हम ढेर दिन से लालटेन लेके खोज रहे हैं कि आखिर कौन ससुरा पलामू में पनीर लेकर आया था.
पाहिले जहाँ भी शादी बियाह जीनी-मरनी में भोज खाने जाते थे, तरह-तरह के आइटम मिलता था. कभी कटहल के सब्जी, कभी आलूदम, कभी गोभी के मसालेदार एकदम बिना रस वाला सुखल सब्जी, तो कभी भिन्डी का ही कौनो आइटम. अरे कलाकार लोग पैदा होता था गाँव-गाँव में, अलगे सब्जी के अलगे कारीगर. कहल जाता था कि फलना के बेटवा परवल के कारीगर है, अईसन बनाता है कि कई गो पंचायत में ओकर टक्कर का कोई नहीं है. कई बार तो ऐसा होता था कि फलना गाँव में बारात जाना है का हो?? उहाँ के लोग बैगन का एगो आईटम बड़ा बेजोड़ बनाता है. और क्या, बाराती गाडी ऊपर से निचे फुल.
उहे क्रम में हमको ज्ञान प्राप्त हुआ, सब्जी के नामकरण का. एक बार पाँत में बैठे थे खाने, सब्जी चलने वाले से चचा बोले कि ओल के तरकारी ले आओ. तुरंत बाल्टी में से निकाल के दो कलछुल परोसा गया. हम भी टुभक दिए कि हमको भी कटहल के तरकारी चाहिए. अरे जा हंसी के फव्व्वारा छुट गया पूरा पांत में. हमको बुझाया नही, लोग हमको सांत्वना देने लगे. हालाँकि तुरंत हमार पत्तल में कटहल उपलब्ध करा दिया गया.
रात जनवासा में हमको परम ज्ञान की प्राप्ति करायी गयी. बाबु! सब्जी के चार प्रकार होता है. जमीन के नीचे पाये जाने वाले फल से अगर सब्जी बने तो उसको 'तरकारी' कहते हैं. अगर जमीन के ऊपर फल लगे तो उसको 'फरकारी' कहते हैं. हमहूँ ललकारी में उछल के फिर टुभके और जे घोरान पर फरेगा उसको? हमारी बेसब्री की अवहेलना करते हुए बड़े बुजुर्ग ने प्यार से बताया- उ हुआ 'लरकारी'! अब ई मत पूछना कि लरकोरी क्या होता है? तबे कम्बल से मुड़ी निकाल के चचा उवाच हुआ- बेटा! तिलोरी, अदौरी, कढोरी इत्यादि 'हथकारी' की श्रेणी में वर्गीकृत हुए हैं हमारे पाकशास्त्र में.
गज़ब का उन्नत है पाकशास्त्र और उनका साहित्य. इनसे सीखना चाहिए आजकल के रेस्टूरेंट वालों को. नामकरण ऐसा जैसे कोई हत्यारा हो. पनीर कीमा मने उसका हड्डी पसली चूर. भिन्डी फ्राई मने जल्लाद की तरह उसको जिन्दा जला दिया गया हो. मशरूम दो प्याजा अर्थात दो प्याज जैसे प्यादे के सहारे मशरूम जैसे निरीह प्राणी को हमारे सामने प्रस्तुत किया जा रहा हो शहीद होने के लिए. अरे कुछ तो साहित्य हो.
एक बार मुर्गा प्रेमी मित्र हम से शास्त्रार्थ करने लगे कि शाकाहार अच्छा की मांसाहार. उनके तर्क भी ऐसे कि हम शाकाहारी अपने खाद्य पदार्थ की तरह ही निरीह हो गये. कहने लगे गरजते हुए वो- आज से 10 हजार साल पहले तो दुनिए के सब मनुष्य मांसाहारी ही थे. भगवन राम भी तो मांसाहारी होंगे नहीं तो हिरण का शिकार करने क्यों निकले? महाभारत में भी लिखा है कि कृष्ण ने विदुर के घर सात्विक भोजन ही स्वीकार किया, अर्थात तामसिक में भी कोई दिक्कत नहीं थी. सारे वेदों में आर्य पशुपालक और मांसाहार का वर्णन है. एक बार भगवन बुद्ध को भिक्षा में मांस प्राप्त हुआ था, तो उन्होंने भी ग्रहण कर लिया था. जो-जो जानवर मांसाहार करते हैं, देखो कितने बहादुर होते हैं जैसे शेर, भेड़िया और फ़ूड चेन में भी ऊपर होते हैं. राज वही करता है जो फ़ूड चेन में टॉप पर होता है और शाकाहार वाले कितने मासूम जैसे गाय, बकरी, खरगोश. थोड़ी देर में उनका ज्ञान फ़ूड चेन से होते हुए लिंडमान के दस प्रतिशत के नियम पर जाकर विराम लेनेवाला था कि मेरे अन्दर का साहित्यकार जाग गया.
हमारी बात गीत गोविन्द के स्वर में चालू हुई- देखिये मित्रवर! कितना तरह का पकवान है वेज में, इतना कि रोज एक खाएं बदल-बदल कर तो भी साल भर बाद रिपीट हो. मगर नॉनवेज में मिला के वही चार- अंडा, मछली, चिकेन, मटन. इतना कहना था कि उनका आग खुल गया. मेस में खाना खाए हैं कभी आप! आपको क्या पता कि हम भी कभी शुद्ध शाकाहारी हुआ करते थे. अंडा तो छोड़िये , लहसुन प्याज तक को हम हाथ ना लगते थे. मगर जब से मेस ज्वाइन किये देखे कि शाकाहारियों के साथ घोर अन्याय हो रहा है. नॉन वेज मेनू में रोज अलग-अलग आइटम- कभी ओम्लेट, कभी अंडा-कढ़ी, कभी फिश फ्राई तो कभी चिकेन चिल्ली, कभी चिकेन सूप तो कभी मटन हांड़ी. और शाकाहारियों को हर मौके पर सांत्वना पुरस्कार के तौर पर थमा दिया जाता था पनीर. पानी में तैरते पनीर के अधमरे दुकड़े. नाम तो उस पनीर के डिश का 'कहाँ गया पनीर' कर देना चाहिए, जिसके जिस्म ऐसे हार्ड कि अन्दर नमक-मसाला घुसने की हिम्मत तक न कर पाए. अब इसको जबरी स्वादिष्ट और महंगा आइटम मानकर कब तक छ्द्म गौरव की अनुभूति की जाये. जीभ और मन की लड़ाई में कब तक एकतरफा फैसला सुनाया जाये.
मित्रवर ने रोते हुए हमे समझाया. दोस्त! शाकाहारियों के बढ़ते बौद्धिक प्रभाव से आहात हो कर ही मांसाहारियों ने ये साजिश रची है और पनीर जैसे ब्रह्मास्त्र का प्रयोग कर दिया है. मेस का उदहारण तो हमने दे ही दिया लेकिन यह युद्ध बहुत आगे निकल चूका है. पहले हर गाँव, हर घर के चूल्हे का अपना स्वाद होता था, उस स्वाद से उनकी पहचान होती थी. मगर पनीर जब से आया, हर आयोजन में बस मटर-पनीर ओह पोह होता नजर आता है. आगे उन्होंने हमे बताया की किस तरह बफे पार्टी और कैटरिंग वाले इसी युद्ध के हथियार हैं, जो जानबूझकर वेज आइटम को नीरस बनाते है हर पार्टी में. अब तो हालत ये है कि उत्तर से दक्षिण तक हर आयोजन में पनीर का वही स्वाद मिलता है. फिर उन्होंने मुझे समझाया- जाओ. मैं तो खेमा बदल चूका, अगर तुम शाकाहारियों के गौरव को बचाए रखना चाहते हो तो पनीर से मुक्ति दिलाओ. धीरे-धीरे शाकाहार फिर से अपनी मर्यादा बचाए रख पायेगा.
अब हम घर वापस आये और थाली में पनीर चिल्ली देखकर ध्यानमग्न हो गये.
~ सत्यान्वेषी स्वामी

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