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‘खा ले ले तो चल न रे बमड़वा! दुरा पर खटियाँ बिछावल जाव’। सहिये सांझे रात के भोजन कर लेने के बाद दादा ने अपने तीसरे पैर (यानी गोजी) को टटोलते हुए कहा।
‘अरे चल बुड़बक! दुरा पर मोटरो-गाड़ी देखबे। ओने बढ़िया हवा-बेयार चलइत हई। एने गर्मी में घर में का सुतबे?’ मोटर गाड़ी के बारे में बात करके दादा एक झटके में मेरे घर में सोने के खयाल को फुर्र कर दिए। उनकी ये बात अचनाक गुलकोन-डी की शक्ति दे गई। हमने कहा -
‘आएं! फटफटियो देखेला मिलतवा हो … चला अउ का! तब दुरे देन सुत के गाड़ी-मोटर देखल जाइ….. माई तो हर घड़ी मईवें (छोटकी बहीन) के गोदी में ले ले रह हsवा।अउ रात के हमरा पीठ देने फेक देsव हsवा। एह से बढ़िया तो तोहरे भीजून न सुतब हो…! चला सार के ’
गाँव में तब नया-नया सुर्खी (मोरम) वाला रोड़ बना था। हमनी लइकन के तो दिन भर में एकाद जीप आउ फटफटिया देख के ही मन खुश हो जाता था। पास से गुजरने पर उसके पीछे हमीन भागते और उसका पीछा करके खूब लहसते। गाँव में बिजली का आना तो बस सपनों में ही था। तब तो पगडंडियों को चौड़ा करके रोड़ का शक्ल दिया जा रहा था, और यही बहुत था। रात के वक़्त अपने गांव में 'किसी मोटर कार या फटफटिया का अपनी ही रोशनी का अनुगमन करना' मेरे लिए किसी आश्चर्य से कम नहीं था।
ये बात नब्बे के दशक की है, ये बात अपने गाँव की है। ये बात छह-सात साल के बच्चे के यादों के पिटारे से निकाली गई है।
लगभग गाँव के सभी बड़े बुजुर्ग जेठ (गर्मी) की रातों में खेत-खलियान या सड़क के किनारे खुले आसमान में सोना पसंद करते थे। घर के गृहनियों के संझउत (शाम का दीया) देखा देने के बाद सहिये सांझे सबके घर भोजन बन जाता और लोग गरमा -गरम भोजन कर भी लेते थे। फिर का…. एक लाइन से सभी वरिष्ठ नागरिकों (सीनियर सिटिज़न) का खटियां लग जाता। और आराम फरमाते हुए ये लोग थोड़ा गांव गिराव और उनमे कुछ घुम्मकड़ प्रकृति वाले देश दुनियां की भी बाते करते। हाँ, इन सीनियर सिटिज़नो के बीच एकाद रेचकी (लइका) भी माई बाबूजी से रूस (रूठ) के दादा के गोदी में घुस जाते थे। फिर का..... थोड़ी देर में सुतिए के 'हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे। हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे।' होता और फिर दादा एकाद खिली खैनी रगड़ के मुँह में भर के सो जाते। इ खैनी के गंध के बिना दादा के समीप होने का एहसास कहाँ ..!
हमहू कहते- ‘तनी सा हमरो दा न हो, चीख के देखुं तो कइसन लग हइ’ और फिर दादा कहते-‘अरे सूत बुड़बक! ढ़ेर रात हो गेलइ …’
फटफटिया के इंतज़ार में कब आँख लगा पते नहीं चलता। हमलोग रात के तीसरे प्रहर में प्रवेश कर जाते। कुछ देर में महसूस होता कि ठंडी-ठंडी हवाएं सामान्य से ज़्यादा तेज़ चल रही है। पर नींद का कहर इस कदर हावी होता था कि चादर ओढ़ने की क्षमता ही क्षीण हो चली थी। फिर भी थोड़ी देर में हम बदन पर चादर महसूस करते। अरे वो दादा न है …. सब बिन कहे समझ जाते है।
अरे ये क्या! इतनी बड़ी बड़ी बुँदे अचनाक कहां से आ गई और बदन पर छुरी-चाकू के माफिक प्रहार करने लगी! हम उठ के बैठ गए …
‘अहो दादा…! उठा हो … मर पानी बरसे लsगलवा …!’
और दादा ये बोलते हुए सांत्वना देते हुए कहते - ‘अरे बकरखेदवा! पानी हइ हो.... सूता चुपचाप.... तनी देर में निकल जतवा’.. फिर अपने और मेरे बदन पर चादर को ठीक करते हुए निश्चिंतता से सोते रहे।
अरे वाह…. ! सच में पानी भागते हुए दूर निकल जाता। मने एह से एकर नाम बकरखेदवा (बकरी खेदने वाला) है न, चलिए ठीके है।
तनी देर में एक फटफटिया का आवाज़ आता और हम देखा करते कि आगे आती हुई पीली रौशनी के पीछे कोई रईस बाबू शायद गांव के भंडार गृह में जा रहे थे। पर इतनी रात को.…? खैर उससे हमे क्या? हमारी आँखों को तो तसल्ली उनकी फटफटिया ने दे दी, और फिर हम सो गए।
दादा और उनके नींद का साथ यही तक का होता। उ अब गाय-गोरु के सानी-गवत में लग चुके होते थे। थोड़ी देर में पक्षियों की चहचहाहट के बीच मवेशियों के झुण्ड से आती घंटी के टन-टन की आवाज़ हमें सोने लायक नहीं छोड़ती, तो मजबूरन तब उठ ही जाते थे ….।
जेठ की ये रातें तो अब यादें बन कर रह गयी है। अब न वो बचपन रहा ना ही वो गांव का माहौल। माटी के खपड़ैल घर धीरे धीरे पक्के में बदलते चले जा रहे है।
बदलाव अच्छा होता है। जो सक्षम है उनका क्या कहना। बाक़ी लोगों को प्रधानमंत्री आवास योजना से बल मिल चूका है। सब कुछ तो अच्छा ही हो रहा है, ये हम, आप, सभी जानते है, फिर भी न जाने क्यों…
उन दिनों में फिर से लौटने को दिल करता है…
फिर से गुल्ली-डंटा और गाय मेराते हुए गोबरगीद का खेल खेलने को मन करता है...
भरी दुपहरिया में आम के पेड़ पर लबेदा चलाने और कच्चे आम के कोयलॉस को उपर उछालने को दिल करता है…
फिर से फटफटिया के पीछे दौड़ने को मन करता है…
न जाने क्यों फिर से ....
© अवनीश प्रकाश

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