Monday, November 26, 2018

पलामू के लईकन


आज बाल_दिवस न है, तो सोचे कि पलामू के लईकन से भेंट करवाया जाए। अरे! अभी के लईकन नहीं, अापन समय के लईकन से मिलवाते हैं। अब सोच रहें होंगे कि तब आऊ अब में फरक का पड़ा है, तो वो भी बता रहें है। इतना अकबकी काहे है, थोड़ा आराम-आराम से न।

हमनी जब पेट में रहते हैं न, तबे से सबके टेंशन स्टार्ट हो जाता है कि बेटा होगा कि बेटी होगी। सब जानकार लोग के सामने बढ़िया-बढ़िया अल्ट्रासाउंड_मशीन भी फेल हो जाता है। माई-बाप के छोड़ के बाकी हित जन जेतना हैं, सब अपन-अपन पूर्वानुमान करके बैठे रहते हैं| कौनो बाबा के नाम लेके कि "फलना के सबसे बढ़ बेटा होइल हलई तो एकरो बेटे होतई।" ओकरे में उधर से कौनो बढ़ फुआ_दादी इ सब आकर कहेंगी "हमरा मन तो कहैत बा कि बेटिये होतवा।" मान लीजिए इतना तर्क-वितर्क के बाद जनम ले लिए, उसके बाद उधर उनलोग सब अलगे लड़ेगा कि किसका भविष्यवाणी सही हुआ और दूसरा लड़ाई होगा नामकरण का। आपका कोई केतनो बढ़िया नाम रख दे, पर अलगे से २-४ ठो उपनाम तो मिल ही जाना है। कुछ भी न मिले तो दिन के नाम के हिसाब से नाम से उपनाम मिलना तो तय है। इसी का परिणाम है कि अभियो गांव में सोमरा, मंगरा, बुधना, बिफना, शुकरा आदि नाम का आदमी जरुरे मिल जाएगा।

छठी के टाइम गीत गा-गा के इतना नहवाया जाता है कि १०० में ९० को न्यूमोनिया उसी टाइम हो जाता है। हमलोग सेरेलेक्स खाते कम जनमघुंटी इतना ज्यादा पीते हैं, उसी का नतीजा है कि जिंदगी भर घुट- घुट के रहना नहीं पड़ता। जैसे ही थोडा बड़े होते थे तो अभी के बच्चा जैसा थोड़े न होता था कि जॉनसन_बेबी का ब्रांड एम्बेस्डर बने बैठे थे, हमलोग को तो बस करुआ_तेल के मालिश करके भर आँख काजर पोत के धुर में खेलने छोड़ दिया जाता था। आऊ तब तक खेलते रहते जब तक कि भूख नहीं लग जाता। आऊ भूखे छटपटाना केंकियाना शुरु करते तबे कुछ मिलता था। अमूल स्प्रे के जमाना था, फिर भी संतुष्टि तो माई के दूध ही पी के मिलता था और हो भी काहे नहीं दिन भर के काम के बीच यही तो टाइम मिलता था माई के गोदी में रहने का।

भले आज सब अढ़ाई-तीन साल में ही प्ले स्कूल जाने लगा है, पर हमनी तो चार-पाँच साल तक चंदा मामा दूर के आऊ माई के दूध में ही बिजी रहते थे। पाँच साल बाद सोचना स्टार्ट होता था कि हाँ अब स्कूल भेजना चाहिए। आउर सोचते -सोचते साल भर ऐसे ही निकल जाता था। हमलोग के उम्र का शायद ही कोई होगा, जिसका मैट्रिक के सर्टिफिकेट में ओरिजिनल जन्मतिथि लिखा हुआ हो। आउर इसके बाद स्कूल जाने का बारी आता था, जब तक झोंटा पकड़ के दू-चार झाप न पड़े तो मजाल है कि एक डेग स्कूल के तरफ बढ़ जाएँ| समझ जाइए दो-चार झाप में गाड़ी स्टार्ट होता था। उसके बाद से मुँह से हॉर्न बजाते हुए गाड़ी अपने आप स्कूल के तरफ बढ़ जाती थी।

स्कूल में 30 तक पहाड़ा, मनोहर_पोथी पढना, आउर गुरूजी से कुटाने का तो अलग मज़ा था, वो अबके बच्चे क्या जानें| एगो सिलेट में मिटका-मिटका के पहला-दूसरा क्लास ऐसे ही पार हो जाता था, तब जा के जिस्ता वाला कॉपी नसीब होता था। अब तो सब्जेक्ट से जादे कॉपी ही रहता है, लइकन के बैग में। तो स्कूल में भी लॉलीपॉप मिलने लगा है| बाकी बड़ा होने के बाद वाला स्टोरी युवा दिवस में सुनाएँगें। तब तक आपलोग भी अपना बचपन याद कीजिए और कुछ याद आए, तो हमे भी बताइए |

©Anand Keshaw

बाल दिवस:(खेसारी चाचा की बतकही)


"का चचा...? आज पोतवा ता पूरा गांधीजी बन के स्कूल जा रहल बाss। कौनों फैंसी ड्रेस प्रतियोगिता बा का ?" मैंने यूं ही अनजाने में खेसारी चचा की दुखती रग पे हाथ रख दिया।

"का कहूं बबुआ।आजकल ई सब नवका इस्कुलियन के चोंचला बा खाली...। लईकन आज कल पढ़े जा ले कि नौटंकी खेले हमरा थाहे ना चलs ला।

एगो हमीन के जमाना रहे इस्कुलिया के नामे पे हमीन के नानी मरs हलक। एह मार गुरुजी मारs हलन की चार रोज लंगड़ा के चले ला पड़s हलक। आज कल ता मास्टर के तनी सुन डांट पड़लक नाही की बाउजी के एगो हर्ट हो जाए ला।"

"हमर बड़का अभिए अपन छौंड़ा के पुरनका इस्कूल से नाम कटा के चियांकी इस्कुल में लिखवइले बा।हम कहबो कईली कि रहे दा रे.. मार से रेंगन के देहिया बजर होखs ला। लेकिन काहे ला, आज कल के नवका छउरन सुने जास..., एहनी के ता फरफर अंग्रेज़ी बोले वाला लईकन चाही।

हमीन के टाइम में बाबू पौना, सवैया, अढ़ैया सब रट्टा मारे के पड़s हलक। आज कल ता लईकन वन जा, टू जा, थ्री जा में ही गड़बड़ा जाले।

हमीन रात में ढ़िबरी जला के अउर सतुवा खा के दिन भर पढ़े जा हली। आज कल ता बस्केटवा में अलगे से तीन बेरा के खाना ले जाले। पस्ता,मईगी आऊ चौमीन खाली इहे सब के रुचs ला।

हमीन वाला बात आज कल के रेंगन में ना रह गइल होsss... आज कल ता बाल दिवस ऐसे मनावा ले कि बचपना कहीं खो गईल बा आऊ ओकरा मिस करत बड़न सब। बच्चा ना हो गइलन , बाघ हो गईलन। दिवस मनावे के पड़त बा।

हमीन के हिम्मत रहे की बाऊजी के आगे आंख उठा देती, दीदा ना फोड़ देतन हमीन के। डैड डैड कह के कपार पे चढ़ गईलन हो सब। दू सेर दूध हमीन ऐक्के सांस में गटक जा हली। ई सब के कुछु-कुछु मिला के दे दा उहे एहन के बेस लागेला।"

खेसारी चाचा के इ सब बात सुनकर हमरा लागल कि ठीके बोलत बाड़ेन चाचा।आजकल इ सब बढ़का बढ़का ईस्कूलिया के चोंचलेबाजी बढ़ गईल बा। पढ़ाई लिखाई के त एहन धंधा बना ले लेलन।अब चाचा के अउर फिर हमनी के जमाना और अब इ नवका लइकन के जमाना केतना अंतर आ गइल बा...।

का मालूम.....?चाचा के बतकही सुनकर शायद रउआ लोग इहे बोलब कि इ बात चाचा के उम्र का तकाज़ा बा ..या बुढ़ापा के असर बा।हमरो न बुझाईल...। फिर भी उनकर दार्शनिक सोच पर कुछ देर हम सोचे ला मजबूर हो गइली।

फिर इ सब फ़िज़ूल के चक्कर में ना पड़ते हुए हम खेसारी चचा के आगे खेसारी जैसा मुंह बना कर हंसने की चेष्टा करने लगे। समझ में नहीं आया कि इनकी बातों का क्या जवाब दूं।

©Ajay Shukla
 
 

पलामू किला मेला


राजा मेदनिया
 
घर-घर बाजे मथनिया
इस पौराणिक कहावत को याद दिलाता है ऐतिहासिक मेला   जो पलामू किला में लगता है. खूबसूरत ओरंगा  नदी और बेतला जंगल की शानदार खूबसूरती के बीच शानदार मेला. लाखों लोग खींचे चले जाते हैं हर साल. यह चेरों वंशों का एकलौता मेला है, दूर रहने वाले चेरो भी मेला में जरूर आते हैं.
पिछले साल कम से कम 5 करोड़ की खरीद बिक्री इस मेला में हुई थी और एक लाख से ज्यादा लोग आए थे, यहाँ की कचरी (पेहटा) कुछ ज्यादा ही फेमस है बहुत से लोग विशेष रूप से इसे ही लेने जाते हैं, साथ ही साथ ,   लखठो ,गठौरी  यहाँ का ताज़ा पकौड़ी तो जान है यहाँ की। लोहे के पारम्परिक हथियारों (भाला, गड़ासा, टांगी ) के साथ-साथ किसानों के खेती के सामान कोड़ी, कुदाली, हर -फार की खरीद बिक्री के लिए भी यह मेला जाना जाता है। लेकिन कहीं न कहीं हम सब ठगे हुए महसूस करते हैं जब तलवारों और हथियारों के जगह प्लास्टिक के पिस्टल देखते हैं मेले में और पकौड़ों के महक के जगह कुरकुरे लटके मिलते हैं।
लाल दीवारों को तो गुटखा ने और लाल कर ही दिया है बीचोंबीच में 'पिंकी लव्स पप्पू' के तीर दिल को चीरते हैं। ना वहां तक पहुंचने का रास्ता बन पाया है न मोबाइल का नेटवर्क।
नक्सली हिंसा में कमी शायद अब लोगों को जाने का न्योता मिले. अब तो सड़क भी अच्छी बन गई है, साफ सफाई भी पहले से ज्यादा है, कसम से किसी भी जंगल से ज्यादा खूबसूरत  है हमारा पलामू किला से दिखने वाला जंगल.
तो आइये सेल्फी लीजिये किला से आउ इम्प्रेशन मारिये अपनी वाली पे.
इन ढहती विरासत और दीवारों को बचाएँ इसी बहाने

©sunny shukla

देवउठान


आज देवठान  है , अगर हम हिन्दू पंचांग के हिसाब से देखें तो शुभ कार्य आज ही के बाद से ही शुरू हो जाता है। वैसे पुराणों की बात करें तो ऐसा वर्णन है कि आषाढ़  शुक्ल पक्ष की देवशयनी एकादशी  को भगवान विष्णु सो जाते हैं और चार महीने बाद कार्तिक  मास में आज ही के दिन भगवान विष्णु शयन निद्रा से जागते हैं और सृष्टि का कार्यभार देखते हैं, इसीलिए आज के एकादशी तिथि को 'देवउठनी ' एकादशी भी कहा जाता है। ये तो रहा #देवठान पूजा करने का कहानी पर हमलोग के लिए तो थोड़ा अलग ही रहता था।

जैसे ही तुलसी चबूतरा  के आस-पास अँगना लिपाना  शुरू होता तो समझ जाते कि आज देवठान है। अब ठंडा के दिन में घाम कम न निकलता है, इसलिए सुबह-सुबह ही लीपना  पड़ता था काहे कि देर हो जाने से फिर सूखेगा नही तो उसपे विवाह मंडप कैसे बनेगा? जल्दी-जल्दी सब काम कर के दुनो दादी लोग अँगना में बैठ जाती थीं मंडप बनाने। केतारी  के चार डांठ तुलसी जी के चबूतरा पास रख के मंडप बनता था आऊ फिर अंगना में जमीन में चाउर पीस के उसके घोल से बनता था, डिजाइन वाला खड़ाऊ । पहिले भगवान जी के खड़ाऊ बनता उसके बाद घर भर के आदमी के खड़ाऊ बनता। हमलोग पूरा ध्यान से बैठ के आँख गड़ा के देखते रहते कि अपना बनता है कि नहीं। इहे चक्कर में घर भर के आदमी का गिनती आऊ अँगना में बनने वाला खड़ाऊ के जोड़ी का गिनती चलते रहता। पर दादी लोग अपन गिनती पर पूरा कॉन्फिडेंस में टेंशन फ्री हो के बनाती रहतीं। हराम जे केकरो मिस हो जाए। घरे के सब आदमी के बनाने के बाद अलगे एगो कोना में बनता हर-जुआठ आऊ साथ में महतो बाबा  आऊ अजोध (अयोध्या) का डिजाइन भी बनाया जाता था। ई दुनो हमर घर के हरवाहा  थे, तो जब पूरा परिवार के लिए खड़ाऊ बनता था तो उनके लिए भी बनाया जाता था।

इसके बाद का काम था पूरा घर के दीवाल में 'श्री सीता राम' आऊ दरवाजे पर शुभ-लाभ, स्वागतम लिखने का। अब चूँकि गाँव का माटी का घर छोटा तो था नहीं कि एक आदमी से लिखा जाए और ऐसे भी अँगना में मंडप बनाते-बनाते दादी लोग को देर हो जाता था तो ये काम हमलोग को भी मिल जाता था। उसके लिए हमलोग पहिले से दतवन_का_कूची बना के उसके ऊपर सूती कपड़ा बाँध के तैयार रहते थे। जैसे ही दादी कहती कि "लिख दे तो चिंया" बस उसके बाद सब बच्चा लोग में कॉम्पीटिशन स्टार्ट कि के केतना लिखने सकता है।

एक बार तो हमको लिखने मिला तो गलती से पूरा दीवाल पर लिख तो दिए,पर सीता राम के सीता में दिरघी  के जगह हरसी कर दिए। अब लिखा गया उसको कैसे हटाया जाए और दुधी_माटी से लिपाया दीवाली में ही सो दुबारा लिपाता भी नहीं। पूरा साल भर उ ऐसे ही रह गया कोई आए पूछे तो बस सब मेरा नाम बता देता कि उहे गलत लिख दिया है और हम कहते रहते कि गलत कहा है, है तो 'सीता' ही न। खैर बाद में स्कूल में जब कुटाये इसके लिए तब पता चला कि सिता मने चीनी होता है। घर के दीवाल में राम नाम लिखते काहे है? जब दादी से पूछते तो कहती थी कि "जब लंका में आग लगाईले हलथि हनुमानजी तो सब के घर जर गइल हलइ खाली विभीषण के घर छोड़ के, काहे कि विभीषण के घर में राम नाम लिखल हलई, वैसे ही घर में राम नाम लिखला से कोई संकट ना आवे।" अब आफत, विपत, संकट से हमलोग के का दिक्कत जब आवे तब न जाने, लेकिन इहे बहाने दीवाल में अापन कलाकारी देखावे के मौका मिल जाता था, वही बहुत था। शाम में पूजा के बाद पर-पकवान परसादी में मिल जाता था सो अलगे ।

खैर अब हम तो घरे हैं नहीं नई तो देखबे करते कि हमर खड़ाऊ बना कि नहीं। अगर आपलोगों के घर होता है, तो जरूर ध्यान से देखिएगा और हो सके तो फोटो भी भेजिएगा।

Anand keshaw 


पईंचा


आने वाले त्योहारों की चर्चा करते ही आज लीलावती की आँखों से आँसू अनायास ही झरने लगे। उसने कहा "हमनी खातिर का हई परब आउ तयोहार दारू आ पईंचा से त जीअल हराम होइल बा।"

उसके आँसू देखकर मेरा भी मन रूआंँसा हो गया और यह सोचने पर मजबूर हो गई कि इतनी तरक्की के बावजूद भी आम जीवन कितना हलकान और परेशान है। खासकर एक स्त्री का जीवन, जो कई मोर्चों पर एक साथ जद्दोजहद करती है।

दरअसल लीलावती के पति ने अपनी बहन की शादी के लिए महाजन से 25000रुपए कर्ज ले रखा था, जिसे पलामू की भाषा में 'पईंचा' बोलते हैं। इस 'पईंचा' में मूल रकम के अलावे हर माह ब्याज भी देना होता है। रकम न चुका पाने की स्थिति में 'पईंचा' लेने वाला व्यक्ति ब्याज के बोझ तले दबता चला जाता है। कई बार तो मरते दम तक वह इससे मुक्त नहीं हो पाता और यह बोझ अगली पीढ़ी पर लद जाता है। कई बार इससे तंग आकर लोग अपनी जान तक गँवा बैठते हैं।
गाँव के पैसे वाले लोग
महाजन मजबूर लोगों को समय पर पैसे देकर मदद कर तो देते हैं, पर बेचारा वह व्यक्ति इसके चंगुल में बुरी तरह फँस जाता है और 100 के बदले 150 देता है।

कुछ ऐसे ही चंगुल में फँस चुकी है कामवाली लीलावती। महीने भर जूठन धोकर चंद रूपये जुटाने वाली लीलावती इन पैसों से बच्चों की जरूरतें पूरी करे कि पति के 'पईंचे' की रकम अदा करे। इस बात को लेकर आए दिन पति-पत्नी में झड़प और तीखी नोंक-झोंक होती रहती है और कई बार दिन भर की थकी-हारी लीलावती बिना खाए-पीए डबडबाई हुई सो जाती है। पति रोज मजदूरी के लिए जाए न जाए, पर लीलावती को हर रोज घर से निकलना होता है चंद पैसों की खातिर, ताकि वह बच्चों की फरमाइशें पूरी कर सके। अपने लिए तो उसने कभी कुछ सोचा ही नहीं।

होली-दशहरा में तो मालिक के घर से मिली दो साड़ी ही उसके लिए काफी है। अपनी बाकी की इच्छाओं का वह गला घोंट चुकी है। मुझे तो उसकी सयानी हो रही दो बेटियों की चिंता खाए जाती है कि जो अभी अपनी ननद की शादी पर हुए 'पईंचे' से मुक्त नहीं हुई वो औरत अपनी दो-दो बेटियों की शादी कैसे कर पाएगी? क्या दहेज लोभी इसकी व्यथा समझेंगे? क्या 'पईंचा' देनेवाला ब्याज की रकम माफ करेगा?आखिर बेटी की शादी की बात है। फिर से 'पईंचा' के चंगुल में फँसा परिवार आखिर कब और कैसे इससे मुक्त हो पाएगा?

Sharmila shumee 
 
 

अंग्रेजी



केतना बार समाचार में ई सुने के मिलेला कि कोई शिक्षा पदाधिकारी विद्यार्थी से पूछ लेलन कि ABCD सुनाओ तो लईका उल्टा पूछ देलक कि कवन सुनाये सर बड़का कि छोटका? अईसन-अईसन केतने समाचार सुने के मिल जाला कि कहीं कोई महीना के नाम अंग्रेजी में गलत बता देलक तो कोई अल्फाबेट केतना होवेला से गलत बता देलक। तो भाई जी लोगन आज हम आपन जमाना में अंग्रेजी सीखे-सिखावे के आउर अंग्रेजी कइसन होत रहे ओकर वृतांत बतावत हिये।

जब हम क्लास छठा में गेल रही तs पहली दफा हमरा पता चलल कि अब अंग्रेजी सिखेला बा। मन में बड़ा ललक रहे कि हमहूँ अंग्रेजी सीखूँ आउर उ ललक एहसे रहे कि जब हम चौथा में रही, ओहिघरी गरमी के छुट्टी में हमर फुफेरा भाई जे उत्तरप्रदेश में पढ़त रहन छुट्टी मनावेला अपन नानी घर मने हमार घर आईल रहsन। उ त पढ़त रहsन एक क्लास उपरे आउर अंग्रेजी धड़ल्ले से चार लाइन में लिखत रहsन। हमरा तs..एको पल्ले पड़ते नाहीं रहे, काहे कि कबो उ चार लाइन में अक्षर के उपरे, कबो नीचे, कबो बीचे। पते नाहीं चलत रहे कि इ कइसे उपरे, नीचे आउ बीचे ले जाके लिखs हथीन।

जब ई हमार बुद्धि में नाहीं धसल तो बड़ी हिम्मत करके पूछली। हिम्मत के बात एहला बा कि हमर फूफा ओबरा, उत्तर प्रदेश में थर्मल पावर में साहेब रहsन आउर हमर फुफेरा भाई लोगन पूरा अंग्रेजी मीडियम कान्वेंट में पढ़त रहsन। एक दम से ड्रेस, टाई, बेल्ट आउर बूट जूता, इतना देखके हमरा हिम्मते नहीँ पड़त रहे। उ घरी त हम ऊ चेक वाला अंडर बियर पूरा जरबन वाला पहिन के खुद के टाइट बुझत रही आउर खुशी-खुशी बैइठेला प्लास्टिक के बोरा, आउर कपड़ा के झोला माई सीके बना देले रहे, ओर से में किताब आउर जिस्ता वाला कॉपी ले जात रही। ई चार लाइन के कॉपी का होत रहे, हमनी के भेंटे नाहीं रहे।

त जब देखली कि ई चार लाइन के कॉपी हो ला, जेकरा में कबो नीचे, कबो उपरे लिखल जा ला। त भईया से हिम्मत करके पूछली कि एहो!भईया, इ उपरे-नीचे अक्षरवा के कइसे आउर कब ले जा लs.?..हमारा तs..बुझाते नखव। त उ घरी उ डांट देलन कि तुमको नहीं बुझाएगा। आउर सच में उनकर लिखब देखके बहुत आश्चर्य भइल आउर फुफेरा भाई के ज्ञान के देखके उनकर तरफ बड़ी कातर नजर से देखत रहगेली आउर एहसे उनकर ज्ञान ला बड़ी मन में आदर भइल। मन में बड़ा व्याकुलता बनल रहल, पर मन मार के रहली। फिर जब हम छठा में पहुँचली त पता चलल कि अब हमरो अंग्रेजी पढ़ेला बा। बाउजी हेड मास्टर रहsन एहसे जल्दीये हमरा खातिर किंग रीडर किताब खरीद के ला देलsन कि हम तनी स्पेलिंग याद कर-कर के अंग्रेजी सिख जाऊँ।

आउर फिर जल्दी-जल्दी बड़का ए बी सी डी...,फिर छोटका, फिर लपटेऊआं सीखे के कोशिश करे लगली। वैसे तs लपटेऊआं ए बी सी डी.....तs अभियो बढ़िया से नाई अईलक, पर हार नइखी मनले अभियो कोशिश करत रहिला। हं इ उपरे, नीचे आउ बीचे लाइन में लिखे वाला बतवा जाके मैट्रिक में बुझाएलक। तब जा के अंग्रेजी से कुछ-कुछ डर खतम भइल।

एही बीच में एगो घटना घटल कि वार्षिक परीक्षा होत रहे, हमर आपन बड़ भाई हमरा से चार क्लास आगे रहन। अंग्रेजी परीक्षा में आपन दिमाग लगाके खूब लिखलन, पूरा पेज भर देलन। ई देखके गांव के एगो लईका हमार भईया से जिद कएलक कि हमरो कॉपी में लिख देहुँ न गउवां। भईया कहलन कि हमरा अंग्रेजी लिखे नई आवलउ, पर ओकरा विश्वास नाहीं भइल। ओकर जिद पर हमर भईया खुबे अंग्रेजी लिखलन ऊ लइकवा बड़ी खुश रहे कि अबरी अंग्रेजी में खुबे नम्बर आई, पर जब मास्टर साहब कॉपी चेक कइलन त आपन माथा पकड़ के बैठ गेलन, काहे कि जे लिखल गइल रहे ओकर कोई अर्थे नाहीं रहे। बस लेटर के कबो उपरे, नीचे आउ बीचे, जे बुझाइल, जइसे मन कएलक खूब अंग्रेज तरी लिखलन बाद में जब मास्टर साहब भिर भेद खुलल त ऊ दुनों जने के थेथर के दोहरा छड़ी से ठोकाइ भइल। जेकरा याद करके हमर भईया आजो सिहर जा लन। उ समय में ई रहे मास्टर आउर विद्यार्थी के सम्बंध। आउर आज.....RTE...😡
इ कहs कहs के पिटाई भइल रहे कि
"जब छड़ी चमके, तब बिद्या बमके।"

जय हो अंग्रेजी
खैर! अंग्रेजी से डर भगावेला बड़ी मेहनत कइली। कॉलेज में प्रो. सुभाष चंद्र मिश्रा सर से पढ़ली आउर फिर स्नातक में भी अंग्रेजी पढ़ली। फिर बाद में अशोक कुमार सिंह सर (पटना में) (लेखक-द ब्रिटिश इंग्लिश ग्रामर) से पढ़ेला सौभाग्य मिलल। आउर आज ईश्वर के कृपा से हम ओहि अंग्रेजी के मास्टर बनल हीs, स्नातक प्रशिक्षित शिक्षक।

बहुत दिन तक तो पलामू के केतने लईकन तो विनय प्रकाशन के न्यू मॉडल इंग्लिस ट्रांसलेशन से ट्रांसलेशन बना-बना के अंग्रेजी सीखे के कोशिश में बचपन गुज़ार देलन पर ई ससुरी अंग्रेजी समझ मे एतना जल्दी आवो तब न। पर अब समय के साथ स्थिति बदल गईल बा, अब अंग्रेजी कौनो पहाड़ नईखे रह गेल, तबे तो इहाँ के लईकन सब भी बढ़िया-बढ़िया सरकारी नौकरी से लेके हर क्षेत्र में परचम लहरा रहल हथ।

अविस्मृत संस्मरण आप सभी को सादर समर्पित।।।


Dinesh Kumar Shukla 



ट्रांसफार्मर कथा


कुछ बरस पहिले की बात है। लंबे समय के बाद हमारे गांव में ट्रांसफार्मर बन गया था। अउर उस दिन सभी लोग पूजा पाठ करके चालू किया था। बहुत दिनों बाद रात में कुछ घरों में रोशनी दिखलाई पड़ी थी। भक्क-भक्क कर के जब बल्ब जल गया था तब अगला दिन भिनसारे सबके चेहरे में मुस्कुराहट दिखलाई पड़ रही थी।
का मालूम उन दिनों कहाँ से कनेक्शन था कि जब भरी दुपहरिया में या फिर रात को जब आप आधा नींद में रहते थे तब ही बल्ब जलता था लेकिन जलता था खुशी की यही बड़ी बात थी। दूर दूर में बाल बच्चों को खबर कर दिया गया कि ट्रांसफार्मर बन गया है। अब लाईट का कोई दिक्कत नहीं है।
लाईट का दु फेस था। कभी एकरा में है तो ओकरा में नहीं । इ फेस में कम बोल्टेज है ओकरा में जादे है। ई परेशानी जब शुरू हुआ तो लगभग सभी घर में हुक लगा हुआ बांस का एक डंडा रहता था और इ फेस से उ फेस में बदलने वाले पारंगत लोग भी....। तार में एगो पत्थर बांध के इ तार से उ तार में करना गाँव के लोगों के दैनिक दिनचर्या का अंग हो गया था।
अब जब लाईट आ गया तो चाहे दुपहरिया हो या आधी रात....बल्ब बस जलते रहता था।गाँव में अधिकांश घर में जलाने बुझाने का स्विच ही नहीं था। रात को सब बल्ब जला के सोता था त पूछे काहे....??तो बोला कि- "हमीन यहाँ भी बॉल बत्ती आ गया है अब अन्हरिया में नहीं सुतते हैं।" यहाँ तक कि घरे घर हीटर रखा जाता है, अगर खाना बन गया और लाईन नहीं काटा है तो सब पानी चढ़ा देता है। लाईट आने से बहुत फायदा...। एगो त अन्हरिया में सांप बीछ का खतरा कम हो गया। घर-घर में टीवी अउर मोबाईल...मतलब मनोरंजन का साधन बढ़ गया। पंखा कूलर, फ्रीज तो अब आम बात हो गया है। सबसे बड़ा सुविधा हो गया पानी पटाने में..अब सबके खेत-बाड़ी हरियर दिखने लगा।
अब लाईट है त खराबी तो आएगा ही..। इसे जलन की भावना कहिए कि सामाजिक एकता की मिसाल....एक टोला में लाईट है दूसरा में नहीं....तो गाँव के तेजस्वी युवा पक्का दूसरे टोला का भी ट्रांसफार्मर या बिजली तार में छेड़छाड़ करके खराब कर देते हैं कि हमरा घर में अन्हरिया है त फलाना टोला में बल्ब जलता देख मन में कूढ़न नहीं हो।
अउर दु चार दिन लाईट नहीं रहेगा तो उसके बाद सबके सब मालिक-मालिक बोलकर इंजीनियर को फोन करेंगे। पहिले त टूटी फूटी खड़ी बोली में अउर फिर पलमूहाँ अंदाज़ में उनके अद्भुत वार्तालाप को सुनकर आप पलामू के युवा शक्ति की विलक्षण प्रतिभा से परिचित हो जाएंगे। ट्रांसफार्मर खराब होने पर गांव के लइका लोग निकल जाएगा चंदा जुटाने... सब मिल जुल के चंदा जमा करता है अउर फिर नेता जी के पास जाता है। कभी तेल डालना है तो कभी फ्यूज उड़ गया है। इसके लिए चंदा लेने का कार्यक्रम लगातार जारी रहता है। और चंदा काटने के लिए लड़को के झुंड में एक गांव का विश्वास पात्र आदमी जरूर रहेगा और उसका काम सब घर जा के गारजीयन टाइप आदमी के पूरा प्रक्रिया समझाना रहता है। अउर जे चंदा देने में जादा आनाकानी करता है त समझ लीजिए कि उसको रात बिरात अंधेरे में ही रहना पड़ेगा कि कब कौन तार गिरा दिया पता नहीं चलता। यहाँ तक कि गांव पंचायत के नया-नया नेता से उद्घाटन करवाने के नाम पर विशेष अनुदान भी लिया जाता है। कई बार अगर जल्दी-जल्दी ट्रांसफार्मर उड़ने लगे तो विशेष पूजा- पाठ के बाद ही स्टार्ट किया जाता है।
अब ऐसे समय में मान लीजिए कोई शहर से गाँव गया है और उसका पूरा विश्वास दिलाया गया है कि गाँव में बिजली आ गई है,अब कोई परेशानी नहीं...और जिस दिन वह वहाँ पहुँचे उसी दिन ट्रांसफर्मर खराब हो जाता है। लेकिन दु चार दिन बाद जब उसके वापस जाने का समय होता था तब लाईट आ भी जाता था।उस समय लगता था कि वह मुंँह चिढ़ाने के लिए आया है।
एक बार तो हम बड़का स्टैबलाईजर खरीद कर लाए कि अब वोल्टेज सही रहेगा और लाइट ही गायब...अउर ई त पलामू के पुरान रिवाज है कि जहिया पंखा,फ्रीज, कूलर कीनाया नहीं की...बी मोड़ से लाइन कटल है... 4 रोज ला.... त हफ्ता रोज़ ला। थोडा हवा बयार चला त समझ लीजिए कि दु चार दिन के फुरसत।
का है कि हमरा घर के पास ही ट्रांसफार्मर है। वहाँ त मचहला जमा रहता है। एक से बड़े एक कारीगर है गाँव के युवा लोग.... उनके सामने बिजली इंजीनियर हो या बिजली मिस्त्री,सब के फेल...। दु चार गो का डाइरेक्ट कांटेक्ट होता है बिजली विभाग से... लाईट कनेक्शन कटवाने में एक्सपर्ट..। सब बंदर जइसा खम्भा पर अइसे चढ़ जाता है कि खुद के नन टैलेंटेड होने का पक्का यकीन हो जाता है।
मान लीजिए कभी ट्रांसफार्मर खराब हो गया तो गाँव के बड़-बुजुर्ग सबसे ज्यादा गाली सुनाएंगे तो गाँव के युवा नेताओं को....कि काहे के नेता बनते हो जी। सब परिवार आया है।अउर यहाँ लाईटे नहीं है हमरा समय में जब ट्रांसफार्मर खराब हुआ था त नमधारिया को सिर्फ एके बार जा कर बोले थे। जइसने हमको देखा... खड़ा हो गया था.... बोला कि बाबा रउआ बोल दिहली त राउर घर पहुँचे के पहिले ट्रांसफार्मर लग जाइ अउर सांझ के बाजार कर के आए त देखें कि पूरा गाँव जगमगा रहा है।
वैसे तो पलामू की ट्रांसफार्मर कथा या व्यथा पर बड़ा रिसर्च किया जा सकता है।लगभग सभी पलामूवासियों का इसपर लंबा अनुभव रहा है।उम्मीद है इस पोस्ट पर आप भी अपने अनुभव को कमेंट के माध्यम से प्रस्तुत करेंगे और पलामू की ट्रांसफॉर्मर कथा को पूर्ण करेंगे।
©Ajay Shukla

Saturday, October 27, 2018

बेटों की विदाई


आज कई लोगों के घर मे माँ ने रात में ही चावल फटक कर बोरी में बंद कर के रख दिया होगा। साथ मे अँचार, अदौरी, घर का पिसाया हुआ मसाला भी पैक हो गया होगा। आज दसहरा छुट्टी खत्म होने के बाद बेटा राँची जो जाने वाला है। ये कहानी हमारे आपके घर की ही नहीं बल्कि लगभग अधिकतर घरों की है। भले #राँची की जगह कोई पटना या दिल्ली जा रहा हो।

3-4 दिनों तक घर भरा-भरा सा रहता है, बाहर के मेले से कहीं अच्छा घर मे लगा मेला लगता है। सब का साथ मे खाना , देर रात तक एक साथ बैठ के बात करना। बच्चे घर से बाहर रहते हैं इसलिए खासकर उनकी पसंद का खाना बनाना और फिर सुबह से लेकर दूसरे दिन के सुबह तक उसको ये कहकर खिलाना कि - " तनी कुन लान दियऊ का तोरा बेस लग हउ इहेला रहे देले हलियऊ " । एक अलग ही माहौल बना होता है। और शायद यही सब हमारे यहाँ के पर्व त्योहारों को खुद से जोड़ने पर मजबूर करती है।

  दसहरा खत्म होने के दूसरे दिन से ही बच्चों के जाने के तैयारी होने लगती है। पूजा में उतना व्यस्त थके होने के बाद भी माँ का ध्यान लगा रहता है कि बेटा को क्या-क्या देना है?  और वो घर का काम खत्म कर के जैसे ही समय मिले उसे जुटाने में लगी रहती है। कभी ये #कोठी से #पुरनका_चावल निकाल रही है तो कभी ठंढी बढ़ जाने के चलते थोड़ा अच्छा दिखने वाला कम्बल #बिछावन निकाल रही होती है। और बीच-बीच मे बेटे से आकर पूछती भी है - " आलू ले जइबे घरे के हउ पुरनका अभी नयका तो महँगा न मिलतऊ। तो तनी घरे वाला #बुट दे देले हिअउ फुला के खईहे न तो मन करे तो सब्जी भी बना लिहे। अँचार का चीज के ले जइबे #करील वाला बढ़िया बनल हउ दे देवईत हिअउ। "और न जाने क्या-क्या और लड़का बेचारा बस हाँ ना में ही जवाब दे रहा होता है।

उधर पापा थोड़ा हड़बड़ी में जल्दी-जल्दी का गुस्सा भी  दिखा रहे होंगे। चाचा लोग पहले ही आसपास के लोगों के तरक्की का किस्सा कहानी सुना चुके थे कि " #फलनवा के लईका के उ चीज में नौकरी हो गेलइ, बहुत मेहनती हइयो हलइ, तो #चिलनवा के बेटी के एतना परसेंट आइल हई परीक्षा में, #पेपर_में_फ़ोटो आउ नाम भी छपल हलई। का जनी हमीन घर के कहिना नसीब होई।"

इन तमाम चीजों के बीच जो सबसे मुश्किल काम होता है वो माँ-बाप और बच्चों तीनों का खुद के भावनाओं को संभाल कर रखना। जहाँ लड़का चुप-चाप सबकी बात को सुन कर घर परिवार से दूर जाने के गम को छुपाते हुए इसबार और मेहनत का वादा खुद से कर रहा होता है। वहीं माँ अपने बेटे के दूर जाने की भावना को दबाये जल्दी-जल्दी सब कर के मन ही मन रो भी रही होती है और भगवान से प्रार्थना भी करते रहती है कि ये जो दूर भेजने का कष्ट वो कर रही है उसका फल अच्छा मिले और बेटा कुछ अच्छा कर के सबको जवाब दे। और बाप बस में बेटे को चढ़ाते तक खुद को इन तमाम भावनाओं से दूर दिखाने की कोशिश में जैसे उन्हें तो कोई फर्क ही नही पड़ रहा है। बस जल्दी करने का हल्ला किये जा रहे हैं। मन से इस उम्मीद के साथ कि बेटे को किसी चीज़ का दिक्कत नहीं होने दे रहे हैं तो बच्चा भी इसका परिणाम देगा। जल्दी ही अपने पैरों पर खड़ा होगा और नाम पेपर में आये चाहे न आये पर बेटा आगे चलकर काम जरूर आयेगा।

अब ये सिर्फ बेटों तक ही नहीं #बेटियां भी बाहर जाने लगीं है। भले #डेरा का जगह #हॉस्टल ने ले लिया हो। हम विद्यार्थी जीवन से आगे बढ़कर #नौकरी करने लगे हो पर घर से आते समय आने वाला माँ का प्यार, बाप का विश्वास, और चाचा-बाबा के द्वारा अगल-बगल के लोगों के सफलता की कहानी वही है। और हम बच्चे भी भारी मन के साथ आगे कुछ और अच्छा करने के वादे और नई जिम्मेदारी के साथ घर से विदा हो रहे हैं।

फ़ोटो:- Sunny Shukla

©Anand Keshaw

Thursday, August 9, 2018

सांप और हम

(अंतरराष्ट्रीय हिंदी पत्रिका सेतु के जून 2018 अंक में प्रकाशित सांप एवं सर्पदंश से जुड़े कई अंधविश्वासों और भ्रांतियों से पर्दा उठाता डॉ Govind Madhaw का रोचक एवं ज्ञानवर्धक आलेख. जरूर पढ़ें. ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाएं.)

साँप’ यह शब्द सुनते ही आँखों के आगे आश्चर्य, रहस्य, भय, कौतूहल, से भरे अनेक दृश्य उपस्थित होने लगते हैं जिनमें शामिल हैं - ब्रह्माण्ड को अपने मस्तक पर धारण किये शेषनाग, शिव की ग्रीवा में शोभित विषधर, कालकादह में कृष्ण का नृत्य, परीक्षित का काल तक्षक, विषकन्या, नागमणि, इच्चाधारिणी नागिन की कहानियाँ, नागपंचमी का पर्व, नागराज के रोमांचक कॉमिक्स, और बीन बजाते संपेरों का जीवन इत्यादि। शायद इसीलिए पश्चिमी देश भारतभूमि को ‘साँप और संपेरों का देश’ कहते हैं।

मगर दुखद पहलू यह कि हमारे देश में ही हर साल विश्व में सबसे ज्यादा यानि लगभग 20 हजार मौतें सिर्फ सर्पदंश से होती हैं। उस से भी ज्यादा कष्टकर बात ये कि इनमें से 90 फीसदी मौतें सिर्फ और सिर्फ इसीलिए होती हैं क्योंकि हम साँप और सर्पदंश के बारे में सटीक वैज्ञानिक जानकारी नहीं रखते, समय पर इलाज न कराके झाड़-फूँक-टोटका जैसे अंधविश्वास को प्राथमिकता देते हैं। कई बार मेरे हॉस्पिटल में भरती सर्पदंश के मरीज़ के पढ़े लिखे परिजन हमसे कहते हैं- “सर! हम चाहते हैं कि अपने मरीज की झाड़फूंक करा लें यहीं पर, बस थोड़ी देर के लिए उन्हें ICU से निकाल दीजिये। मेरे गाँव से आये बाबा बाहर बरामदे में ही उनका देहाती इलाज कर देंगे। कुछ जड़ी-बूटी और सिद्ध मन्त्र है उनके पास, बहुत लोगों को मौत के मुँह से निकला है उन्होंने। ठीक है कि आप इन बातों में भरोसा नहीं रखते, लेकिन हम तो भरोसा रखते हैं न! आपका मेडिकल साइंस अभी उतना आगे नहीं पहुँचा है, एक दिन आपको भी इनकी शक्ति पर भरोसा हो जायेगा। अगर आप हमारे मरीज को नहीं छोड़ेंगे तो हम हिंसक रास्ता अपनाने के लिए मजबूर हो जायेंगे।”

© Govind madhaw (www.setumag.com)

भारत में मानसून का आगमन हो चूका है और यही समय है जब हमारे हॉस्पिटल में सर्पदंश के सबसे अधिक मामले आते हैं। क्यों? हम मनुष्य अपने शरीर का तापमान स्थिर रखते हैं। पिछले लेख में आपने पढ़ा कि किस तरह ठंढे मौसम में चर्बी पिघलाकर, रोमछिद्र बंद कर के तथा कंपकंपी के सहारे हम शरीर में गर्मी पैदा कर लेते है। ठीक इसके उल्टे बाहरी वातावरण गर्म होने पर पसीना निकालकर हम शरीर का अंदरूनी तापमान बढ़ने नहीं देते। मगर साँप के शरीर में तापमान नियंत्रण की ऐसी कोई प्रणाली नहीं होती। उनकी त्वचा शुष्क और चिकनी होती है, वे पसीना नहीं निकाल सकते, शायद इसीलिए क्योंकि पैरों के बिना रेंगने के लिए उन्हें ऐसे शरीर की आवश्यकता है जो घर्षण को बर्दाश्त कर पाए। उन्हें आंतरिक क्रियाओं को सुचारू रूप से चलाने के लिए अपने शरीर का तापमान 30 डिग्री सेल्सियस रखना पड़ता है। जबकि मनुष्य के लिए यह 37 डिग्री सेल्सियस है। इसीलिए साँप का स्पर्श ठंडा होता है और उन्हें ‘कोल्ड ब्लडेड एनिमल’ कहा जाता है। अत्यधिक ऊष्म या शीत वातावरण में साँप अपने शरीर के तापमान को अनियंत्रित होने से बचाने के लिए लम्बी निद्रा में चले जाते हैं जिसे ग्रीष्मनिद्रा या शीतनिद्रा कहते हैं। इस दौरान साँप ना तो खाते-पीते हैं ना ही कोई क्रियाकलाप करते हैं। बस हृदय और फेफड़े की मंदगति के सहारे मौसम परिवर्तन का लम्बा इंतजार करते हैं। क्या मनुष्य भी बिना भोजन-पानी के महीनों तक जीवित रह सकता है? क्या योगी भी  शीतनिद्रा जैसी किसी अवस्था के सहारे हिमालय जैसे ठंडे क्षेत्र में वर्षों समाधि में लीन रहते हैं? क्या शीतनिद्रा के सहारे मनुष्य को सदियों तक जिन्दा रखा जा सकता है ताकि हम सुदूर ब्रह्माण्ड की यात्रा कर सकें? इस विषय में गहन शोध चल रहे हैं। आइये हम साँपों पर लौटते हैं।

© गोविंद माधव
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संस्कृत का शब्द ‘सर्प’ और फ्रेंच में ‘सर्पेंटाइन’ भाषाविज्ञान की दृष्टि से ‘एकीकृत भारोपीय (इंडो-यूरोपियन) भाषा परिवार’ की अवधारणा और ‘डाईवर्जेंट थ्योरी ऑफ़ इवोल्यूशन’ को पुष्ट करते प्रमाण हैं। हालाँकि भारत के अलावा अन्य देशों में भी साँपों से जुड़ी कई कहानियाँ और मान्यताएँ-परम्पराएँ पाई जाती हैं। इंडोनेशिया और थाईलैंड में लोग पौरुषवृद्धि के लिए सर्प-रक्तपान करते हैं, कुछ पश्चिमी देशों में सर्प-निर्मित शराब का भी प्रचलन है। मिश्र में क्लियोपेट्रा का आत्मदाह और तुत-अंखामन का सिंहासन हो या मध्यएशियाई क्षेत्र के दंतकथाओं में पर-पैर वाले ड्रैगन का वर्णन। दरअसल साँपों का विकास लिजार्ड/छिपकली से हुआ है। दोनों ही सरीसृप परिवार के सदस्य हैं। बस इवोल्यूशन के दौरान साँपों ने पैरों की जगह लम्बी पूँछ और पतले-लम्बे वक्ष को अपनाया। लेकिन छिपकली की तरह साँप की पूँछ काटने पर वापस नहीं बढती। मगर एनाकोंडा और अजगर की कुछ प्रजातियों में अल्पविकसित पैरों के अंश पाए जाते हैं। क्रमिक-विकास की किसी अवस्था में संभव है ये पैर ज्यादा विकसित रहे हों और उनके अवशेष देख कर ही ड्रैगन की अवधारणा का जन्म हुआ हो।

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साँपों से जुड़े अंधविश्वासों और रहस्यों का कारण शायद उनकी विशिष्ट शारीरिक रचना और व्यवहार है। आइये उनसे जुड़े कुछ रोचक तथ्यों पर नजर डालें। संसार में कुछ ऐसे स्थान भी हैं जहाँ साँप बिलकुल नहीं पाए जाते, जैसे – अन्टार्कटिका, न्यूजीलैंड, आइसलैंड, आयरलैंड, हवाई द्वीप और हिमालय की ऊँचीबर्फीली श्रृंखलाएँ। शायद इन स्थानों का निम्न तापमान या अनुकूल भोजन के अभाव की वजह से। या फिर उद्गमस्थल से वहाँ तक साँपों के पूर्वज तैर कर नहीं पहुँच सके हों, या फिर सरीसृप का क्रमिक विकास वहाँ अलग दिशा में हुआ हो। साँपों की लम्बाई 10 सेंटीमीटर से लेकर 7 मीटर तक हो सकती है। संसार का सबसे लम्बा साँप अजगर और सबसे भारी साँप एनाकोंडा है। साँप के कान नहीं होते, वह सुन नहीं सकता लेकिन अपने पेट और जबड़े को सतह पर टिका कर उसके कम्पन को बहुत ही प्रभावी ढंग से महसूस कर सकता है। संपेरे के बीन पर नाचने वाले साँप बीन की आवाज़ पर नहीं नाचते बल्कि संपेरे के द्वारा उनकी आँखों के सामने हिलाते डुलाते बीन के फुले हुए हिस्से को शिकार समझकर उसकी तरफ झपटते हैं। अगर संपेरा एक जगह शांत बैठकर बीन बजाये तो साँप भी शांत पड़े रहेंगे। इसीलिए कभी कभी संपेरे अपने हाथ से मुट्ठी बनाकर साँप की आँखों के सामने घुमा-घुमा कर उसे उकसाते है तब बीन बजाकर उन्हें भड़काते हैं। हालाँकि भारतीय वन्य जीव अधिनियम 1971 के हिसाब से साँपों पर दिखाए जानेवाले खेल गैर क़ानूनी हैं और ‘जीवों पर अत्याचार’ जैसे अपराध की श्रेणी में आते हैं।

साँप की आँखें भी बहुत विकसित नहीं होती, अधिकतर साँप बस अँधेरे और उजाले में फर्क कर पाते हैं। कुछ साँप अपने शिकार को उसकी गति के सहारे पहचानते हैं। शायद इसीलिए साँपों के पूर्वज डायनासोर की फिल्मों में अक्सर हीरो उनके सामने आते ही जान बचाने के लिए एकदम स्थिर हो जाता है। आप समझ सकते हैं कि ‘साँप अपने हत्यारे की तस्वीर खींच लेता है’ जैसी अवधारणा एक गप्प के सिवाय कुछ भी नहीं है। वैसे भी उनका दिमाग इतना विकसित नहीं है कि वे बदला लेने या पीछा कर के खोज निकालने जैसे जटिल काम को अंजाम दें। हालाँकि पेड़ पर रहने वाले साँप की दृष्टि अधिक विकसित होती है, वे रंग भी पहचानते हैं। साँप अपने शिकार को उनके शरीर की गर्मी से पहचानते हैं इन्फ्रारेड सेंसर के सहारे। इसीलिए वे अँधेरे में भी अपना शिकार पकड़ लेते हैं। शिकार का पीछा करने के लिए वे अपनी दोमुँही जीभ को बार-बार हवा में निकालते हैं और वातावरण में मौजूद कणों को अपने तालू के पास ले जाते हैं जहाँ गंध और स्वाद के लिए अतिसंवेदनशील अंग मौजूद होते हैं। साँपों के जबड़े कई छोटी-छोटी हड्डियों से मिलकर बनते है और बहुत चौड़े शिकार को भी निगलने में सहायक होते हैं। साँप की छाती में डायाफ्राम नहीं होता, इस कारण उनका हृदय एक जगह स्थिर नहीं होता बल्कि काफी बड़े शिकार को निगलने के दौरान आगे पीछे खिसक सकता है। उनके पास एक ही फेफड़ा होता है और किडनी अगल बगल ना होकर आगे-पीछे एक पंक्ति में होते हैं।

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साँप हमेशा मांसाहारी होते हैं, वे पानी की कुछ बूंदें चाटते हैं यदा-कदा लेकिन दूध कभी नहीं पीते। बल्कि जबरन दूध पिलाने से वे बीमार भी पड़ जाते हैं। नागपंचमी के दिन दुग्धपान करते दिखने वाले सर्प कई सप्ताह से भूखे-प्यासे रखे जाते हैं। अक्सर गाँवों की गोशालाओं में दिख जाने वाले साँप वहाँ चूहों की तलाश में जाते हैं ना कि दूध पीने। संभव है गाय की थन को वे शिकार के भ्रम में पकड़ लेते हों और डर से उनके पैरों से लिपट जाते हों। 

नर-सर्प का जननांग एक जोड़ा अर्धशिष्ण होता है जो छुपा हुआ होता है, सिर्फ मैथुन के समय मादा-सर्प के जननद्वार में टेढ़ा घुस कर अटक जाता है और वीर्य स्खलन करता है। भारत के कई गाँवों में ऐसा अंधविश्वास है कि ‘नाग’ नर होते हैं और ‘धामिन’ मादा। जी नहीं, साँप सिर्फ अपनी प्रजाति के सदस्य से मैथुन करते हैं। नर सर्पों को मादा को रिझाने के लिए बहुत मशक्कत करनी पड़ती है। अपनी कला का प्रदर्शन करना पड़ता है, प्रतियोगी नरों से युद्ध करना पड़ता है, कोबरा तो प्रतियोगी नर को निगल भी जाता है। अपनी टेरिटरी पर कब्ज़ा जमाने वाले विजयी नर को कई मादाओं से संसर्ग करने का मौका मिलता है। अधिकतर साँप परिवार नहीं बसाते, वे अंडे देने के बाद उन्हें छोड़ कर चले जाते हैं। हालाँकि कोबरा और अजगर मादाएँ अपने अण्डों को लिए घोसला बनाती हैं और अण्डों से लिपटी रहती हैं जबतक उनमे से संपोले बाहर नहीं निकलते। सर्प-मैथुन से मणि का प्रकट होना महज कोरी-कल्पना है।

केंचुली भी लोगों के कौतुहल का विषय होता है। कई परिवारों में लोग इसे सौभाग्य और सम्पन्नता का वाहक समझ कर रखते हैं। दरअसल साँप ऐसे जीव हैं जो जीवनभर लम्बाई में बढ़ते रहते हैं। रेंगने के कारण भी इनकी त्वचा की बाहरी परत जीर्ण-शीर्ण होती जाती है। उनकी आँखों में पुतली नहीं होती बल्कि उसकी जगह पारदर्शी सतह होती है, केंचुली की एक परत यहाँ भी पड़ जाती है जिससे इनकी दृष्टि कमजोर हो जाती है। तब सर्प खाना-पीना छोड़ कर किसी सुरक्षित स्थान में जाकर निष्क्रिय हो जाते हैं। भोजन और उर्जा के अभाव से कुछ दिनों में इनकी मोटाई कम हो जाती है, तब ये किसी कठोर रुखड़े सतह पर रगड़ते हुई खुद को निर्जीव, टूटे-फूटे, छोटे पड़ गए केंचुली से बाहर निकलते हैं। बाहर निकलते ही सर्प स्फुर्तिशील और चमकीले हो जाते हैं। जवान साँप साल में दो तीन बार केंचुली छोड़ते हैं जबकि बूढ़े हो गए साँप साल-दो साल में एक बार। चुकि केंचुली साँपों को एक तरह से नया जीवन देती है इसीलिए मेडिकल साइंस और चिकित्सकों के लोगो में ‘एक स्तम्भ से लिपटे दो सर्प’ हीलिंग के प्रतीकस्वरुप अंकित होते हैं।

©गोविंद माधव
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कुछ पेड़-पौधों के गंध साँपों को आकर्षित करते हैं, तो कुछ पौधों के इर्द-गिर्द शिकार की प्रचुरता उन्हें वहाँ ले जाती है। केंचुली छोड़ने के अलावा शिकार को निगलने के बाद उसे पचाने के लिए भी इन्हें किसी कठोर डंठल के चारो तरफ लिपटने की आवश्यकता होती है। चन्दन के पेड़, केवडा, रातरानी और कनेर की झाड़ियाँ साँपों के आश्रय के रूप में मशहूर हैं। पुराने खंडहर चूहों के लिए भी सुरक्षित घर होता है तो साँप भी ऐसे स्थान काफी पसंद करते हैं। शिकार निगलने के बाद उन्हें पचाने के लिए साँपों को करीब 4-5 घंटे लगते हैं, इस दौरान वे एकदम सुस्त हो जाते हैं, खतरे की स्थिति में या तो शिकार को उगल कर भाग जाते हैं या फिर मारे जाते हैं। एक चूहे का भोजन चार-पांच दिन के लिए पर्याप्त होता है। सभी साँप तेज नहीं रेंग पाते, इसीलिए प्रकृति ने उन्हें शिकार में सहायता के लिए ‘विषदंत’ यानि ‘फैंग’ प्रदान किया है। दुनिया का सबसे जहरीला साँप ‘करैत’ बहुत सुस्त और बेवकूफ होता है। इसीलिए यह इंसानी बस्ती के आसपास ही रहता है जहाँ शिकार की प्रचुरता होती है और इसे ज्यादा भागना नहीं पड़ता। अक्सर यह घर में घुस जाता है, बिस्तर में घुसकर इंसानों को काट लेता है, मगर काटने के बाद भी वहीँ पड़ा रहता है, भागता नहीं और इसीलिए मारा भी जाता है। जबकि कोबरा थोडा तेज भाग लेता है इसीलिए इंसानों से दूर ही रहना पसंद करता है। जबकि अधिकतर विषहीन साँप बहुत तेज भागने में सक्षम होते हैं। किसानों के घरों में पाए जानेवाले विषहीन ‘धामिन’ यानि ‘रैटस्नेक’ सबसे तेज दौड़ते हैं। चुकि ये हानिरहित सर्प घर से चूहों का सफाया कर देते हैं इसीलिए बहुत से किसान इन्हें मारते ही नहीं, बल्कि सौभाग्य का प्रतीक मान कर अनौपचारिक तरीके से पालते भी हैं।

©गोविंद माधव
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सभी साँप विषैले नहीं होते। विश्व में साँपों की कुल 3,600 स्पीशीज हैं, उनमे से करीब 2 हजार प्रजातियाँ भारत में भी मिलती हैं, मगर मात्र 725 प्रजातियाँ विषैली हैं। समुद्री जल में पाए जाने वाले सभी सर्प जहरीले होते हैं, मगर मीठे पानी के साँप विषहीन होते हैं। जलीय साँपों की पूँछ तैरने में सहायता करने के लिए चिपटी होती है।
जमीन पर पाए जानेवाले सांपो में कौन विषधर हैं और कौन विषहीन, ये कैसे पहचानें? अगर साँप पकड़ में नहीं आया या दिखा ही नहीं तो कैसे जानेंगे कि सर्पदंश विषयुक्त था या नहीं? क्या सभी सर्पदंश प्राणघातक होते हैं? क्या सर्पदंश बिना उपचार के भी ठीक होता है? झाड़-फूंक से भी सर्पदंश ठीक होता है क्या? सर्पदंश होने पर तुरंत क्या करें? सर्पदंश के उपचार में डॉक्टर क्या करते हैं, यह कितना प्रभावी है, क्या यह सर्वसुलभ है? सर्पदंश की दवा कैसे बनती है?

इन प्रश्नों के उत्तर जानने के लिए अगले अंक की प्रतीक्षा करें। (क्रमशः) 

(साभार : सेतु जून 2018 अंक)