सिंघाड़ा के तो लोग अइसही गुणगान करते हैं,
असली तबाही तो ससुरा चटनी मचाता है।
लईकन के चैलेंज लगाना हो, चाहे जल्दी में भूख मिटाना हो। भले दिल्ली वाला सब आधा पाकल मोमो और बर्गर के फैन होगा लेकिन हमीन के इहाँ तो जे है से सिंघाड़ा ही है। अब इसका अंदाजा इहे से लगाया जा सकता है कि भले सब जगह राजा महाराजा हुए होंगे, लेकिन हमर यहाँ #सिंघाड़ा_महाराज' है। इहाँ बात-बात में आदमी दोस्ती में मनाने के लिए भी सिंघाड़ा ही खिलाता है।
पलामू में बदलते समय के साथ अलग-अलग सिंघाड़ा के दुकान भी रहा और अपने समय मे फेमस भी रहा। अब सबसे पुराना में कहिए तो कचहरी के #बंगाली_के_सिंघाड़ा' दुकान आपन जगह पर फेमस रहा है। बाकी छह मुहान वाला टेम्पू स्टैंड के 'सिंघाड़ा महाराज' आपन खट्टा-मीठा चटनी के लिए अलगे फैन फॉलोइंग रखता है।
स्टेशन तरफ #पंचवटी_के_समोसा' के अलगे क्रेज था। रोटरी स्कूल से आते समय डेली के यहीं अड्डा रहा करता था। अब रोटरी स्कूल पहुँच ही गए और 'पंचवटी के समोसा' ना खाए तो क्या ख़ाके रोटरी स्कूल में पढ़े। बिना चटनी के खाये में भी मजा आता था आऊ अगर बिना लहसुन प्याज़ वाला सिंघाड़ा खाना है, तो बजार में पंडीजी के इहाँ जाइए आऊ इत्मीनान से खाइए।
अब आते है एकदम कल वाला फिलिंग पर चाहे लाख लाल-पियर चटनी खा लीजिए, लेकिन सिंघाड़ा खाये के असली मज़ा जो है न उ हरियरके चटनी के साथ है। तो ई मिलेगा आपको रेड़मा चौक बाइपास रोड में #'भूलटा_जी_के_सिंघाड़ा' दुकान में। स्वाद के अंदाजा इहे बात से लगाया जा सकता है कि तिहरा दिए हैं इनके यहाँ इहे 4 दिने में। दुकान में कोई नाम नहीं है सिंघाड़ा के अलावा बस खीरमोहन रहता है, तो जादे तामझाम नहीं है। गरमा-गरम सिंघाड़ा 4 बजे से मिलना शुरू हो जाता है। कब निकला, कब खत्म हुआ पते नहीं चलता है। अगर खाये के स्पीड कम है तो हो सकता है पोरसन के लिए अगला बार निकलने तक इंतजार भी करना पड़े। गरमा-गरम सिंघाड़ा के हल्का फोर के उसपर जे हरियर (लहसुन धनिया मिचाई आऊ खटाई) के चटनी मार के देते हैं न, क्या बताये बस लगता है जइसे दु-चार दिन उपवास कर के यहीं पारण करते, तो इत्मीनान से पहुँचिए और हिसाब से खाइए ,फिर बताइए अनुभव।
वैसे ढेरे मानी आदमी तो बचपन से चाँपते आ रहे होंगे, तो उ भी आपन अनुभव जरूर बताइएगा। पुरान लोग के लिए बता दे कि दुकान लगभग 40-50 साल पुराना है। पहिले राँची रोड मोड़ पर था, फिलहाल रेड़मा चौक पर है । दुकान के फ़ोटो भी डाल दे रहे हैं काहे कि दुकान में कुछ लिखल ना है। जाने के बाद भटक न जाएँ, जगहे पर खाएं और बाद में अनुभव बताएँ, न तो ऐने-ओने खा के बाद में हमको ना बोलिएगा।
नोट:- आपन-आपन गाँव-घर शहर के भी दर-दुकान, उहाँ के आईटम, दोकान के फोटो के साथे बता दीजिए। का पाता कभी घूमते -घामते पहुँच जाएँ, तो वहाँ भी 4-6 पीस चाँप लिया जाएगा।
© आनंद केशव 'देहाती'

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