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रक्षाबंधन एकमात्र त्योहार है, जिसमें मिली हुई नगदी पर बेटियों का एकक्षत्र अधिकार होता था। वरना माताश्री की वसूली तो जगजाहिर है। ये कहते हुए की पैसों से बच्चे बिगड़ जाते हैं, तो बच्चों के हांथ में पैसे रहने ना पाये, इसका पूरा ध्यान माताजी के द्वारा रखा जाता था।
रक्षाबंधन आने के बहुत पहले से ही हमारी प्लानिंग शुरू हो जाती थी। फोम, किरण गोटा, गत्ता, कागज़ औऱ कपड़ा - जितनी मोटी औऱ सतहों वाली बड़ी राखी होती थी, उसका आकर्षण उतना ही ज्यादा होता था। बाज़ार और अमला टोली के सारे श्रृंगार स्टोर, कई दिन पहले से ही जैसे पट जाते हों, राखियों की चमक से। पता नहीं भाइयों के लिए सर्वश्रेष्ठ राखी लाने की तमन्ना थी या बालमन की चंचलता, राखी हमेशा बजट से ज्यादा वाली ही पसंद आती थी। फिर भी पूरा बाजार घूम कर भी हम बहनें, अपने भाइयों के लिए सबसे ज्यादा सुंदर वाली राखी ढूंढ ही लाती थीं। लेकिन संतुष्टि तो तब होती थी, जब भइया मेरी राखी हांथ पर बांध राजकुमार जैसा इठलाता फिरता था। किसके हाथ पर कितनी राखी बँधी हुयी है, यह भी एक कम्पटीशन की बात होती थी। अलग-अलग डिज़ाइन के मनभावन राखी होते थे; किसी में चंदन की लकड़ी, किसी में घड़ी, किसी में चॉकलेट, तो कोई जरी वाली कीमती राखी, तो कोई मोतियों वाली पतली राखी। एक बार पहने तो दिन भर पहने ही रहे, पहन के घूमते रहे ...जब तक सारे दोस्त-यार ना देख लें, तब तक भाइयों का शानदार शोऑफ चलता ही रहता था।
हर त्योहार की तरह रक्षाबंधन भी समय के साथ मॉर्डनाइज हो गया है। पहले जहां बहन और भाई, राखी के बहाने एक दूसरे से जरूर मिलते थे, पर अब ऑनलाइन ही राखी भेज दिया जाता है और भाई भी Gpay/Paytm करके अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो जाते हैं।
दूसरा गंभीर विषय यह है कि आजकल भाई बहन अगर सगे ना हुए, तो उन्हें जाने क्यूँ 'कजिन्स ' कहने का चलन हो गया है। कजिन्स शब्द इतना पराया कर देता है कि हमारी अगली पीढ़ी शायद उन्हें भाई-बहनों की श्रेणी में शुमार ही ना करें। वरना एक हम थे कि चाहे चचेरा, मौसेरा, ममेरा, फुफेरा, मुँहबोला, बगलगीर - कैसा भी रिश्ता हो, भाई बहन का रिश्ता सगा ही मानते थे। मजाल है कि कभी राखी खरीदना किसी भी भाई के लिए भूले हों।
घर में बनी खीर, सेवई, गुलगुला, पूरी, सब्ज़ी, हनुमान मंदिर का छेना-मुरकी, परवल कि मिठाई, मधुबन का रसगुल्ला; जिव्हा को आकर्षित करने के लिए पापा से कम फरमाइशें नहीं करते थे हम। जब तक थाली में वैरायटी-वैराइटी की मिठाई नहीं दिखती थी, आरती उतारने में मज़ा ही नहीं आता था।
"कोरोना काल के बहानें, ऑनलाइन बिना चिट्ठी-पत्री, बिना मिठाई और प्रेम के, सूखी राखी भेजी या मटिया दी, या कई लोगों ने तो ये त्यौहार भी बस टाल दी।"
पर अब बस भाइयों/बहनों, उत्साह भूलें नहीं, याद रखें। रोड़ी अभी भी उतनी ही सुर्ख लाल है। राखी के धागे की पवित्रता कई परिवर्तनों के बावजूद अभी भी अक्षुण्ण है। भाई का उपहार, बहन का दुलार, ये प्यारा बंधन बहुत बेमिसाल है।
© शिवांगी शैली

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