याद आये ऐसे मैसेज? जो आप न्यू ईयर पर बांटते थे कुछ दिन पहले तक. अभी हाल की ही तो बात थी, जब तक घंटो हमलोग ग्रीटिंग कार्डस को ढूंढने में लगाते थे. कितनी मासूमियत से लबरेज हम चुनते, बनाते, बांटते थे ये संदेश. ओह कितना अपनापन और खास महसूस होता था, मिल जाए किसी से तो सालों तक सहेजते थे किसी प्रेम-पत्र की तरह.
चिट्ठी-पत्री का रिवाज भले सालों पहले तकनीक की बेदी पर शाहिद हो चुके थे, पर ग्रीटिंग कार्ड ने दशकों बाद तक चिट्ठियों की परंपरा को जिंदा रखा. शब्दों के जरिए भावनाएं एक दूसरे तक प्रेषित करना भी एक कला हुआ करती थी और इसमें भी कुछ लोग खिलाड़ी हुआ करते थे. बाद में तकनीक बढ़ता गया और भावनाएं कम होने लगी. एक वो ज़माना था जब एसएमएस का फ्री पैक भरवाया जाता था त्योहार के पहले (हालांकि मोबाइल कंपनियां एन वक़्त पर पैसे काटने लगती थी). या फिर जब मैसेज मुफ्त नहीं थे, तो फालतू के फॉरवर्ड मेसेज नहीं आते थे. मुफ्त होते ही कीमत खत्म हो जाती है, ये भी क्रूर सच है उतना ही. फिर WhatsApp पर भी कुछ पहले तक ऐसे दोहे न्यू ईयर पर खूब चलन में रहे.
खैर क्रमिक विकास की सीढ़ी पर कई परम्पराओं ने दम तोड़ा, मगर आज बरबस ही ये पंक्तियाँ दिख गई कहीं और मन पुराने दिनों की यादों में डुबकी लगाने लगा.
क्या आप भी डूब गए उन सुनहरे दिनों की यादों में... परोसीये हमें भी कुछ पंक्तियां कमेंट्स में.

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