Monday, January 23, 2023

" तो केतना चंदा काटें चचा "

बचपन में सरस्वती पूजा से ज्यादा मजा घरे घर घुम के चंदा काटने में आता था। पूजा से दु हफ्ता पहिले बाकायदा रेडीमेड पैड खरीदाता और स्टाम्प मार के चंदा का लाइसेंस तैयार। फिर 50 रुपया में भुला जाने वाला लइकन हज़ारों का हिंसाब रखता था। मजाल की कहियो एक रूपया भी इधर-उधर खर्चा किया हो। लेकिन कुछ बातें आज भी कुछ गार्जियन लोगों की दिल में चुभती हैं। उस वक़्त ऐसे खड़ूस चचाओं को जवाब नहीं दे पाया था, तो सोचा ठेठ पलामू से बढियां क्या प्लेटफार्म मिलेगा, तो अब जवाब दे दिया जाए, जो उस वक़्त दिल में रह गए थे। सभी चचाओं से अनुरोध है कि अपना-अपना कैटेगरी खुद समझ कर जवाब ले लीजियेगा।
"अभी तो समय है ना जी, हम पहुँचा देंगे चंदा तुमलोग के। टेंशन मत लो, मिलेगा, सबसे जादे देंगे, तुमलोग के आना भी नहीं पड़ेगा दुबारा।"
~ चचा हम जानते हैं आप एक नंबर के कंजूस हैं। ना आप पिछला साल दिए थे, ना इस बार देंगे। वो तो हमलोग बेशरम हैं कि हर साल आपकी कुटिल मुस्कान देखने के खातिर आ जाते हैं और आपको लगता है कि आप बहुत बुद्धिमान हैं। नहीं चचा ऐसे लोगों को चतुर बोला जाता है, बुद्धिमान नहीं। आप 50 साल में नहीं बदले, तो एक साल में क्या बदलियेगा। हमलोग फिर आएंगे अगले साल, जवाब मालूम है, लेकिन आएंगे जरूर।
"तुमलोग कहाँ के रेंगन हो जी, एने कभी देखे नहीं तुमलोग को, मने चंदा मांगने कहीं चल दिए, देखो हमलोग चंदा नहीं देते, अंतिम दिन आकर फल ले जाना यहां से"।
~ गज्जब भुलक्कड़ हैं चचा आप। एक बार रोड पे गिर गए थे आप, तो हमलोग सब उठा कर के आपको घरे तक पहुंचाए थे। और हमलोग का कितना क्रिकेट बॉल आपके घर में जाने के बाद आप नहीं दिए हैं। अब आप असमाजिक हैं तो हम बच्चों का क्या दोष। दो घर के बाद का बच्चा लोग को आप नहीं पहचानते, तो समझ सकते हैं कि आप इतना अकेले क्यों रहते हैं और क्यों कोई रिश्तेदार भी आपके दरवाजा पर दस्तक देने नहीं आता है।
"आएं जी पढ़ने वला रेंगन सरसती पूजा करता है, अभी पढ़ने का समय है ना तुमलोग का। मेरा दूनो बेटा डॉक्टर इंजीनियर हो गया, तुमलोग यही सब करते रहो, 11 रुपया हम दे रहे हैं, अपनी स्वेच्छा से, रसीद मत काटो"। ~ चचा आपका रेंगन डॉक्टर इंजीनियर जरूर बन गया होगा, लेकिन आदमी अच्छा और सामाजिक नहीं बना होगा इसका हम गारंटी लेते हैं। आज भी हज़ार तरह के डिप्रेशन और सोशल एनज़ाइटी से जूझ रहा होगा। गर्व से आज कह सकते हैं कि चंदा काटने वाला रेंगन पढ़ा भी और जिम्मेवार नागरिक भी बन गया। लेकिन आपका बेटा लोग आपको अकेले छोड़ गया। इसीलिए दूसरे के बच्चों को नागरिकता की शिक्षा देने से बेहतर था खुद के बच्चों को कभी चंदा काटने दिए होते, तो आज उनका लगाव भी अपने देश समाज मोहल्ले से होता। और आप रशीद ना कटवा कर खुद के नाम को बदनामी से बचा रहे हैं, लेकिन हम बच्चों में गलत शिक्षा के बीज बो रहे हैं, जो बाद में घूस और घोटाला की परिणति में सामने आएगा।
और उन आंटियों को मेरा जवाब जो ये कहती थी पूजा के दिन "आएं जी 51 रुपया चंदा दिए हैं और एतना ही प्रसाद"।
~ आंटीजी चंदा के पैसों से सिर्फ प्रसाद ही नहीं बनती है, ये जो अभी मूर्ति के सामने आप अश्रु बहा रही थी ना, जिस पंडाल में अलग-अलग पोज में फोटो घिंचवा रही थी ना, ये लड़ी, ये लाइट सबमें पैसा लगा है चंदे का। और हाँ सारा पैसा पूजा में ही नहीं खत्म कर दिया गया है, अभी विसर्जन में भी पैसे खर्च होंगे। फिर परसादी मतलब भर-पेटवा थोड़े होता है। जितना मिले उतने में खुश रहिये, माता का बेशकीमती आशीर्वाद मिला और क्या चाहिए 51 रुपया में।
तो भाइयों आप सबों से निवेदन है कि जो भी बच्चे पूजा कर रहे हैं, उनका हौसला जरूर बढ़ाएं और ये बिलकुल ना समझें कि इससे उनकी पढ़ाई पर असर पड़ेगी, उलटा ये उन्हें एक अच्छे और मजबूत इंसान बनने, एक अच्छा नागरिक बनने में मदद करेगी।
May be an image of 3 people and people standing

All react

No comments:

Post a Comment