Sunday, June 26, 2022

मंगरा हादसे के 32 साल और डालटनगंज के लोगों का सेवा भाव

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25 जून 1990 यानी आज से 32 साल पहले मंगरा रेलवे स्टेशन एक भयानक हादसे का गवाह बना था। दोपहर में एक पैसेंजर ट्रेन की टक्कर कोयले से लदी मालगाड़ी से हो गई थी। करीब 60 लोग मारे गए थे और घायलों की संख्या सैकड़ों थी। इस हादसे में घायल लोगों का इलाज डालटनगंज के सदर अस्पताल में चला था। इस दौरान शहर के लोग रक्तदान करने से लेकर दूसरी तरह से मदद के लिए उमड़ पड़े थे।
उस समय मेरे घर में काम लगा हुआ था। कुछ सामान खरीदने के लिए मैं शहर की ओर जा रहा था। तभी रेड़मा चौक पर विद्यार्थी परिषद के जिला प्रमुख रामानुज पांडेय और छात्र नेता ओम प्रकाश प्रसाद 'पप्पू' स्कूटर से आते मिले। इन दोनों ने बताया कि बरवाडीह के पास ट्रेन एक्सीडेंट हो गया है और वे वहीं जा रहे हैं। मैं भी इन लोगों के साथ हो लिया। जब हमलोग घटना स्थल पर पहुंचे तो वहां का दृश्य हृदय विदारक था। चारों तरफ लाशें थी और लोगों की चीख चिल्लाहट। वहां मौजूद अधिकारियों ने हमलोगों से कहा कि यदि आप लोग कुछ कर सकते हैं तो तुरंत डालटनगंज के सदर अस्पताल जाइए। यहां से घायल वहीं जा रहे हैं। हम तीनों तुरंत डालटनगंज के लिए निकल पड़े। अभी कुछ आगे ही बढ़े थे कि पप्पू जी ने कहा कि इसी ट्रेन से उनके मां-पिताजी भी आ रहे थे। यह चिंतित करने वाली खबर थी। तभी रोड पर लोगों का झुंड दिखा। ये लोग हादसे के शिकार तो हुए थे पर कम घायल थे। इन्हीं में पप्पू जी के मां-पिताजी भी थे। हमलोगों ने सड़क पर खड़े होकर एक ट्रक को रोका और सभी घायलों को लेकर डालटनगंज अस्पताल की ओर चले।
अस्पताल पहुंचने पर आरएसएस के अश्विनी मिश्रा और बजरंग दल के श्याम बिहारी राय वहां पहले से मौजूद थे। हादसे की सूचना मिलने के बाद संघ परिवार और अन्य संगठनों के लोग भी जुटने लगे थे। राहत कार्य प्रारंभ हो चुका था। इसकी कमान विद्यार्थी परिषद के लोगों के हाथ में थी। शाम होते-होते लोगों को ब्लड देने के जरूरत हुई। सिविल सर्जन ने मुझसे कहा कि खून की व्यवस्था हो सकती है क्या। मेरा जवाब था, ‘मुझसे ही शुरुआत कीजिए।’ साथ में नगर प्रमुख शिवपूजन पाठक (वर्तमान में झारखंड भाजपा के मीडिया प्रभारी) खड़े थे। उन्होंने कहा, ‘पहले मेरा ब्लड ले लीजिए, इसके बाद और किसी का।’ शिवपूजन जी के रक्तदान के बाद फिर खून की जरूरत पड़ी। इस बार कौशिक मल्लिक(ग्रामीण बैंक में कार्यरत और सेसा के महासचिव) ने कहा, ‘सुमन, अब मैं ब्लड डोनेट करूंगा।’ यह कौशिक का पहला रक्त दान था। वह अभी तक करीब50बार देश ही नहीं विदेश में भी रक्तदान कर चुका है।
इसके बाद कितने लोगों ने रक्त दिया इसकी गिनती नहीं है। सदर अस्पताल की हालत बेहद खराब थी। राहत कार्य के दौरान बिजली कट गई तो परिषद के कार्यकर्ताओं ने मोमबत्ती की रोशनी में रक्त दिया। इसी दौरान पलामू की तत्कालीन उपायुक्त अमिता पॉल वहां पहुंची। भगवा पट्टा लगाए युवाओं को देखने के बाद उन्होंने सभी को हटने को कहा। इस पर मेडिकल टीम के लोगों ने कहा कि यदि ये लोग हट गए तो हमारे लिए काम करना मुश्किल हो जाएगा। ये स्ट्रेचर पर घायलों को लाने से लेकर रक्तदान तक में लगे हैं। जब डीडीसी लिआन कुंगा वहां पहुंचे तो बिजली गुल हो गई थी। प्रदेश कार्यसमिति के सदस्य रहे अनूप कुमार लाल ने उनसे कहा कि बड़े अधिकारी हैं तो जनरेटर की व्यवस्था कराइए। खैर, जैसे-तैसे उन्होंने जनरेटर की व्यवस्था की।
हादसे के दूसरे या तीसरे दिन तत्कालीन रेल मंत्री जॉर्ज फर्नांडिस भी अस्पताल के दौरे पर आए थे। भगवा पट्टा देखकर वे थोड़े असहज हुए पर जब उन्हें पता चला कि राहत कार्य में सबसे ज्यादा योगदान इन्हीं युवकों का है तो शाबासी दिए बिना नहीं रह सके। तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद भी अस्पताल में आए थे।
परिषद का राहत कार्य चार दिन तक चला था। मिथिलेश कुमार पांडेय, अभय कुमार तिवारी, ध्रुव कुमार अग्रवाल, मनोज कुमार सिंह, श्रीप्रकाश चौबे, ब्रजेश कुमार, अखिलेश्वर पाठक, अक्षय कुमार, धर्मदेव यादव सरीखे न जाने कितने पूर्व और वर्तमान के कार्यकर्ता इस कार्य में लगे उसकी गिनती संभव नहीं। आरएसएस के जगतनंदन प्रसाद जी के अलावा शिक्षक कार्यकर्ताओं में प्रो. केके मिश्रा, प्रो. एससी मिश्रा, प्रो. बीआर सहाय, प्रो. एलआरएन शाहदेव दिन में कई बार अस्पताल में पहुंच जाते थे। एक बात का जिक्र नहीं करूं तो वह बेइमानी होगी। यह है डालटनगंज के लोगों का इस संकट के समय मदद के लिए उतरना। जब मैं घर से निकला था तो मेरी जेब में पांच रुपये थे। राहत कार्य खत्म होने के समय मेरे पास हजार रुपये के आसपास थे। बिना किसी रिश्ते के शहर के लोग आते थे और मेरे पॉकेट में रुपये रखकर चले जाते थे। इन रुपयों से दवाइयां खरीदी गईं, भोजन बनवाया गया, फल-दूध मंगवाए गए। रुपयों के अलावा बड़ी संख्या में लोग फल, दूध और दवाइयां लेकर भी आते थे। जो रुपये बचे थे वे मैंने अधिकारियों की मौजूदगी में घायलों के परिजनों को दे दिए। ये लोग कौन थे हमें इसकी जानकारी नहीं थी। आज जैसा युग भी नहीं था कि मोबाइल नंबर ले लें या तस्वीर खींच लें।
इस हादसे के 32 साल बाद इस संस्मरण के लिखने का मकसद यह है कि डालटनगंज में सेवा की परंपरा काफी पुरानी है। कोरोना काल में भी शहर के उत्साही और दृढ़ निश्चयी युवाओं ने अनुभवी लोगों के साथ मिलकर इस भावना को जिंदा रखा है। यह भावना जिंदा रहे, यही कामना है।
©प्रभात मिश्रा सुमन
वरिष्ठ पत्रकार, अमर उजाला नोएडा
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Friday, June 17, 2022

जेठ की रात

 #ठेठ_पलामू:

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‘खा ले ले तो चल न रे बमड़वा! दुरा पर खटियाँ बिछावल जाव’। सहिये सांझे रात के भोजन कर लेने के बाद दादा ने अपने तीसरे पैर (यानी गोजी) को टटोलते हुए कहा।
‘ना दादा! आज तो हम घरे में माई भिजुन सूतबsवा ’ अनमने मन से ही हमने दादा को जवाब दिया। छोटकी बहीन के जन्म के बाद माई के गोद मेरे लिए कभीए-कभी नसीब होती थी।छह-सात साल के तो हइये थे हम, पर अब दादा तो लगता है हमें माँ के बिस्तर से भी गायब करे के योजना पर काम कर रहे थे।
‘अरे चल बुड़बक! दुरा पर मोटरो-गाड़ी देखबे। ओने बढ़िया हवा-बेयार चलइत हई। एने गर्मी में घर में का सुतबे?’ मोटर गाड़ी के बारे में बात करके दादा एक झटके में मेरे घर में सोने के खयाल को फुर्र कर दिए। उनकी ये बात अचनाक गुलकोन-डी की शक्ति दे गई। हमने कहा -
‘आएं! फटफटियो देखेला मिलतवा हो … चला अउ का! तब दुरे देन सुत के गाड़ी-मोटर देखल जाइ….. माई तो हर घड़ी मईवें (छोटकी बहीन) के गोदी में ले ले रह हsवा।अउ रात के हमरा पीठ देने फेक देsव हsवा। एह से बढ़िया तो तोहरे भीजून न सुतब हो…! चला सार के ’
गाँव में तब नया-नया सुर्खी (मोरम) वाला रोड़ बना था। हमनी लइकन के तो दिन भर में एकाद जीप आउ फटफटिया देख के ही मन खुश हो जाता था। पास से गुजरने पर उसके पीछे हमीन भागते और उसका पीछा करके खूब लहसते। गाँव में बिजली का आना तो बस सपनों में ही था। तब तो पगडंडियों को चौड़ा करके रोड़ का शक्ल दिया जा रहा था, और यही बहुत था। रात के वक़्त अपने गांव में 'किसी मोटर कार या फटफटिया का अपनी ही रोशनी का अनुगमन करना' मेरे लिए किसी आश्चर्य से कम नहीं था।
ये बात नब्बे के दशक की है, ये बात अपने गाँव की है। ये बात छह-सात साल के बच्चे के यादों के पिटारे से निकाली गई है।
लगभग गाँव के सभी बड़े बुजुर्ग जेठ (गर्मी) की रातों में खेत-खलियान या सड़क के किनारे खुले आसमान में सोना पसंद करते थे। घर के गृहनियों के संझउत (शाम का दीया) देखा देने के बाद सहिये सांझे सबके घर भोजन बन जाता और लोग गरमा -गरम भोजन कर भी लेते थे। फिर का…. एक लाइन से सभी वरिष्ठ नागरिकों (सीनियर सिटिज़न) का खटियां लग जाता। और आराम फरमाते हुए ये लोग थोड़ा गांव गिराव और उनमे कुछ घुम्मकड़ प्रकृति वाले देश दुनियां की भी बाते करते। हाँ, इन सीनियर सिटिज़नो के बीच एकाद रेचकी (लइका) भी माई बाबूजी से रूस (रूठ) के दादा के गोदी में घुस जाते थे। फिर का..... थोड़ी देर में सुतिए के 'हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे। हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे।' होता और फिर दादा एकाद खिली खैनी रगड़ के मुँह में भर के सो जाते। इ खैनी के गंध के बिना दादा के समीप होने का एहसास कहाँ ..!
हमहू कहते- ‘तनी सा हमरो दा न हो, चीख के देखुं तो कइसन लग हइ’ और फिर दादा कहते-‘अरे सूत बुड़बक! ढ़ेर रात हो गेलइ …’
फटफटिया के इंतज़ार में कब आँख लगा पते नहीं चलता। हमलोग रात के तीसरे प्रहर में प्रवेश कर जाते। कुछ देर में महसूस होता कि ठंडी-ठंडी हवाएं सामान्य से ज़्यादा तेज़ चल रही है। पर नींद का कहर इस कदर हावी होता था कि चादर ओढ़ने की क्षमता ही क्षीण हो चली थी। फिर भी थोड़ी देर में हम बदन पर चादर महसूस करते। अरे वो दादा न है …. सब बिन कहे समझ जाते है।
अरे ये क्या! इतनी बड़ी बड़ी बुँदे अचनाक कहां से आ गई और बदन पर छुरी-चाकू के माफिक प्रहार करने लगी! हम उठ के बैठ गए …
‘अहो दादा…! उठा हो … मर पानी बरसे लsगलवा …!’
और दादा ये बोलते हुए सांत्वना देते हुए कहते - ‘अरे बकरखेदवा! पानी हइ हो.... सूता चुपचाप.... तनी देर में निकल जतवा’.. फिर अपने और मेरे बदन पर चादर को ठीक करते हुए निश्चिंतता से सोते रहे।
अरे वाह…. ! सच में पानी भागते हुए दूर निकल जाता। मने एह से एकर नाम बकरखेदवा (बकरी खेदने वाला) है न, चलिए ठीके है।
तनी देर में एक फटफटिया का आवाज़ आता और हम देखा करते कि आगे आती हुई पीली रौशनी के पीछे कोई रईस बाबू शायद गांव के भंडार गृह में जा रहे थे। पर इतनी रात को.…? खैर उससे हमे क्या? हमारी आँखों को तो तसल्ली उनकी फटफटिया ने दे दी, और फिर हम सो गए।
दादा और उनके नींद का साथ यही तक का होता। उ अब गाय-गोरु के सानी-गवत में लग चुके होते थे। थोड़ी देर में पक्षियों की चहचहाहट के बीच मवेशियों के झुण्ड से आती घंटी के टन-टन की आवाज़ हमें सोने लायक नहीं छोड़ती, तो मजबूरन तब उठ ही जाते थे ….।
जेठ की ये रातें तो अब यादें बन कर रह गयी है। अब न वो बचपन रहा ना ही वो गांव का माहौल। माटी के खपड़ैल घर धीरे धीरे पक्के में बदलते चले जा रहे है।
बदलाव अच्छा होता है। जो सक्षम है उनका क्या कहना। बाक़ी लोगों को प्रधानमंत्री आवास योजना से बल मिल चूका है। सब कुछ तो अच्छा ही हो रहा है, ये हम, आप, सभी जानते है, फिर भी न जाने क्यों…
उन दिनों में फिर से लौटने को दिल करता है…
फिर से गुल्ली-डंटा और गाय मेराते हुए गोबरगीद का खेल खेलने को मन करता है...
भरी दुपहरिया में आम के पेड़ पर लबेदा चलाने और कच्चे आम के कोयलॉस को उपर उछालने को दिल करता है…
फिर से फटफटिया के पीछे दौड़ने को मन करता है…
न जाने क्यों फिर से ....
© अवनीश प्रकाश
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Thursday, June 9, 2022

पलामू वाली बात बंगलोर में कहाँ

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चलते वक़्त मेरी निगाहें औऱ सर दोनों ऊँचा देखना पसंद करते हैं। जितने भी ऊँचे भवन के छत , उनपर लगे मधुमक्खी के कुछ अधूरे कुछ पूरे छत्ते, पेड़ों की फूँगी, आसपास कलरव करते चिड़ियों के बच्चे, ऐसे शीर्ष सम्बन्धी कोई भी सवाल पूछ लिया जाये हमको कोई परेशानी नहीं है।
जब गार्जियन बने ना, तब जाके बुझाया कि बेट्टा, जन्ने-मन-तन्ने घूमे के दिन गए अब। पहिले करोना रोलाया, फिर बिटिया का स्कूल। हमहुँ दांत पजउले थे कि अबकी तs गर्मी छुट्टी में बहरे जाना है घूमे, चाहे जे हो जावे।
सब तरकीब सोचे के बाद बंगलोर जाने का प्लान हुआ। वैसे भी एक महीना ला शिमला आउ मनाली के जाता है बताइये। बंगलोर एक अइसन जगह है, जहाँ डाल्टेनगंज के सब घर के एकाध आदमी जरूर दिखेगा।
बंगलोर गइला पे मने अइसा लगा ना, जइसे भट्टी से निकाल के फ्रीजर में डाल देवल गइल हो। एकदम बिहाने मॉर्निंग वॉक करे निकले हम। एतना रकम के कुत्ता दिखा ना रोड पे कि का कहें। आदमी से जादे कुत्ता सब मॉर्निंग वॉक कर रहा था। हमको भी बिदेश वाला फीलिंग्स आने लगा। हमहुँ उपरे मुड़ी, नीचे गोड़ करके रपेट दिए। कुछु कहिये सुंदर-सुंदर बिल्डिंग सब देख के मन एकदम तृप्त हो गया। मेरा तो पाँव रुकिए नहीं रहा था।लेकिन ब्रेक लग गया एकदम।
हाय रे हमर किस्मत!!! इंडिया में कउनो जगह जाइये, रोड पे गढ्ढा ना मिले, अइसा कइसे हो सकता है। होना का था, गोड़ पड़ गया था गढ्ढा में, मुँह के बल सीधे औंधे मुंह जमीन पे तारे देखने लगे। सडक किनारे गिर के ज़मीन पर बैठे थे औऱ मेरे साथ / आगे / कुछ कदम धीरे चलने वाले लोग भी बिना कुछ पूछे सिर्फ एक सरसरी निगाह डाले राउंड पर राउंड लगा रहे थे। जाने क्यूँ अजीब लगा की किसी ने ये ना पूछा, की बेटा क्या हुआ?
इहे डाल्टेनगंज रहता तो अभी रोड जाम हो गया होता। कसम से उ घड़ी हमरा आपन शहर के बहुत याद आया।
एक बार के बात है, मने बहुत पहिले का। इंटर में हम नया-नया स्कूटर चलाने सिखे थे। बाबूजी से जिद करके ट्यूशन में सबके दिखावे ला स्कूटर से जा रहे थे। रेड़मा चौक पे स्कूटर लेले गढ्ढा में घुस गए। होना का था, सब आपन काम छोड़ के हमरा उठावे में लग गया। कउनो हाल चाल पूछे लगा, कउनो बाबूजी के नाम पता। एगो कहे लगा कि नमधारी जी से इ गढ्ढा कहियो ना भरायेगा। अबरी भोट रोड पे देना है। एगो चचा बेचारे स्कूटर उठा के पोंछे लगे। एतना अपनापन था न पूछिये मत। पूरा भौकाल बन गया था हमर।
बहरहाल, उस समय हमको उठाने मेरे घरवाले जिनको फ़ोन कर दिये थे,आये. - मेरी गोतनी बहन ने पूछा, " दीदी क्या आपने किसी से मदद मांगी थी "? सवाल बड़ा गूढ़ था क्यूंकि सचमें मदद मांगना तो दूर, अंदर ही अंदर दर्द से कसमसाते हुए, ऊपर से एकदम स्थिर दिखने कि कोशिश करते सोच रहे थे , ऐसे अचानक किसी को ज़मीन पर बैठा देख लोग क्या सोच रहे हैं? ( क्यारियों से फूल चुन रही है , या इटें गिन रही है?)
तो बस अब हम हैं औऱ मेरे बाएं पैर का नीला पलस्टर जो मुँह बाए उसी तरह हमको इग्नोर करता है जैसे हम अपने पैरों को करते थे , साथ में एक छड़ी भी जिसके सहारे थोड़ा बहुत चलने के अलावा कमरे के स्विच बोर्ड को चलाने, बुतरूअन को हवा में उसे घुमा डराने औऱ धम्म से आवाज़ कर लोगो को अपनी विवशता का एहसास करवाने औऱ मन ही मन कुटिल मुस्कान के साथ सोचने -'कि आज हम बंद हैं तो क्या, कल फिर चरणजीप पर हम हवाओं से गुफ्तगू करेंगे' - इसके अलावा कुछ नहीं कर सकते।
ठंडा जगह में रहे से जादे सब इंसान लोग भी ठंडा हो गइल है। कहे ला आपन देश है, पर अंग्रेज़ियत ने सबको परदेशी बना दिया है। चाहे जईसन है, हमर ठेठ पलामू; लू-लक्कड़, आनी-बानी, पाला सब झेलने के बाद भी गर्मजोशी में हम लोग को कोई फेल नहीं कर सकता है। संवेदना सिर्फ सुनने में आसान लगती है, पलमुआ लोग के मुंडी में घुस भी जाती है, पर इसे महानगरीय सभ्यता को समझाना या उनमें हो- ऐसी कोई उम्मीद लगाना कोयल नदी में गिर गयी सुई ढूंढ़ने जैसा है।
अब बस आह से अहा तक का इंतजार है...ठीक है ना?!
©शिवांगी
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Wednesday, June 8, 2022

कुआं किनारे (जेठ स्पेशल)

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इसी कुँएं की भित्ति पर बैठकर
ठहाके मारते
हँसते-खिलखिलाते थे
गाँव-घर के लोग।
वहीं पर बैठकर गप्प हांका करती थी
आस-पड़ोस की औरतें।
उदासी और अकेलेपन के बीच
वहीं पर बैठकर
सभी खोजते थे खुशियां।
इसी कुँएं के पास से
आती थी
आस-पास की खबरें
यहीं पर लड़ते-भिड़ते
और फिर सुलझते थे झगड़े।
कुँएं पर बैठकर
अपनी उमर का हिसाब नहीं
बल्कि गिनते थे रेलगाड़ी के चमकते डिब्बों को
उसकी गति और आती-जाती रोशनी को।
यहीं पर बैठकर
देखते थे
कौन सी बस रुकी?कौन जा रहा..?
और कौन आया अपने गाँव।
टूटते सपनों से बेखबर
देखते थे
शांत चमकती आँखों से
दौड़ती गाड़ी और भागते लोगों को।
शहनाइयों के स्वर
और मंगलगीतों को सुनकर
हँसते-इतराते-लजाते
देखा है इस कुँएं को।
तो अपनों को दूर जाता देखकर
निर्जीव आँसू बहाते हुए भी
देखा है इस कुँएं को।
लेकिन अब...
इसकी घिरनी पर नहीं खेलती रस्सियां
बाल्टियों की खनखनाहट सुनाई नहीं देती
धसक रही ईटें अब इसके दीवारों की
धुंधले पड़ रहे अक्षर अब इसकी पट्टिका के
आवाज आती है तो
बुजुर्ग महिलाओं की फुसफुसाहट
खोजती है जो स्मृतियां
इस कुँएं के पास अब भी।
©Ajay kumar Shukla
No photo description available.

Friday, June 3, 2022

सबसे प्यारी मेरी साइकिल


( विश्व साइकिल दिवस)
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कभी घर में साइकिल थी पर पापा ने उसे किसी को दे दिया। हम दोनों भाई छोटे थे तो किसी को नीचे से (कैंची) साइकिल चलाते देख ललचा जाते थे। इंतजार होता था कि घर में कोई स्टूडेंट आए और हम उनसे साइकिल मांग कर थोड़ा आगे-पीछे कर लें। मन में एक कसक होती थी कि काश, हम भी साइकिल वाले होते।
मन की मुराद पूरी हो यह आसान नहीं था। मां के डर से हमलोग पापा से साइकिल लेने के लिए नहीं कह सकते थे। ऐसे में बचते थे बाबा और माई (दादी)। शनिवार को हम दोनों भाई बाबा-माई के पास पनेरीबांध चले जाते थे। वह दौर था जब देश में आपातकाल खत्म हुआ था। हमारे मन में दो बातें उठतीं थी ...संघर्ष हमारा नारा है और अनशन। ऐसे में, हमारे बाल मन में भी यह बात बैठ गई थी कि अनशन के बल पर कुछ हासिल किया जा सकता है।
हम दोनों भाइयों के पनेरीबांध पहुंचते ही पिआव और खीरमोहन सामने आ जाता था। भरपेट मिठाई खाने के बाद गांव में खेलने जाना और फिर शाम को आना। इस बीच माई की अमृत जैसी सेवई तैयार रहती थी, बढ़का डूभा (कटोरा) में भरकर। इससे पेट भरने के बाद जब देर रात गए (करीब नौ बजे) माई खाने को कहतीं तो हम दोनों भाइयों (ज्यादा मेरा) का अनशन शुरू। मांग बस एक-बाबा हमको साइकिल खरीद दीजिए। माई मनुहार करतीं-खा ल मुनू...खा ल गुड्डू। पर संघर्ष में कोई ढिलाई नहीं। वैसे वास्तविकता रहती थी कि सेवई से ही पेट इतना भर जाता था कि कुछ खाने की जगह पेट में रहती ही नहीं थी।
खैर, रात कटती और सुबह दस बजे तक पापा डालटनगंज से आ जाते। माई की शिकायत मुनू नखथू खइले, गुड्डू नखथू खइले। इसके बाद पापा कहते क्या बात है सुमनजी। सुमनजी सुनना कि अनशन समाप्त। पापा जब गुस्से में होते हैं तो मुझे सुमनजी कहते हैं। आज भी इस संबोधन को कभी-कभी सुन लेता हूं तो हालत खराब हो जाती है। एक बार (सन् 1979) की बात है कि पापा कॉपी जांचने रांची गए थे। रविवार को देर शाम वे लौटे तो पनेरीबांध आने का सवाल ही नहीं था। मेरा अनशन रविवार को भी जारी रहा। सोमवार की सुबह बाबा राजी हो गए कि चलो साइकिल खरीद देते हैं। मेरी शर्त थी कि पहले साइकिल दुकान पर चलिए, ऑर्डर दीजिए तब पापा को खबर कीजिए। हुआ भी ऐसा ही। रांची साइकिल स्टोर में ऑर्डर दिया गया रेले साइकिल कसने का। इसके बाद पापा को खबर भेजी गई। वे आए तो दुकान वाले ने उन्हें प्रणाम किया और आने का कारण पूछा। जब उन्हें जानकारी हुई तो 535 रुपये की साइकिल का बिल 500 रुपये हो गया। बाबा ने भी इतने ही रुपये देने की बात कही थी कि क्योंकि उन्हें छोटानागपुर बैंक से इतने ही पैसे वापस मिले थे। छोटानागपुर बैंक आज के झारखंड का अग्रणी बैंक था जो 1960 के आसपास डूब गया था। इससे कभी-कभी जमाकर्ताओं के पैसे वापस मिलते थे और बाबा को मिली यह आखिरी किस्त थी।
इसके बाद, विजयी मुस्कान के साथ मैं पापा के साथ साइकिल पर बैठकर डेरा लौट आया। उस समय हमलोग अग्रवाल साहब के घर में रहते थे। आज वहां ऐसी सड़क बन गई है कि ढलान और चढ़ान खत्म हो गया है। पर उस समय हम दोनों भाई ढलान में साइकिल पर बैठ कर बिना पैडल मारे देवब्रत बाबू के घर तक चले जाते जाते थे। वापसी वर्तमान के सुरेश सिंह चौक से होती यहां से शुरू ढलान भी करीब दो सौ मीटर का था। बाद में हम दोनों भाई साइकिल ठीक से चलाने लगे। पनेरी बांध जाना और वहां से अमरूद, शरीफा झोले में भरकर लाना शुरू हो गया। शुरुआत में जाते थे तब कोयल पर पुल नहीं था। पानी रहने पर कुछ पैसे लेकर लड़के साइकिल कंधे पर उठाकर नदी पार कर देते थे। बाद में पुल बना तो साइकिल चलाने का आनंद ही बढ़ गया। केजी स्कूल रोड से आगे आने पर सद्दीक चौक (नेता जी सुभाष चौक) से बिना पैडल मारे ही आधा पुल पार करने और फिर लौटते समय शिवलाल जी के होटल (तस्वीर यहीं की है) से बिना पैडल मारे आधा पुल पार करने का रोमांच ही कुछ और था। इस रोमांच को आज की बाइक वाली और दोनों छोर पर भारी ट्रैफिक देखने वाली पीढ़ी समझ नहीं सकती है।
इसी साइकिल से मैं अपने मित्रों के साथ 1983 में बेतला भी गया था। पहली बार जब साइकिल पंक्चर हुआ था तब बनवाते समय टायर और ट्यूब के दर्द को मैंने भीतर तक महसूस किया था। स्कूल जाने से लेकर कॉलेज जाने तक, छात्र राजनीति करने से लेकर पत्रकारिता करने तक कई यादें इस साइकिल से जुड़ी हैं। एक बार संभवतः 1991 या 92 में यह साइकिल चोरी हो गई। गुड्डू इसे लेकर कहीं गया था। लौटा तो यह गायब। दिल टूट गया बेचारे का। उसने अपने स्तर से खोज शुरू की। साइकिल चुराने वाले ने इसे पूरा नया रूप दे दिया था। उसे एक दिन साइकिल कहीं पर लगी हुई दिख गई। जब गुड्डू ने इस पर दावा किया तो वहां भीड़ लग गई। तब गुड्डू ने कहा कि मुझे इस साइकिल के सीट ने नीचे लिखा नंबर याद है यदि जिसके पास अभी यह साइकिल है तो वह उसे बता दे तो वह दावा छोड़ देगा। जिसके पास साइकिल थी उसके लिए इस सवाल का जवाब देना असंभव था। जब लोगों ने गुड्डू से पूछा तो उसका जवाब था 311H70। फिर साइकिल वापस, रंग-रोगन के बाद नए रूप में। बाद में यह साइकिल घर में दूध देने वाले को दे दी गई और यह यादों में समा गया। लॉकडाउन के दौर में पुरानी तस्वीरों के जखीरे में इसकी भी तस्वीर सामने आ गई तो इसकी यादों को शब्दों में संजो दिया।
साइकिल खरीदने का सिलसिला थमा नहीं था। पापा गाजियाबाद आए थे। सोमू-छोटू ने साइकिल खरीदने की फरमाइश अपने बाबा-दादी के सामने रखी जो तुरंत पूरी हो गई। पर साइकिल चोरी का सिलसिला भी जारी रहा। एक सप्ताह के अंदर ही वह साइकिल चोरी हो गई पर वापस मिलने का सिलसिला टूट गया।
यह कहानी सिर्फ मेरी साइकिल की नहीं है बल्कि असंख्य मित्र होंगे जिन्होंने इस तरह जिद कर साइकिल खरीदवाई होगी और सवारी की होगी।
सभी को विश्व साइकिल दिवस की शुभकामनाएं
©प्रभात मिश्रा सुमन
वरिष्ठ पत्रकार अमर उजाला नोएडा
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