Saturday, March 20, 2021

ठेठ_पलामू: मूर्ति विसर्जन


सुने अबकी पलामू में डी जे पर पाबंदी लग गया था, तब मूर्ति विसर्जन हुआ कि नहीं। काहे कि इसके बिना तो सरस्वती पूजा का कल्पना करना भी मुश्किल है। और हो भी क्यों नहीं जब तक गाना न बजे माता जी आती ही नहीं हैं न। यहाँ तो माहौल ऐसा है कि डी जे न मिलने के चक्कर मे सब 2 दिन बाद तक मूर्ति विसर्जन करने लगे हैं।
ईमानदारी से ईगो बात कहे अपने आसपास सब जगह नजर दौड़ा के देखियेगा न तो पता चलेगा कि सही में जो पढ़ने वाला लईकन है न उसको तो पूजा से मतलब ही नहीं रहता है। पर हमको तो रहता था आऊ पूरा रहता था। तो इसका मतलब ई नहीं कि हम पढ़ने वाले थे हमहुँ वही ग्रुप के लईका थे।
गाँव मे तो बचपन मे पूजा पूरा धूम धाम से होता था। तैयारी शुरू होता था कमिटि के गठन से बजापते अध्यक्ष सचिव उपाध्यक्ष के चुनाव होता था। हमको याद है उस समय गाँव के एगो चाचा के सचिव बनाया गया था से हमलोग बड़ी दिन तक उनको सचिव महोदय ही कहा करते थे। और बेचारे अभी भी किसी यज्ञ समारोह में सचिव ही बनते हैं। इसके बाद चन्दा कर के घरे- घर से तहसीलदारी करना, उम्मीद के हिसाब से चंदा न मिलने पर बुंदिया में कटौती कर के गजरा बढ़ा देना आम बात था। पूजा के बाद प्रसाद वितरण दिन में और रात में पूरा किर्तन का कार्यक्रम रहता था। और आधा रात से चलता था वी सी आर से सिनेमा। सब लोग अपना-अपना घर से बहाना बना के आते कि अब दिन में पूजा किये हैं तो रात में सरस्वती जी को अकेले छोड़ दे और यहां फूल जुगाड़ साल-कम्बल, लेदरा-बिछौना पूरा बिछा के और इत्मिनान से सिनेमा का आनंद लिया जाता था। अब दूसरा दिन हवन ये सब के बाद तैयारी होता था गाँव मे मूर्ति घुमाने का। सब लोग चंदा दिए हैं तो घरे तो ले जाना पड़ता था, और साथे साथे बिना गजरा बैर वाला खाली बुनिया वाला परसादी भी। अब गाँव मे गली दुबला पतला रहता था इसलिए लकड़ी का कुर्सी पर मूर्ति बांध के घरे घर घुमाया जाता था वो भी देशी ढोल और बैंड बाजा के साथ। घुमा फिरा के सरसती जय जय करते पोखरा तक ले जाते थे और आराम से आरती प्रार्थना कर के विसर्जन कर देते थे। विसर्जन करने समय मूर्ति से बाल लेना कभी नहीं भूलते थे। और वही बाल को अंग्रेजी किताब में रखते थे कि विद्या आये। इसलिए लगता है आज भी अंग्रेजी वहीं का वहीं रह गया।
पर आजकल तो सरस्वती जी बीना बड़का-बड़का बॉक्स और म्यूजिक सिस्टम लगाए आती ही नहीं है। विसर्जन में फूल साउंड में भाँग के घोल के साथ भोजपुरी गाने बजा के ताण्डव तो ऐसा होता है कि भोले बाबा भी शर्मा जाएं। अब वैसे तो गीत संगीत माँ सरस्वती की ही देन है पर पता न विसर्जन में सब मुर्गे की आवाज़ पर भी इतना थिरकने लगते हैं कि अच्छा अच्छा भारत नाट्यम का डांस फेल हो जाये।
खैर अब अपना-अपना समय का बात है , कमसे कम हमलोग अपना-अपना बचपन वाला अंग्रेजी किताब ढूँढिये शायद सरस्वती जी वाला बाल किताब में मिल जाये। आउ हाँ अगर आप भी अपना समय में गाँव घर स्कूल में पूजा किये होंगे तो अपनी यादे हम सबको जरूर बताइयेगा। हाथ उठा के प्रेम से बोलिये सरसती- जय जय
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