#ठेठ_पलामू: सरस्वती पूजा
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नया साल आते ही बेसब्री से #सरस्वती_पूजा का इंतजार होता था। साल शुरू होने के कुछ दिन बाद से ही माता की मूर्ति बनने का काम शुरू हो जाता था। स्कूल आते-जाते कुछ देर रूक कर हम मूर्ति निर्माण प्रक्रिया को देखा करते थे; मानो हर पल के साक्षी बनने की जिम्मेदारी किसी ने सौंप रखी हो। फरवरी का महीना शुरू होते ही हम दिन गिनने लगते थे। होली, दशहरा में कपड़ा बने चाहे नहीं बने, लेकिन सरस्वती पूजा में पीला फ्रॉक जरूर सिलवाए हैं 'बजरंग टेलर'में। नयका फ्रॉक पहने खातिर भी आउ उतावलापन बढ़ जाता था।
पूजा का दिन आता और सुबहे से हम तैयारी में लग जाते। आयोजन के उल्लास में भूख प्यास न जाने कहाँ लापता हो जाता था एक दू दिन पहलहीं से। बेसन, चीनी, पीयरका रंग लावे से ले के लक्ष्मण काका (हलवाई) के बुलावे तक हर काम में भागीदारी निभाते थे हम।
बड़ी मजा आता जब एकदिन पहिले अमरूद के बगीचा में माटी के #चूल्हा पर बड़का कड़ाह चढ़ा के लक्ष्मण काका #बुंदिया बनावे का कार्यक्रम शुरू करते थे। हम बचवन के टोली तो उहें अड्डा जमाए रहता कि का-का और कैसे-कैसे कर रहे हैं काका। बड़ी उत्सुकता से हर एक चीज देखते आउ सीखते थे। लगता जैसे बड़ा हो के बुंदिया का दुकान हमहीं लोग को खोलना है। पता नहीं बचपन का स्वाद ही अनोखा था या हर चीज शुद्ध होने के कारण इतना स्वादिष्ट लगता था।
इ सब करते कम-से-कम दस तो बजिए जाता था। तबतक मूर्ति आ जाती थीं आऊ हमलोग अगल-बगल से आउ माई से रंग-बिरंगा साड़ी, सेप्टी पिन ले के रात भर मूर्ति सजाते थे। न थकते थे, न ही नींद आती। एक दो घंटे सोकर फिर भोरे-भोरे उठते आउ फिर लग जाते पूजा के तैयारी में। माला बनाते, आरती के तैयारी करते, नया कपड़ा मे सज धज के पूजा में बैठते, कबो घंटी बजावे के जिम्मा लेते तो कबो परसादी बांटे में बढ़ चढ़ के रोल अदा करते।
आपन स्कूल के काम निमारे के बाद शाम के फिर तैयार हो के निकलते अगल बगल के मूर्ति देखे आऊ परसादी खाए। घरे आवत तक समूचा कपड़ा बुंदिया के रस से चटचट हो जाता। जब थोड़ा बड़ा हुए त सरस्वती पूजा आऊ शिवरात्रि में पीला साड़ी पहीने के धुन सवार हुआ।
सरस्वती पूजा के रात भी उतने रंगीन होता था, हर साल सिनियर विद्यार्थी लोग नाटक करते थे। पिताजी प्राचार्य थे और हिंदी प्रेमी, इसीलिए नाटक होता कभी गोदान, कफ़न, बड़े घर की बेटी आदि कहानी पर। उस समय मालूम भी न था कि इ सब प्रेमचंद का लिखा हुआ है। पापा के हेड मास्टर होने का बड़ी फायदा होता, हम देर से भी आते तबो नाटक में आगे ही बैठते।
अइसहीं दूसरा दिन मूर्ति विसर्जन के समय आ जाता आऊ रो-रो के बुरा हाल हो जाता। आखिरी वाला पूजा खातिर लड़का लोग मूर्ति लेकर घरे-घर आता। माई चाची लोग पूजा करतीं आऊ हम आँसू भरकर चुपचाप देखते रहते। थोड़ी ही देर में 'सरस्वती जय जय' के नारा से पूरा स्कूल परिसर गूँजने लगता और ट्रैक्टर पर माता की मूर्ति रखकर छात्र नदी पोखर की तरफ चल देते #भसान के लिए।
अब मूर्ति विसर्जन के मजेदार किस्से अगले पोस्ट में, ठेठ पलामू के स्टार लेखक आनंद केशव की कलम से और कुछ रोचक वीडियो भी... जुड़े रहिये! माँ शारदे की कृपा सब पर बरसे.

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