Sunday, January 29, 2023

जाड़ा के घाम घनाक्षरी छंद

 छंद बद्ध प्रबंध काव्य शृंखला की दुसरी कड़ी में आज प्रस्तुत है घनाक्षरी छंद अवनीश प्रकाश की आवाज में।

गीत रचना:ठेठ पलामू की टीम
देख जाड़ के दहाड़, एक काम के पहाड़
कोई कर ना जुगाड़, देह सेंक लेती घामा में
दिन बाड़े इतवार, हाथ लेके अखबार
साल सूट अंकवार, देह सेंक लेती घामा में
लान खटिया दुआर, डाल ओहपे पूआर
मत करिह ओहार, देह सेंक लेती घामा में
घर खिचड़ी तैयार, आव बबुआ हमार
साथै चोखा आचार, खाके सूत लेती घामा में
रोज होते भिनसार, सउँसे डिब्बा खंगार
होत लाईये पे मार, खाके सूत लेती घामा में
ठेठ बोलिया हमार, जाने सारा संसार
का बुझल इयार, देह सेंक सेंक घामा में

Wednesday, January 25, 2023

"आज मूर्ति जी आयेंगी"

पूजा के एक दिन पहले हमीन के दिमाग हिलल रहता है। काम बहुत बढ़ल रहता है ना, सेहिसे सबे पूजा में शामिल बचवन को पैनिक अटैक आ रहा होता है, नतीजतन छोट-छोट बात पे चिल्लाने लगना, अपने अलावा सब लइकन कामचोर दिखना, इ सब साधारण लक्षण है कि लईका पूरी तरह से रम गया है कम पइसा में जुगाड़ लगा के भव्य आयोजन करने में।
चंदा कलेक्शन उम्मीद से कम हुआ है, उसी में सब मैनेज करना पड़ेगा ना! पिछला बार 4 किलो बेसन का बुंदिया बनवाये थे, घट गया था, मेंबर लोग के घर तक में प्रसाद नहीं पहुंचा पाए थे। इस बार 6 किलो बेसन का बनवाना है। नवनीत का किराना दुकान है, बोल रहा था कि बाज़ार में होलसेल रेट में डालडा, बेसन, चीनी खरीद के ले जाएगा। अविनाश के जिम्मे डेकोरेशन का सामान खरीदना है, फूल वाले के पास आज ही जा के फूल ले आना है, ला के फूल माला को फ्रीज़ में रख देना है। भोर में पंडाल तैयार होए के बाद आखिरी में फूल माला से सजाना है।
मूर्ति लाने चिंटू और विकास चला जायेगा, रिक्शा पे पकड़ कर के बैठना होगा ठीक से, डैमेज नहीं होना चाहिए, नया लाल कपड़ा लेते जाइयेगा मूर्ति ढंकने के लिए। गाजर और बेर बोलल है टीभू साव को, हमर घरे पहुंचा देगा आज शाम को ही, कल भोरे मोहल्ला के लइकन चेंगन को लगाना है गाजर काटने में। टेंट हाउस वाला को फोन करो कि दुगो कनात और टेबुल और चाहिए, एतना में कइसे मैनेज होगा, परसादी बांटे ला टेबुले नहीं लिखे लिस्ट में, और एक देने नाली का पानी दिख रहा है, कनात से ढंकवाना होगा इसको।
आज रात में कौनो रेंगन नहीं सोएगा। सुबहे से दु गो मजदूर लगावल है झाड़ी और घास की सफाई के लिए। शाम तक चकाचक चाहिए पूरा एरिया। आज शाम तक ही दु गो हैलोजन पंडाल एरिया में लग जाना चाहिए। रात भर गढ्ढा खोदना है, बल्ली मजबूत गड़ाना चाहिए पंडाल का, टूटल ईंट्टा डाल के कूट देना है बढ़िया से उलट के सब्बल, हिल भी ना पावे एको बल्ली। फिर झंडी का रस्सी लगाने के लिए पतरका डंडा गाड़ना पड़ेगा, पंडाल से लेके रोड तक दूनो देने झंडी टँगल रहना चाहिए। लेकिन बढ़िया से लकड़ी गाड़ना है, काहे कि ओकरे में ट्यूब लाइट लगेगा। पांडेय जी के घर के पीछे ढेरे केला का थंब है, दु चार गो पूजा के नाम पर काटने नहीं देंगे, द्वार पे केला का थंब मस्त लगेगा नइ! डैम देने जाके पेड़ का हरा-हरा बड़हन डाली कटवा के मंगवा लेते ना तो एकदम हरियरी छा जाता पंडाल में।
सजाने के लिए बढ़िया-बढ़िया साड़ी भी माई-पितीयाइन लोग से तसिलना है। पिछला बार एगो में अगरबत्ती से छेद हो गया था, बड़ी गाली पड़ा था। होता है एतना, यज्ञ है ये, आहुति तो देना ही पड़ता है ना सबको। परसादी छनवाने का काम बाबुजी को देंगे, कउनो पर भरोसा नहीं है हमको, मौका मिलते ही एकाध बाल्टी बुनिया गायब कर देगा सब। आधा रात के डालडा, चीनी घटी-बढ़ी के लिए नवनीत के दुकान से मंगवा लिया जाएगा। माँ शारदे, शक्ति दे माँ कि सब मैनेज कर लें। बहुत भक्ति भाव से लइकन लगा है माँ। बस आप ही संभाल सकती हैं, बहुत दिमाग गिजबीजा गया है।
जय माँ शारदे, सब बढ़िया होगा।
सर्वाधिकार सुरक्षित: @thethpalamu
दिव्या रानी
तस्वीर: Sudhanshu Ranjan
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Tuesday, January 24, 2023

सरस्वती पूजा

 नया साल आते ही बेसब्री से सरस्वती पूजा का इंतजार होता था। साल शुरू होने के कुछ दिन बाद से ही माता की मूर्ति बनने का काम शुरू हो जाता था। स्कूल आते-जाते कुछ देर रूक कर हम मूर्ति निर्माण प्रक्रिया को देखा करते थे, मानो हर पल के साक्षी बनने की जिम्मेवारी किसी ने सौंप रखी हो। होली-दशहरा में कपड़ा बने चाहे नहीं बने, लेकिन सरस्वती पूजा में पीला फ्रॉक जरूर सिलवाए हैं 'बजरंग टेलर' में।

पूजा का दिन आता और सुबहे से हम तैयारी में लग जाते, आयोजन के उल्लास में भूख प्यास न जाने कहाँ लापता हो जाते थे एक-दू दिन पहिलहीं से। बेसन, चीनी आउ चम्पई रंग लावे से लेके लक्ष्मण काका हलवाई के बुलावे तक, हर काम में भागीदारी निभाते थे हम।
बड़ी मजा आता जब एकदिन पहिले अमरूद के बगीचा में, माटी के चूल्हा पर, बड़का कड़ाह चढ़ा के, लक्ष्मण काका बुनिया छाने के कार्यक्रम का श्रीगणेश करते थे। हम बचवन के टोली तो उहें अड्डा जमाए रहते थे कि कउन साइंस भिंडा रहे हैं काका। बड़ी उत्सुकता से हर एक चीज देखते आउ आश्चर्य के दुनिया में डुबकी लगाते रहते। हम तो सोच लिए थे कि बड़ा हो के बुनिया का दुकान ही खोलना है हमको। अब दुकान तो नहीं खुला लेकिन तकिया कलाम जरूर जबान पर चढ़ गया "आपन काम करे दुनिया, हम बजाएं हरमुनिया"।
इ सब करते कम-से-कम दस तो बजिए जाता था। तब तक मूर्ति माई आ जाती थी, आऊ हमलोग अगल-बगल आउ माई से मांग के, रंग-बिरंगा साड़ी, सेप्टी पिन ले के रात भर मूर्ति सजाते थे। इतना उमंग रहता था सब बच्चों में की न थकते थे, न ही नींद आती, भूख-प्यास-थकान सब उड़नछू। एक दो घंटे सोकर फिर भोरे-भोरे उठते आउ फिर लग जाते पूजा के तैयारी में। माला बनाते, झंडी काट काट के सगरो चिपकाते सुतरी में, आरती के तैयारी करते, फिर नया कपड़ा मे सज-धज के पूजा में बैठते, कबो घंटी बजावे के जिम्मा लेते तो कबो परसादी बांटे के रोल रहता हमरा।
आपन पंडाल के काम निमारे के बाद शाम के समय निकाल के निकलते अगल-बगल के मूर्ति देखे आऊ परसादी खाए। घरे आवत तक समूचा कपड़ा बुंदिया के रस से चटचट हो जाता।
सरस्वती पूजा के रात भी उतने रंगीन होता था, हर साल सिनियर विद्यार्थी लोग नाटक करते थे स्कूल में। पिताजी प्राचार्य थे और साहित्य प्रेमी भी, इसीलिए नाटक होता कभी 'गोदान', 'कफ़न', तो कभी 'बड़े घर की बेटी' पर। उस समय मालूम भी न था कि इ सब 'प्रेमचंद' का लिखा हुआ है। पापा के हेड मास्टर होने का बड़ी फायदा होता, हम देर से भी आते, तबो नाटक में आगे ही बैठते।
अइसहीं दूसरा दिन मूर्ति विसर्जन के समय आ जाता, आऊ रो-रो के बुरा हाल हो जाता। आखिरी वाला पूजा खातिर लड़का लोग मूर्ति लेकर घरे-घर आता। माई चाची लोग पूजा करतीं आऊ हम आँसू भरकर चुपचाप देखते रहते। थोड़ी ही देर में 'सरस्वती जय जय' के नारा से पूरा स्कूल परिसर गूँजने लगता और ट्रैक्टर पर माता की मूर्ति रखकर विद्यार्थीगण नदी पोखर की तरफ चल देते, भसान के लिए।
अब मूर्ति विसर्जन के मजेदार किस्से अगले दिन फिर किसी की कलम से पढ़ने को मिलेगी, माँ शारदे की कृपा आप सबों पर बनी रहे। इस असहिष्णुता वाले सोशल मीडिया के डरावने वातावरण में ठेठ पलामू परिवार में प्रेम और अध्यात्म की बारिश होती रहे। तो जोर से बोलिये 'सरस्वती माता की' - जय.
तस्वीर और आलेख © @sharmila_shumee
( लेखिका जानी मानी समाजसेविका हैं और गरीबों के कल्याण के लिए सेवारत हैं। शर्मिला जी डाल्टनगंज रेडियो में उद्घोषिका भी हैं, इनकी मीठी जुबान पर मां सरस्वती स्वयं ही विराजमान हैं। )
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Monday, January 23, 2023

" तो केतना चंदा काटें चचा "

बचपन में सरस्वती पूजा से ज्यादा मजा घरे घर घुम के चंदा काटने में आता था। पूजा से दु हफ्ता पहिले बाकायदा रेडीमेड पैड खरीदाता और स्टाम्प मार के चंदा का लाइसेंस तैयार। फिर 50 रुपया में भुला जाने वाला लइकन हज़ारों का हिंसाब रखता था। मजाल की कहियो एक रूपया भी इधर-उधर खर्चा किया हो। लेकिन कुछ बातें आज भी कुछ गार्जियन लोगों की दिल में चुभती हैं। उस वक़्त ऐसे खड़ूस चचाओं को जवाब नहीं दे पाया था, तो सोचा ठेठ पलामू से बढियां क्या प्लेटफार्म मिलेगा, तो अब जवाब दे दिया जाए, जो उस वक़्त दिल में रह गए थे। सभी चचाओं से अनुरोध है कि अपना-अपना कैटेगरी खुद समझ कर जवाब ले लीजियेगा।
"अभी तो समय है ना जी, हम पहुँचा देंगे चंदा तुमलोग के। टेंशन मत लो, मिलेगा, सबसे जादे देंगे, तुमलोग के आना भी नहीं पड़ेगा दुबारा।"
~ चचा हम जानते हैं आप एक नंबर के कंजूस हैं। ना आप पिछला साल दिए थे, ना इस बार देंगे। वो तो हमलोग बेशरम हैं कि हर साल आपकी कुटिल मुस्कान देखने के खातिर आ जाते हैं और आपको लगता है कि आप बहुत बुद्धिमान हैं। नहीं चचा ऐसे लोगों को चतुर बोला जाता है, बुद्धिमान नहीं। आप 50 साल में नहीं बदले, तो एक साल में क्या बदलियेगा। हमलोग फिर आएंगे अगले साल, जवाब मालूम है, लेकिन आएंगे जरूर।
"तुमलोग कहाँ के रेंगन हो जी, एने कभी देखे नहीं तुमलोग को, मने चंदा मांगने कहीं चल दिए, देखो हमलोग चंदा नहीं देते, अंतिम दिन आकर फल ले जाना यहां से"।
~ गज्जब भुलक्कड़ हैं चचा आप। एक बार रोड पे गिर गए थे आप, तो हमलोग सब उठा कर के आपको घरे तक पहुंचाए थे। और हमलोग का कितना क्रिकेट बॉल आपके घर में जाने के बाद आप नहीं दिए हैं। अब आप असमाजिक हैं तो हम बच्चों का क्या दोष। दो घर के बाद का बच्चा लोग को आप नहीं पहचानते, तो समझ सकते हैं कि आप इतना अकेले क्यों रहते हैं और क्यों कोई रिश्तेदार भी आपके दरवाजा पर दस्तक देने नहीं आता है।
"आएं जी पढ़ने वला रेंगन सरसती पूजा करता है, अभी पढ़ने का समय है ना तुमलोग का। मेरा दूनो बेटा डॉक्टर इंजीनियर हो गया, तुमलोग यही सब करते रहो, 11 रुपया हम दे रहे हैं, अपनी स्वेच्छा से, रसीद मत काटो"। ~ चचा आपका रेंगन डॉक्टर इंजीनियर जरूर बन गया होगा, लेकिन आदमी अच्छा और सामाजिक नहीं बना होगा इसका हम गारंटी लेते हैं। आज भी हज़ार तरह के डिप्रेशन और सोशल एनज़ाइटी से जूझ रहा होगा। गर्व से आज कह सकते हैं कि चंदा काटने वाला रेंगन पढ़ा भी और जिम्मेवार नागरिक भी बन गया। लेकिन आपका बेटा लोग आपको अकेले छोड़ गया। इसीलिए दूसरे के बच्चों को नागरिकता की शिक्षा देने से बेहतर था खुद के बच्चों को कभी चंदा काटने दिए होते, तो आज उनका लगाव भी अपने देश समाज मोहल्ले से होता। और आप रशीद ना कटवा कर खुद के नाम को बदनामी से बचा रहे हैं, लेकिन हम बच्चों में गलत शिक्षा के बीज बो रहे हैं, जो बाद में घूस और घोटाला की परिणति में सामने आएगा।
और उन आंटियों को मेरा जवाब जो ये कहती थी पूजा के दिन "आएं जी 51 रुपया चंदा दिए हैं और एतना ही प्रसाद"।
~ आंटीजी चंदा के पैसों से सिर्फ प्रसाद ही नहीं बनती है, ये जो अभी मूर्ति के सामने आप अश्रु बहा रही थी ना, जिस पंडाल में अलग-अलग पोज में फोटो घिंचवा रही थी ना, ये लड़ी, ये लाइट सबमें पैसा लगा है चंदे का। और हाँ सारा पैसा पूजा में ही नहीं खत्म कर दिया गया है, अभी विसर्जन में भी पैसे खर्च होंगे। फिर परसादी मतलब भर-पेटवा थोड़े होता है। जितना मिले उतने में खुश रहिये, माता का बेशकीमती आशीर्वाद मिला और क्या चाहिए 51 रुपया में।
तो भाइयों आप सबों से निवेदन है कि जो भी बच्चे पूजा कर रहे हैं, उनका हौसला जरूर बढ़ाएं और ये बिलकुल ना समझें कि इससे उनकी पढ़ाई पर असर पड़ेगी, उलटा ये उन्हें एक अच्छे और मजबूत इंसान बनने, एक अच्छा नागरिक बनने में मदद करेगी।
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Saturday, January 21, 2023

पनीर

 हम ढेर दिन से लालटेन लेके खोज रहे हैं कि आखिर कौन ससुरा पलामू में पनीर लेकर आया था.

पाहिले जहाँ भी शादी बियाह जीनी-मरनी में भोज खाने जाते थे, तरह-तरह के आइटम मिलता था. कभी कटहल के सब्जी, कभी आलूदम, कभी गोभी के मसालेदार एकदम बिना रस वाला सुखल सब्जी, तो कभी भिन्डी का ही कौनो आइटम. अरे कलाकार लोग पैदा होता था गाँव-गाँव में, अलगे सब्जी के अलगे कारीगर. कहल जाता था कि फलना के बेटवा परवल के कारीगर है, अईसन बनाता है कि कई गो पंचायत में ओकर टक्कर का कोई नहीं है. कई बार तो ऐसा होता था कि फलना गाँव में बारात जाना है का हो?? उहाँ के लोग बैगन का एगो आईटम बड़ा बेजोड़ बनाता है. और क्या, बाराती गाडी ऊपर से निचे फुल.
उहे क्रम में हमको ज्ञान प्राप्त हुआ, सब्जी के नामकरण का. एक बार पाँत में बैठे थे खाने, सब्जी चलने वाले से चचा बोले कि ओल के तरकारी ले आओ. तुरंत बाल्टी में से निकाल के दो कलछुल परोसा गया. हम भी टुभक दिए कि हमको भी कटहल के तरकारी चाहिए. अरे जा हंसी के फव्व्वारा छुट गया पूरा पांत में. हमको बुझाया नही, लोग हमको सांत्वना देने लगे. हालाँकि तुरंत हमार पत्तल में कटहल उपलब्ध करा दिया गया.
रात जनवासा में हमको परम ज्ञान की प्राप्ति करायी गयी. बाबु! सब्जी के चार प्रकार होता है. जमीन के नीचे पाये जाने वाले फल से अगर सब्जी बने तो उसको 'तरकारी' कहते हैं. अगर जमीन के ऊपर फल लगे तो उसको 'फरकारी' कहते हैं. हमहूँ ललकारी में उछल के फिर टुभके और जे घोरान पर फरेगा उसको? हमारी बेसब्री की अवहेलना करते हुए बड़े बुजुर्ग ने प्यार से बताया- उ हुआ 'लरकारी'! अब ई मत पूछना कि लरकोरी क्या होता है? तबे कम्बल से मुड़ी निकाल के चचा उवाच हुआ- बेटा! तिलोरी, अदौरी, कढोरी इत्यादि 'हथकारी' की श्रेणी में वर्गीकृत हुए हैं हमारे पाकशास्त्र में.
गज़ब का उन्नत है पाकशास्त्र और उनका साहित्य. इनसे सीखना चाहिए आजकल के रेस्टूरेंट वालों को. नामकरण ऐसा जैसे कोई हत्यारा हो. पनीर कीमा मने उसका हड्डी पसली चूर. भिन्डी फ्राई मने जल्लाद की तरह उसको जिन्दा जला दिया गया हो. मशरूम दो प्याजा अर्थात दो प्याज जैसे प्यादे के सहारे मशरूम जैसे निरीह प्राणी को हमारे सामने प्रस्तुत किया जा रहा हो शहीद होने के लिए. अरे कुछ तो साहित्य हो.
एक बार मुर्गा प्रेमी मित्र हम से शास्त्रार्थ करने लगे कि शाकाहार अच्छा की मांसाहार. उनके तर्क भी ऐसे कि हम शाकाहारी अपने खाद्य पदार्थ की तरह ही निरीह हो गये. कहने लगे गरजते हुए वो- आज से 10 हजार साल पहले तो दुनिए के सब मनुष्य मांसाहारी ही थे. भगवन राम भी तो मांसाहारी होंगे नहीं तो हिरण का शिकार करने क्यों निकले? महाभारत में भी लिखा है कि कृष्ण ने विदुर के घर सात्विक भोजन ही स्वीकार किया, अर्थात तामसिक में भी कोई दिक्कत नहीं थी. सारे वेदों में आर्य पशुपालक और मांसाहार का वर्णन है. एक बार भगवन बुद्ध को भिक्षा में मांस प्राप्त हुआ था, तो उन्होंने भी ग्रहण कर लिया था. जो-जो जानवर मांसाहार करते हैं, देखो कितने बहादुर होते हैं जैसे शेर, भेड़िया और फ़ूड चेन में भी ऊपर होते हैं. राज वही करता है जो फ़ूड चेन में टॉप पर होता है और शाकाहार वाले कितने मासूम जैसे गाय, बकरी, खरगोश. थोड़ी देर में उनका ज्ञान फ़ूड चेन से होते हुए लिंडमान के दस प्रतिशत के नियम पर जाकर विराम लेनेवाला था कि मेरे अन्दर का साहित्यकार जाग गया.
हमारी बात गीत गोविन्द के स्वर में चालू हुई- देखिये मित्रवर! कितना तरह का पकवान है वेज में, इतना कि रोज एक खाएं बदल-बदल कर तो भी साल भर बाद रिपीट हो. मगर नॉनवेज में मिला के वही चार- अंडा, मछली, चिकेन, मटन. इतना कहना था कि उनका आग खुल गया. मेस में खाना खाए हैं कभी आप! आपको क्या पता कि हम भी कभी शुद्ध शाकाहारी हुआ करते थे. अंडा तो छोड़िये , लहसुन प्याज तक को हम हाथ ना लगते थे. मगर जब से मेस ज्वाइन किये देखे कि शाकाहारियों के साथ घोर अन्याय हो रहा है. नॉन वेज मेनू में रोज अलग-अलग आइटम- कभी ओम्लेट, कभी अंडा-कढ़ी, कभी फिश फ्राई तो कभी चिकेन चिल्ली, कभी चिकेन सूप तो कभी मटन हांड़ी. और शाकाहारियों को हर मौके पर सांत्वना पुरस्कार के तौर पर थमा दिया जाता था पनीर. पानी में तैरते पनीर के अधमरे दुकड़े. नाम तो उस पनीर के डिश का 'कहाँ गया पनीर' कर देना चाहिए, जिसके जिस्म ऐसे हार्ड कि अन्दर नमक-मसाला घुसने की हिम्मत तक न कर पाए. अब इसको जबरी स्वादिष्ट और महंगा आइटम मानकर कब तक छ्द्म गौरव की अनुभूति की जाये. जीभ और मन की लड़ाई में कब तक एकतरफा फैसला सुनाया जाये.
मित्रवर ने रोते हुए हमे समझाया. दोस्त! शाकाहारियों के बढ़ते बौद्धिक प्रभाव से आहात हो कर ही मांसाहारियों ने ये साजिश रची है और पनीर जैसे ब्रह्मास्त्र का प्रयोग कर दिया है. मेस का उदहारण तो हमने दे ही दिया लेकिन यह युद्ध बहुत आगे निकल चूका है. पहले हर गाँव, हर घर के चूल्हे का अपना स्वाद होता था, उस स्वाद से उनकी पहचान होती थी. मगर पनीर जब से आया, हर आयोजन में बस मटर-पनीर ओह पोह होता नजर आता है. आगे उन्होंने हमे बताया की किस तरह बफे पार्टी और कैटरिंग वाले इसी युद्ध के हथियार हैं, जो जानबूझकर वेज आइटम को नीरस बनाते है हर पार्टी में. अब तो हालत ये है कि उत्तर से दक्षिण तक हर आयोजन में पनीर का वही स्वाद मिलता है. फिर उन्होंने मुझे समझाया- जाओ. मैं तो खेमा बदल चूका, अगर तुम शाकाहारियों के गौरव को बचाए रखना चाहते हो तो पनीर से मुक्ति दिलाओ. धीरे-धीरे शाकाहार फिर से अपनी मर्यादा बचाए रख पायेगा.
अब हम घर वापस आये और थाली में पनीर चिल्ली देखकर ध्यानमग्न हो गये.
~ सत्यान्वेषी स्वामी
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Thursday, January 19, 2023

" अंग्रेज़ी में पलमुवा लेखक "

 एक पलमुवा के लिए अंग्रेज़ी में किताब पढ़ना कौनो हिमालय चढ़ने से कम थोड़े ही है। लेकिन अब दूसरा कोई रास्ता भी नहीं बचता, जब हमारे Gyan Singh भाई जी खाली अंग्रेज़ी में ही किताब लिखते हैं। पलामू का होकर अंग्रेज़ी में साहित्य का सृजन करना हम सब पलामूवासियों के लिए गर्व की बात है।

शिव भक्त ज्ञान जी पहले एक रोमांटिक नोवेल लिख चुके हैं, जिसे पढ़ कर इतना तो अंदाजा हो ही चुका था कि इनमें सृजन की अद्भुत क्षमता है और देखिए ये भगवान शिव की महागाथा में एक और नगीने जोड़ भी चुके हैं। प्रस्तुत किताब "Cursed Snake Of Lord Shiva" त्रय-खंड की प्रथम पुस्तक है और विश्वास मानिए आप पढ़ते वक्त एक दूसरी ही दुनिया में गोते लगा रहे होते हैं। शिव जी के गर्दन में लिपटी नाग की भी एक अपनी कहानी होगी, किसने सोचा था।
ज्ञान भाई की जितनी भी तारीफ की जाए कम है, जिन्होंने हमें मनोरंजन के साथ पौराणिक किरदारों से भी परिचित करवाया। हैरी पॉटर और नोर्निया के जादुई जंगलों में सैर से हज़ार गुना बेहतर है अपनी खुद की सांस्कृतिक यात्रा। गर्व है हमें अपनी संस्कृति और विरासत पर, गर्व है हमें ज्ञान सिंह जैसे लेखकों पर जो वाल्मीकि और तुलसी की विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं। जरूरत है हमें फिर से अपनी पौराणिक कहानियों को, कथाओं को रीमेक करने की, आज की पीढ़ी को जिस भाषा में पढ़ना कूल लगता उसी में परोसने की। ताकि कोई अंग्रेज़ी में बर्गर खाते हुए ये ना बोले-
"We don't have characters like vikings and Thor in stories to tell".
जरूरत है जड़ों की ओर लौटने की, अपनी विरासत पर गर्व करने की, तो चलिए एक बार पढ़ देते हैं ये किताब और ज्ञान सिंह भाई को धन्यवाद पलामू को राष्ट्रीय पटल पर रखने के लिए। कमेंट बॉक्स में अमेज़न का लिंक है, भाई की किताब आर्डर करना ना भूलें। अब तो डिस्काउंट भी मिलने लगा है।
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Wednesday, January 18, 2023

कड़कड़ाती ठंड की रात और पुआल….

“ आज बड़ी कनकनी बढ़ा देले हsउ हो, पछुवा चलइत हइ तो बुझात हइ की हाड़ में छेद कर देतइ ’’ रात का भोजन कर लेने के बाद बिस्तर को झाड़ते ठण्ड से कुड़कूड़ाते दादा ने कहां।
“ अहो दादा, इ लेदरा-फेदरा से अब जाड़ ना भगतsवा कुछ दोसर उपाय करा हो, तू तो बोरसी ताप के बिहान कर देबा, हम रात भर में जाड़ से कड़कड़ा जाएब। हमरा तो बोरसी तापे के जादे फैदा ना बुझा हsवा; पेट, मुँह, ठेहुना गरम आउ पीठास ठंडा। समाचार में सुsन ह.. न, आज रांची का तापमान अधिकतम २२ डिग्री और न्यूनतम २ डिग्री दर्ज किया गया, उहे लेके बोरसी तपबा तो आपन देह आगे के अधिकतम और पीछे के न्यूनतम तापमान पर चल जतवा उहो एके समय में ’’ बूट के साग-भात नरेटी तक चढ़ा लेने के बाद नींद के आगोश में ख़ुद को शौपने को आतुर पोते ने कहा।
“ अरे रुक बुड़बक…. एतना अकबकाएल काहे ला हे, बsड़नि से ढ़ाबा बहार के रख, जाड़ के जुग़ाड ले के आवइत ही, कातो इ ससुर के नाती सकरातों के बितला पर आउ जवान होएल आवइत बा ’’ कहते हुए दादा खलिहान में लगे पुआल के ढ़ेर के पास चले गए।
“ दूर सार के… ! मर एक पांजा #पोरा (पुआल) ले अनलहुँ हो, का करबहूँ एकर..? ’’ पोते से विस्मय प्रगट करते हुए पूछा
“ हां हो, …. अब पोरा (पुआल) के गलीचा ढ़ाबा में बिछावा, ओकर उपरे लेदरा, बेडशीट हो गेलवा बिछौना; फिर अपने उपर कंबल ओकर उपरे से चद्दर हो गेलवा ओढ़ना अब देखा कइसे दान फेंकsतवा से “ एक के बाद एक बिछौने को लगाते हुए दादा-पोता संवाद कर रहे थे।
“ अहो दादा पहीले चद्दर ओढ़ा फिर कम्बल, काहे की इ गड़ेड़िया वाला करिका कंबलवा बड़ी चुभ हsवा “
“ इहे तो ग़लती नखवा करेला, कंबल कहता है पहले हमको जुड़ाव (प्रोटेक्ट करो) फिर हम तुमको जुड़ाएंगे, अब गुड़मुड़ा के सुता चुपचाप हम दुरा पर के बेड़ास लगा के आवइत हीsवा “ कहते हुए दादा दुरा पर के मुख्य दरवाजा बंद करने चले गए। दरअसल मुख्य दरवाज़ा का कुण्डी काफी जाम था, इस कारण किसी महिला या बच्चें उसे नहीं लगा पाते थे। पूरब की लाली पहचान से पहीले इसे खोलना और रात के भोजनोपरांत तथा घर के आख़री व्यक्ति के आ जाने के पश्चात इस दरवाजे को लगाना इन्ही के जिम्मे था। अब इसे जिम्मा कह लीजिए या फिर डबल लॉक का सुरक्षा कवच एक ही बात हैं। दरवाजा लगा के आने के बाद दादा पुआल के बिस्तर पर बैठ के एक खिल्ली खैनी रगड़े और बाये गाल में दबा के श्री राम-श्री राम कहते हुए लेट गए। अभी थोड़ा ही वक़्त गुजरा था कि बाहर से लड़खड़ाती जबान से आवाज़ सुनाई पड़ी ..
“ अहो चाचा खोला दुहरियाँ हो… “
“ मर इ घरी के बेयाल चलल आवइत बा हो “ बुदबुदाते हुए दादा बिस्तर से न निकलने की इच्छा को दरकिनार करते हुए ये सोच के बैठ गए की शायद एक बार और आवाज़ मिले तो उठ के दरवाजा खोले। लेकिन दुबारा पुकार नहीं मिलने पर फिर से सो गए। सच में आज ठण्ड का एहसास बिल्कुल भी नहीं हो रहा था और थोड़ी ही देर में दादा कच्ची नींद और पोता गहरी नींद में चले गए। ठण्ड तो दूर की बात है शरीर से आज शीतली फेंक रही थी और इस कड़ाके की ठण्ड में भी, सुकून भरी नींद से पूरी रात बीत चुकी थी। फिर भी मैंने उस नींद को एक दो घंटो के लिए और आगे एक्सटेंड कर दिया था। लेकिन दादा … किसान जो ठहरे.....
“ नहीं हुआ है अभी सबेरा, पूरब की लाली पहचान चिड़ियों के जगने से पहले, खाट छोड़ उठ गया किसान। ” कविता तो पढ़े ही होंगे बचपन में;
चल दिए गाय -गोरु के सांही-पानी में, खलिहान में.....और का।
“ पोरवा के तो अइसे बसका देलई…, अइसनो होखहत “ बोलते हुए दादा भस्के पुआल के ढ़ेर को ठीक करने ही वाले थे कि उसमें घुस के सो रहा आदमी दिखा।
“ मर के हा हो .. ? “ बांस के बने अर्खईन से उस आदमी के पीठ को ठोकते दादा ने पूछा।
“ हम हिवा चाचा पचना “ अपना परिचय देते हुए वो झट से पुआल से अलग खड़ा हो गया और अपने कान मे बांधे गमछे को निकाल खुद को झाड़ने लगा।
“ पीयाक हे का हो… तुहीं रात खिन आवाज़ देsवइत हले..?? “
“ हाँ हो चाचा, राते ठेर निशा (नशा) चढ़ गेल हsलवा, आपन घरे जाए के हिम्मते ना होलवा तो हिअई जाड़ से बचेला, पोरवा में घुस गेल हलिवा “
“ दूर बुड़बक... काहे ला ऐतना पीअ हे…, जो जो.. घरे जो…. “ मुस्कुराते हुए दादा, बिखरे पुआल को अर्खईन से ढ़ेर पर चढ़ाने लगे….।
May be an image of outdoors and text that says "ठेठ पलामू कड़कड़ाती ठंड की रात और पुआल..... अवनीश प्रकाश"

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