Tuesday, June 12, 2018

पलामू का इतिहास: भाग 2


हिन्दू धर्म ग्रंथों में इतिहास को चार युगों में बांटा गया है – सतयुग,त्रेता, द्वापर और कलियुग. सतयुग यानि राजा मनु, त्रेता यानि रामायण युग, द्वापर यानि कृष्ण का काल और कलियुग का आरम्भ महाभारत में परीक्षित की मौत से माना जाता है.

मगर आधुनिक इतिहासकार अपनी सुविधा के लिए मानव विकास के प्राचीन भाग को जिन चार भागों में बांटते हैं वे हैं – पाषाण युग, ताम्र युग, कांस्य युग और लौह युग. इसके बाद मध्यकाल और आधुनिक काल आता है. हम अपने देश के इतिहास में 600AD तक का काल प्राचीन भारत, अंग्रेजों के पहले तक मध्यकालीन भारत और उसके बाद को आधुनिक भारत के नाम से जानते हैं.

हम कोशिश कर रहे हैं पाषाण युग से वर्तमान यानि प्लास्टिक युग तक के पलामू के इतिहास को जानने की. आज चर्चा प्राचीन काल खंड की. यहाँ एक बात समझ लें कि मानवीय सभ्यता के विकास की गति देश के हर हिस्से में एक जैसी नहीं थी. एक तरफ जब मगध साम्राज्य स्वर्णयुग की तरफ बढ़ रहा था उसी समय झारखण्ड की कई प्रजातियाँ जंगलों में पाषाण काल में ही जीवनयापन कर रही थी. फिर भी इतिहास की बेहतर समझ के लिए पुरे काल खंड को हम इस प्रकार बांटते हैं-

पाषाण काल– 20 लाख से 10 हजार BC तक
नव पाषाण काल– 10 हजार से 4 हजार BC तक
ताम्र युग– 4 हजार से 3 हजार BC तक
कांस्य युग-3 हजार से 1500BC तक
लौह युग– 1500 BC से 500 AD तक

ध्यान रहे कि यह विभाजन हमारी सुविधा के लिए है, अलग अलग इतिहासकारों ने अपने हिसाब से कालखंड को कई तरीके से बांटा है, और विद्वानों में मतभेद होना तो भारत में कोई नई बात नहीं है. अब हम हर कालखंड में पलामू को देखने की कोशिश करते हैं.

#पाषाण_युग (स्टोन एज) का आरंभ आज से करीब 20 लाख साल पहले यानि वह समय जब धरती पर नियंडरथल की जगह होमो सेपिएन्स आये. पहाड़ों गुफाओं में रहते रहते हमने समूह का निर्माण सीखा था. शिकार के लिए पत्थर के औजार और आग को खोज लिया था हमने. चुकि इस युग के बारे में अधिकतर जानकारियां धुंधली हैं, कोई लिखित विस्तृत प्रमाण नहीं हैं हमारे पास इसीलिए इतिहासकार इस युग को प्रगैतिहासिक काल यानी प्री-हिस्टोरिक एज भी कहते हैं. इसी काल में सातो महादेश एक दुसरे से अलग हुए थे लावा के ऊपर तैरते अपने प्लेट के खिसकने के कारण. इसके पहले तक समूची धरती एक साथ थी और सारे महासागर एक साथ. हिमालय जैसी ऊँची पर्वतमालाओं का निर्माण भी इसी दरम्यान हुआ होगा. तो क्या इस काल में पलामू और उसके आसपास के क्षेत्र निर्जन थे? जी नहीं. हजारीबाग के ‘इसको’ में समतल पत्थरों पर उकेरे हुए चित्र मिले हैं जो पूरापाषाण काल (पेलियो लिथिक एज) के प्रतीत होते हैं. झरिया में भी कोयला खदानों से पत्थरों के औजार बरामद हुए हैं जिनका प्रयोग आदि मानव शिकार के लिए करते होंगे. चाईबासा के चक्रधरपुर, बुढाडीह तमाड़ और सिंहभूम के लोटापानी बरुनी में भी इसी काल के पत्थरों के औजार मिले हैं.

रांची जिला के बसिया में तांबे की बनी करीब 4 हजार साल पुरानी एक कुल्हाड़ी मिली है. ऐसी ही कुल्हाड़ी तथा कई और औजार पलामू के पाटन में भी खोजे गए हैं. अर्थात #ताम्र_युग में भी यह क्षेत्र मानव सभ्यता के विकास की कहानी गढ़ रहा था. गढ़वा जिला के भवनाथपुर में कैमूर की पहाड़ियों में गुफाओं में अजीबोगरीब चित्रकारी मिली. ध्यान से देखने पर उनमे हिरन और बारहसिंगो के चित्र दिखे. रंगों के प्रयोग से शिकार की कहानियां उकेरी गयी थी. यानि तब हमने चित्रात्मक शैली में ही सही भाषा और साहित्य के विकास की आधारशिला रख दी थी. हम ने जंगली जीवन छोड़कर इंसानी बस्तियों का निर्माण शुरू कर दिया था इस क्षेत्र में भी. गाँव बने होंगे तो नियम कानून भी बने होंगे, नियम पालन करने के लिए दंड और डर का भी प्रबंध किया गया होगा. रीती रिवाज और मृत्यु की समझ भी आई होगी. प्रकृति के अनसुलझे रहस्यों को देवताओं की उपाधि भी मिलने लगी होगी. पितृसतात्मक कबीलों में गम्हेल और मातृसतात्मक गांवों में ग्रामदेवी की स्थापना हुई होगी. कुछ लोग बैगा-पाहन बने होंगे तो कुछ लोग सरदार-राजा-सैनिक और किसान भी बने होंगे.

#कांस्य_युग की शुरुआत आज से 5 हजार साल पहले यानि 3000BC के करीब माना जाता है. इसी समय धरती पर अलग अलग जगहों पर नदी घाटी सभ्यता का उदय हो रहा था. यूरेशिया में रोमन, मेसोपोटामिया, सुमेर, यूनान और मिश्र की सभ्यता का जन्म हुआ था तो अमेरिका में माया और इंका सभ्यता विकसित हो रही थी. भारत में भी सिन्धु घाटी की सभ्यता का जन्म हुआ और वैदिक युग की शुरुआत हुई. हड़प्पा और लोथल जैसे नगर बसाये गए. व्यापार और साम्राज्य विस्तार की जरुरत महसूस हुई. वेद और उपनिषद की रचना हुई. फिर इंसानों ने लोहा खोजा. वही लोहा जिससे मजबूत हथियार बनाये जा सकते थे- तलवार, बरछी, भाला इत्यादि. अर्थात अब इन्सान सिर्फ शारीरिक क्षमता के बल पर नहीं बल्कि हथियारों के बल पर अपने से ज्यादा ताकतवर जीवों और इंसानों को भी पराजित कर सकता था. फिर क्या था, मानव में लालच और स्वार्थ को पनपने का मौका मिला, युद्ध लादे जाने लगे, साम्राज्य का विस्तार होने लगा. सभ्य लोग ज्यादा जमीन के लिए खोज में निकलने लगे, पर्वत नदियाँ लांघकर उत्तर से दक्षिण की तरफ बढ़ने लगे. नए नए छोटे बड़े राज्य बने. कई सारे नए जनपद बने. रामायण और महाभारत की लड़ाइयाँ इसी काल में हुई होंगी.

पलामू में इसी समय में चेरो, खरवार, मुंडा और उरांव जातियों का आगमन हुआ. जातियों से मेरा मतलब अभी की जातिप्रथा से नहीं है, उस समय कार्य आधारित वर्ग विभाजन था. यानि चेरो समुदाय में ही राजा-सामंत-सैनिक और दास सभी होंगे. खरवारों का उद्गम अयोध्या से जोड़ा गया है. मनु के छठे वंसज का नाम करूस था, उनके पुत्र थे करुसास और उनके वंशज खरवार कहलाये. सूर्यवंशी क्षत्रिय कहलाने वाले खरवार राजाओं ने बाद में रोहतास गढ़ में 1200 AD तक शाषण किया. मुंडा लोगों का उल्लेख महाभारत में भी मिलता है जहाँ संजय धृतराष्ट्र को बताते हैं कि मुंडा लोग भीष्म की सेना में शामिल होकर पांडवों का मुकाबला बहादुरी से कर रहे हैं. ऐतरेयब्राह्मण उपनिषद में चेरो लोगों का उल्लेख महर्षि च्यवन के वंशज के रूप में है. इसी उपनिषद में झारखण्ड के लिए मुण्डक प्रदेश का प्रयोग हुआ है जबकि महाभारत में पुण्डरिक प्रदेश का. पलामू में चेरो राज की स्थापना मराठा और रक्सैल राजपूतों को हराकर की गयी.

#लौहयुग वह काल है जब भारत में छोटे छोटे जनपदों के विलय से 16 महाजनपदों का निर्माण हुआ. मगध उनमे सबसे प्रमुख रहा. मगध साम्राज्य का कालखंड 450 BC से 500 AD तक का माना जाता है. यही भारतीय इतिहास का स्वर्णयुग भी था. जरासंध के बाद से मगध राजाओं ने पुरे छोटानागपुर पर शाषण किया, हालाँकि सरायकेला के कुछ हिस्से उत्कल और कलिंग साम्राज्य का हिस्सा थे. मगध एक संघ था, उसके अंतर्गत कई छोटे बड़े राज्य थे जो समय समय पर स्वतंत्रता के लिए संघर्षशील रहे. उनमे से सबसे प्रमुख हुए छोटानागपुर के नागवंशी राजा. 63AD में सुतियाम्बे में जन्मे फनिमुकुट राय ने छोटानागपुर साम्राज्य की नीव रखी और बेरोकटोक करीब दो हजार वर्षों तक शाषण किया. इतने लम्बे समय तक भारत के किसी भी हिस्से में किसी अन्य वंश ने शाषण नहीं किया है.

तो लौहयुग में ही पलामू के एक तरफ मगध साम्राज्य और दुसरे तरफ छोटानागपुर का नागवंश. जाहिर है पठारी क्षेत्र जैसे लातेहार, महुआडांड इत्यादि क्षेत्र जहाँ नागपुरी संस्कृति का ज्यादा प्रभाव है, वे रातू महाराज के अधीन रहे होंगे जबकि कोयल और सोन नदी के मैदान में बसे हिस्सों पर मगध का प्रभाव ज्यादा रहा, और इसीलिए यहाँ की भाषा मगही के इतने करीब है.

मगर हाल ही में दामोदर नदी के किनारे खुदाई करने से एक अलग ही नदी घाटी सभ्यता के प्रमाण मिले हैं. असुर जाती की सभ्यता जो सिन्धुघाटी से बिलकुल अलग थलग थी और स्वतंत्र रूप से विकसित हो रही थी. असुर जाती के लोग अभी भी नेतरहाट के आसपास रहते हैं, और इनके साथ हैं बिरहोर भी.

क्या ऐसा नहीं हुआ होगा कि पलामू में भी सोन नदी के किनारे एक अलग सामानांतर सभ्यता विकसित हो रही होगी? आइये आपको लिए चलते हैं सोन और कोयल नदी के संगम पर ....

क्रमशः....

© सत्यान्वेषी

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