'झूठे न एतना ताम-झाम आउ रेल में चार दिन पेरशान करले बाबू, एह ले बढ़िया तो हम चेगौना धाम में बाबा बीरकुँअर के जोड़ा घोड़ा चढ़ा के आ जइती'
जी हाँ! मुझे ठीक से याद है, यही शब्द निकले
थे दादी के मुह से उस दिन, जब
हम अपनी नौकरी लगने के बाद दादा-दादी
सहित परिवार के करीब पंद्रह सदस्यों को इलाहाबाद,
चित्रकूट और देवी दर्शन के लिए मैहर ले गए थे। वापस घर आने के बाद
दादी के मुख से निकले यथोक्त शब्द ने मुझे ये एहसास दिलाया की आपन #गाँव_गिराव
के चौहदी से लगे पूज्य स्थल चार धाम यात्रा से कउनो कम नहीं हैं।
तो फिर चलिए आज हमलोग चलते है, डालटनगंज से लगभग 30 KM मेदिनीनगर-
औरंगाबाद मुख्य पथ (NH 98) पर नावाबाजार प्रखंड
के सीमा पर अवस्थित #बाबा_बीरकुँवर यानि #चेगौना_धाम के दर्शन के लिए।
प्रतिदिन इस पथ से गुजरने वाले सैकड़ो बसों
के यात्री अपने बस की खिड़की से ही बाबा बीर कुँवर ‘चेगौना धाम’ का
दर्शन बड़ी ही सहजता से कर लेते है। बस का कंडक्टर जड़त्व के नियम पालन करते हुए बस के
रुकने से पहले उतरेगा और चलने के बाद चढ़ेगा और इस अंतराल में मंदिर की खिड़की से प्रसाद
ले आएगा। भले ही मुँह में पान भरा हो पर रोड़ी-चन्दन का तिलक भी पुजारी से लगवा ही लेगा। और इसतरह हांथो-हाँथ सभी यात्रियों तक प्रसाद पंहुचा दी जाएगी । 30 सेकंड के छोटे अंतराल में बिना यात्री-असुविधा के बस की सीट पर बैठे बैठे 'देव दर्शन'
किसी आश्चर्य से कम नही।
चेगौना धाम के मंदिर की नींव 1973 में रखी जा चुकी थी, किन्तु बाबा बीरकुँअर की प्रतिमा इसके कई
दशक पहले की हैं ,तब
यहां घनघोर जंगलों के बीचो-बीच
आज का
#NH98 एक संकीर्ण सड़क हुआ करती थी जिसपर पुरे
दिन में मुश्किल से तीन से चार बस का आवागमन हुआ करता था।
पलामू के ग्रामीण जन-जीवन की परिकल्पना बिना #माल_मवेशी के शायद ही संभव हो,
और यही कारण है कि माल मवेशियों को भी परिवार के सदस्यों की तरह
ही समझा जाता है तथा इनके सुख और समृद्धि के लिए बाबा #बीरकुँअर चेगौना धाम पर #मिट्टी_के_घोड़े
अर्पित करने का रिवाज़ हैं। भक्तों की ऐसी निष्ठा बनी हुई है कि ऐसा करने से मवेशियों
की आकाल मृत्यु नहीं होती। जहां गाँव में आज भी नगदी फसलों के साथ-साथ माल-मवेशी आय के स्रोत हुआ करते है,
ऐसे में किसी मवेशी की अकाल मृत्यु परिवार पर किसी त्रासदी से कम
नहीं होती। मेरी दादी कहती थी 'फलनवा घर चार जोड़ी हर (हल) एके साथे चल हइ'
मने अधिक माल-जाल का होना अधिक समृद्धता
की निशानी थी। इसकी महत्ता इस बात से आँकी जा सकती है कि उस समय कुछ धूर्त प्रकृति
के लोग खुद को अधिक समृद्ध बताने के लिए अपने बेटे की शादी के लिए आ रहे #अगुवा के आने से पहले अगल-बगल से ला कर चार जोड़ी गाय-बैल आपन
#दुरा पर बांध देते थे। ख़ैर.....
भक्तजनों में अगर किसी का #गछल_भाखल पूरा हो जाए तो चेगौनाधाम
पर #खस्सी_पठरु की बली भी दी जाती है। यात्रा सदा
मंगलमय बनी रहे इसके लिए इस क्षेत्र के लोग अपने वाहन की पूजा भी चेगौना धाम
पर कराते रहते हैं।
आज यहां की तस्वीर बहुत बदल चुकी हैं, कुछ साल पहले ही मंदिर परिसर में विवाह
मंडप बनाये गए है। बाबा के आशीर्वाद से प्रत्येक साल युगल विवाह सूत्र में बंध कर अपने
दांपत्य जीवन प्रारंभ कर रहे हैं। मंदिर परिसर में ही दक्षिण के शिल्पकला से प्रेरित
एक नया मंदिर का निर्माण किया गया है।
सब कुछ अच्छा अच्छा और अच्छा ही लग रहा
है।
बस.......
इसका ध्यान रखें कहीं राजपथ की बढ़ती लेनो में पर्यावरण में से वन
न दफ़न हो जाए।
©
अवनीश प्रकाश
#ठेठ_पलामू #पलामू_में_पर्यटन #JharkhandTourism

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