#ठेठ_पलामू : राजा मेदनी राय की दानवीरता
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डाल्टेनगंज में कोयल नदी के पुल से सटा एक तरफ गिरिवर प्रसाद सिंह के बनवावल गिरिवर स्कूल आउ दूसर कोर पर राजा मेदनी राय के किला. देखल बाद वाह या शाबास कहे बिना रहना मुश्किल. कारण ई हो जाता है कि किला तो बहुत पुराना है लेकिन है नयको से मजबूत. का जाने कवन कारीगर के पाथल ईंटा है. किताब जैसन पातर-पातर एक सवा इंच मोटा. आज के चिमनी भाठा के ईंटा फेल. बिना पाना पलस्तर के अपनी मजबूती समेटे हुये खड़ा है आज भी. लगता है कि शायद साक्षात भगवान विश्वकर्मा के बनावल है. आज के बनावल घर मकान पांच साल में झड़ना-भसकना शुरू. पर सबसे ताजुब लगता है कि ई किला कौन सीमेंट, गारा, छरी से बनावल है कि आजो तक टस से मस नहीं हुआ है. मेदनी राय के बनावल किला "चलानी किला" के नाम से भी जाना जाता है. किला के देखे बतावे में तनी विषयांतर हो गये थे साहेब!
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डाल्टेनगंज में कोयल नदी के पुल से सटा एक तरफ गिरिवर प्रसाद सिंह के बनवावल गिरिवर स्कूल आउ दूसर कोर पर राजा मेदनी राय के किला. देखल बाद वाह या शाबास कहे बिना रहना मुश्किल. कारण ई हो जाता है कि किला तो बहुत पुराना है लेकिन है नयको से मजबूत. का जाने कवन कारीगर के पाथल ईंटा है. किताब जैसन पातर-पातर एक सवा इंच मोटा. आज के चिमनी भाठा के ईंटा फेल. बिना पाना पलस्तर के अपनी मजबूती समेटे हुये खड़ा है आज भी. लगता है कि शायद साक्षात भगवान विश्वकर्मा के बनावल है. आज के बनावल घर मकान पांच साल में झड़ना-भसकना शुरू. पर सबसे ताजुब लगता है कि ई किला कौन सीमेंट, गारा, छरी से बनावल है कि आजो तक टस से मस नहीं हुआ है. मेदनी राय के बनावल किला "चलानी किला" के नाम से भी जाना जाता है. किला के देखे बतावे में तनी विषयांतर हो गये थे साहेब!
पूर्वज लोग बताते थे. दादा-दादी जो शुरू से राजशाही देखे हुए राजा साहेब के बारे में कुछ कहानी भी सुनाते. राजा साहेब के पुजारी पनेरिबाँध गाँव के शाकद्वीपीय ब्राह्मण पाठक वंश के थें. पुजारी लोग पूजा पाठ के अलावे कहानी कविता भी किया करते थे. इनकी विद्वता पर राजा साहेब पुरष्कार में दु -तीन गो गाँवे दे दिये थे. ई रहा उनका दानवीरता.
राजा साहेब के इहाँ विद्वान के खूब कदर होता था. घर में 98-99 साल के बूढ़ दादा जो अब नहीं हैं बताते थें-'बाबू एक समय अइसन अकाल पड़ा कि पैदा-पैदाइश , खेती-बारी कुछो नई हुआ. भोजन पानी के भारी संकट, माल-मवेशी सब के हाल बेहाल. आज जईसन डेगे-डेग कुइयाँ, चापाकल बोरिंग थोड़े जो था.
किला के दक्षिण तरफ करीब आधा कोश दूर पर एगो बांध था, उ त आजो है- फरि बाँध. किला जईसन इहो आपन अस्तित्व बचा के रखा है. आजो मछ्ली पालन, कमल के फूल, भेंट के फूल का बढ़िया स्रोत है. पहिले तो सिंघाड़ा (पानी फल) बहुत ज्यादा मात्रा में होता था. चोरी- चमारी के चलते अब कुछ दिन से लोग नहीं करते हैं. अकाल के समय इहे फरविसबाँध पर सब आश्रित हो गए. नहाना -धोवाना, पीने का पानी, गाय -गोरु सब उसी पे.
अन्न और पानी के बिना हाल बेहाल, वाह रे अकाल! जईसे -तईसे राजा को खबर हुआ. तुरंत प्रजा को बुलाकर राजा पूछे - 'आपलोग इस अकाल में कईसे खा- पी रहे हैं?'
प्रजा लोग बतायें - 'मालिक कोदो, सावाँ मकई, मड़ुआ थोड़ा बहुत हुआ था. उसी से प्राण बचा रहें हैं.'
राजा साहेब ने भी कोदो, सावाँ, मड़ुआ को बनवाकर थोड़ा - थोड़ा खा कर देखा. उनको तनीको अच्छा नई लगा. फिर एगो बुद्धिमान रसोइया के कहने पर दूध, दही के साथ खाकर देखें तो थोड़ा ठीक लगा. राजा मेदनी ने जरा सी भी देर किये बिना नौकर- चाकर, मंत्री इत्यादि को बुलाकर फरमान जारी किया- 'एक एक लगहर गाय (दूध देने वाली गाय) सभी को दिलवा दिया जाए, ताकि प्रजा दूध दही के साथ मोटे अनाज को भी खाकर प्राण बचा सके'.
प्रजा लोग बतायें - 'मालिक कोदो, सावाँ मकई, मड़ुआ थोड़ा बहुत हुआ था. उसी से प्राण बचा रहें हैं.'
राजा साहेब ने भी कोदो, सावाँ, मड़ुआ को बनवाकर थोड़ा - थोड़ा खा कर देखा. उनको तनीको अच्छा नई लगा. फिर एगो बुद्धिमान रसोइया के कहने पर दूध, दही के साथ खाकर देखें तो थोड़ा ठीक लगा. राजा मेदनी ने जरा सी भी देर किये बिना नौकर- चाकर, मंत्री इत्यादि को बुलाकर फरमान जारी किया- 'एक एक लगहर गाय (दूध देने वाली गाय) सभी को दिलवा दिया जाए, ताकि प्रजा दूध दही के साथ मोटे अनाज को भी खाकर प्राण बचा सके'.
प्रजा जय- जयकार लगाने लगी. सब के यहाँ सुबह- सुबह दही महने वाला मन्हान चलने लगा. मन्हान की आवाज गूंजने लगी. खुशी के मारे मन्हान चलाते हुए लोग गीत गाते थे-
"वाह ! रे राजा मेदनीया
घर-घर में बाजे मथनीयाँ"
घर-घर में बाजे मथनीयाँ"
©सुधीर कुमार पाठक

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