एक एक कर के सब लेडिज लोग का और उनके पतिदेव का नाम धराता.
उस रात पापा चाचा लोग को खाना खिलाने का जिम्मेदारी हमारा होता. भारत के नक़्शे के समान रोटियां हम उनके थाली तक पंहुचा के अपने कर्तव्य से निर्वाहित होते.
पंडित जी ई भी डरा के रखे हुए थे कि अगर आज कोई परवैतिन सूत गयी तो उ अगले जनम में अजगर के रूप में पैदा होगी. पर दिन रात की थकी प्यासी महिलाएं आखिर में अजगर बनना कबूल करती और सो जाती.
दूसरे दिन भोरे उठ के रसियाओ और दल पूड़ी बनता. उसको पहले चील सियार को दोना में परोसा जाता. उसके बाद ही ये जगत जननी देवियां पानी का एक घोट भर्ती. फिर चार चार पडुकिया समूचे टोला और गांव में ठकुराइन बांट के आती.
आज १२ घंटे के उपवास में पैर थर थरा जाते हैं, क्या गजब का सहन शक्ति था उन महिलाओं में.
चाँद तब तक पुणे में भी निकल आया. प्यार से मैंने चलनी में अपने पति देव और चाँद को देखा. भगवान् से आजीवन अहिवात के लिए आर्शीवाद मांग कर और सासु माँ का आर्शीवाद ले उनके द्वारा स्वदिष्ठ व्यंजन खाने में व्यस्त हो गयी. मगर मन में बचपन की यादें ताजा हो रही थी...

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