Monday, November 26, 2018

पलामू के लईकन


आज बाल_दिवस न है, तो सोचे कि पलामू के लईकन से भेंट करवाया जाए। अरे! अभी के लईकन नहीं, अापन समय के लईकन से मिलवाते हैं। अब सोच रहें होंगे कि तब आऊ अब में फरक का पड़ा है, तो वो भी बता रहें है। इतना अकबकी काहे है, थोड़ा आराम-आराम से न।

हमनी जब पेट में रहते हैं न, तबे से सबके टेंशन स्टार्ट हो जाता है कि बेटा होगा कि बेटी होगी। सब जानकार लोग के सामने बढ़िया-बढ़िया अल्ट्रासाउंड_मशीन भी फेल हो जाता है। माई-बाप के छोड़ के बाकी हित जन जेतना हैं, सब अपन-अपन पूर्वानुमान करके बैठे रहते हैं| कौनो बाबा के नाम लेके कि "फलना के सबसे बढ़ बेटा होइल हलई तो एकरो बेटे होतई।" ओकरे में उधर से कौनो बढ़ फुआ_दादी इ सब आकर कहेंगी "हमरा मन तो कहैत बा कि बेटिये होतवा।" मान लीजिए इतना तर्क-वितर्क के बाद जनम ले लिए, उसके बाद उधर उनलोग सब अलगे लड़ेगा कि किसका भविष्यवाणी सही हुआ और दूसरा लड़ाई होगा नामकरण का। आपका कोई केतनो बढ़िया नाम रख दे, पर अलगे से २-४ ठो उपनाम तो मिल ही जाना है। कुछ भी न मिले तो दिन के नाम के हिसाब से नाम से उपनाम मिलना तो तय है। इसी का परिणाम है कि अभियो गांव में सोमरा, मंगरा, बुधना, बिफना, शुकरा आदि नाम का आदमी जरुरे मिल जाएगा।

छठी के टाइम गीत गा-गा के इतना नहवाया जाता है कि १०० में ९० को न्यूमोनिया उसी टाइम हो जाता है। हमलोग सेरेलेक्स खाते कम जनमघुंटी इतना ज्यादा पीते हैं, उसी का नतीजा है कि जिंदगी भर घुट- घुट के रहना नहीं पड़ता। जैसे ही थोडा बड़े होते थे तो अभी के बच्चा जैसा थोड़े न होता था कि जॉनसन_बेबी का ब्रांड एम्बेस्डर बने बैठे थे, हमलोग को तो बस करुआ_तेल के मालिश करके भर आँख काजर पोत के धुर में खेलने छोड़ दिया जाता था। आऊ तब तक खेलते रहते जब तक कि भूख नहीं लग जाता। आऊ भूखे छटपटाना केंकियाना शुरु करते तबे कुछ मिलता था। अमूल स्प्रे के जमाना था, फिर भी संतुष्टि तो माई के दूध ही पी के मिलता था और हो भी काहे नहीं दिन भर के काम के बीच यही तो टाइम मिलता था माई के गोदी में रहने का।

भले आज सब अढ़ाई-तीन साल में ही प्ले स्कूल जाने लगा है, पर हमनी तो चार-पाँच साल तक चंदा मामा दूर के आऊ माई के दूध में ही बिजी रहते थे। पाँच साल बाद सोचना स्टार्ट होता था कि हाँ अब स्कूल भेजना चाहिए। आउर सोचते -सोचते साल भर ऐसे ही निकल जाता था। हमलोग के उम्र का शायद ही कोई होगा, जिसका मैट्रिक के सर्टिफिकेट में ओरिजिनल जन्मतिथि लिखा हुआ हो। आउर इसके बाद स्कूल जाने का बारी आता था, जब तक झोंटा पकड़ के दू-चार झाप न पड़े तो मजाल है कि एक डेग स्कूल के तरफ बढ़ जाएँ| समझ जाइए दो-चार झाप में गाड़ी स्टार्ट होता था। उसके बाद से मुँह से हॉर्न बजाते हुए गाड़ी अपने आप स्कूल के तरफ बढ़ जाती थी।

स्कूल में 30 तक पहाड़ा, मनोहर_पोथी पढना, आउर गुरूजी से कुटाने का तो अलग मज़ा था, वो अबके बच्चे क्या जानें| एगो सिलेट में मिटका-मिटका के पहला-दूसरा क्लास ऐसे ही पार हो जाता था, तब जा के जिस्ता वाला कॉपी नसीब होता था। अब तो सब्जेक्ट से जादे कॉपी ही रहता है, लइकन के बैग में। तो स्कूल में भी लॉलीपॉप मिलने लगा है| बाकी बड़ा होने के बाद वाला स्टोरी युवा दिवस में सुनाएँगें। तब तक आपलोग भी अपना बचपन याद कीजिए और कुछ याद आए, तो हमे भी बताइए |

©Anand Keshaw

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