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जी हाँ! 'सगहर' तो संयोग से बनता है। ठंड के मौसम में इस परंपरागत लजीज रोटी के सामने छप्पनों व्यंजन भी फेल हो जाते हैं। उम्मीद तो यही है कि आप सभी ने छककर इसका आनंद उठाया होगा। हमारे पेज पर सिर्फ पलामू ही नहीं बल्कि देश-विदेश के लोग जुड़े हैं।अलग संस्कृति औरअलग परिवेश के लोग भी यहाँ की संस्कृति और यहाँ के खानपान को जानने के लिए उत्सुक रहते हैं। इसी लिए आज 'सगहर' की बात की जा रही है।
आजकल हमारे गाँव के हरे-भरे खेतों में चने की फसल की हरियाली फैली हुयी है। वैसे इस वक्त शहरों और महानगरों में भी चने की साग की भारी मांग है। क्योंकि सिर्फ पलामू ही नहीं बल्कि उत्तरी भारत में चने की साग बहुत लोकप्रिय है। जिससे सिर्फ भाजी ही नहीं अनेकों परंपरागत व्यंजन बनाए जाते हैं। जिसमें 'सगहर' प्रमुख है।
इस पेज पर बहुत सारे ऐसे भी पाठक होंगे। जो इससे अपरिचित हो और इस लजीज व्यंजन को अपने घर में बनाना चाहते होंगे। इसीलिए 'सगहर' बनाने की प्रक्रिया जानना भी जरूरी है। इसे बनाने के लिए सबसे पहले खेतों में जाकर चने की साग को खोटा जाता है।जहाँ चने के पौधे की ऊपरी भाग के पत्तों को एकत्रित किया जाता है।जिसे हम 'चने की साग को खोटना' कहते हैं।फिर उस एकत्रित चने की साग को बारीक काट कर तैयार कर लिया जाता है।
दूसरे चरण में कुछ घंटे पहले भिगोए हुए चावल और थोड़ी मात्रा में दाल को लहसुन,अदरक और हरी मिर्च के साथ पीस कर मीडियम पेस्ट बना लिया जाता है।तीसरे चरण में उस पेस्ट में बारीक कटे हुए चने की साग और जीरा को मिला लिया जाता है और अंतिम चरण में गर्म तवे में तेल डालकर उस पेस्ट को रोटी के आकार में फैलाकर सेक लिया जाता है।
फिर तैयार होने वाली करारी और स्वादिष्ट रोटी को ही हम 'सगहर' कहते हैं। जिसे सिर्फ टमाटर-धनिया पत्ती की चटनी ही नहीं बल्कि टमाटर-बैगन के भर्ता या फिर मौसमी सब्जियों के साथ खाकर आनंद लिया जाता है।
यह सिर्फ अपने बेमिसाल स्वाद के मामले में ही नहीं बल्कि अपनी पौष्टिकता,अपने चिकित्सकीय गुण और स्वास्थ्यगत कारणों से सदियों से खानेवालों के दिल पर राज करती रही है। अगर आपने अभी तक इसे नहीं खाया है तो आप इस मौसम की सबसे लजीज़ व्यंजन को मिस कर रहे हैं और अगर खाया है तो अपने अनुभव को हम सभी से अवश्य रुबरु कराएंगे तो जिसे जानकर,हम सभी मिलजुल कर आनंद उठाएंगे।
© अजय शुक्ला


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