Tuesday, August 30, 2022

घरे पेंड़ोंकिया छनाइल है कि नहीं

 

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पूरा देश जब गणेश चतुर्थी के तैयारी में लगल रहता है, तब हम पलमूवा लोग तीज के तैयारी कर रहे होते हैं।
तीज एकमात्र पर्व है, जिसका इंतेजार हम लइकन लोग के बहुते दिन से रहता था। काहे कि माई तीज में पेंड़ोंकिया जे छानती थी।
पेंड़किया के आज कल के जादे पढ़ल रेंगन गुझिया कहता है, लेकिन हमिन घड़ी पेंड़किया या पंड़ोंकिया ही कहल जाता था। आजकल के गार्जियन लोग लइकन के खाये ला एकाध किलो पेंड़ोंकिया बज़ार से किन के ले आएगा। नहीं तो कुछ नवकी माई लोग साँचा से दबा-दबा के टेंढ़-भाकुच एकाध दर्जन पेंड़ोंकिया छान लेगी। अब एतना तो हमिन स्कूल में दोस्त लोग के बांट देते थे। बच्चा तनी घूम-घूम के एकाध हफ्ता पेंड़ोंकिया नहीं खाया, तो घर में तीज क्या मना?
कुछ साल पहले जब इतना मोबाइल और सास-बहू सीरियल का क्रेज़ नहीं था, तो आस पड़ोस की माता लोग, पारा-पारी सबके घर में पेंड़ोंकिया बनाने जाती थी। केकर घर केतना किलो खोवा के पेंड़ोंकिया छनाईल है, ई रुतबा का बात होता था। वैसे खोवा वाला दु चार दिन में अंउरा जाता था, सेही ला सूजी वाला भी छानल जाता था। असली में सूजी वाला परसादी बांटे ला छानल जाता था। लेकिन जब खोवा वाला पेंड़ोंकिया से डिब्बा खनिया जाता था, तो फिर सूजी वाला पे धूमच के टूट पड़ते थे। बाद में कुछ लोग बेसन वाला भी पेंड़ोंकिया बनाने का कोशिश किया, लेकिन हिट तो खोवा और सूजी वाला ही था। माई लोग के भी एकाध हफ्ता स्कूल के टिफिन बनावे से छुट्टी मिल जाता था। रोज पेंड़ोंकिया, रोज पेंड़ोंकिया, अब एक जान केतना सधाए। फिर कउनो बेचारा जे टिफिन मे रोटी-सब्जी या कुछ भी नमकीन ले आता था, ओकरे पे हमिन सब टूट पड़ते थे।
समय की कमीं कह लीजिए या परिवार में माताओं की बढ़ती वित्तिय जिम्मेवारी- नई पीढ़ी पेंड़ोंकिया गूँथने की कला ही भूल गई। हमारे समय में तो माँ लोग अनेकों प्रकार से पेंड़ोंकिया गूँथती थी। उस वक़्त हम बच्चे भी जबरदस्ती मदद करने के नाम आसान डिज़ाइन का पेंड़ोंकिया गूँथने का प्रयास करते थे (ज्यादातर कमल का फूल बनाते थे)। अब तो हाँथ से परफेक्टली गूँथा हुआ पेंड़ोंकिया जल्दी देखने को भी नहीं मिलता। अगर आपको इस बार खाने को मिलता है, तो यकीन मानिए कि आप एक विलुप्तप्राय रिवाज का अनुभव कर रहे हैं और आप बहुत भाग्यशाली हैं।
तो भाइयों और बहनों जिसके-जिसके घर खोवा वाला पेंड़ोंकिया छनाइल है, हमर घरे परसादी भेजना नहीं भुलायेगा। सूजी वाला पेंड़ोंकिया पे हम अगला हफ्ता जोर मारेंगे।
© सन्नी शुक्ला
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Friday, August 19, 2022

पलमुवा जन्माष्टमी

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बात उन दिनों की है, जब हम नया-नया होश संभाले थे। चुंकि हमलोग मोबाइल के पहले वाले किड्स हैं, तो हमारी दोस्ती आस-पास के दर्जनों बच्चों से थी। बच्चों में जन्माष्टमी को लेकर एक अलग हटके क्रेज रहता था। ये एकमात्र पर्व था, जिसमें लड़के भी उपवास रखते थे और उनका कोई मजाक नहीं बनाता था। दुसरों की ललकारी में हमने भी कई बार उपवास रखा था, जो कि बहुत ही गन्दा एक्सपेरिएंस था दिनभर भूखे रहने वाला। किसी और दिन इसपे अलग से एक आर्टिकल लिखेंगे।
सुबह से ही माँ लगी रहती थी, अपनी बगलगीर #गोई के साथ जन्माष्टमी के तैयारी में। आज जिक्र पूड़ी-सब्जी के अलावा कुछ अलग अलग दिखने वाले पकवान का जो उस समय जन्माष्टमी के दिन जरूर से बनते थे हमारे पलामू में:
1. #तिक्खुर_का_हलवा : ई सबसे इम्पोर्टेन्ट आइटम था। जन्माष्टमी का नाम लीजिये किसी पलमुवा के सामने और उसके मुँह में तिक्खुर का स्वाद तैरने लगेगा। आज की तारीख में बनने वाला कस्टर्ड जैसा कुछ कुछ कह सकते हैं। तिक्खुर(कहते थे कि खेक्सा का जड़ होता है) को सात पानी से धो कर, रात भर भीगो कर, बहुत ज्यादा दूध में उबाल कर खीर जइसा प्रोसेस से बनाते थे, माने की 50 ग्राम तिक्खुर पर ढाई लीटर दूध घांटना होता था। इसी से पलमुवा कहावत भी निकला था "तिक्खुर घोंटत हें का रे?", अर्थात "एतना देर काहे लग रहा है?"
2. #सिंघाड़ा_के_आटे_का_हलवा: नार्मल आटा के हलवा जैसा घी में भूंज के बनाते थे।
3. #पंजरी- खड़ा धनिया को भून कर और उसमें चीनी मिला कर बनाते थे।
4. #हरदी- हल्दी को घी में भूंज के और उसमें गुड़ डाल के बनाते थे। लरकोरी लोग को बहुत खिलाया जाता है, आपलोग जरूर देखे होंगे।
इन सबके अलावा भी बहुत कुछ जरूरी था जन्माष्टमी के पूजा थाल के लिए, जैसे माखन और मिश्री (भगवान को भोग लगाने के लिए), फल में केला बहुत जरूरी था अगरबत्ती खोंसने के लिए और खीरा लड्डू गोपाल के जन्म के लिए।
जन्माष्टमी पर्व हमारे पलमुवा संस्कृति का अभिन्न अंग थी, बहुत गर्मजोशी से मनाते थे हमलोग। हर पर्व की तरह इसको मनाने का भी एक अलग अंदाज था। कुछ परंपराएं थी, जिसे बनने में सैकड़ो साल लगे थे और आज की पीढ़ी ने कुछ साल में ही सब भुला दिया। गार्जियन अपने बच्चे को कृष्णा का ड्रेस पहना कर और स्टेटस अपडेट मार कर जन्माष्टमी मना लेते हैं और आज की 10 मिनट में खाना बना लेने वाली माताओं से ढेरों पकवान बनाने की आशा करना ही बेकार है।
कृष्ण-झूला से रिलेटेड बातें जान बूझ कर छोड़ रहा हूँ। उम्मीद है आप अपने घर में बने झूले की तस्वीर और अनुभव कमेंट बॉक्स में जरूर से शेयर करेंगे।
© सन्नी शुक्ला
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Monday, August 15, 2022

प्रभात फेरी

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यूँ तो इस बार हर तरफ स्वतंत्रता दिवस का अमृत महोत्सव मनाया जा रहा है या मनवाया जा रहा है जिससे घर घर तिरंगा विराजमान हो गया है।मगर हमे आज भी याद है वो बचपन के दिन जब 15 अगस्त या 26 जनवरी हमारे लिए देशभक्ति के प्रदर्शन से ज्यादा एक उत्सव की तरह होता था...
ऐसा नहीं है कि हमारे जमाने में स्वतंत्रता दिवस धूम-धाम से नहीं मनाया जाता था। हमारी तैयारी तो कई हफ्तों से चलती थी, पर आज आपको सिर्फ 15 अगस्त की दिनचर्या बताते हैं। उसी से आपको हमारे वक़्त में स्वतंत्रता दिवस के आयोजन की भव्यता का अंदाजा लग जायेगा। उस वक़्त हर घर में तिरंगा फहराने का परमिशन नहीं था। सिर्फ सरकारी कार्यालयों या विद्यालयों में ही झंडोतोलन हो सकता था। हालांकि तब तिरंगा खरीदना सबके कपैसिटी की बात भी नहीं थी।
हमारे गांव में एक सरकारी स्कूल था और ध्वजारोहण का कार्यक्रम भी सिर्फ वहीं पर होता था। झंडोत्तोलन और ध्वजारोहण मे फर्क़ है, कुछ लोग शायद इससे वाकिफ होंगेl सुबह भीनसारे होने से पहले ही #प्रभातफेरी का आयोजन किया जाता था। प्रभात फेरी बच्चों की वह शानदार रैली होती थी, जो भोरे भोरे आस-पास के समूचे इलाके में घूम कर स्वतंत्रता दिवस का माहौल सेट कर देती थी। इस परंपरा की शुरुआत हम देश को मिली नयी नयी आज़ादी के समय से जोड़ सकते हैं, जब अखबार समाचार इतने सुलभ नहीं थे, दो जून की रोटी में मगन जनता को पता भी नहीं होता था कि 15 अगस्त कब आ गया और क्यों आ गया। तब शायद सरकार की ओर से जागरूकता फैलाने के लिए प्रभात फेरी का आयोजन किया जाने लगा। हालांकि सन 47 के पहले भी बड़े नेताओं की भीड़ जुटाने के लिए या फिर आजादी का अलख जगाने के लिए प्रभात फेरी का आयोजन होता था।
खैर अभी हम अपने #बचपन के प्रभात फेरी में लौटते हैं। फेरी में कौन-कौन से नारे लगने हैं, इसका डिसिशन एक दिन पहले ही बच्चों द्वारा बहुमत से ले लिया जाता था। पता नहीं क्यों लेकिन 'डॉ लोहिया की जय' सबका फेवरेट होता था। खूब लड़ी मर्दानी, वंदे मातरम, सारे जहां से अच्छा आदि गीतों के मुखड़े भी नारों की शृंखला में शामिल रहते थे। चूंकि उस वक़्त रेडीमेड झंडा उपलब्ध नहीं होता था, तो हम सब बच्चे जिस्ता वाले सफेद पन्ने को छड़ी में चिपका कर झंडा बनाते थे, जिसके लिए मोम वाली रंग या वाटर कलर का इस्तेमाल होता था। कोशिश यही रहती थी कि सभी बच्चों के हांथों में तिरंगा झंडा जरूर रहे। कुछ न मिले तो कम से कम डंडा लाठी जरूर रहे, जो कभी जोश भरने के काम आते तो कभी गली से कुत्ते से बचाव के लिए। जिस बच्चे की नींद भोर में सबसे पहले खुलती था, उसकी जिम्मेवारी होती थी कि गांव में सभी बच्चों के घर खटखटा कर अलार्म बजा दिया जाए। हाफ-पैंट में ही, हांथ में डंडा- झंडा लिए भोरे-भोरे हम सभी बच्चे अपने-अपने घरों से प्रभात फेरी में शामिल होने के लिए निकल जाते थे। प्रभात फेरी के रूट का डिस्कशन बहुत डिटेल के साथ होता था। अगर किसी के घर वाले देर तक सोते रहते थे, तो उधर फेरी आखिरी में जाएगी। नारा लगायें तो कोई सुनने वाला भी तो होना चाहिए ना जी। अगर किसी गली में कोई काना कुत्ता दौड़ाता है, तो उधर नहीं जाना है। हमारी कोशिश रहती थी कि उजाला होने के पहले ही फेरी खत्म कर के नारा लगा के लौट आएं। उस वक़्त मोबाइल फ़्लैश लाइट या टोर्च तो होती नहीं थी। और बारिस का मौसम ऊपर से घनाघुप अंधेरा। तो हम लोग घर से माचिस की तिल्ली ले कर आते थे, लकड़ी की छड़ी में आग जला कर मसाल बनाने के लिए। इससे क्रान्तिकारी होने का जबर अहसास होता था। फिर अंधेरे में लाठी पटकते हुए नारा लगाने में जो मज़ा आता था ना कि क्या बताएं। अंदर से जोश भर जाता था। संघ की शक्ति के अहसास से अंदर का भगत सिंह जाग जाता था। कभी कभी ज्यादा क्रांतिकारी होकर हम पड़ोसी गाँव को दुश्मन देश समझ कर बदला लेने की मासूम रणनीति पर भी काम कर लेते थे। प्रभात फेरी में गांव और आस पास के एक दो किलोमीटर तक तो पूरा राउंड में हमलोग कवर कर ही लेते थे, पहली बार मौका जो मिलता था ग्रुप में हल्ला मचाने का इस तरह।
प्रभात फेरी जब लौट कर गाँव के विद्यालय पहुंचती थी, तो हमें जल्दी-जल्दी चबूतरा (झंडोतोलन का स्थान) साफ कर के सजा लेना होता था। किरण फूटते ही यह सब काम कर के घर भी लौटना होता था, नहा धोकर वापस समारोह में शामिल होने के लिए घर घर से फूल तसीलते हुए। कुछ बड़े स्कूल में लाउड स्पीकर से देशभक्ति के गाने बजने लगते थे। वही गाने जो हम कुछ दिन पहले स्कूल मे बेचने आए देशभक्ति गीत की किताब से रट रहे होते थे। उस दिन न जाने क्यों गाने की धुन दिल में सिहरन पैदा कर देती थी। भाषण प्रतियोगिता के लिए रटे गए लाइन जैसे दुगनी ऊर्जा से बाहर निकलने वाले थे।
तब तक सभी शिक्षक और गांव वाले भी स्कूल कैंपस में जमा होने लगते थे। दनादन कुछ बच्चे रंगबिरंगी झंडियां काट कर सुतरी में चिपका कर परिसर को सजाने में लग जाते थे।तो कुछ फूल से चबूतरा पर कुछ-कुछ सुंदर आकृतियां बनाने लगते थे। आटा अबीर से जमीन पर देश का नक्शा बनना भी अलग कौतुहल का विषय होता था। हमारे स्कूल का चपरासी झंडा बांधने में एक्सपर्ट था, तो उस काम को करने का पेटेंट उसी के पास था। झंडा बांधते समय हम सभी बच्चे बहुत भक्तिभाव से उसको देखते रहते थे कि कैसे वो झंडा के बीच में फूल रख, मोड़ रहा है और कैसे रस्सी का फंदा बना रहा है। उसकी कला आज भी मेरे लिए एक अबूझ पहेली है। लेकिन मजाल थी कि झंडा कभी भी जमीन से छू जाए। झंडे की गरिमा हमेशा बनी रहे, इसका बहुत ही खास ध्यान रखा जाता था। तिरंगा झंडे को हमेशा हमलोग बहुत पवित्र मानते थे और झंडे को कभी रखना भी हुआ थोड़ी देर के लिए, तो दीवाल से ओट करके रखते थे, ताकि झंडा पर किसी का गलती से भी पैर ना लगे, नाहीं झंडा जमीन को छू पाये।
स्कूल में हर कोई अपने हैसियत के हिसाब से सर्वश्रेष्ठ दिख रहा होता था। सभी बच्चे बहुत पहले से ही उस दिन पहनने वाले कपड़ों को आयरन कर के रख लेते थे। हमारे शिक्षकगण भी खादी का कुर्ता और उसपर फबती बंडी जैकेट पहनने को वरीयता देते थे। प्रधानाध्यापक महोदय तो एक कदम और आगे बढ़ कर गांधी टोपी भी धारण करते थे।
तकरीबन 8 बजे प्रधानाध्यापक महोदय झंडोतोलन करते थे और उसके तुरंत साथ में ही राष्ट्रगान शुरू होता था। उसके बाद सांस्कृतिक प्रोग्राम चालू हो जाता था और बजट के हिसाब से हम बच्चों में पंचपईसवा टॉफी (आज के दिन में आपको शॉपिंग मॉल में 'हार्ड बॉयल्ड कैंडी' कह कर चमकदार डब्बे में काफी महंगा मिलेगा) बांटा जाता था। कुछ बच्चे जो प्रभात फेरी के बाद जब घर लौटते थे तो वहीं से उनकी माताजी लुकमा लेकर खेत में भेज देती थी। बेचारे बहुत बार हफ्तों भाषण की तैयारी करते थे पर पारिवारिक व्यस्तता के कारण वक्त पर भाषण नहीं दे पाते थे।
तकरीबन 11 बजे के आस-पास झंडोतोलन कार्यक्रम खत्म हो चुका होता था। शिक्षकगण भी अपने-अपने घरों को लौटने लागते थे। लेकिन तिरंगा झंडा शान से शाम तक लहराता रहता था और अंधेरा होने के पहले उसे उतारने की जिम्मेवारी 7वां क्लास का मॉनिटर को दिया जाता था। उसके पहले दूरदर्शन पर हम रोजा फिल्म का रिवीजन कर चुके होते थे। कोई दोस्त किसी प्रतियोगिता में सांत्वना पुरस्कार लेकर ख़ुश हो चुका होता था, कोई अगली बार की रणनीति बना रहा होता था।
आज जब शिक्षा का पूर्णतः व्यवसायीकरण हो चुका है और 15 अगस्त अर्थात छुट्टी का दिन हो चुका है। बहुत तकलीफ होती है जब आज के अंग्रेज़ी कल्चर वाले स्कूलों में नई रिवाज देखता हूँ। प्रभात फेरी की इतनी शानदार परंपरा तो अब यादों के झरोखे में ही कैद है।
आप सबों को स्वतंत्रता दिवस की 75वीं वर्षगांठ पर #ठेठ_पलामू की ओर से बहुत-बहुत शुभकामनाएं।
© रोहित, राकेश, गोविंद, शिवांगी, स्वामी, मुकेश

Thursday, August 11, 2022

रक्षाबंधन': बहन की कलम से

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रक्षाबंधन एकमात्र त्योहार है, जिसमें मिली हुई नगदी पर बेटियों का एकक्षत्र अधिकार होता था। वरना माताश्री की वसूली तो जगजाहिर है। ये कहते हुए की पैसों से बच्चे बिगड़ जाते हैं, तो बच्चों के हांथ में पैसे रहने ना पाये, इसका पूरा ध्यान माताजी के द्वारा रखा जाता था।
रक्षाबंधन आने के बहुत पहले से ही हमारी प्लानिंग शुरू हो जाती थी। फोम, किरण गोटा, गत्ता, कागज़ औऱ कपड़ा - जितनी मोटी औऱ सतहों वाली बड़ी राखी होती थी, उसका आकर्षण उतना ही ज्यादा होता था। बाज़ार और अमला टोली के सारे श्रृंगार स्टोर, कई दिन पहले से ही जैसे पट जाते हों, राखियों की चमक से। पता नहीं भाइयों के लिए सर्वश्रेष्ठ राखी लाने की तमन्ना थी या बालमन की चंचलता, राखी हमेशा बजट से ज्यादा वाली ही पसंद आती थी। फिर भी पूरा बाजार घूम कर भी हम बहनें, अपने भाइयों के लिए सबसे ज्यादा सुंदर वाली राखी ढूंढ ही लाती थीं। लेकिन संतुष्टि तो तब होती थी, जब भइया मेरी राखी हांथ पर बांध राजकुमार जैसा इठलाता फिरता था। किसके हाथ पर कितनी राखी बँधी हुयी है, यह भी एक कम्पटीशन की बात होती थी। अलग-अलग डिज़ाइन के मनभावन राखी होते थे; किसी में चंदन की लकड़ी, किसी में घड़ी, किसी में चॉकलेट, तो कोई जरी वाली कीमती राखी, तो कोई मोतियों वाली पतली राखी। एक बार पहने तो दिन भर पहने ही रहे, पहन के घूमते रहे ...जब तक सारे दोस्त-यार ना देख लें, तब तक भाइयों का शानदार शोऑफ चलता ही रहता था।
हर त्योहार की तरह रक्षाबंधन भी समय के साथ मॉर्डनाइज हो गया है। पहले जहां बहन और भाई, राखी के बहाने एक दूसरे से जरूर मिलते थे, पर अब ऑनलाइन ही राखी भेज दिया जाता है और भाई भी Gpay/Paytm करके अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो जाते हैं।
दूसरा गंभीर विषय यह है कि आजकल भाई बहन अगर सगे ना हुए, तो उन्हें जाने क्यूँ 'कजिन्स ' कहने का चलन हो गया है। कजिन्स शब्द इतना पराया कर देता है कि हमारी अगली पीढ़ी शायद उन्हें भाई-बहनों की श्रेणी में शुमार ही ना करें। वरना एक हम थे कि चाहे चचेरा, मौसेरा, ममेरा, फुफेरा, मुँहबोला, बगलगीर - कैसा भी रिश्ता हो, भाई बहन का रिश्ता सगा ही मानते थे। मजाल है कि कभी राखी खरीदना किसी भी भाई के लिए भूले हों।
घर में बनी खीर, सेवई, गुलगुला, पूरी, सब्ज़ी, हनुमान मंदिर का छेना-मुरकी, परवल कि मिठाई, मधुबन का रसगुल्ला; जिव्हा को आकर्षित करने के लिए पापा से कम फरमाइशें नहीं करते थे हम। जब तक थाली में वैरायटी-वैराइटी की मिठाई नहीं दिखती थी, आरती उतारने में मज़ा ही नहीं आता था।
"कोरोना काल के बहानें, ऑनलाइन बिना चिट्ठी-पत्री, बिना मिठाई और प्रेम के, सूखी राखी भेजी या मटिया दी, या कई लोगों ने तो ये त्यौहार भी बस टाल दी।"
पर अब बस भाइयों/बहनों, उत्साह भूलें नहीं, याद रखें। रोड़ी अभी भी उतनी ही सुर्ख लाल है। राखी के धागे की पवित्रता कई परिवर्तनों के बावजूद अभी भी अक्षुण्ण है। भाई का उपहार, बहन का दुलार, ये प्यारा बंधन बहुत बेमिसाल है।
© शिवांगी शैली
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Tuesday, August 9, 2022

डाल्टनगंज कि मेदिनीनगर ?

 अगर यही सवाल महाराष्ट्र में पूछ लीजिये कि मुम्बई या बम्बई, तो आपको दिन में तारे दिखते समय नहीं लगेगा। मद्रास भी चेन्नई बहुत आसानी से बन गया। तमिल लोग गलती से भी चेन्नई को मद्रास बोलते नहीं दिखेंगे। तो फिर क्या वजह है कि हम अपने बोलचाल में मेदिनीनगर बोलने में हिचक महसूस करते हैं? लाख कोशिश कर लीजिए डाल्टनगंज है कि जाता ही नहीं है और मेदिनीनगर है कि आता ही नहीं है, जबान बोलने से भी इनकार कर देता है।

डाल्टनगंज है भी तो वैसे औपनिवेशिक शासन की देन। स्कूल में केमिस्ट्री किताब में जॉन डाल्टन पढ़े तो लगा कि 'ओ तो ये हैं डाल्टन साहेब, हमारे शहर के संस्थापक!' बाद में मेडिकल के दोस्त मजाक भी बनाते थे कि डालटोनिज़्म अर्थात कलर ब्लाइंडनेस भी तुम्हारे यहां से ही आया है। बाद में पता चला ढेरे डाल्टन हुए हैं इतिहास में।
कुछ तथाकथित बुद्धिजीवी लोग डाल्टनगंज का नाम बदलने को लेकर पिल पड़ गए और नाम बदलवा के भी माने। अपनी जगह पर उनका तर्क भी सही ही होगा। नाम में क्या रखा है? बदलते रहता है। उससे वास्तविकता में कोई बदलाव थोड़े आता है। एक पुराना जोक याद आ गया कि कुत्ता का नाम शेरू रख देने से वो कुत्ता ही रहेगा ना, शेर थोड़े हो जाएगा। फिर तो हम लोगों को बहुत मुश्किल नहीं होनी चाहिये थी, मेदिनीनगर नाम को स्वीकार करने में?
लेकिन सच्चाई है इसके बिलकुल उलट। जब से हम लोग होश संभाले हैं, डाल्टनगंज का अस्तित्व था और रहेगा। डाल्टनगंज कोई हाइवे के किनारे का कसबा नहीं था, जो धीरे धीरे हाइवे के चारों ओर बढ़ता चला गया और फिर हाईवे को बाइपास करना पड़ा। डाल्टनगंज देश के सबसे पुराने शहरों में से एक है और जिसका इतिहास एक सदी से भी पुराना जाता है। हर बड़े शहर की तरह इसकी अपनी कॉस्मोपॉलिटन संस्कृति है, जिसमें अवधि, मगही, भोजपुरी, हिंदी, उर्दू, बंगाली, आदिवासी और न जाने कितने संस्कृतियों का मिश्रण देखने को मिल जाता है। डाल्टनगंज तब भी था जब हमारा राज्य बिहार नहीं बंगाल कहलाता था। डाल्टनगंज किसी भी गाँव के सबसे बुजुर्ग इंसान के जन्म के पहले से है, तो कोई ये कहे कि इसका नाम ये था, वो था और अब ये हो गया है, तो भाई हमर ला तो ई डाल्टनगंज ही रहेगा। अगिलका पीढ़ी के शायद मेदिनीनगर बोलने में सहूलियत हो जाये, हमरा से तो नहीं हो पायेगा।
डाल्टनगंज हमारे लिए मेदिनीनगर हो भी नहीं सकता है, उसमें वो फीलिंग्स ही नहीं आती है, वो जुड़ाव ही नहीं महसूस होता, जो डाल्टनगंज के लिए होता है। डाल्टनगंज बाहर के लोगों को बोलो तो एक हिल स्टेशन वाला फीलिंग्स आता है। वैसे भी डाल्टनगंज हमारे लिए सिर्फ एक शहर नहीं है, ये तो लालटनगंज, ढिभरीगंज, डी-गंज और ना जाने कितने रूपों में हमारे अंदर समाया हुआ है। आचार्य श्रीलाल शुक्ल जी के शब्दों में हम सहीं मायने में गंजहा हैं, नगरिया नहीं बनना हमें।
©सन्नी शुक्ला
( ये लेखक के निजी विचार हैं। हम मेदिनीनगर नाम के प्रसंशको से उनके विचार कमेन्ट बॉक्स में आमंत्रित करते हैं। )
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