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25 जून 1990 यानी आज से 32 साल पहले मंगरा रेलवे स्टेशन एक भयानक हादसे का गवाह बना था। दोपहर में एक पैसेंजर ट्रेन की टक्कर कोयले से लदी मालगाड़ी से हो गई थी। करीब 60 लोग मारे गए थे और घायलों की संख्या सैकड़ों थी। इस हादसे में घायल लोगों का इलाज डालटनगंज के सदर अस्पताल में चला था। इस दौरान शहर के लोग रक्तदान करने से लेकर दूसरी तरह से मदद के लिए उमड़ पड़े थे।
उस समय मेरे घर में काम लगा हुआ था। कुछ सामान खरीदने के लिए मैं शहर की ओर जा रहा था। तभी रेड़मा चौक पर विद्यार्थी परिषद के जिला प्रमुख रामानुज पांडेय और छात्र नेता ओम प्रकाश प्रसाद 'पप्पू' स्कूटर से आते मिले। इन दोनों ने बताया कि बरवाडीह के पास ट्रेन एक्सीडेंट हो गया है और वे वहीं जा रहे हैं। मैं भी इन लोगों के साथ हो लिया। जब हमलोग घटना स्थल पर पहुंचे तो वहां का दृश्य हृदय विदारक था। चारों तरफ लाशें थी और लोगों की चीख चिल्लाहट। वहां मौजूद अधिकारियों ने हमलोगों से कहा कि यदि आप लोग कुछ कर सकते हैं तो तुरंत डालटनगंज के सदर अस्पताल जाइए। यहां से घायल वहीं जा रहे हैं। हम तीनों तुरंत डालटनगंज के लिए निकल पड़े। अभी कुछ आगे ही बढ़े थे कि पप्पू जी ने कहा कि इसी ट्रेन से उनके मां-पिताजी भी आ रहे थे। यह चिंतित करने वाली खबर थी। तभी रोड पर लोगों का झुंड दिखा। ये लोग हादसे के शिकार तो हुए थे पर कम घायल थे। इन्हीं में पप्पू जी के मां-पिताजी भी थे। हमलोगों ने सड़क पर खड़े होकर एक ट्रक को रोका और सभी घायलों को लेकर डालटनगंज अस्पताल की ओर चले।
अस्पताल पहुंचने पर आरएसएस के अश्विनी मिश्रा और बजरंग दल के श्याम बिहारी राय वहां पहले से मौजूद थे। हादसे की सूचना मिलने के बाद संघ परिवार और अन्य संगठनों के लोग भी जुटने लगे थे। राहत कार्य प्रारंभ हो चुका था। इसकी कमान विद्यार्थी परिषद के लोगों के हाथ में थी। शाम होते-होते लोगों को ब्लड देने के जरूरत हुई। सिविल सर्जन ने मुझसे कहा कि खून की व्यवस्था हो सकती है क्या। मेरा जवाब था, ‘मुझसे ही शुरुआत कीजिए।’ साथ में नगर प्रमुख शिवपूजन पाठक (वर्तमान में झारखंड भाजपा के मीडिया प्रभारी) खड़े थे। उन्होंने कहा, ‘पहले मेरा ब्लड ले लीजिए, इसके बाद और किसी का।’ शिवपूजन जी के रक्तदान के बाद फिर खून की जरूरत पड़ी। इस बार कौशिक मल्लिक(ग्रामीण बैंक में कार्यरत और सेसा के महासचिव) ने कहा, ‘सुमन, अब मैं ब्लड डोनेट करूंगा।’ यह कौशिक का पहला रक्त दान था। वह अभी तक करीब50बार देश ही नहीं विदेश में भी रक्तदान कर चुका है।
इसके बाद कितने लोगों ने रक्त दिया इसकी गिनती नहीं है। सदर अस्पताल की हालत बेहद खराब थी। राहत कार्य के दौरान बिजली कट गई तो परिषद के कार्यकर्ताओं ने मोमबत्ती की रोशनी में रक्त दिया। इसी दौरान पलामू की तत्कालीन उपायुक्त अमिता पॉल वहां पहुंची। भगवा पट्टा लगाए युवाओं को देखने के बाद उन्होंने सभी को हटने को कहा। इस पर मेडिकल टीम के लोगों ने कहा कि यदि ये लोग हट गए तो हमारे लिए काम करना मुश्किल हो जाएगा। ये स्ट्रेचर पर घायलों को लाने से लेकर रक्तदान तक में लगे हैं। जब डीडीसी लिआन कुंगा वहां पहुंचे तो बिजली गुल हो गई थी। प्रदेश कार्यसमिति के सदस्य रहे अनूप कुमार लाल ने उनसे कहा कि बड़े अधिकारी हैं तो जनरेटर की व्यवस्था कराइए। खैर, जैसे-तैसे उन्होंने जनरेटर की व्यवस्था की।
हादसे के दूसरे या तीसरे दिन तत्कालीन रेल मंत्री जॉर्ज फर्नांडिस भी अस्पताल के दौरे पर आए थे। भगवा पट्टा देखकर वे थोड़े असहज हुए पर जब उन्हें पता चला कि राहत कार्य में सबसे ज्यादा योगदान इन्हीं युवकों का है तो शाबासी दिए बिना नहीं रह सके। तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद भी अस्पताल में आए थे।
परिषद का राहत कार्य चार दिन तक चला था। मिथिलेश कुमार पांडेय, अभय कुमार तिवारी, ध्रुव कुमार अग्रवाल, मनोज कुमार सिंह, श्रीप्रकाश चौबे, ब्रजेश कुमार, अखिलेश्वर पाठक, अक्षय कुमार, धर्मदेव यादव सरीखे न जाने कितने पूर्व और वर्तमान के कार्यकर्ता इस कार्य में लगे उसकी गिनती संभव नहीं। आरएसएस के जगतनंदन प्रसाद जी के अलावा शिक्षक कार्यकर्ताओं में प्रो. केके मिश्रा, प्रो. एससी मिश्रा, प्रो. बीआर सहाय, प्रो. एलआरएन शाहदेव दिन में कई बार अस्पताल में पहुंच जाते थे। एक बात का जिक्र नहीं करूं तो वह बेइमानी होगी। यह है डालटनगंज के लोगों का इस संकट के समय मदद के लिए उतरना। जब मैं घर से निकला था तो मेरी जेब में पांच रुपये थे। राहत कार्य खत्म होने के समय मेरे पास हजार रुपये के आसपास थे। बिना किसी रिश्ते के शहर के लोग आते थे और मेरे पॉकेट में रुपये रखकर चले जाते थे। इन रुपयों से दवाइयां खरीदी गईं, भोजन बनवाया गया, फल-दूध मंगवाए गए। रुपयों के अलावा बड़ी संख्या में लोग फल, दूध और दवाइयां लेकर भी आते थे। जो रुपये बचे थे वे मैंने अधिकारियों की मौजूदगी में घायलों के परिजनों को दे दिए। ये लोग कौन थे हमें इसकी जानकारी नहीं थी। आज जैसा युग भी नहीं था कि मोबाइल नंबर ले लें या तस्वीर खींच लें।
इस हादसे के 32 साल बाद इस संस्मरण के लिखने का मकसद यह है कि डालटनगंज में सेवा की परंपरा काफी पुरानी है। कोरोना काल में भी शहर के उत्साही और दृढ़ निश्चयी युवाओं ने अनुभवी लोगों के साथ मिलकर इस भावना को जिंदा रखा है। यह भावना जिंदा रहे, यही कामना है।
©प्रभात मिश्रा सुमन
वरिष्ठ पत्रकार, अमर उजाला नोएडा

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