Saturday, June 16, 2018

मेरा गाँव सिंगरा डाल्टनगंज

© Ajay Shukla

यह गांव हमारे लिए श्रद्धा की भूमि है। यहीं पर पिताजी का जन्म हुआ, माँ दुल्हन बनकर आयी, यहीं बड़े भाई-बहनों का जन्म हुआ था। बाबा, परदादा और न जानें उनकी कितनी पीढ़ियों ने यहाँ जन्म लिया था शायद इसीलिए गांव के अधिकांश चेहरे जाने-पहचाने लगते थें। उन्हीं के संबंधियों और संतानों से उत्पन्न वंशजों के परिवार को आज अधियार, चरघरा और छौघरा के नाम से जाना जाता हैं।

अपने गांव से जुड़ी हमारे पास ढ़ेर सारी स्मृतियां हैं। अपने बाबा और उनके भाईयों की कहानियां हैं। जिनमे शामिल हैं - पिताजी, चाचा,बुआ और बड़े भाई-बहनों के किस्से, जिन्हें सुनकर हम बड़े हुए।

मेरे जन्म से बहुत पहले पिताजी नौकरी करने दूसरे राज्य में जा चुके थे। बाद मे मंझले चाचा भी दूसरे देश के निवासी बन गए। पहले हम सब कोयल नदी के किनारे रहते थे जिसे अब डीह कहा जाता है। बहुत भरा पुरा संयुक्त परिवार था। बाबा चार भाई थे और पूरे घर मे पांच चाचा और बारह फुआ थी। घर की मुख्य मालकिन बाबा की माँ थीं, जिन्हें घर में सभी अईयों कहते थे।

वह अंग्रेजों का शासन था।डाल्टनगंज में बाबा हेल्थ इंस्पेक्टर थें। बारह रुपया माहवार वेतन थी। अपने पिता की मृत्यु के बाद घर और खेती-बाड़ी की जिम्मेदारी के कारण उन्होंने नौकरी छोड़ दी क्योंकि और बाबा लोग बहुत छोटे थें।

माँ बताती है कि मेरे जन्म से कुछ वर्ष पहले कोयल नदी में भीषण बाढ़ आयी थी। जिसमें हमारे पुराने घर को बहुत नुकसान हुआ। नदी किनारे के हमारे खेत अथाह बालू से दब गए। बाद में ऊपर सड़क के किनारे जहाँ हमारा भंडार था, छोटे बाबा वहीं रहने चले गये और फिर बाबा ने वही पर घर बना लिया था। मेरा पहला परिचय उसी घर से हुआ था। सामने बड़ा सा दालान, लंबा ढ़ाबा फिर बीच में बड़ा आंगन और उसके चारों तरफ ढाबा और उसके पीछे छोटे-बड़े कमरे। ढ़ाबा को दखिने-पूरबे आदि दिशाओं के नाम से जाना जाता था।

गर्मी_की_छुट्टियों में जब हम अपने गांव जाते थे, तब दंवाई-छंटाई का काम होता था। घर के सामने बाड़ी को साफ कर गोबर से लीपा कर खलिहान बनता। वहीं पर चौकी और खटिया बिछी रहती थी। घर के सामने से गुजरने वाली बड़ी-बड़ी गाड़ी, गाना बजाते हुए टेम्पू हमारे आकर्षण के केन्द्र हुआ करते थे। सड़क पर कोई भी बस रुकती तो कौन उतरा, कौन चढ़ा- यह हमारी जिज्ञासा का विषय रहता था।

सबसे मजा तो रात में आता जब थोड़ी दूर रेललाईन पर रोशनी से चमकती रेलगाड़ी के डिब्बे दिखलाई पड़ते थे और हम उन डिब्बों को गिनती कर बेहद खुश हुआ करते थे। तब चाचा बताते  कि - "अरे। इsतss पलामू एक्सप्रेस बा। आज बहुत लेट आइल बा"। उसी समय से हम सभी बच्चे हावड़ा ,पलामू, लोकल और मालडिब्बों के समय और अन्य जानकारियों से अपने सामान्य ज्ञान का इजाफा करते रहते थें।

रात को बाबा नयी-नयी कहानी सुनाते थे। हम घने अंधेरे में चमकते चांद को देखकर खो जाते तो कभी तारों को गिनते तो कभी उड़ते हवाई जहाज की रोशनी देख खुश हुआ करते थे।

हमारे दूसरे आकर्षण का केन्द्र था घर के पीछे बहने वाली अमानत_नदी। जहाँ नदी किनारे तरबूजा और ककड़ी की फसल लगी रहती थी और वहां के लोग हमें गउआं बोलकर प्यार से खाने को ताजे फल और सब्जियां दिया करते थे। नदी के रास्ते में ढ़ेर सारे बैर के पेड़ थे। बेहद बड़े-बड़े और स्वादिष्ट बेर को तोड़कर इकट्ठा कर लिया करते फिर बालू के घरौंदे बनाकर अपनी वास्तुकला का परिचय देते और फिर नदी में नहाने के नाम पर लंबे समय तक घमाचौकड़ी करना हम सभी का प्रिय शगल था।

स्कूली दिनों में दशहरा दीपावली की लम्बी छुट्टी में #रहरेठ और लकड़ी के टुकड़ों को जला कर तापने में गजब का आनंद मिलता था। बूट_का_साग और सगहर(चावल के अरिहन के साथ चने की साग की रोटी) हमारा पसंदीदा व्यंजन था। खेत से हरे मटर और चने को इकट्ठा करके, उसके दाने निकालना फिर स्वादिष्ट #घुघनी का स्वाद हमारे दिलोदिमाग में आज भी ताजा है।

वो मलाई बर्फ़ की पोss-पोss, जलेबी वाले की घंटी की आवाज सुनकर दौड़ कर उसे बुलाना और फिर सामने वाले महंगु बाबा की गुमटी की यादें भी ताजा हैं जहाँ तामी भर अनाज (चना,मटर) में मुंहमांगी चीजें मिल जाती थी क्योंकि बाबा-आजी के रहते घर में किसी की हिम्मत भी नहीं थी कि घर में कोई, किसी प्रकार की रोक-टोक करे।

घर से थोड़ी दूर पर लगने वाले उस #शिवरात्रि के मेले को कैसे भूल सकते हैं। जहाँ लकठो, पियाव (बालूशाही) और सिंघाड़ा(समोसा) को खाने में जो आनंद मिलता था उसे शब्दों में बखान करना संभव नहीं है। रंग-बिरंगे खिलौने, कपड़े और मिठाई की दुकानों से भरे हुए उस मेले की बहुमूल्य स्मृतियां आज भी हमारे बचपन को जीवित कर देती है।

बचपन के दिनों में वह रामलीला, वह यज्ञ और गांव के बारात में आने वाले नाच पार्टी ऐसी अमूल्य यादें हैं जिस पर लिखना शुरु करें तो न जाने कब तक लिखते चले जाएंगे।

कोयल और अमानत नदी के किनारे दूर-दूर तक हरी सब्जियों से भरे खेत, दिन भर रेलवे क्रासिंग के पास बैठकर ताशपत्ती खेलते हुए बेफिक्र लोग, एक से बढ़कर एक किस्से कहानी सुनाने वाले बिंदास बुजुर्ग इस गांव को शानदार बनाते हैं।

गांव का पेट्रोल पंप, ढ़ाबा, स्कूल, आईटीआई कॉलेज, बड़ी-छोटी दुकानें, छोटी फैक्टरियां और छोटे-बड़े सुन्दर घर के साथ यहाँ के मददगार और मिलनसार लोग इस गांव की शोभा बढ़ाते हैं।

हाँ! लगातार विकसित होते जा रहे इस गांव में अपनी संस्कृति और परंपरा के प्रति उतना ही सम्मान है।आज भी सिर्फ बुजुर्ग ही नहीं बल्कि युवा भी दरहा बाबा से मन्नत मांगते है। डाल्टनगंज आते-जाते लोग यहां के चिरकुटिया दाइई को प्रणाम करते हैं और अपनी मन्नत पूरी होने पर अब सिर्फ लाल चिरकुट (कपड़ा) ही नहीं बल्कि सुंदर लाल चुनरी बांधते हैं।

इस गांव के युवा यज्ञ करवाते हैं, प्रवचन सुनते हैं और जोर-शोर से रामनवमी का जुलूस भी निकालते हैं।यहाँ तक की गांव से निकलने वाले तजिया के जुलूस में सभी सहयोग करते हैं।

इस श्रद्धेय भूमि का निवासी होने पर हम सभी को गर्व है और हमारी आने वाली पीढ़ी भी गौरवान्वित होती रहेगी।

No comments:

Post a Comment