मांड़-भात, अर्थात गुजारा करने वाला भोजन, गरीबी की पहचान। जब कभी मांड़-भात की बात होती है, तो यही विचार मन में आते हैं। जिनका जीवन पहले गरीबी में बीता है, उनसे अक़्सर सुनने को मिल जाता है कि उनका बचपन मांड़-भात खा कर गुजरा है। यह बात भी सही है। आज भी न जाने कितने लोग सिर्फ मांड़-भात पर गुजारा करते हैं और अपने बच्चों की परवरिश करते हैं।
पलामू और झारखण्ड के लगभग सभी जिलों में मांड़-भात खा कर न जाने कितने लोग आज भी गुजारा करते हैं। पर मांड़-भात कितना स्वादिष्ट, पौष्टिक और सुपाच्य है, इसे संभ्रांत लोग नहीं जानते। नया उसना चावल का गरम-गरम मांड़-भात और नमक के स्वाद को केवल वही जान सकते हैं, जिसने खाया हो।मांड़ की क्वालिटी चावल के किस्म पर भी निर्भर करती है। अगहन के महीने में तो नए चावल के मांड़ का स्वाद गॉंव के लोग जरूर लेते हैं। हमारे यहाँ काले रंग का धान होता था, जो सबसे पहले कटता था, उसे "बाकर धान " कहते थे। इसका चावल अच्छी क्वालिटी का तो नहीं होता था, पर इसके मांड़ का कोई जवाब नहीं था। इसका मांड़ बहुत ही गाढ़ा होता था और स्वाद बहुत ही मीठा।
गांव जाने पर मैं अकसर तसली वाली भात का मांड़ और नमक मिला कर पी लेता था। उस मांड़ को पीने का आनंद और संतुष्टि आज कई तरह के स्वादिष्ट भोजनों में भी नहीं आता है। मांड़-भात को और स्वादिष्ट बनाने के लिए उसे घी, लहसुन और थोड़ा जीरा से छौंक लगा सकते हैं और यदि उसमें थोड़ा सा दाल भी मिला दें, तो फिर क्या कहने!
यदि पेट खराब हो जाय, तो मांड़-भात काफी लाभदायक पथ्य माना जाता है। पहले इसकी सलाह डॉक्टर भी दिया करते थे। आज मांड़-भात खाने में लोगों को एक हीन भावना महसूस होती है। पर मैं तो कहूँगा कि शौक से ही सही, कभी खा कर तो देखें। कभी तो प्रेशर कुकर के भात से उकता कर तसला में मांड़ पसाएँ। बहुत आनंद आएगा, पर मांड़ को गरम रहते ही आजमाएं।
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