Saturday, December 25, 2021

#पलामू_किला

 #ठेठ_पलामू-

पलामू के पर्यटन की जानकारियों की श्रृंखला में आपका स्वागत है।आज हम पर्यटन की दृष्टि में सबसे महत्वपूर्ण पलामू किले की बात करने वाले हैं। आप पलामू जिला घूम रहें हैं, तो आपका सफ़र तब तक अधूरा है, जब तक आप पलामू क़िला नहीं देख लेते हैं।
मेदिनीनगर से बरवाडीह जाने वाले रास्ते में, मेदिनीनगर से लगभग 25 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है पलामू किला। पलामू क़िला अपने गौरवपूर्ण इतिहास को समेटे हुए खड़ा है। यहाँ पर जाने के बाद आप नजदीक से पलामू के गौरवशाली इतिहास से परिचित होंगे।ऐतिहासिक किवदंतियों के अनुसार यह रक्सैल वंश के राजाओं के द्वारा निर्मित है।बाद में चेरो वंश के लोकप्रिय राजाओं ने इसे और संवारा।अतीत में यह किला पलामू के सत्ता का केन्द्र रहा है।
यहाँ पर लगभग आधे-आधे किलोमीटर की दूरी पर दो किलों के ध्वंसावशेष दिखलाई पड़ते हैं। लंबा समय गुजर जाने के बावजूद भी यहाँ की चौड़ी और ऊँची दीवारें अभी तक सही-सलामत खड़ी हैं, जो किले के मजबूती का सबूत है। हरियाली से खूबसूरत वादियों में इन दोनों किलों में इतिहास की कई परतें दबी हुयी हैं।जो पलामू के गौरवमयी इतिहास की अमूल्य धरोहर है।
किले के शुरूआती हिस्से में,यहाँ का विशाल द्वार बाँहें फैला कर आपका स्वागत करती है। अंदर जाते ही किले की शानदार बनावट और सीढ़ीदार कुआं आपको रोमांचित कर देगा, चूँकि किला बहुत पुराना है।ऊबड़-खाबड़ और पथरीले रास्ते भी हैं,इसलिए यहाँ घुमते समय, सावधानी बरतना भी बहुत जरूरी है।किले की ऊंची दीवारों पर चढ़ कर, चारों तरफ के जंगलों और घाटियों का नज़ारा देखना पर्यटकों को खूब पसंद आता है।इसीलिए तो यहाँ पूरे साल पर्यटकों का आवागमन लगा रहता है।
प्राकृतिक सौंदर्य से परिपूर्ण पलामू किले में कई फिल्मों की शूटिंग भी होती रहती है। दूर-दूर से लोग यहाँ की खूबसूरती को निहारने के लिए घूमने आते हैं। पलामू क़िला से लगभग तीन-चार किलोमीटर की दूरी पर हीं है -'बेतला नेशनल पार्क',जो कि पलामू टाइगर रिजर्व के लिए फेमस है।आप यहाँ पर स्वच्छंद विचरण करते हुए टाइगर के साथ-साथ विभिन्न प्रकार के दुर्लभ प्रजाति के पशु-पक्षियों भी देख सकते हैं।
बगल में ही है शानदार म्यूजियम।जिसमें आपको विभिन्न वन्य जीवों के बारे में रोचक जानकारी मिल जाएगी। प्रत्येक मौसम में यहाँ पर्यटकों का आना-जाना लगा रहता है।अगर आप यहाँ रुककर,इस खूबसूरत स्थान की खूबसूरती ,रहस्य और रोमांच को करीब से अनुभव करना चाहते हैं तो आपके ठहरने के लिए आस-पास कई होटल मिल जाएँगे। शहर से थोड़ी ही दूरी पर, शांत वातावरण मेें, ये दोनों जगह पर्यटकों को खूब आकर्षित करती हैं।
फोटोग्राफरों के लिए तो यह एकदम सटीक जगह है क्योंकि यहाँ पर उन्हें प्राकृतिक खूबसूरती के साथ-साथ जंगली जीव और ऐतिहासिक स्थल को कैमरे में कैद करने का सुनहरा अवसर मिलता है।यह दिसंबर का महीना है।आइए,गुनगुनी धूप में पलामू किले और बेतला नेशनल पार्क में एक यादगार यात्रा का आनंद लीजिए। पिकनिक स्पॉट की लिस्ट में, इन दो जगहों को करिए मार्क, पकड़िए गाड़ी और घूम आइए.... #पलामू_किला और #बेतला_नेशनल_पार्क
© बालेन्दु शेखर
May be an image of text that says "ठेठ पलामू The Palamu Fort"


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Friday, December 24, 2021

#मिर्चइया_फॉल

 #ठेठ_पलामू:-



चलिए खोलते हैं, पिकनिक स्पॉट सफर के अगले पड़ाव का पोल...यहाँ हैं; खूबसूरत हसीन वादियाँ, झरना और इसका नाम है मिर्चइया फॉल। यह खूबसूरत फॉल #लातेहार जिला के #गारू में स्थित है। जितना सुन्दर यह वॉटर फ़ाल है, उतने ही सुंदर और मनोरम हैं, यहाँ तक जाने वाले रास्ते। जंगलों के बीच से निकली हुई सड़क, घाटियों से हो कर गुज़रती है, जिससे सफर के शुरुआत में ही आपको प्रकृति की सुंदरता का एहसास होने लगेगा, चूँकि ये जगह प्रकृति के बहुत करीब है शायद इसीलिए यह शहर से थोड़ी दूर स्थित है। यहाँ आने के लिए आप सवारी गाड़ी पर ज्यादा निर्भर नहीं रहेंगे, तो बेहतर होगा। वैसे इस रास्ते पर आपको छोटे-मोटे दुकान बादाम का ठेला मिलेगा, पर आप यदि खाने के शौकीन हैं, तो आपको नाश्ता-खाना शहर से ही लेना पड़ेगा खुद के लिए भी और अपनी गाड़ी के लिए भी मने अपनी गाड़ी का फ्यूल का टंकी फूल करवा लीजिएगा, क्योंकि इस रास्ते में आपको पेट्रोल पम्प नहीं मिलने वाला है।
इस वाटर फ़ाल की विशेषता यह है कि यह मुख्य सड़क से बस कुछ ही क़दम की दूरी पर है, यानी बुजुर्ग बच्चे या दूर तक पैदल चलने मे असमर्थ लोग भी इस जगह का अनुभव बिना कोई परेशानी के कर सकते हैं। झरना बहुत ऊँचा तो नहीं है, लेकिन यह बहुत बड़े क्षेत्र में फैला हुआ है, जिससे आपको पिकनिक मनाने और एंजॉय करने के लिए काफी जगह मिल जाएगा।
झरने से लगातार पानी बहता रहता है, जिससे वहाँ की चट्टानें चिकनी हैं, तो यहाँ थोड़ा सम्भल कर कदम बढ़ाएँ। अगर यहाँ तक आने में आपको थोड़ी थकावट महसूस हुई हो, तो उसका इलाज भी इसी फॉल में है, बस झरने की बहती धारा में पैर डूबा कर थोड़ी देर बैठे रहिए, आपकी सारी थकान कुछ पल में ही दूर हो जाएगी। अब झरने तक जाएँ और झरने में ना नहाए ऐसा हो सकता है क्या, मौसम कितना भी ठंडा हो, पर झरने में नहाने का अनुभव हमेशा बेहतरीन होता है, तो हम जैसे नहाने के शौकीन लोग घर से गमछा लेके निकालते हैं सर पर, लेकिन झरना को देखते ही गमछा आ जाता है कमर पर।
दो बातें जो हमेशा ध्यान में रखनी चाहिए। ऐसे जगहों पर जाने से पहले स्वच्छता और शांति, चूँकि ये जगह जंगली पशुओं का मूल निवास है, तो एक जिम्मेदार नागरिक होने का कर्तव्य निभाते हुए, शोर और गंदगी ना फैलाएँ। जिससे कि ना हमें और ना जंगली जीवों को असहज महसूस हो और पर्यावरण की सुन्दरता भी कायम रहे।
© बालेन्दु शेखर

Thursday, December 23, 2021

मलय डैम



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दिसंबर महीने के इस लुभावने मौसम में अगर आप तलाश रहे हैं पिकनिक स्पॉट तो चलिए लिए चलता हूँ आपको पलामू के एक सुंदर पिकनिक स्पॉट पर। पलामू के सतबरवा से लगभग पांच किलोमीटर दूर रांची रोड मे है #मलय डैम। पलामू के केंद्र मेदिनीनगर से लगभग 35 किलोमिटर की दूरी पर है यह सुंदर सा डैम। चारो तरफ पहाड़ी और हरे भरे पेड़ों के बीच यह डैम लोगों के आकर्षण का केंद्र है। डैम में अथाह पानी भरा हुआ है जिससे कुछ छोटी पहाड़ी इसके मध्य मे टापू की तरह बन गई है, यह नज़ारा वाकई मनमोहक लगता है। इसीलिये तो यहां पर्यटकों की भीड़ हमेशा देखने को मिलती है। भरपूर मात्रा मे पानी होने से यहां पर आपको बोटिंग की भी सुविधा उप्लब्ध है। जिससे आप डैम के बीच मे जा कर प्रकृति के सुन्दर नजारे का अनुभव कर सकते हैं। इसीलिये तो बहुत से लोग बोटिंग का मज़ा लेने के लिए यहां आते हैं और लुत्फ उठाते हैं नजारे का।
मलय डैम रांची रोड से लगभग 2 किलोमीटर अंदर है. लेकिन आप यहां अपनी गाड़ी या सवारी गाड़ी से आसानी से पहुंच सकते हैं। वैसे तो
लोगों के यहां आने के चलते डैम के अगल बगल बहुत सी छोटी दुकाने खुल गई हैं, लेकिन अगर आप डैम का नज़ारा लेते हुए अपना पसंदीदा खाना एंजॉय करना चाहते हैं तो आप सतबरवा के बाजार से खरीद सकते हैं।
अगर आप फोटोग्राफी के शौकीन है तो ये जगह बिल्कुल आपके लिए है। पानी के बीच मे घिरी हुई पहाड़ी और चारो तरफ हरे भरे पेड़ पौधे। एकदम मनमोह लेने वाले नजारे जो आपको कैमरा ऑन करने पर मजबूर कर देती है। सूर्यास्त के समय जब सूर्य की लालिमा आकाश मे बिखरती है तो डैम के पानी मे सूर्य के प्रतिबिंब का नज़ारा अद्भुत होता है।
तो बिल्कुल जाइए सतबरवा के मलय डैम में और अपना फोटोग्राफी स्किल दिखाते हुए डैम की ली गई सुन्दर तस्वीर हमारे पेज पर साझा करें।
© बालेन्दु शेखर

Tuesday, December 21, 2021

केचकी



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नया साल बस आने ही वाला है। नए साल मे सिर्फ कैलेंडर की तारीख़ ही नहीं बदलती, साथ में बदलता है मौसम और प्राकृतिक पर्यावरण। पर्यावरण मे चारों तरफ़ हरियाली और ताजगी भर जाती है, ऐसे में सबका जी करता है, प्रकृति की मनोरम छटा का लुफ्त उठाने का, सुंदरता से भरपूर प्रकृति के गोद में कुछ समय बिताने का, जिससे हमें भाग-दौड़ भरी जिंदगी से निकलकर असीम सुख और शांति का अनुभव होता है। ऐसे में हमे तलाश होती है, एक प्राकृतिक सुंदरता से भरपूर शांत स्थान की, तो ये पोस्ट ऐसे ही लोगों के लिए है, जिन्हें नए वर्ष में प्रकृति की अनुपम छटा को निहारने का मन कर हो।
आज हम जानेंगे एक ऐसे ही प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर और शांत स्थान के बारे में, दो नदियों ओरगा और कोयल का जंगलों और पहाड़ों की गोद में संगम। जी हाँ, बात हो रही है केचकी की। पलामू का हार्ट कहे जाने वाले, डाल्टनगंज से लगभग दस किलोमीटर की दूरी पर दो नदियों का सुंदर संगम स्थान केचकी है, नए वर्ष के ताजातरीन मौसम से इसकी खूबसूरती में चार चाँद लग जाते हैं।
दिसंबर और जनवरी महीने में यहाँ तो पर्यटकों का बहुत हुजूम देखने को मिलता है, सभी लोग दोस्तों और परिवार के साथ इस सुन्दर वातावरण का अनुभव करने आते हैं। नदी की रेत पर अपना पसंदीदा खाना बनाना और पिकनिक मनाना, आह! प्राकृतिक सौंदर्य की अलग ही अनुभूति होती है।
यहाँ के डूबते सूर्य (सनसेट) के दृश्य की तो बात ही अलग है। पूरा दिन पिकनिक मनाना नदी के पानी में डुबकी लगाना और शाम को डूबते हुए सूर्य को निहारना, एक समय तो ऐसा लगता है, जैसे ये सूर्य कभी ना डूबे और वक़्त ठहर जाए, यूँ कहें तो आपकी पूरे साल की थकावट बस एक दिन में गायब हो जाती है यहाँ।
अगर आप नए साल की छुट्टियों में परिवार और दोस्तों के साथ प्रकृति की मनोरम छटा का आनंद लेना चाहते हैं, तो #केचकी जरूर जाइए और वहाँ की सुन्दर तस्वीरों को हमारे साथ शेयर कीजिए।
© बालेन्दु शेखर

Friday, December 17, 2021

#सगहर




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आप सभी ने एक लोकप्रिय कहावत अवश्य सुना होगा -
"दाल-भात रोज
सगहर संजोग"
जी हाँ! 'सगहर' तो संयोग से बनता है। ठंड के मौसम में इस परंपरागत लजीज रोटी के सामने छप्पनों व्यंजन भी फेल हो जाते हैं। उम्मीद तो यही है कि आप सभी ने छककर इसका आनंद उठाया होगा। हमारे पेज पर सिर्फ पलामू ही नहीं बल्कि देश-विदेश के लोग जुड़े हैं।अलग संस्कृति औरअलग परिवेश के लोग भी यहाँ की संस्कृति और यहाँ के खानपान को जानने के लिए उत्सुक रहते हैं। इसी लिए आज 'सगहर' की बात की जा रही है।
आजकल हमारे गाँव के हरे-भरे खेतों में चने की फसल की हरियाली फैली हुयी है। वैसे इस वक्त शहरों और महानगरों में भी चने की साग की भारी मांग है। क्योंकि सिर्फ पलामू ही नहीं बल्कि उत्तरी भारत में चने की साग बहुत लोकप्रिय है। जिससे सिर्फ भाजी ही नहीं अनेकों परंपरागत व्यंजन बनाए जाते हैं। जिसमें 'सगहर' प्रमुख है।
इस पेज पर बहुत सारे ऐसे भी पाठक होंगे। जो इससे अपरिचित हो और इस लजीज व्यंजन को अपने घर में बनाना चाहते होंगे। इसीलिए 'सगहर' बनाने की प्रक्रिया जानना भी जरूरी है। इसे बनाने के लिए सबसे पहले खेतों में जाकर चने की साग को खोटा जाता है।जहाँ चने के पौधे की ऊपरी भाग के पत्तों को एकत्रित किया जाता है।जिसे हम 'चने की साग को खोटना' कहते हैं।फिर उस एकत्रित चने की साग को बारीक काट कर तैयार कर लिया जाता है।
दूसरे चरण में कुछ घंटे पहले भिगोए हुए चावल और थोड़ी मात्रा में दाल को लहसुन,अदरक और हरी मिर्च के साथ पीस कर मीडियम पेस्ट बना लिया जाता है।तीसरे चरण में उस पेस्ट में बारीक कटे हुए चने की साग और जीरा को मिला लिया जाता है और अंतिम चरण में गर्म तवे में तेल डालकर उस पेस्ट को रोटी के आकार में फैलाकर सेक लिया जाता है।
फिर तैयार होने वाली करारी और स्वादिष्ट रोटी को ही हम 'सगहर' कहते हैं। जिसे सिर्फ टमाटर-धनिया पत्ती की चटनी ही नहीं बल्कि टमाटर-बैगन के भर्ता या फिर मौसमी सब्जियों के साथ खाकर आनंद लिया जाता है।
यह सिर्फ अपने बेमिसाल स्वाद के मामले में ही नहीं बल्कि अपनी पौष्टिकता,अपने चिकित्सकीय गुण और स्वास्थ्यगत कारणों से सदियों से खानेवालों के दिल पर राज करती रही है। अगर आपने अभी तक इसे नहीं खाया है तो आप इस मौसम की सबसे लजीज़ व्यंजन को मिस कर रहे हैं और अगर खाया है तो अपने अनुभव को हम सभी से अवश्य रुबरु कराएंगे तो जिसे जानकर,हम सभी मिलजुल कर आनंद उठाएंगे।

Friday, December 10, 2021

#ठेठ_पलामू :- #पलामू_के_सिंघाड़ा


सिंघाड़ा के तो लोग अइसही गुणगान करते हैं,
असली तबाही तो ससुरा चटनी मचाता है।
लईकन के चैलेंज लगाना हो, चाहे जल्दी में भूख मिटाना हो। भले दिल्ली वाला सब आधा पाकल मोमो और बर्गर के फैन होगा लेकिन हमीन के इहाँ तो जे है से सिंघाड़ा ही है। अब इसका अंदाजा इहे से लगाया जा सकता है कि भले सब जगह राजा महाराजा हुए होंगे, लेकिन हमर यहाँ #सिंघाड़ा_महाराज' है। इहाँ बात-बात में आदमी दोस्ती में मनाने के लिए भी सिंघाड़ा ही खिलाता है।
पलामू में बदलते समय के साथ अलग-अलग सिंघाड़ा के दुकान भी रहा और अपने समय मे फेमस भी रहा। अब सबसे पुराना में कहिए तो कचहरी के #बंगाली_के_सिंघाड़ा' दुकान आपन जगह पर फेमस रहा है। बाकी छह मुहान वाला टेम्पू स्टैंड के 'सिंघाड़ा महाराज' आपन खट्टा-मीठा चटनी के लिए अलगे फैन फॉलोइंग रखता है।
स्टेशन तरफ #पंचवटी_के_समोसा' के अलगे क्रेज था। रोटरी स्कूल से आते समय डेली के यहीं अड्डा रहा करता था। अब रोटरी स्कूल पहुँच ही गए और 'पंचवटी के समोसा' ना खाए तो क्या ख़ाके रोटरी स्कूल में पढ़े। बिना चटनी के खाये में भी मजा आता था आऊ अगर बिना लहसुन प्याज़ वाला सिंघाड़ा खाना है, तो बजार में पंडीजी के इहाँ जाइए आऊ इत्मीनान से खाइए।
अब आते है एकदम कल वाला फिलिंग पर चाहे लाख लाल-पियर चटनी खा लीजिए, लेकिन सिंघाड़ा खाये के असली मज़ा जो है न उ हरियरके चटनी के साथ है। तो ई मिलेगा आपको रेड़मा चौक बाइपास रोड में #'भूलटा_जी_के_सिंघाड़ा' दुकान में। स्वाद के अंदाजा इहे बात से लगाया जा सकता है कि तिहरा दिए हैं इनके यहाँ इहे 4 दिने में। दुकान में कोई नाम नहीं है सिंघाड़ा के अलावा बस खीरमोहन रहता है, तो जादे तामझाम नहीं है। गरमा-गरम सिंघाड़ा 4 बजे से मिलना शुरू हो जाता है। कब निकला, कब खत्म हुआ पते नहीं चलता है। अगर खाये के स्पीड कम है तो हो सकता है पोरसन के लिए अगला बार निकलने तक इंतजार भी करना पड़े। गरमा-गरम सिंघाड़ा के हल्का फोर के उसपर जे हरियर (लहसुन धनिया मिचाई आऊ खटाई) के चटनी मार के देते हैं न, क्या बताये बस लगता है जइसे दु-चार दिन उपवास कर के यहीं पारण करते, तो इत्मीनान से पहुँचिए और हिसाब से खाइए ,फिर बताइए अनुभव।
वैसे ढेरे मानी आदमी तो बचपन से चाँपते आ रहे होंगे, तो उ भी आपन अनुभव जरूर बताइएगा। पुरान लोग के लिए बता दे कि दुकान लगभग 40-50 साल पुराना है। पहिले राँची रोड मोड़ पर था, फिलहाल रेड़मा चौक पर है । दुकान के फ़ोटो भी डाल दे रहे हैं काहे कि दुकान में कुछ लिखल ना है। जाने के बाद भटक न जाएँ, जगहे पर खाएं और बाद में अनुभव बताएँ, न तो ऐने-ओने खा के बाद में हमको ना बोलिएगा।
नोट:- आपन-आपन गाँव-घर शहर के भी दर-दुकान, उहाँ के आईटम, दोकान के फोटो के साथे बता दीजिए। का पाता कभी घूमते -घामते पहुँच जाएँ, तो वहाँ भी 4-6 पीस चाँप लिया जाएगा।
© आनंद केशव 'देहाती'

Friday, December 3, 2021

#मरजाद_ बरात



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आज के समय में बरात जाना स्टॉल पर चॉमिन खाने जइसन आसान हो गया है। गए मुँह चमकाए, फोटू घिंचवाये, खाये तो खाये, नई तो चल दिये। अगर लमहर प्रोग्राम रहल, तनिक दूर के, तो बारात जाए से पहिले हीं सब प्लान रेडी रखता है। रात में रुकना है कि राते में चल देना है, आपन गाड़ी से जाना है कि कउनो के साथ शेयरिंग करना है। फिर आगे के प्रोग्राम भी फिक्स रहता है, बस बारात जाना है, दुआर लगाना है, हाली-हाली भकोसना है और राते-बिराते चल देना है। केकरो से भेंट मुलाकात हालचाल के कोई हेडेके नहीं। इहाँ तक कि दुबारा दु दिन बाद अगर उहे जगह फिर से जाना पड़ जाए, तो आदमी भूला जाए कि कहाँ गए थे, कइसे गये थे।
पहिले ई सिस्टम हइये नहीं था। मने इहे समझिए कि बिना #मरजाद के बरात कोई मनबे नहीं करता था। इहाँ तक कि अगर कोई पहुना गाँव-घर में आने के बाद जल्दी निकल लिये, तो पुछल जाता था कि "काहे पहुना, जल्दी जाये लगली, मरजाद के व्यवस्था ना हलक का।"
अब होता का था कि पहिले बरात नजदीक जाये, चाहे दूर जाये, कम-से-कम दु टाईम खाना तो खियावेला पड़ता था। खाना मने खाना, ई कचौड़ी, जिलेबी आउर छोला भटूरा ना चलता। एकरा पहिलका आमदिन सब नास्ता मान ले, उहे बहुत है। अब बाराती के जईसन डिमांड रहे, ओकरे हिसाब से रात के कच्ची, न तो पक्की के इंतजाम रहता था। आदमी जाये पर नस्ता-उस्ता करता था, फिर रात में इत्मीनान से तान के खाता था आउ फिर भोर में बियाह होता था। तब तक बाकि आदमी सब, फर फ़्रेश हो के नदी-कुईयाँ-चापाकल जे व्यवस्था रहे, उहइं नहा के, तनी अगल-बग़ल घूम लेता था। केतना के हित-नाथ रहतन अगल बगल, तो उ सब उहऊँ तनिक हो लेता था। नस्ता पानी के बाद मजलिस बइठता - "सब के परिचय, थोड़ा हँसी ठिठोली, मर मज़ाक, किस्सा कहानी।" ओकर बाद एकदम निकले से पहिले बईठा के बजापते फुल भोजन करवाया जाता। अब रात के कच्ची रहे, तो दूसरे दिन पक्की, न तो एकर उल्टो। अब बाराती साइड के डिमांड पर दुनो टाईम कच्ची भी रह सकता था। लेकिन सराती सब चले घरी कहियो देता "अबकी दूनो टाईम कच्ची चलल, पक्की बाकिये बा।"
ई मरजाद के परथा भी सब जगहे अलग-अलग होता था। कहीं तो एक-दू दिन भी रोक लेता था सब। बाराती के स्वागत करे के एही तरीका था। तब आस-पास चर्चा का विषय भी रहता था और पूरा गाँव घर के सहयोग के बात भी रहता था। सब जगह चर्चा होता कि "जानईत हहुँ, फलना घर दु दिन बाराती मरजाद रुकल हलथि, बड़का घरे बेटा बियहउले हथी।" अभियो मगह इलाका में कहीं-कहीं बरात के मरजाद रखल जाता है। दु तीन बार हमरो मरजाद में रुके के मउका मिलल था। लेकिन अब तो कचहरी में हाज़िरी लगावे वाला सिस्टम है- आएँगे, खाएँगे, जाएँगे। अगर आपलोग का भी मरजाद का कोई अनुभव हो, तो कमेंट सेक्शन में लिख डालिये।
© आनन्द केशव