Wednesday, June 6, 2018

ठेठ पलामू : 90 साल पहिले

वैसे तो पलामू का कोई लिखित प्रामाणिक विस्तृत इतिहास कहीं उपलब्ध नहीं है. लेकिन इस पेज के एडमिन साहब को इतिहास में गहरी रुचि है. उनका मानना है कि इतिहास को किताबों से आजाद करने की जरूरत है. 'इतिहास के पन्ने' शब्द ही एक धोखा है. दरअसल इतिहास दस्तावेजों में नहीं बल्कि हमारे इर्द गिर्द कई रूपों में मौजूद है, बस नजर चाहिए उनके अस्तित्व और महत्व को समझने की.

तो फिर क्या! हम सब लग गए वक्त की खुदाई में, और पहला खजाना मुझे अपने घर में ही मिल गया! मेरी आजी 105 साल की हो गई है! ये तो जीती जागती किताब ही न है, उनसे बेहतर किताब क्या होगी पलामू के इतिहास के लिए. एडमिन जी कहते हैं कि इतिहास सिर्फ राजाओं का नहीं होता, बल्कि आम इंसान, परिधान, पकवान, जुबान, मकान, स्वाभिमान और गीत गान का भी होता है. चलिए वक्त के दरवाजे खोलते हुए गुजरे वक्त के सफर पर चलते हैं, आज के लिए हमसफर हैं मेरी आजी!

पेश है उन्ही की जुबानी, करीब 90 साल पहले के पलामू की कहानी.
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"जब हम 9 साल के रही तबे हमर बियाह हो गईल. आउ 91 साल तक हम उनकर साथे रहली लेकिन अब कुछ साल से अकेलहीं न ही! बियाह के बात ओतना त नइखे याद, लेकिन तहिया ढेरे पानी बरसत रहे. घर बगीचा गुड़िया अंगना सब छूटत रहे, एगो बरसात ऊपर से तो दोसर बरसात हमर दिदा में से टपकत रहे. लेकिन एक बात के हूलस रहे कि डोली पालकी में बैठ के जाएला बा! एही ला खुश रही. बचपन से सपना देखावल जात रहे कि एक दिन...

ना हो, नाम ना धरब! भैंसुर के, ससुर के और उनकर नाम नई लेवल जाला. पाप होखे ला. आजकल के फ़ैशन जे होखे, हमनी के तो सौ साल साथे कट गइल, कहियो नाम लेवे के जरूरत नहीं पड़ल. त इहे ला तू पपीता के रड़मेउवा आउ जूही के रूही बोल ही हम.
 
पहिले एतना गाड़ी घोड़ा थोड़े रहइ! केतना बार त पैदले आ जात रही लालटेनगंज. अब न गाड़ी घोडा हो गईल त तोरिन के दुओ कोश चले में मुश्किल बुझा ला! हमीन त चल लेवत हली अराम से. उ रहत रहन नौकरी पर त रेंगन के ले के हम अराम से चल जात रही कनहु. पहिले एतना डरो भय ना रहे. जादे सामान होला पर बैलगाड़ी में लाद के ढोआत रहे. बैलगाड़ी में लालटेन टाँग के रात भर में कहाँ से कहाँ पहुँच जात रही. लेकिन नईहर केतनो भीरू होखो तीन चार साल में कहीयो जाय के मौका मिलतक. उनका भीर एगो घोड़ा रहे, तो ओकेरे से सगरो घुम हलन. नाह, कनेया न हली हम, कहीयो माथा से अंचरा हिललक ना, तो हम कइसे घोड़ा पर बैठती. आउ लाजो लाग हलक! कइसे आजकल के मेहरारू सब मोटर साइकिल पर बैठ के जा हथीन? तोहर आजा एक बार चूपके से हमरा साइकिल पर बइठइले हलन....

अंग्रेजवन के बारे में सूनइत हली खूब सब से लेकिन भेंट मने सामना समनी बहुत कम, एक आध बार के याद बा देख ले रही. देश आजाद होईल रहे तो गांव में नाच-गाना के प्रोग्राम आउ पुजाइ हो के देवता के भंडारा होइल हलक. उ सब छउनी(लेस्लीगंज) में रहत रहन, ओने से सब पार होवत हलन त हमीन गाड़ी के पीछे-पिछे दौड़त रही जब नन्हे गो हली तब...

आगिया फूंकाय ई मोबइल! सब के का जनी का सूर सवार रहेला कि दिन रात एकरे में ढूंकल रह हथ सब! मने मूंहा मूंही न बतिया सक हथ? उ जमाना में
चिठ्ठी-पतरी होत रहे पहिले. अब न तोरिन के हाली हाली हाल-चाल भेंटात जात बा! उ जमाना में पहिले हँकवा के भेजत रही डल्टेनगंज मदन के हाल समाचार ला, चाहे चिठ्ठी लिखा के आवत रहे त उहे पढ़वा के सुनअ हली. मरनी ढहनी के चिट्ठी तो घर के भीतर ढूंकतो नहीं रहे, पढ के बहरीए बहरी फाड़ के फेंका जात रहे. फिर पढे वाला नहा धोके घरे घूंसअ हलन.

डाल्टनगंज में एतना घर मकान नइ रहे हो. खाली कोट कचहरी आउ कौलेज करे सब जा हलन. बाकी सब तो गांवे में रह हलन. ढेर काम रहे इहंउ. कोई कोई कमाये जा हलन बाहरे, लेकिन बड़ी डरे डरे. कोई खोज खबर नई न मिलत रहे, कै गो तो वापसो नइ अइलन!

नदी में बाढ़ अइला पर एने के आदमी एनहीं रह जईतन हफ्ता भर तक. कभी कभी नाव चल हलक कहंउ कहंउ. बिजइया बहू नाव सहिते न बह गेल रहे, आज तक कोई खोज खबर नई मिललक. बेचारी नामो नई जानअ हलक आपन ससूरा में केकरो. फिर बिजईयो पगला गेल रहे, केतनो झाड़ फूंक होला से ना सूधरलक, एगो जोगी ले गेल हलई का तो मंतर मार के? कह हथीन कि अब उ कासी में महंत बन गेल हई!

हमीन के स्कूल उसकूल नई भेजत जात रहे. अखबार गांव भर में एगो घर आवत रहे. एक आदमी पढअ हलन आउ सब गोले बइठ के सून हलन. रेडियो अइला पर तो लहार बहार हो गेल रहे. नेहरू जी के भाषण सूने घरी तो मेला लग जात रहे.

गोदना गोदवावल जात रहे सब जनाना के. एगो अहीरीन तो काजनी कैसे मर गेल हलक गोदना गोदवावे घरी, दरद नइं बर्दाश्त करे पारल होई. लइका होवे घरी भी कै गो जनानी नइं बचे पार हलन. कै गो के तो लइको छठी के पहिलहीं साफ हो जा हलन. डाइन बिसाहिन कर देव हलथीन न ढेरे!

50-60 आदमी के खाना बनाव हली अकेले! बेहोश भी हो गेल रही कै बाजी! लकड़ी के चूल्हा होत रहे सब घर आउ हमार घर कांसा(फूल का)के हड़िया(बटलोही), तनी भारी रहे! दहेज में न मिल हलई भारी भारी फूल के बरतन. इमन आजकल सब कागज प्लास्टिक आउ टीना अलामउनाम के थरिया यवमें खाय के शौक चढ़ल हइ सबके!

दहेज में एगो परिवारो मिलल रहे हमरा साथ. सेवा खातिर,  2 बीघा जमीन दे के आउ घर देके बसावल गेल रहे ओकरा।

ढेर बात बा बाबू! का का सूनब? अब उ सब दिन घूर के थोड़े न आई? ऊहो तो चलीए गेलन, हमहूं चल जाइब कोनो दिन उनके भीर. उनकरे लगावल आम के रूख बा ई जे सोझे देखात बा न, जेकर में से तोड़ा के आइल रहे अचार धराए ला! उहो खूब अचार के शोकिन रहन न.... "

फिर उनको आँखों में आँसू डबडबा गये. हम भी बात बदलकर उनको चाय पिलाने लगे. फिर कभी साथ बैठेंगे तो और कुछ सुनाएंगे. तब तक आप लोग भी अपने घर के बूढ़े बुजुर्गों के साथ समय की यात्रा पर जाइये और उन नायाब यादों को हमारे साथ बांटीए ताकि हम मिलकर उन लम्हों को सहेज सकें, इतिहास को नए सिरे से समझ सकें पन्नों के बाहर भी!

© Sunny Shukla

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