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पूरा देश जब गणेश चतुर्थी के तैयारी में लगल रहता है, तब हम पलमूवा लोग तीज के तैयारी कर रहे होते हैं।
तीज एकमात्र पर्व है, जिसका इंतेजार हम लइकन लोग के बहुते दिन से रहता था। काहे कि माई तीज में पेंड़ोंकिया जे छानती थी।
पेंड़किया के आज कल के जादे पढ़ल रेंगन गुझिया कहता है, लेकिन हमिन घड़ी पेंड़किया या पंड़ोंकिया ही कहल जाता था। आजकल के गार्जियन लोग लइकन के खाये ला एकाध किलो पेंड़ोंकिया बज़ार से किन के ले आएगा। नहीं तो कुछ नवकी माई लोग साँचा से दबा-दबा के टेंढ़-भाकुच एकाध दर्जन पेंड़ोंकिया छान लेगी। अब एतना तो हमिन स्कूल में दोस्त लोग के बांट देते थे। बच्चा तनी घूम-घूम के एकाध हफ्ता पेंड़ोंकिया नहीं खाया, तो घर में तीज क्या मना?
कुछ साल पहले जब इतना मोबाइल और सास-बहू सीरियल का क्रेज़ नहीं था, तो आस पड़ोस की माता लोग, पारा-पारी सबके घर में पेंड़ोंकिया बनाने जाती थी। केकर घर केतना किलो खोवा के पेंड़ोंकिया छनाईल है, ई रुतबा का बात होता था। वैसे खोवा वाला दु चार दिन में अंउरा जाता था, सेही ला सूजी वाला भी छानल जाता था। असली में सूजी वाला परसादी बांटे ला छानल जाता था। लेकिन जब खोवा वाला पेंड़ोंकिया से डिब्बा खनिया जाता था, तो फिर सूजी वाला पे धूमच के टूट पड़ते थे। बाद में कुछ लोग बेसन वाला भी पेंड़ोंकिया बनाने का कोशिश किया, लेकिन हिट तो खोवा और सूजी वाला ही था। माई लोग के भी एकाध हफ्ता स्कूल के टिफिन बनावे से छुट्टी मिल जाता था। रोज पेंड़ोंकिया, रोज पेंड़ोंकिया, अब एक जान केतना सधाए। फिर कउनो बेचारा जे टिफिन मे रोटी-सब्जी या कुछ भी नमकीन ले आता था, ओकरे पे हमिन सब टूट पड़ते थे।
समय की कमीं कह लीजिए या परिवार में माताओं की बढ़ती वित्तिय जिम्मेवारी- नई पीढ़ी पेंड़ोंकिया गूँथने की कला ही भूल गई। हमारे समय में तो माँ लोग अनेकों प्रकार से पेंड़ोंकिया गूँथती थी। उस वक़्त हम बच्चे भी जबरदस्ती मदद करने के नाम आसान डिज़ाइन का पेंड़ोंकिया गूँथने का प्रयास करते थे (ज्यादातर कमल का फूल बनाते थे)। अब तो हाँथ से परफेक्टली गूँथा हुआ पेंड़ोंकिया जल्दी देखने को भी नहीं मिलता। अगर आपको इस बार खाने को मिलता है, तो यकीन मानिए कि आप एक विलुप्तप्राय रिवाज का अनुभव कर रहे हैं और आप बहुत भाग्यशाली हैं।
तो भाइयों और बहनों जिसके-जिसके घर खोवा वाला पेंड़ोंकिया छनाइल है, हमर घरे परसादी भेजना नहीं भुलायेगा। सूजी वाला पेंड़ोंकिया पे हम अगला हफ्ता जोर मारेंगे।
© सन्नी शुक्ला

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