Friday, June 29, 2018

नानी घर


आज कुछ मेहमान अचानक से बिना सूचना दिए घर आ गए. मैं हैरान परेशान सी सोचने लगी कि चाय के साथ क्या नाश्ता परोसा जाए? फिर अचानक से खयाल आया कि अपने पलामू में तो हलवा अर्थात मोहनभोग परोसा जाता था. एक नंबर का नाश्ता था ये. फिर क्या था! खूब सारे घी में आटा डाल के लाल होने तक भूंजते रहे जब तक कि लोहिया सौंध सौंध धमकने नहीं लगा. वाह! उ सुगंध से पूरा बचपन आँख के सामने से गुजर गया. खुशबु यादों को किस तरह से जकड़ लेती है इसका एहसास अब जाकर हुआ. पहले सिर्फ किताबों में पढ़ती थी कि लोग अपनी माटी की खुशबु से अपने देश की यादों में खो जाते हैं, अब लगता है कि सच ही तो कहा लिखा गया था वो सब. फिर से मेरी आँखों के सामने तैरने लगा ठेठ पलामू का टैग लाइन 'अपनी बोली अपनी माटी' .

मेरी रसोई इस कदर महक उठी थी मोहनभोग के संग संग मेरी यादों की खुशबु से कि बगल वाली पड़ोसन भी झाँकने आ गयी थी और पूछ ही बैठी - "आखिर पक क्या रहा है श्वेता के रसोई में?"

मेरा ननिहाल है सिंगरा खुर्द. जी हां वही गाँव जिसका जिक्र कुछ दिन पहले ही ठेठ पलामू पर किया गया था. डालटनगंज से दूर ही कितना था ये, हम जीप में बैठ के सोच भी नहीं पाते थे और पहुंच जाते थे अपनी नानी के पास. पर बार-बार वहां जाने के बावजूद हमारे आवभगत में नानी कभी कोई कमी नहीं करती थी. पहुंचते ही मामी पीतल के थाली में हमारा पैर धोकर अपने आँचल से पोछती थी. भगिनी पूजनीय होती है न पलामू के परंपरा के अनुसार! इसी बीच नानी बड़का डूभा में आधा किलो चीनी डाल के चम्मच की जगह अपना हाथ डूबा के ही शर्बत घोलती. उस शर्बत में नींबू कम और चीनी बहुत ज्यादा हुआ करता था. बिलकुल मेरी नानी की तरह. फिर स्टील के गिलास में २-३ गिलास शर्बत हम पी लेते. कसम से मुँह तो बंधा जाता पर मन नहीं भरता था. अब सोचती हूँ कि नानी अगर शर्बत चम्मच से घोलती तो शायद इतना स्वाद नहीं आता. क्या फाइव स्टार होटल में बिना हाथ डाले चम्मच से गोल गप्पे खिलाने वाले इसीलिए वो स्वाद नहीं दे पाते जो ठेले पर मिलता है?

अब तक मेरी माँ नानी को आजी द्वारा किए गए अत्याचारों से अवगत कराती पूरी भाव भंगिमा के साथ, कभी फुसफुसाहट से तो कभी ऊंचे स्वर में. नानी भी लगे हाथ मामी का बही खाता खोल देती. कभी कभी किसी की बुराई करने में भी कितना आनंद आता है हम औरतों को ये पुरुष जात क्या जाने?

मगर हम बच्चे सब भूल-भाल के ढोला-पाती, विष- अमृत, कित_कित, हूरा, सेरेडीची, और न जाने क्या क्या खेलने में बिजी हो जाते थे. पता नहीं अब के बच्चे वो सब खेल जानते भी हैं कि नहीं?

हम दूरा पर के सामने खोरी में खेलते रहते कि इतने में बहुत ही स्वदिष्ट खुशबु आने लगती अंदर से. समझ आ जाता कि मोहनभोग भूंजा रहल है. मामा के दोकान से दालमोट किना के आता और तब स्टील के प्लेट में मोहनभोग परोसा जाता साथ में. आउ आरारोट  वाला बिस्कुट भी. खा पी के हम फिर से बिजी हो जाते अपने काम में. अब मामा जी का कॉमिक्स और नंदन का कलेक्शन पर मेरा छापा पड़ता.

धुसका, केरा_दुधौरा और गुड़ का पुवा माँ को बड़ी पसंद था. दूसरे दिन से रोज पकवान बनता. हमें क्या, हम तो खाने ही जाते थे नानी घर में. सबसे मस्त होता था सुबह का नाश्ता. सरसो तेल का परोठा और आलू का पतला भुजिया, जो शायद भूंजने की बजाय तला ही जाता था. साथ में ताज़ा मल्हान से मह के निकाला गया माठा, गुड़ और आम का स्पेशल अचार. सिंगरा वैसे भी 'घाटा और माठा' के लिए प्रसिद्ध है. वहां आज भी हर घर में मवेशी मिल जायेंगे और मकई की खेती तो जम के होती है.

जब वापस जाने लगते तो नानी दौरी भर के खाजा, कसार, पियाओ, अरिसा और बंगला निमकी बना के देती. जाते समय नानी और मामी ११ रुपये भी पकडाते विदाई के रूप में. थोड़ा देर हम लोग न नुकुर वाला नौटंकी करते और फिर चुपचाप पकड़ लेते थे अपना अपना हिस्सा और मन में चलने लगता था बजट कि इस पैसे से करना क्या है? कभी कभी अगर किसी खास मौके पर नानी दक्षिणा- विदाई में बड़का वाला नोट धरा देती तो टेंशन भी होने लगता था. काहे कि हमीन तो बच्चा न थे, एतना पैसा का क्या करेंगे, इसीलिए अक्सर हमारा पैसा मम्मी पापा के द्वारा छीन लिया जाता था. इसीलिए हम मने मन सोचते रहते कि काश इस बार बड़का नोट ना मिले! माँ हर दो महीने पे जाती थी पर आते वक़्त खोंइछा लेते हुए ऐसे रोती थी मानो अब तो सालों बाद ही दुबारा मायके आना हो पाएगा.

वो गजब का समय था. बेटी-बहन हो या कोई दूसरा पहुना, मान-सम्मान में कोई कमी नहीं होती थी. कम ही साधन में लोग इतनी खातिरदारी करते थे कि सच्चाई वाला अपनापन महसूस होता था.

आज तो सब कुछ बदल सा गया है.
संबंधों से मिठास निकल सा गया है.
रिश्तों के मायने खोते जा रहे हैं.
हम तन्हा और तन्हा होते जा रहे हैं.
विकसित शहरी दौड़ में
समय से आगे जाने की होड़ में
छोड़ रहे हैं अपनो को,
तोड़ रहे हैं उन सपनो को
मोड़ रहे हैं रिश्तों से मुँह
अकेली होती जा रही है हमारी रूह!

हमारा पलामू भी इससे अछूता नहीं रहा है.

चलिए न थोड़ा पीछे चलते हैं.
अपनी चाल थोड़ी धीमी करते हैं.
अपने व्यवहार और संस्कृति को समझते हैं
मोहनभोग की खुशबु फिर से बिखेरते हैं.
यादों के समन्दर से मोती तलाशते हैं.
उलझे रिश्तों की डोरी सुलझाते हैं.

आने वाले पीढ़ी के लिए एक सुनहरी दुनिया बनाते हैं...

© Swetaanand Mishra

Tuesday, June 26, 2018

पहिले दफा


फ्लाइट से पहीला बार जतरा करइत हली। अइसे तो आज तक हिम्मत न परल रहे पर उ मुहजरौनी सेठ के बेटिया संतोषिया के का कहल जाओ, जे उ सबितवा के प्रेमी के तारिफ करे लगलक कह कह के उ त हवाई जहाज से जा हई नौकरी पर, बड़ी बड़ा आदमी हई। अब ई लाइन बाज़ी के चक्कर मे टिकट कटवा के हमहूं बैठ गेली प्लेन पर आपन जनमगदह उतारे ला।

उपरे उड़े के नाम पर तो अकबकी आउ धकधकी से हालत खराब हलक लेकिन, तबो आसपास  वलन के देख के हिम्मत बांधले हली। अब गांव जा के सब के बताहूँ ला तो होई कि कइसन लागेला, कइसन होवेला? वैसे भी गाँव के पहिला लड़का होइब जे जामल घरी से अभी तक जहाज पर चढ़ल होवे!

अब खुले के टाइम हो गेल हलक। एयर होस्टेस पूरा मुहँ बना -बना के जइसे- जइसे बतइलक ओइसे- ओइसे कर लेली। प्लेन उड़ पड़ल, जइसे जइसे स्पीड पकड़ल करेजा के धकधकी तो समझूँ  कि दू-चार दिन के बदले आझे धड़क जाई। आउर जइसहीं जमीन छोड़लक शरीरे सुन्न हो गइल।

दस पनरह मिनट बाद जा के कुछ बुझाइल, उहो तब जब हँस के एयर होस्टेस अंग्रेजी में पुछलक - कुछु लिजयेगा का? अब खा के तो चलल हली, लेकिन एतना सुंदर लईकी आके एतना परेम से पूछे आउ ना कह देब तो नरको में जगह मिली? दु सौ रुपया के दु गो सिंघाड़ा लेली मन मार के। एतना में तो 2 दिन पूरा गांव के सिंघाडा खियौति।

अब सब ठिक से चलइत हलक खाली तनी मनी कान सुसरुआइत हलक। तबे अचानक प्लेन में तनी हलचल होइल। काहे हो? काहे हिले लगा प्लेन? गिरेगा का? मरेंगे का?

'मौसम में खराबी होगी ' - एगो बगल वाला अपना कबलइति देखावे ला कहलक। तब तक हमर बगल वाला भी कितबवा में हावा भर के कूदे वाला फ़ोटो देखे लगल! ओकरो पहिले बार हलक, ई तो ओकर करेजा के धकधकीये देख के पाता चलइत हलक। एयर होस्टेसवन भी ढेरे डेराइल हलन तबो झूठे जबरी मुस्कुराईत हलन! उ सब के देख के मने-मन टेंसन बढ़ईत हलक। तब तक बगल के एगो आदमी दोसरका के कहे लगल कि - "ट्रेन एक्सिडेंट मे तो फिर भी बचने की गुंजाइश होती है पर ..."
अब एतना सुनते हम तो वीर कुंवर से लेके गाँव-गमहेल सब के गछ देली। बस अबकि बार बचा दिहें! ई ग़लती अब न होखी। ई मुहजरौनी जे न करा देलक। का मजे के ट्रेन के स्लीपर में जा हली बेडशीट ओढ़ के! इहाँ मर जाईब तो घरे बताहूं वाला के बची? सब तो मरिए जइहें! फोनो के नेटवर्क नईखे! जियो खरीदे के काम हलक? ना केकरो फोन में नेटवर्क नईखे एतना ऊपरे!

जइसे तइसे मामला ठीक होइल, तब जा के हमहुँ सोचे लगली कि आखिर उ छौंड़ी तो हमरे खातिर न एतना कइले रहे। ऊ तो ईहे ला न हमरा प्लेन के टिकट कटावे ला जोर देलक कि ओकर जान के आवे-जाये में कउनो तकलीफ न होवे। खैर ओकर गलती ना हलक!

अब तो हमरा दोसरे चिंता सतावे लागल -
"अगर हम मर जाइति ऊपरहीं तो का कभी हमर सन्तोसीया जाने परतक कि हम मरे-मरे घरी ओकर बारे में का सोचईत हली? आउ पता नहीं केतना दिन के बाद ओकरा हमर मरे के खबर मिलतक, शायद नहियों मिलतक! पता नहीं उ केतना दिन तक हमर इतंजार करतक ...?"

इहे सब सोचते रही कि ओने से आवाज़ आइल-" अपनी कुर्सी के पेटी बांध लें विमान लैंड करने वाली है"

बेल्ट बांध के हमहूं भगवान के नाम लेवे लगली। कि बस इहे पहिला आउ अंतिम बार रहे ई अगिया फूंकाव आसमान में उड़े वाला यात्रा के। जइसहीं उतरली, उतर के धरती माई के परनाम करली। आउ घरे पहुचते, बघउत बाबा के दूसरे दिन जोड़ा घोड़ा चढ़वाईली।

जान में जान आ गेल आउ हमार जान भी सब जान गेल!

© पूटेसर कुमार

ढिबरी


शाम के टाइम हो गईल हलक,  बड़की दादी ललटेन आउ  ढिबरी लेके बइठल हलक  साफ करे ला। उहे जगह देखली कि फुआ के  बेटा बड़ी ध्यान से एक जगह बइठ के उनका देखइत हलक,  उ भी ऐसे जइसे कोई जादू चलइत  होवे। आउर एकर में बेचारा के ग़लती का हलक, उ जन्मे लेले रहे ई  लाइट बत्ती वाला जमाना  में। ओकरा कभी मौके न मिलल रहे इसब देखे के। आउर जब अभी देखइत हलक तो एकदम नाया बुझाइत हलक  कि कईसे ई  ललटेन जे इतना जटिल देखाला उ खुल जाइत बा एक- एक करके।  शुरू-शुरू में तो हमनियो बड़ी धेयान से देख हली कि कईसे ललटेन के सीसा का साँचा ओकरा  बाएं दाएं जाये  से तो रोकेला। आउ तो आउ  ऊपर से ओकरा दबा के रखे वाला भी कइसे एतने जोर देव हलक कि सीसा न फुट हलक। (केतना बार तो सही से न बइठला पर  एको मिनट के देर ना होइतक फूटे में)

दादी सब के अइसे भी सांझी बेरा रोज - रोज के इहे काम रह हलक। घर भर के ढिबरी ललटेन लेके एक जगह बईठ जइतन। सब के तेल बाती देख के फिर ललटेन के सीसा चमका के साफ कर हलन। उ टाइम सर्फ़ रह हलक पर गोइठा के राख से भी बड़ी बढिया चकाचक साफ हो जा हलक। एक दो बार लइके में कोशिश कइले हली तो एक तो हाथों कट गेल हलक ऊपर से ओइसन साफ न होइल हलक।बाद में फिर सिखते- सिखते आदत हो गईल तब दिक्कत न होइत हलक। ओइसे भी शाम के कवन लइका जल्दी लालटेन  जरा के बइठत बा पढ़े ओकर बड़ाईयो बड़ी होव हलक। कै बार तो आसपास वाला भी उदाहरण देव हलन कि फलनवा के लइका के देखली छवे बजे से ललटेन     जरा के बइठ गइल हलक आउर इसब का जनी कब बेरा होई पढ़े के ।

आउर  ढिबरी के  तो बाते अलग रहे, समझ लिहुँ कि उ  जमाना  के  बजाज प्लेटिना रहे।  सबसे ज्यादा माइलेज वाला आइटम।  हर घर ढाबा में ओकरा रखे ला जगह   फिक्स रह हलक। कहूँ लकड़ी के स्टैंड जईसन तो कहीं डोरा लटकावल रहईत  हलक। मने अगर कोई कहतक  कि उ घर के ढिबरी ले के आव तो आँख बंद कर के जायेला हलक आउर उ जगह से उठा के लेआवेला हलक। अब तो इन्वर्टर और बिजली वाला जमाना बा। आज के लेडिस तो #ढिबरी के बाती बिट दे वही बहुत बा बाती लगा के ढिबरी जलाना त बड़ी बड़का बात हो गईल।

आउ एगो बात बटम दबा के लाइट जलवे तो दादियो सिख गेल हलक तनी रउआ सब भी ढिबरी जलवे सिख लिहुँ।

© Anand Keshaw

Thursday, June 21, 2018

GLA कॉलेज का शिव मंदिर


ये 1978 की बात है। जी.एल.ए.कॉलेज होस्टल के सुपरिन्टेन्डेन्ट क्वार्टर में हम दोनों बहनों की जिन्दगी मजेदार गुज़र रही थी। मेरे पापा श्री Suryakant Chaudhary तब वहाँ सुपरिन्टेन्डेन्ट के पद पर थे।

1978 की वो शाम, मैं पापा की गोद में ट्रक में आगे बैठी हुई निहार रही थी कॉलेज एवं हॉस्टल की सरस्वती पूजा के पश्चात प्रतिमा विसर्जन हेतु कोयल नदी की ओर प्रस्थान का विहंगम दृश्य को। पापा ट्रक चालक को सामने से आती ट्रक के विषय में सावधान कर रहे थे। पास आते ही एक दूसरे पर टमाटर फेंकने का खेल आरंभ कर दिया दोनों ओर के युवाओं ने।आज के सुप्रसिद्ध स्पेन के 'टोमैटिना फेस्टिवल' का विशुद्ध देसी स्वरूप था ये।

मैं तब बमुश्किल पांच वर्ष की रही होऊंगी, हो सकता है कि कुछ डिटेल्स विस्मृत हो गए हों। बहरहाल, पूजा समाप्ति के बाद सारा लेखा जोखा पूर्ण होने पर पापा ने पाया कि पूजा के लिए एकत्रित कुछ राशि शेष रह गई थी। क्या किया जाए इस चंदे के पैसों का? अंततः होस्टल कैम्पस के पूर्वी कोने पर एक शिव मन्दिर बनाने की योजना मूर्त रूप लेने लगी। जाने क्या सोच उभरी होगी पापा के मन में। पर आज समझ पा रही हूँ कि कितनी दूरदर्शिता थी उनमें! युवाओं के बीच एक आध्यात्मिक वातावरण पैदा करना, मानसिक सुद्ढता प्रदान कर कुत्सित विचारों से से दूर रखने का प्रयास, शायद अपनी सांस्कृतिक धरोहर और संस्कार की रक्षा करने का इससे बेहतर प्रयास शायद कुछ और हो ही नहीं सकता था।

फिर मैं साक्षी बन गयी उस अभियान की। हाथ में कुदाल और फावड़ा लिए पापा के साथ छात्रावास के सारे छात्र उमंग से सराबोर थे। खुद अपने हाथों से निर्माण की प्रक्रिया का भागी बनना, सच में सृजन से बड़ा सुख शायद कुछ और नहीं। यह भी उनके जीवन का एक बहुत बड़ा पाठ रहा होगा जो कि पापा ने अपने उदाहरण से उन्हें सिखा दिया। हम दोनों बहनों ने भी अपने छोटे छोटे हाथों के सहारे उस अभियान में शामिल होकर खुद को सौभाग्यशाली समझा था।

आगे बस इतना याद है - एक तिकोने गुम्बद से सुसज्जित एक छोटा किन्तु विशाल संभावनाओं को समेटे सफेद संगमरमर का शिव मंदिर तैयार हो गया। सामने भक्तों के बैठने के लिए काफी बड़ी परिधि का एक सफेद चबूतरा भी था। फिर गुम्बद पर एक सुन्दर त्रिशूल भी लगाया गया। शिव की नगरी वाराणसी से मूर्तियाँ मंगाई गई जिनमे भोलेनाथ के साथ-साथ उनका सारा परिवार था। शायद वो सावन की पूर्णिमा थी, झमाझम बारिश और प्राण प्रतिष्ठा का आयोजन, मंत्रोच्चारण करती श्रद्धालुओं की भीड़ और एक मेला जैसा माहौल - बचपन की धुंधली यादें इतना ही बता पाती हैं।

फिर तो वहां रोज सुबह शाम पूजा-अर्चना होने लगी। मन में अपने भविष्य के सपने लिए छात्र तो आने ही लगे, पीछे के गाँवों से आते-जाते ग्रामीण भी वहां रूक कर जरूर प्रणाम करते। हमारे लिए तो वह मंदिर क्रीड़ास्थल, विश्रामागार, सब कुछ हो गया था।
वहीं मैंने जाना कि जेठ के महीने में शिव की उग्रता को शांत करने के लिए घड़े में जल रखा जाता है शिवलिंग के ऊपर जिससे लटके सूत से बूंद टपकते हैं लगातार।

रिटायरमेंट के बाद पापा हम सबको लेकर अपने घर, चरखी भट्टा के सामने वाली गली में ले आए। फिर तो हम वहां गाहे बगाहे ही जाते थे। पर शिवरात्रि के दिन हर वर्ष झंडा लगाना और पूजा करना मेरे परिवार के नियमों में शामिल हो गया है। पापा कहते हैं -" गणेश लाल अग्रवाल कॉलेज में बिताया समय मेरे जीवन का स्वर्णिम काल था।"

बीच में मन्दिर जीर्ण-शीर्ण अवस्था में आ चुका था। वहां जाने पर अत्यंत दुःख का अनुभव होता था। पर ईश्वर शायद भक्तों की मनोभाव समझ लेते हैं। कॉलेज कैम्पस में अवस्थित CRPF की छावनी ने मंदिर का जीर्णोद्धार करके पुनः उसकी गरिमा लौटा दी है। अब देखरेख भी CRPF के जवान खुद करते हैं। चारों ओर फूल पत्तियों के लग जाने से उसकी हरियाली और निखर गयी है।

तो यह थी जी.एल.ए.कालेज के शिव मंदिर की कहानी, एक पांच वर्षीय बालिका के दिल की जुबानी। यह बात और है कि आज वह बालिका उम्र के कई पड़ाव पार कर चुकी, पर है तो अब भी ठेठ पलामू।

© Priyanki Mishra
Photographs : Sunny Shukla

पढ़ाई के बदलईत स्वरूप


हाँ एगो बात बा कि पहिलका पढ़ाई-लिखाई आउ अब के पढ़ाई-लिखाई में अकाशे-पताल के अंतर बा। पहिले के पढ़ल हमार माई मिडिल फेल रहे, पर उकर जानकारी के जोड़ आउ प्रश्न के जबाब हमनी भाई लोग के काबिल एम.ए. पास मेहरारूओ के पास  नइखे। मने रउरन सब हमनी के मौगी के ज्ञान पर संदेह मत करब, ई त हम बात के उतारू बात बतौले ही।

हमार माई बचपन मे ठंढा में सुबह सुबह कुईआं पर बर्तन मांजत रहतक आउ हम उहंई दत्ती पर बइठल-बइठल घामा तापते-तापते भर में तीस तक पहाड़ा रट लेले रही। साथे-साथे अढैया_डेढ़ा_सवैया भी माई हमरा मुंहजबानी याद करा देले रहे। उ चूल्हा में चिपरी पर खाना बनावइत रहित और हमरा चूल्हा भीर बैठाके प्राथमिक शिक्षा देवईत रहतक। आज ओकरे देवल ज्ञान से हम आपन  सुखी जीवन बितावत हिये।

आउ एक तरफ आजकल के मौगीन हथ जे बिना कैलक्यूलेटर के 'चार नावाँ' और 'सत सते' भी बतावे के हालत में नइखन, 'पाव_असेरा_पसेरी_मन' के त गोलीए मारल जाव। आउ त आउ, एक बार सोचली कि आज के मेहरारू सब अंग्रेजी मीडियम के हवा पानी के बड़ीन तो घर के एगो मेहरारू से पुछली कि कइसे जानब कि फलनवा साल में फरवरी केतना दिन के बा? 28 के कि 29 के? त उ माउगो धड़ाक से जबाब देलिन कि- "एकरा में कोउन मेहनत बा! कैलेंडर में देखलेब!" इ सुन के हमार करेजा बाग-बाग  हो गइल! इहे बा पढ़ाई लिखाई में बढोत्तरी?

आज के सबे महतारी आपन बच्चा के LKG से ट्यूशन लगा दिहें, काहे कि अपने पढावे के सहूर आउ काबिलियत नइखे। दोसर बात इहो बा कि टीसन पढ़े के नकलची रेसा-रेसी भी मचलबा। सब के शिक्षा और साक्षरता में फर्क नईखे बुझाइत। बेटा-बेटी के महंगा_स्कूल में पढ़ावे ला एगो फैशन बन गेल बा।लेकिन कोई माई आपन लईकन साथे बइठ के जीवन के ज्ञान ना सिखइहें जे कि उ आपन अनुभव से सिखले होईहें। आजकल के सब स्कूल भी तो खाली किताबी-किड़ा बनावे वाला फैक्ट्री हो गइल बा। सोचल जाव एकर बारे में।

आज के जनाना के खाली कान में इयरफ़ोन लगाके खाना बनावे के बा आऊ शॉपिंग चाहे टेलीविजन के सीरियल। लइकन के परवरिस में भी इ फैशन रोड़ा बनल बा। आज के छोट मासूम बच्चवन के तो इहो लागेला कभी-कभी कि उनकर जन्म माई के पेट से नइखे भइल बल्कि उ फ़ोन से डाउनलोड होइल बड़न। काहे कि उ आपन 'मम्मा और डैड' के दिन रात 'व्हाट्सएप्प और फेसबुक' से चिपकल देखले बड़न। (यहां पर मेरा मकसद आज की पढ़ाई व्यवस्था पर टिप्पणी है, न कि महिला शिक्षा पर)

लेकिन आज के लइकन के सामान्य ज्ञान में बेसे बढ़ोतरी भइल बा। ओकर एगो उदाहरण देवत ही। हमार एगो छोट भाई जे हमरा से छह सात साल के छोट बा, उ जब 8वाँ/9वाँ में रहे, ओकरा से पुछल गेल कि गाय के बछड़ा के जन्म कइसे हो ला? तो उ घरी उ बतावत रहे कि गाय के पूंछ के महुआ के पेड़ तर गाड़ देला से गाय के बछड़ा हो जाला! असल में भइल इ रहे कि हमार घर के गइया महुआ के पेड़ तर बियाइल रहे। भाई उहे देखले सुनले रहे तो उहे बात ओकर मन मे बइठ गेलक।
आउर अब  के  2रा/3रा क्लास में पढ़े वाला बुतरू तो पूरा 'प्रजननकाल से लेकर शैशवकाल तक' वर्णन कर दिहें! नेट अखबार आउ टीवी के सहारे दिन दुनिया के औसत जानकारी जरुर बढ़ गेल बा उ सब में। लेकिन जीवन खाली जानकारी के सहारे नहीं न चली, ओकर ला संस्कार आउ सहुर के भी ओतने आवश्यकता बा। 'जानकारी' आउ 'बुद्धि' दूनो अलग अलग चीज बा जइसे कि' साक्षरता' आउ' शिक्षा'! एकर बारे में सत्यान्वेषी जी आपन अगला आलेख में विस्तार से बतइहें।

तो हम बतियात रही आज कल के पढाई के बारे में। भले आज के विद्यार्थी आंकड़ा के धनी हथ लेकिन ई शिक्षा व्यवस्था उ सब में संस्कार आउ व्यावहारिक समझदारी नईखे डाले पारइत। उ आपन माई के 'वाइफ ऑफ डैड' और पिताजी के 'हस्बैंड ऑफ मॉम' भी कहअ लन! आउ न जाने का का कहअ लन! लेकिन सबसे खराब बात ई बा कि ओकरे में हमनी माता-पिता अपने आप के गौरवान्वित महसूस करीला कि हमार बच्चवन पूरा अपडेट बड़न। ई सांस्कृतिक_प्रदूषण के प्रथा रुके ला चाही। हम आधुनिकता के विरोधी एकदम नईखी। बस अंधानुकरण के साजिश के रोके के जरूरत बा। आपन जड़ से जे कट जाई ऊ समाज आपन अस्तित्व भी ना बचावे पारी आने वाले समय में। देश के कै गो जनजाति और भाषा लुप्त हो गेलन ईहे कारण।

खैर ई हमार विचार रहे, फिर कुछुओ नया अचेतन मन से चेतन में लावे पर रउआ सब के सामने परोसब। आप सब के कइसन लागल, जरूर टिप्पणी करब।
जोहार!

© Dinesh Kumar Shukla

Sunday, June 17, 2018

अगर आप सकारात्मक जीवन जीना चाहते हैं तो...

हम से जुड़ने के लिए धन्यवाद! आभार आपका.

जी आपने सही पहचाना. वर्तमान में मीडिया से लेकर सोशल मीडिया तक नकारात्मक आलेख से भरा पड़ा है. जिधर देखिए कुछ न कुछ कमी है, अव्यवस्था है, हिंसा है, नाकामी है, अपराध है, भ्रष्टाचार है.

हम उनसे आँख नहीं मोड़ सकते! लेकिन दिन रात सिर्फ नकारात्मकता से घिरे होने पर हमारी प्रवृत्ति भी नकारात्मक ही हो जाती है.

इसीलिए ठेठ पलामू की परिकल्पना ही है सकारात्मक जीवनशैली का विकास और प्रसार. एक ऐसा मंच जहां आपको सुकून मिले, अच्छा फील हो, जीने का जज्बा मिले, सपनो को उड़ान मिले, यादों की कालीन बिछी हो, भावनाओं की नदी बहती हो. थोड़ी हंसी ठिठोली हो, मुस्कुराहट के लम्हे हों, प्रेम का नगमा हो, देहात की सुगंध हो, माटी का मोह हो, बोली की मिठास हो....

सब कुछ बस अच्छा अच्छा हो...

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