हमारे जिले का नाम पलामू क्यों पड़ा, इसके उत्तर में एक तर्क यह भी दिया जाता है कि यहाँ पाला ज्यादा पड़ता है, इसलिए इस जिले का नाम पलामू पड़ा।
आइये, अब जानते हैं कि असल में यह पाला है क्या? जब कड़ाके की ठंड पड़ती है, तो रात का तापमान जीरो डिग्री सेल्शियस तक पहुंच जाता है। इस तापमान पर खुली जगहों पर ओस की बूंदें बर्फ में बदल जाती हैं और सुबह के समय विशेष कर पुआल के ढेर पर बर्फ के अंश दिखाई देते हैं। इसे ही पाला कहा जाता है। पाला पड़ना पहाड़ी या ठंडे प्रदेशों के हिमपात से अलग है। हिमपात में आसमान से बर्फ फाहे की तरह लगातार गिरता है और मुलायम होता है, जबकि पाला वातावरण के तापमान गिरने के कारण ओस की बूंदों के जमने के कारण बनता है और कठोर होता है।
जब हम बहुत छोटे थे, तो गाँवों में आज की तरह मलाई बरफ या आइसक्रीम का कोई प्रचलन नहीं था, इसलिए इनके स्वाद लेने का कोई अवसर भी नहीं था। जब कड़ाके की ठंड पड़ती थी, औऱ लोगों से सुनते कि आज तो पाला पड़ा है, तो पाला जमा कर खाने की इच्छा जागृत हो उठती थी।फिर क्या था, मन में ख्याल आता कि आज रात को पाला जमाएंगे और मजे ले कर खाएंगे। उस रात को सोने के पहले उथले थाली, तश्तरी या तावा में 'पानी में चीनी घोल के' आँगन के बीच बने छोटे चबूतरे पर रख कर सो जाते। अगली सुबह जल्दी ही उठ कर देखते कि पाला जमा है या नहीं। क्योंकि हर दिन इस कार्य में सफलता नहीं मिलती थी। पर जिस दिन पाला जम जाता, उस दिन की खुशी का वर्णन करना आसान नहीं है।
जल्दी से थाली उठा कर लाते और घर के अन्य बच्चों को आवाज दे बुलाते और दिखाते। हम में खाने की होड़ मच जाती और उस ठिठुराती ठंड में भी मिल कर उसे खाने में जुट जाते। उस पाला वाले आइसक्रीम को खाने का आनंद आज के केसर पिस्ता आइसक्रीम से कई गुना अधिक होता था। हाँ, पाले को खाने के बाद ठंड भी जोरों की लगने लगती थी, जिससे निपटने के लिए तुरंत बोरसी सुलगाना पड़ता था।
हालांकि ग्लोबल वार्मिंग के चलते अब पाला नहीं पड़ता। लेकिन "पाला" शब्द आज के संसार के 'इग्नोर भरे स्वभाव' के लिए भी हम प्रयोग कर सकते हैं। आँखों के सामने कोई बच्चा किलकारी मार रहा है, अपने लड़खड़ाते कदमों को साध चल कर जाता है, बालकनी के एलोवेरा के गमले पर सहमे बैठी तितली के नाजुक सुन्दर पंखो को सहलाने की कोशिश करता है और उसके इस जतन से उसे स्वतःस्फूर्त गुदगुदी होती है, वो ठहाके लगा हंस पड़ता है, जिसकी आवाज़ से घबरा कर वो तितली उड़ जाती है... आपने ये सब नोटिस तो किया, पर आप अपने फ़ोन में यूट्यूब शॉट्स देखने में ज्यादा व्यस्त हैं। तो आपका ये जो व्यवहार है इसको पाला पड़ना कहते हैं।
बहरहाल, अपने अनुभव सोच कर बताइये, बचपन वाले मासूम पाले और व्यवहार जनित पाला दोनों के बारे में। साल ख़तम हो रहा है। एक ख़ालिस पलामू वासी होने के नाते आप सिर्फ ठंडा पाला कि यादों को ही सहेजेंगे, इग्नोरेंस को नहीं। बॉटमलाइन ई है कि आप पलमूवा हैं, पाला की यादों को सहेजिये।
© @Shivangi Shaily & @Sunny Shukla Rohan

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