भाई लोग जे शाकाहारी हैं ई पोस्ट से दूर रहें। आप लोग का ढेरे पकवान के पोस्ट आ गया है ठेठ पलामू पेज पे, अब हमिन के बारी है।
पिकनिक के टाइम हो और पलामू के रेंगन मुर्गा भात के डिमांड ना करे, होइए नहीं सकता है। पिकनिक के दूसर नाम मुर्गा भुजंना ही होता है। पलामू के ज्यादातर लइकन आपन घरे साग-सब्जी खात-खात उकता जाता है, तो फिर लुका के मुर्गा पकावे के जुगाड़ में लागल रहता है। कोई बात हो एक्के डायलॉग- "मुर्गा भात खियईबे तो बोल"।
आज कल तो ढेरे होटल ढाबा होटल हो गया है, जहां मुर्गा दे दीजिए तो एकाध घंटा में मस्त भूंज के रेडी रखेगा। लेकिन जब हमिन नया-नया जवान हुए थे, तो बड़ा दुख था जी, घरे से दूर कनहु आगी जोरना पड़ता था। ऐसा ही एक पिकनिक के घटना बताते हैं। सब लइकन के प्लान बना केचकी में जाके 'मुर्गा-डे' सेलिब्रेट करने का। उ घड़ी एतना गाड़ी घोड़ा था नहीं जाए वाला, तो ट्रैन से सब गए। प्लान बना ताजा मुर्गा उहैं छोलने का।
केचकी स्टेशन पर पहुंच के पता चला कि मुर्गवा तो ट्रेनवे में छूट गया। फिर दु गो रेंगन के स्टेशने से दौड़ावल गया मुर्गा लावे ला, वहीं नजदीक के गांव से। लेकिन एकर में एगो फायदा हो गया बॉयलर के प्लान था आउ देशी के जुगाड़ हो गया। लेकिन फुटानी त देखिए रेंगन के पिकनिक में, खड़ा लहसुन सब के चाही थरिया में। अब एकाध किलो लहसुन ले के आदमी जाए तब्बे न सब के नार भरे।
आप भी देखिए नाक बह रहा हो सर्दी में त तीता-तीता मुर्गा भात के जुगाड़ लगाइए। आउ हाँ घरे जाए के पहिले माउथ फ्रेशनर के जुगाड़ जरूर कर लीजिएगा। वरना माई ठंडो में दुबारा नहवा देगी। इसी बात पे गाना बजा दिया जाए "मुर्गा भात खाएंगे, नया साल मनाएंगे"।

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